“तू इतनी सुंदर, इतनी पढ़ी-लिखी है। वह तो तेरे पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है।”
“तुझे यह सब सहने की कोई ज़रूरत नहीं है। अपना सामान बांध और घर आ जा। हम बैठे हैं न तेरी देखभाल के लिए।”
दीनानाथ जी हमेशा काव्या को समझाते थे। “बेटा, घर ऐसे नहीं बसते। थोड़ा धैर्य रखना पड़ता है। अभिषेक बहुत अच्छा लड़का है। तुम्हारी माँ की बातों में आकर अपना घर मत उजाड़ो।” लेकिन काव्या पर तो अपनी माँ की बातों का ऐसा पर्दा पड़ा था कि उसे अपने पिता की कोई बात समझ ही नहीं आती थी।
सुमित्रा देवी के चेहरे पर आज ऐसी चमक थी जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो। उनके घर के दालान में आज उत्सव का सा माहौल था। मेज पर महंगी मिठाइयों के डिब्बे खुले रखे थे और घर की नौकरानी शांति को बार-बार हिदायतें दी जा रही थीं। सुमित्रा देवी ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए कहा, “अरे शांति, जा जल्दी से इलायची वाली कड़क चाय बना कर ला। और सुन, काजू-किशमिश वाली नमकीन भी प्लेट में निकाल लेना। आज तो वकील साहब भी चाय पीकर ही जाएंगे। आख़िर उन्होंने इतना बड़ा केस जिताया है मेरी बेटी को। आज मेरी बच्ची को उस नरक से आज़ादी मिल गई है।”
वकील साहब सोफे पर बैठे मुस्कुरा रहे थे, और उनके सामने बैठे थे सुमित्रा देवी के पति, दीनानाथ जी। दीनानाथ जी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वे बस चुपचाप अपनी चाय का कप घूर रहे थे। उनकी खामोशी में एक गहरा दुख छिपा था, जिसे सुमित्रा देवी अपनी खुशी के शोर में सुन नहीं पा रही थीं।
“सच कह रही हैं आप सुमित्रा जी,” वकील साहब ने मिठाई का एक टुकड़ा उठाते हुए कहा, “यह केस थोड़ा मुश्किल था, लेकिन आख़िरकार हमने सिद्ध कर ही दिया कि काव्या के लिए वह घर और वह लड़का दोनों ही सही नहीं थे। अब आपकी बेटी पूरी तरह से आज़ाद है।”
लेकिन क्या सचमुच काव्या आज़ाद थी? क्या वह सच में खुश थी?
घर के अंदर, एक अंधेरे कमरे में, काव्या अपने बिस्तर पर निढाल पड़ी थी। उसके हाथ में अदालत का वह अंतिम फैसला था जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘तलाकशुदा’ लिखा था। वह शब्द उसकी आँखों में चुभ रहा था। बाहर से आती ठहाकों और बधाइयों की आवाज़ें उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह पड़ रही थीं। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई और सुमित्रा देवी चहकती हुई अंदर आईं।
“काव्या, मेरी बच्ची! उठ जा, देख बाहर सब कितने खुश हैं। वकील साहब बैठे हैं, जा जाकर उनका धन्यवाद कर। शांति चाय ला रही है, तू भी आ कर हमारे साथ बैठ।”
काव्या ने अपनी सूजी हुई आँखें उठाईं और अपनी माँ की ओर देखा। “माँ, मुझे अकेला छोड़ दो। मेरे सिर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है। मुझे कोई जश्न नहीं मनाना।”
“अरे, ऐसे कैसे? चाय पिएगी तो सिर का दर्द भी ठीक हो जाएगा। उठ जा अब, रोना-धोना छोड़ दे। जो हुआ अच्छे के लिए हुआ,” सुमित्रा देवी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
काव्या ने झटके से अपनी माँ का हाथ हटा दिया। “यह आराम और यह खुशी आपको ही मुबारक हो माँ। मुझे इस आज़ादी से घुटन हो रही है। मुझे कोई चाय नहीं पीनी।” उसने उठकर माँ को कमरे से बाहर किया और इतनी ज़ोर से दरवाज़ा बंद किया कि उसकी आवाज़ से पूरा घर एक पल के लिए सन्न रह गया।
दरवाज़े के पीछे ज़मीन पर बैठकर काव्या फूट-फूट कर रोने लगी। वह आज़ादी, जिसके लिए पिछले एक साल से वह कोर्ट के चक्कर काट रही थी, आज उसे एक खोखले पिंजरे जैसी लग रही थी। उसने यह रिश्ता खुद चुना था। अभिषेक से उसकी शादी कोई पारिवारिक समझौता नहीं थी, बल्कि एक गहरा प्यार था। अभिषेक एक बहुत ही सीधा, सुलझा हुआ और प्यार करने वाला इंसान था। दीनानाथ जी तो शुरू से ही अभिषेक को अपने बेटे से बढ़कर मानते थे। उनकी नज़र में अभिषेक काव्या के लिए सबसे बेहतरीन जीवनसाथी था। लेकिन सुमित्रा देवी को अभिषेक कभी पसंद नहीं आया। उन्हें हमेशा लगता था कि अभिषेक उनकी बेटी के लायक नहीं है, उसका रुतबा उनके परिवार के हिसाब से छोटा है।
शादी के शुरुआती दिन बहुत खूबसूरत थे। अभिषेक काव्या का बहुत ख्याल रखता था। वह उसकी हर छोटी-बड़ी खुशी का ध्यान रखता था। लेकिन हर पति-पत्नी की तरह उनके बीच भी छोटी-मोटी नोकझोंक होती थी। कभी अभिषेक को काम से आने में देर हो जाती, कभी वह काव्या को समय नहीं दे पाता। ये बातें बहुत सामान्य थीं, लेकिन काव्या की सबसे बड़ी गलती यह थी कि वह इन छोटी-छोटी बातों को अपनी माँ सुमित्रा देवी को बता देती थी।
सुमित्रा देवी को जैसे इसी मौके की तलाश रहती थी। वह तिल का ताड़ बनाने में माहिर थीं। काव्या जब भी शिकायत करती, सुमित्रा देवी उसके कानों में ज़हर घोलना शुरू कर देतीं।
“देखा? मैंने तो पहले ही कहा था वह तेरी कद्र नहीं करेगा। वह तुझे अपनी जागीर समझता है।”
“तू इतनी सुंदर, इतनी पढ़ी-लिखी है। वह तो तेरे पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है।”
“तुझे यह सब सहने की कोई ज़रूरत नहीं है। अपना सामान बांध और घर आ जा। हम बैठे हैं न तेरी देखभाल के लिए।”
दीनानाथ जी हमेशा काव्या को समझाते थे। “बेटा, घर ऐसे नहीं बसते। थोड़ा धैर्य रखना पड़ता है। अभिषेक बहुत अच्छा लड़का है। तुम्हारी माँ की बातों में आकर अपना घर मत उजाड़ो।” लेकिन काव्या पर तो अपनी माँ की बातों का ऐसा पर्दा पड़ा था कि उसे अपने पिता की कोई बात समझ ही नहीं आती थी। उसे अपनी माँ सबसे बड़ी हमदर्द लगती थीं और अभिषेक अपना सबसे बड़ा दुश्मन। इसी गलतफहमी और माँ की चढ़ाई हुई बातों में आकर उसने एक दिन अभिषेक का घर छोड़ दिया और तलाक का मुकदमा दायर कर दिया।
अभिषेक ने बहुत कोशिश की। वह कई बार घर आया, उसने काव्या के आगे हाथ जोड़े, मिन्नतें कीं कि वह एक बार उससे बात कर ले। लेकिन सुमित्रा देवी ने कभी अभिषेक को घर के अंदर कदम नहीं रखने दिया और काव्या ने भी अपने कमरे से बाहर आना मुनासिब नहीं समझा। आज, जब वह सब कुछ खत्म हो चुका था, काव्या को अभिषेक की वो लाल, रोती हुई आँखें याद आ रही थीं।
“मैं कितनी बड़ी मूर्ख हूँ,” काव्या ने खुद को कोसते हुए आईने में अपना अक्स देखा। “अभिषेक तो मुझसे इतना प्यार करता था। उसने कभी मुझ पर आवाज़ तक नहीं उठाई। उसकी छोटी-सी कमियों को मैंने अपनी माँ के चश्मे से देखकर इतना बड़ा बना दिया कि अपनी ही दुनिया उजाड़ ली। अभिषेक, मुझे माफ़ कर दो… मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती।”
काव्या बेतहाशा रो रही थी। उसने अलमारी खोली और अपना बड़ा सा सूटकेस बाहर निकाल लिया। वह पागलों की तरह अपने कपड़े और सामान उसमें ठूंसने लगी। उसे बस किसी भी तरह यहाँ से भागना था। उसे अपने अभिषेक के पास जाना था।
बाहर दालान में अभी भी महफ़िल सजी थी। शांति ने आकर दरवाज़ा खटखटाया, “दीदी, बाहर चलिए न। मालकिन बुला रही हैं। सब आपका इंतज़ार कर रहे हैं।”
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस अपना सूटकेस पैक करती रही। थोड़ी देर बाद जब काव्या नहीं आई, तो सुमित्रा देवी खुद दरवाज़े पर आईं। “काव्या! क्या कर रही है अंदर? बाहर क्यों नहीं आ रही?”
अचानक दरवाज़ा खुला। काव्या अपने एक हाथ में सूटकेस और दूसरे हाथ में कोर्ट के पेपर्स लिए खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा दृढ़ संकल्प था।
सुमित्रा देवी सूटकेस देखकर अवाक रह गईं। “यह क्या है काव्या? यह सूटकेस क्यों? तू कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रही है क्या? हाँ, ठीक भी है, थोड़े दिन कहीं घूम आ, तेरा मन बहल जाएगा।”
“मेरा मन बहलाने की कोई ज़रूरत नहीं है माँ,” काव्या की आवाज़ इतनी तेज़ और तीखी थी कि वहाँ बैठे वकील साहब और दीनानाथ जी भी चौंक कर मुड़े। “अब तो आपके कलेजे को ठंडक पड़ गई होगी न? हो गई आपकी जीत! आपने अपनी बेटी का बसा-बसाया घर उजाड़ दिया, आ गई आपको शांति?”
सुमित्रा देवी हक्की-बक्की रह गईं। “यह तू कैसी बातें कर रही है अपनी माँ से? होश में तो है तू?”
“हाँ माँ, आज मैं पूरी तरह होश में हूँ,” काव्या अपने सूटकेस को धकेलते हुए दालान के बीचोबीच आ गई। “लेकिन काश, काश मैं उस दिन होश में होती जब आप मेरे कानों में अभिषेक के खिलाफ ज़हर भर रही थीं। मैं अंधी हो गई थी जो आपकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई। मुझे लगा आप मेरी सगी हैं, मेरी भलाई चाहती हैं, लेकिन आपने तो बस अपनी उस पुरानी खुन्नस को मिटाने के लिए मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी कि मैंने आपकी मर्जी के बिना अभिषेक से शादी की थी।”
“बकवास बंद कर!” सुमित्रा देवी चिल्लाईं। “मैंने जो भी किया तेरी भलाई के लिए किया। मैंने तुझे सच्चाई दिखाई। वह आदमी तेरे लायक नहीं था। तू मुझ पर बेवजह भड़क रही है।”
“बस कीजिए माँ!” काव्या ने भी पलटकर जवाब दिया। “बहुत हो गया। आप अभिषेक की जितनी भी बुराई कर लें, अब मैं आपकी बातों में नहीं आने वाली। काश मैंने पापा की बात मान ली होती। उन्होंने मुझे कितना समझाया था कि तलाक किसी भी समस्या का हल नहीं है। लेकिन आपका घमंड मेरी गृहस्थी से बड़ा हो गया।”
“तो अब यह सामान बांधकर कहाँ जा रही है तू?” सुमित्रा देवी ने क्रोध और घबराहट से पूछा।
“अपने घर जा रही हूँ। अपने अभिषेक के पास,” काव्या ने साफ शब्दों में कहा।
“तू पागल हो गई है! आज ही तेरा तलाक हुआ है। वह अब तेरा पति नहीं है।” सुमित्रा देवी ने उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया।
“कागज़ पर लिखे ये चंद शब्द, अदालत की ये स्याही, हमें अलग नहीं कर सकते माँ। हमारे बीच का रिश्ता इन कागज़ों का मोहताज नहीं है। मैंने गलती की है और मैं खुद को और अपने रिश्ते को एक आख़िरी मौका देना चाहती हूँ।”
यह कहते हुए काव्या ने तलाक के उन पेपर्स को दोनों हाथों से पकड़ा और देखते ही देखते उन्हें बीच से फाड़ दिया। फिर उसने उन टुकड़ों को हवा में उछाल दिया। अदालत के फैसले के वो टुकड़े बर्फ के गंदे फाहों की तरह ज़मीन पर गिर रहे थे।
कमरे में सन्नाटा छा गया। वकील साहब सकते में थे। सुमित्रा देवी अपना सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गईं, उनका क्रोध और उनका घमंड टूट कर बिखर चुका था। लेकिन उस पूरे कमरे में एक शख्स ऐसा था, जिसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान थी। वो थे दीनानाथ जी।
उन्होंने अपनी चाय का कप मेज पर रखा, अपनी जगह से उठे और धीरे-धीरे चलकर काव्या के पास आए। उन्होंने काव्या के सिर पर हाथ फेरा और भारी आवाज़ में बोले, “जा बेटा… जा कर अपना घर बसा। इंसान से गलती होती है, लेकिन उसे सुधारने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती। मुझे यकीन है मेरा अभिषेक तुझे कभी खाली हाथ नहीं लौटाएगा।”
काव्या ने रोते हुए अपने पिता को गले लगा लिया। फिर उसने अपना सूटकेस उठाया और दरवाज़े से बाहर निकल गई, एक नई सुबह, एक नई उम्मीद और अपने उस प्यार की ओर जिसे उसने लगभग खो ही दिया था।
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