पश्चाताप के आंसू

आज जब उन्होंने यह सब सुना तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने फोन कौशल्या जी के हाथ से छीन लिया और कॉल काट दिया।

रघुनाथ जी गुस्से से कांप रहे थे। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अपनी ही बहू के चरित्र पर इस तरह कीचड़ उछालने की? और वो भी उस औरत के साथ मिलकर जिसका खुद का कोई वजूद नहीं है, जो सिर्फ दूसरों के घरों में आग लगाना जानती है?”

कौशल्या देवी हड़बड़ा गईं और रोने लगीं। “मैं… मैं क्या करूं जी? आप देखते नहीं हैं, रोहन के जाने के बाद से वो कैसे पराये मर्दों के साथ घूमती है, अनजान लोगों की गाड़ियों में आती है, फोन पर हंस-हंस कर बातें करती है। बिमला बहन ने खुद उसे देखा है…”

शहर के एक शांत और पॉश इलाके में रघुनाथ जी और उनका परिवार रहता था। रघुनाथ जी एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे और उनकी पत्नी कौशल्या देवी एक बेहद सीधी-सादी, धार्मिक और घरेलू महिला थीं। उनका इकलौता बेटा रोहन एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और उसकी पत्नी नेहा शहर के ही एक बड़े प्राइवेट बैंक में ब्रांच मैनेजर के पद पर कार्यरत थी। उनका एक चार साल का प्यारा सा बेटा था, जिसका नाम आरव था। पूरा परिवार हंसी-खुशी अपना जीवन बिता रहा था। घर में किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी। सास-ससुर अपनी बहू को बेटी से बढ़कर मानते थे और नेहा भी ऑफिस के साथ-साथ घर की हर जिम्मेदारी को बहुत ही सलीके से निभाती थी।

सब कुछ बहुत ही शानदार चल रहा था कि अचानक रोहन की कंपनी ने उसे एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट के लिए दो साल के लिए लंदन भेज दिया। रोहन के जाने के बाद घर में थोड़ी उदासी जरूर छा गई, लेकिन नेहा ने स्थिति को बहुत अच्छे से संभाल लिया। वह सुबह जल्दी उठकर सबके लिए नाश्ता बनाती, आरव को स्कूल के लिए तैयार करती, सास-ससुर की दवाइयों का ध्यान रखती और फिर खुद तैयार होकर अपने बैंक निकल जाती। बैंक में उसकी जिम्मेदारियां बहुत बड़ी थीं, इसलिए अक्सर उसे घर लौटने में देर हो जाती थी। रघुनाथ जी और कौशल्या देवी हमेशा नेहा की मेहनत और उसकी लगन की तारीफ करते नहीं थकते थे।

लेकिन हर मोहल्ले में कोई न कोई ऐसा इंसान जरूर होता है जिसे दूसरों की खुशी रास नहीं आती। उनके पड़ोस में रहने वाली बिमला जी ऐसी ही महिला थीं। बिमला जी का अपना कोई खास काम नहीं था, बस दिन भर दूसरों के घरों में तांक-झांक करना, इधर की बातें उधर करना और लोगों के घरों में आग लगाना उनका मुख्य पेशा था। कौशल्या देवी के सीधेपन का फायदा उठाते हुए बिमला जी अक्सर दोपहर में उनके घर आ धमकतीं और दुनिया भर की पंचायत शुरू कर देतीं।

एक दिन दोपहर में जब कौशल्या देवी दाल बीन रही थीं, तभी बिमला जी आ गईं। चाय की चुस्कियां लेते हुए बिमला जी ने अपनी बातों का जाल बिछाना शुरू किया, “कौशल्या बहन, एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगी?”

कौशल्या जी ने मासूमियत से कहा, “अरे नहीं बिमला बहन, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है? कहो क्या कहना है।”

“बहन, मैं पिछले कई दिनों से देख रही हूं कि तुम्हारी बहू नेहा के कुछ रंग-ढंग बदले-बदले से लग रहे हैं। रोहन बेचारा वहां परदेस में दिन-रात खून-पसीना एक कर रहा है, और तुम्हारी बहू कभी किसी के साथ तो कभी किसी के साथ हंस-हंस कर बातें करती हुई घूमती है। कल ही मैंने देखा, वो सोसाइटी के गेट पर एक गाड़ी से उतरी थी और गाड़ी चलाने वाले उस आदमी को हाथ हिलाकर बाय कर रही थी और खूब दांत निकाल रही थी। तुम्हें तो पता ही है, आजकल का जमाना कैसा है। अकेली औरत को इतनी आज़ादी देना ठीक नहीं है।”

कौशल्या देवी यह सुनकर थोड़ा असहज हो गईं। उन्होंने नेहा का बचाव करते हुए कहा, “अरे नहीं बिमला, ऐसा कुछ नहीं है। नेहा बैंक में काम करती है, वहां उसके साथ बहुत से लोग काम करते हैं। कोई सहकर्मी होगा जिसने उसे घर छोड़ दिया होगा। मेरी बहू बहुत समझदार है।”

बिमला जी ने तुरंत बात काटते हुए अपने शब्दों में ज़हर घोला, “अरे कौशल्या बहन, तुम बहुत भोली हो। तुम्हें दुनियादारी की कोई समझ नहीं है। ये बैंक-वैंक का काम तो सब बहाना होता है। जब पति पास नहीं होता, तो ये पढ़ी-लिखी औरतें आज़ादी का पूरा फायदा उठाती हैं। अपने पोते आरव को बेचारी आया और तुम्हारे भरोसे छोड़कर वो दिन भर बाहर मजे मारती है। कल को अगर समाज में कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो बदनामी तो तुम्हारे ही परिवार की होगी ना! मेरा तो काम था सचेत करना, बाकी तुम्हारी मर्जी।” यह कहकर बिमला जी तो अपने घर चली गईं, लेकिन कौशल्या देवी के मन में शक का एक ऐसा बीज बो गईं, जिसे धीरे-धीरे बड़ा होना ही था।

उस दिन के बाद से कौशल्या देवी का नज़रिया नेहा के प्रति पूरी तरह से बदल गया। अब वह नेहा के हर काम पर, हर हरकत पर शक की नज़र से देखने लगीं। नेहा ऑफिस से कब आ रही है, कब जा रही है, फोन पर किससे बातें कर रही है, उसके चेहरे पर खुशी है या थकान, हर चीज़ का हिसाब रखा जाने लगा। एक दिन नेहा ऑफिस से आई तो वो बहुत खुश थी। वह बालकनी में खड़ी होकर फोन पर बहुत ज़ोर-ज़ोर से हंसते हुए बात कर रही थी। वह कह रही थी, “हाँ समीर, आज तो तुमने कमाल कर दिया, मुझे यकीन ही नहीं हो रहा कि यह काम इतनी जल्दी हो जाएगा। कल मिलते हैं फिर, बाय।”

यह सुनकर कौशल्या देवी के कान खड़े हो गए। उन्होंने तुरंत बिमला जी की बातें याद कीं। ‘ये समीर कौन है? इसके साथ क्या काम है? और मेरी बहू इसके साथ इतनी हंस-हंस कर क्यों बतिया रही है?’ उनके मन में सवालों का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। अब उनका बर्ताव नेहा के साथ रूखा होने लगा। जब नेहा उनसे बात करने की कोशिश करती, तो वह उल्टे-सीधे जवाब देतीं या बात टाल देतीं।

कुछ दिन बाद वीकेंड पर नेहा ने आरव को तैयार किया और कौशल्या देवी से कहा, “मां जी, मैं आरव को लेकर थोड़ा बाहर जा रही हूं, कुछ जरूरी काम है, शायद आने में दो-तीन घंटे लग जाएं।”

कौशल्या जी ने तंज कसते हुए कहा, “हाँ-हाँ जाओ, तुम्हें हमारी कहाँ फिक्र है। आरव को भी ले जा रही हो या उसे हमारे पास ही छोड़ जाओगी ताकि तुम्हें घूमने-फिरने में कोई दिक्कत न हो?”

नेहा अपनी सास का यह रूप देखकर हैरान रह गई। उसे समझ नहीं आया कि अचानक उन्हें क्या हो गया है। उसने नम्रता से कहा, “नहीं मां जी, मैं आरव को साथ ही ले जा रही हूं, एक दोस्त के घर जाना है।”

जैसे ही नेहा घर से निकली, कौशल्या जी ने बिमला जी को फोन लगा दिया। “बिमला बहन, तुम सही कह रही थीं। मेरी बहू के तो पैर ही घर में नहीं टिक रहे। आज छुट्टी का दिन था, फिर भी तैयार होकर निकल गई, कह रही थी किसी दोस्त के घर जा रही है। पता नहीं कौन सा दोस्त है। मेरा बेटा वहां अकेला कमा रहा है और यह यहां गुलछर्रे उड़ा रही है। मुझे तो डर है कि कहीं मेरा सीधा-साधा बेटा किसी धोखे का शिकार न हो जाए। मुझे लगता है मुझे रोहन को फोन करके सब कुछ बता देना चाहिए।”

कौशल्या देवी फोन पर यह सब बोल ही रही थीं कि तभी पीछे से एक कड़कती हुई आवाज़ आई।

“कौशल्या! यह क्या अनाप-शनाप बक रही हो तुम?”

यह आवाज़ रघुनाथ जी की थी। वह पिछले कुछ दिनों से अपनी पत्नी के बदले हुए व्यवहार को नोटिस कर रहे थे, लेकिन आज जब उन्होंने यह सब सुना तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने फोन कौशल्या जी के हाथ से छीन लिया और कॉल काट दिया।

रघुनाथ जी गुस्से से कांप रहे थे। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अपनी ही बहू के चरित्र पर इस तरह कीचड़ उछालने की? और वो भी उस औरत के साथ मिलकर जिसका खुद का कोई वजूद नहीं है, जो सिर्फ दूसरों के घरों में आग लगाना जानती है?”

कौशल्या देवी हड़बड़ा गईं और रोने लगीं। “मैं… मैं क्या करूं जी? आप देखते नहीं हैं, रोहन के जाने के बाद से वो कैसे पराये मर्दों के साथ घूमती है, अनजान लोगों की गाड़ियों में आती है, फोन पर हंस-हंस कर बातें करती है। बिमला बहन ने खुद उसे देखा है…”

रघुनाथ जी ने ज़ोर से डांटते हुए कहा, “बस करो कौशल्या! बहुत सुन लिया मैंने। तुम्हारा दिमाग उस बिमला ने पूरी तरह से सड़ा दिया है। तुम जिस ‘अजनबी मर्द की गाड़ी’ की बात कर रही हो, वो नेहा का जूनियर सहकर्मी राहुल है। उस दिन नेहा की स्कूटी रास्ते में खराब हो गई थी और बारिश हो रही थी। इसलिए राहुल उसे घर छोड़ने आ गया था। और तुम जिस समीर की बात कर रही हो, वो बैंक का रीजनल हेड है। नेहा को पिछले हफ्ते जो बहुत बड़ा प्रमोशन मिला है, वो समीर सर की सिफारिश पर ही मिला है। वो उनसे काम के सिलसिले में बात कर रही थी।”

कौशल्या देवी यह सब सुनकर स्तब्ध रह गईं।

रघुनाथ जी ने आगे कहा, “तुम्हें पता भी है आज वो कहां गई है? आज वो उस अनाथालय गई है जहां हम हर साल जाते हैं। रोहन के विदेश जाने से पहले उन दोनों ने मन्नत मानी थी कि अगर प्रोजेक्ट मिल गया तो वो वहां जाकर बच्चों को खाना खिलाएंगे। रोहन नहीं है, इसलिए वो अकेली सारी ज़िम्मेदारी उठा रही है। वो एक उच्च पद पर काम करने वाली आज़ाद और समझदार महिला है। वो दिन भर बैंक में सौ तरह के लोगों से मिलती है, परेशानियों का सामना करती है और फिर घर आकर मुस्कराते हुए हमारी सेवा करती है। और तुम? तुम उस बेटी जैसी बहू पर शक कर रही हो? वो भी एक ऐसी पड़ोसन की बातों में आकर जिसका काम ही घर तोड़ना है?”

कौशल्या देवी को जैसे कोई गहरा सदमा लगा हो। उन्हें अपनी ओछी सोच और बिमला की बातों में आने पर भयंकर पछतावा होने लगा।

रघुनाथ जी की आवाज़ अब थोड़ी नरम हुई, लेकिन उसमें अभी भी गंभीरता थी। “कौशल्या, भरोसे की नींव पर ही परिवार टिके होते हैं। अगर तुम अपनी बहू पर विश्वास नहीं कर सकती, तो तुम अपने बेटे को भी खो दोगी। ये मंथरा जैसी पड़ोसनों का क्या है? इनका तो काम ही घर जलाना और तमाशा देखना है। आज के बाद अगर उस बिमला ने इस घर की चौखट पर कदम भी रखा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। और तुम, अपने दिमाग से ये शक का ज़हर निकाल दो। एक पढ़ी-लिखी, काम करने वाली औरत अगर किसी से बात कर रही है या हंस रही है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसका चरित्र खराब है। अपनी सोच बदलो, वरना अपना ही घर तबाह कर लोगी।”

कौशल्या देवी फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गए थे। मैं उस बिमला की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई। मैं भूल गई कि नेहा ने आज तक हमें पलट कर जवाब तक नहीं दिया। मेरी गलत सोच हमारे हँसते-खेलते परिवार में महाभारत करवा देती। हे प्रभु, मुझे क्षमा करना। मैं आज के बाद कभी ऐसी नीच सोच नहीं रखूंगी।”

शाम को जब नेहा घर लौटी, तो उसने देखा कि कौशल्या देवी दरवाज़े पर ही उसका इंतज़ार कर रही हैं। जैसे ही नेहा अंदर आई, कौशल्या देवी ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया। उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। नेहा कुछ समझ नहीं पाई, लेकिन उसे अपनी सास की बाहों में एक अजीब सा सुकून और मातृभाव महसूस हुआ।

रघुनाथ जी दूर खड़े यह सब देख रहे थे और उनके चेहरे पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान थी। उन्होंने मन ही मन सोचा कि परिवार को टूटने से बचाने के लिए कभी-कभी कड़वे सच का आइना दिखाना बहुत ज़रूरी होता है। उस दिन के बाद से बिमला जी के लिए उस घर के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो गए और सास-बहू का रिश्ता पहले से भी ज्यादा गहरा और पवित्र हो गया।

कहानी से जुड़ा एक सवाल:

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या हमारी सोसाइटी में आज भी कामकाजी महिलाओं के हंसने, बात करने या उनके रहन-सहन पर इस तरह शक किया जाना आम बात है? क्या रघुनाथ जी ने अपनी पत्नी को सही समय पर रोक कर एक आदर्श ससुर और पिता का फर्ज निभाया? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

error: Content is protected !!