लगभग एक वर्ष बीत गया था रमेश को इस संसार को अलविदा कहे हुए।रमा पति की यादों में खोई हुई थी।पति के साथ बिताए हुए हर एक लम्हें को इस एक वर्ष में उसने हजारों-हजार बार जिया था।पति को याद करते हुए कभी उसकी आँखें नम हो जातीं तो कभी होंठो पर खोई हुई मुस्कान वापिस आ जाती।एकाएक मोबाइल की घण्टी बजी।वो पति की यादों के समंदर से बाहर नहीं आना चाहती थी,अनमने मन से फोन देखा बेटे रोहित का कॉल था।उसके चेहरे की रंगत बदल गई।
खिन्न स्वर में बोली -“हेलो” बहुत दिनों के पश्चात आज बेटे ने फोन किया था।माँ के हालचाल पूछने की ज़हमत उठाए बिना ही बेटा तुरन्त बोला-“माँ,तुम्हें याद है ना,पापा को गुजरे एक वर्ष होने वाला है।चार दिन पश्चात पापा का श्राद्ध है।हम पापा की सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक हैसियत को देखते हुए बहुत धूमधाम से श्राद्ध करेंगे।परिवार और समाज इस आयोजन को देखता ही रह जाएगा। कोई भी व्यक्ति निमंत्रण से छूटना नहीं चाहिए।आप सारी तैयारियाँ कर लेना।समय पर मैं भी उपस्थित हो जाऊँगा।”माँ की कुशलक्षेम पूछे बिना बेटा एक ही साँस में सारी बात कह गया।जैसे अपना अमूल्य समय वार्तालाप में गँवाना नहीं चाहता हो।रमा का दिल तो मानों टूटकर चूर-चूर हो गया।वह फोन बंद कर लगभग अचेत सी हो गई।बहुत दिनों से जिन आँसुओं को उसने रोका हुआ था,वह पूरे वेग से बहने लगे।
रमा के पति एक बड़ी कम्पनी में उच्च पद पर कार्यरत थे।वह बहुत ही मिलनसार और दयालु प्रकृति के थे।हर किसी की मदद को हमेशा तैयार रहते थे।जब बहुत से परिचित, मित्र,रिश्तेदार कोरोना की चपेट में आकर काल का ग्रास बन गए तो वे अपने आपको संयत न रख सके।
मन की पीड़ा और नकारात्मकता उनपर इस तरह हावी हो गई कि संक्रमित हुए बिना भी सिर्फ दहशत के मारे हृदयाघात से अपने प्राण गँवा बैठे।और विडंबना ऐसी कि दूसरों के दुखदर्द को अपना समझने वाले रमेश स्वयं यथोचित तरीके से अंतिम संस्कार को भी तरस गए।लोगों का अंतिम संस्कार में उपस्थित न होना रमा को इतना नहीं खला क्योंकि कोरोना की दहशत ही ऐसी थी,किन्तु स्वयं के इकलौते बेटे ने नजदीक के शहर से आने में भी असमर्थता प्रकट की तो वो बहुत आहत हुई।कुछ घनिष्ठ मित्रों के सहयोग से बड़ी मुश्किल से वह ‘शवदाह’ की व्यवस्था कर पाई।हाँ,जिस तरह से हुआ उसे ‘शवदाह’ ही तो कहा जा सकता है ‘संस्कार’ तो कदापि नहीं।सोचकर भी रमा का कलेजा मुँह को आता है।
रमा को रोहित का कहा एक-एक शब्द अच्छी तरह याद है।पिता की मौत की खबर देने पर भी उसने फ़ोन पर कहा था -“माँ, मैं अपनी और पत्नी की जान जोखिम में नहीं डाल सकता।आपको खुद सोचना चाहिए।आप स्वयं उनके दाह संस्कार की व्यवस्था कर लें।या हॉस्पिटल से संपर्क कर लें।”
“लेकिन बेटा,तुम्हारे पापा की मौत कोविड से नहीं हुई है…” बिना कोई जवाब दिए रोहित ने बेरुखी से फोन काट दिया था।क्या कोई बेटा भी इतना निर्मम हो सकता है?अंतिम विदाई से पूर्व पिता का मुँह देखने की इच्छा तक नहीं? क्या यह वही बेटा है जिसे दोनों ने इतने लाड़-प्यार से पाला है?रमा दहाड़े मारकर रो रही थी किन्तु कोई नहीं था जो उसे सहारा दे सके।कथित दाह-संस्कार के पश्चात रमा स्वयं ही सुहाग की सारी निशानियाँ त्यागकर,वैधव्य की चादर ओढ़े घर की चारदीवारी में कैद हो गई थी। अपने को जिंदा रखने का प्रयास करती हुई…एकदम गुमसुम…साथ थी तो सिर्फ पति की यादें।न बेटा न कोई और परिजन… आखिर अपना दुख कहे भी तो किससे?
और आज वही बेटा समाज की दुहाई देकर पिता के श्राद्ध का दिखावा करना चाहता है।अपने माथे पर ‘सपूत’ होने का ठप्पा लगवाना चाहता है।
लेकिन ऐसा कदापि नहीं होगा।वह अपने पुत्र के हाथों पति का श्राद्ध कर्म कदापि नहीं करवाएगी।उसने अपने आपको संयत कर रोहित को फोन लगाया-“अपना समय व्यर्थ कर यहाँ आने की कोई आवश्यकता नहीं।तुम्हारे हाथों श्राद्ध करवाने से तुम्हारे पापा की आत्मा को और अधिक तकलीफ ही होगी,जो मैं बिल्कुल नहीं चाहती।” कहकर उसने जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही फोन बंद कर दिया।
रमा ने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वह पति के श्राद्ध के दिन भोज का आयोजन नहीं करेगी बल्कि अनाथालय और वृद्धाश्रम जाकर यथासम्भव दान करेगी और उन्हीं लोगों के साथ अपना समय व्यतीत करेगी।आगे भी आर्थिक और शारीरिक तौर पर उनकी सहायता करती रहेगी।रमेश के स्वभाव के अनुसार यही उनका सही अर्थों में श्राद्ध होगा।आखिर वह यही तो चाहते थे “दूसरों के दुखदर्द में उनका भागीदार बनना।”
अब वह अपने आपको काफी हल्का महसूस कर रही थी।वह उठी और अकेली ही चल पड़ी बाजार की ओर,सामान लाने के लिए।उसे अब किसी भी सहारे की जरूरत नहीं थी।बाज़ार की ओर बढ़ते हुए रमा के मन का बोझ जैसे उतर गया था।आज उसे समझ आ गया था,कि रिश्तों की कीमत बड़े आयोजनों,दिखावे या समाज की वाहवाही से नहीं बल्कि सुख-दुःख में साथ निभाने से तय होती है।जो बेटा पिता की अंतिम विदाई में साथ न दे सका,उसके हाथों किया गया श्राद्ध केवल एक औपचारिकता था। सच्ची श्रद्धांजलि तो वही थी,जो रमेश के आदर्शों के अनुरूप किसी ज़रूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान बनकर पहुँचे।रिश्तों की कीमत धन से नहीं,संवेदनाओं और अपनत्व से चुकाई जाती है।
कमलेश आहूजा
साप्ताहिक कहानी प्रतियोगिता “रिश्तों की कीमत ” शीर्षक के अंतर्गत मैं अपनी कहानी “सच्ची श्रद्धांजलि” भेज रही हूं।आशा है आप इसे स्वीकार करेंगे।