निश्छल प्रेम

पीहू धीरे-धीरे कदमों से भीड़ को चीरती हुई सिद्धार्थ के पास पहुंची। उसने सिद्धार्थ के कुर्ते का कोना खींचते हुए मासूमियत से पूछा, “पापा, दादू फर्श पर क्यों सो रहे हैं? उन्हें वहां ठंड लग जाएगी। और आप सब लोग रो क्यों रहे हो? क्या दादू कहीं जा रहे हैं?”

सिद्धार्थ ने अपनी आंसुओं से भरी आंखें पोंछीं और पीहू को घुटनों के बल बैठकर गले से लगा लिया। उसका गला रुंधा हुआ था, फिर भी उसने खुद को संभालते हुए भारी आवाज में कहा, “हां बेटा… दादू एक बहुत लंबी यात्रा पर जा रहे हैं। भगवान जी ने उन्हें अपने पास बुलाया है। अब वो वहीं रहेंगे, आसमान में… उन तारों के बीच।”

शहर के शोर-शराबे से दूर, आनंद विहार कॉलोनी के एक कोने में बना वह पुराना दो मंजिला घर आज भी अपनी ईंटों में ढेरों यादें समेटे हुए था। इस घर की जान थे पैंसठ वर्षीय रामनाथ जी और उनकी छह साल की पोती, पीहू। रामनाथ जी, जो कभी एक सख्त मिजाज वाले स्कूल प्रिंसिपल हुआ करते थे, रिटायरमेंट के बाद मानो पूरी तरह बदल गए थे। उनका सारा अनुशासन, सारा रौब, पीहू की एक मीठी सी मुस्कान के आगे पानी भरता नजर आता था। घर में पीहू के माता-पिता, सिद्धार्थ और काव्या भी रहते थे। सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और काव्या एक कॉलेज में प्रोफेसर। दोनों अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में इतने व्यस्त रहते थे कि घर और पीहू की पूरी जिम्मेदारी एक तरह से रामनाथ जी ने ही खुशी-खुशी अपने कंधों पर उठा ली थी।

काव्या अक्सर सिद्धार्थ से शिकायत करती थी, “सिद्धार्थ, बाबूजी ने पीहू को बहुत ज्यादा लाड़-प्यार देकर बिगाड़ दिया है। कल रात खाने की मेज पर वह जिद्द कर रही थी कि जब तक दादू उसे अपने हाथों से नहीं खिलाएंगे, वह एक निवाला नहीं खाएगी। और बाबूजी भी… अपना खाना छोड़कर उसे कहानियां सुनाते हुए खिलाने लगे। ऐसे तो बच्ची कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगी। थोड़ा तो अनुशासन होना चाहिए।”

सिद्धार्थ बस मुस्कुरा देता और कहता, “काव्या, तुमने बाबूजी का वह रूप देखा ही नहीं है जो मैंने बचपन में देखा था। उनके एक इशारे पर पूरे स्कूल में सन्नाटा छा जाता था। आज अगर पीहू के प्यार ने उन्हें इतना कोमल बना दिया है, तो इसमें बुराई क्या है? और फिर, बाबूजी के बिना हमारा घर कैसे चलेगा, यह तो सोचो। दोनों की दुनिया एक-दूसरे से ही तो आबाद है।”

काव्या भी मन ही मन जानती थी कि बाबूजी के होने से ही वह निश्चिंत होकर अपनी नौकरी कर पाती है। पीहू को स्कूल बस से लाने से लेकर, उसे पार्क में घुमाने और रात को परियों की कहानियां सुनाने तक, सब कुछ रामनाथ जी ही करते थे।

रामनाथ जी का अपना एक अलग ही नियम था। उनके कमरे में चंदन की लकड़ी का एक छोटा सा पुराना संदूक रखा रहता था। उस संदूक में हमेशा मंदिर से लाया हुआ कलावा (लाल धागा) और प्रसाद वाली मिश्री की डलियां मौजूद रहती थीं। पीहू जब भी किसी नए काम के लिए घर से निकलती, चाहे वह उसका नया स्कूल सत्र हो, डांस क्लास का पहला दिन हो, या फिर मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने जाना हो, रामनाथ जी उसे दरवाजे पर ही रोक लेते। वह अपने संदूक से एक लाल धागा निकालते, बड़े प्यार से पीहू की नन्ही कलाई पर बांधते और एक छोटी सी मिश्री की डली उसके मुंह में रख देते।

“दादू, आप रोज मुझे यह लाल धागा क्यों बांधते हो?” एक दिन पीहू ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से उन्हें देखते हुए पूछा था।

रामनाथ जी ने उसके माथे को चूमते हुए कहा था, “मेरी गुड़िया, यह लाल धागा भगवान जी का आशीर्वाद है। यह तुम्हें हर बुरी नजर, हर खतरे से बचाएगा। और यह मिश्री इसलिए, ताकि मेरी पीहू की बोली हमेशा इतनी ही मीठी रहे और वह जहां जाए, खुशियां ही बांटे।”

पीहू इस बात को इतनी गहराई से मान चुकी थी कि अगर कभी काव्या उसे जल्दी में बिना धागा बंधवाए ले जाने की कोशिश करती, तो पीहू दरवाजे पर ही पैर पटक कर रोने लगती। “नहीं मम्मा, दादू ने अभी भगवान जी का धागा नहीं बांधा है! मुझे चोट लग जाएगी।” हारकर काव्या को रुकना ही पड़ता। रामनाथ जी हंसते हुए आते, धागा बांधते, मिश्री खिलाते और तभी पीहू के चेहरे पर मुस्कान लौटती।

समय अपनी गति से बह रहा था। सिद्धार्थ और काव्या अपनी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, और पीहू धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। लेकिन इस भागती हुई जिंदगी के बीच, किसी ने इस बात पर गौर ही नहीं किया कि रामनाथ जी अब पहले की तरह तेज नहीं चल पाते थे। उनके कदमों में अब वह फुर्ती नहीं थी। उम्र का असर उनके शरीर पर साफ दिखने लगा था।

सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। एक शाम पार्क से लौटते वक्त रामनाथ जी को हल्की सी ठंड लग गई। शुरुआत में सबने सोचा कि मामूली सर्दी-जुकाम है, लेकिन दो दिन के भीतर ही उनकी खांसी बहुत ज्यादा बढ़ गई। डॉक्टर को दिखाया गया, तो पता चला कि उन्हें सीवियर निमोनिया हो गया है और उनके फेफड़ों में पानी भर गया है। उम्र अधिक होने के कारण शरीर दवाइयों पर भी उतनी तेजी से असर नहीं कर रहा था।

देखते ही देखते घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जो घर पीहू की खिलखिलाहट और रामनाथ जी की ठहाकों से गूंजता था, वहां अब एक अजीब सी उदासी और खामोशी ने डेरा डाल लिया था। पीहू को उनके कमरे में जाने से मना कर दिया गया था ताकि उसे कोई इन्फेक्शन न हो जाए। लेकिन वह छुप-छुप कर दरवाजे की दरार से अपने दादू को देखती रहती। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो दादू कल तक उसे अपने कंधों पर बिठाकर पूरे घर में घुमाते थे, वे आज इतने सारे तारों और मशीनों के बीच बिस्तर पर चुपचाप क्यों लेटे हैं।

एक हफ्ते के कड़े संघर्ष के बाद, वह मनहूस दिन आ ही गया। रामनाथ जी का शरीर अब और साथ नहीं दे सका। सुबह के करीब चार बज रहे थे, जब डॉक्टर ने सिद्धार्थ के कंधे पर हाथ रखते हुए अपनी गर्दन ना में हिला दी। काव्या धड़ाम से फर्श पर बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। सिद्धार्थ स्तब्ध खड़ा था, मानो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। जिस पिता की उंगली पकड़कर उसने चलना सीखा था, वह हाथ हमेशा के लिए छूट गया था।

सुबह होते-होते पूरे मोहल्ले और रिश्तेदारों में खबर फैल गई। घर के आंगन में लोगों की भीड़ जमा होने लगी। कोई दरी बिछा रहा था, तो कोई बांस और रस्सियों का इंतजाम कर रहा था। घर की औरतें काव्या को संभालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उसकी आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। आज उसे अहसास हो रहा था कि बाबूजी सिर्फ पीहू के दादू नहीं थे, बल्कि इस घर की वह मजबूत छत थे, जिसके साए में वे सब बेफिक्र होकर जी रहे थे।

रामनाथ जी के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर, सफेद कफन में लपेट कर आंगन के बीचों-बीच रखा गया था। उन पर गुलाब और गेंदे के फूल चढ़ाए जा रहे थे। पास ही अगरबत्ती और कपूर जल रहा था, जिसकी गंध पूरे घर में फैली हुई थी। पंडित जी लगातार मंत्रोच्चार कर रहे थे।

इन सबके बीच, पीहू सीढ़ियों के पास खड़ी, अपनी बड़ी-बड़ी हैरान आंखों से यह सब देख रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि घर में इतने सारे लोग क्यों आए हैं? मम्मा इतना क्यों रो रही हैं? और दादू… दादू सफेद चादर ओढ़कर फर्श पर क्यों सो रहे हैं?

पीहू धीरे-धीरे कदमों से भीड़ को चीरती हुई सिद्धार्थ के पास पहुंची। उसने सिद्धार्थ के कुर्ते का कोना खींचते हुए मासूमियत से पूछा, “पापा, दादू फर्श पर क्यों सो रहे हैं? उन्हें वहां ठंड लग जाएगी। और आप सब लोग रो क्यों रहे हो? क्या दादू कहीं जा रहे हैं?”

सिद्धार्थ ने अपनी आंसुओं से भरी आंखें पोंछीं और पीहू को घुटनों के बल बैठकर गले से लगा लिया। उसका गला रुंधा हुआ था, फिर भी उसने खुद को संभालते हुए भारी आवाज में कहा, “हां बेटा… दादू एक बहुत लंबी यात्रा पर जा रहे हैं। भगवान जी ने उन्हें अपने पास बुलाया है। अब वो वहीं रहेंगे, आसमान में… उन तारों के बीच।”

“लंबी यात्रा?” पीहू ने अपनी पलकें झपकाईं। उसका नन्हा सा दिमाग कुछ और ही गणित लगा रहा था। वह अचानक सिद्धार्थ की गोद से उतरी और तेजी से दौड़ती हुई ऊपर रामनाथ जी के कमरे की तरफ चली गई।

भीड़ में से किसी ने कहा, “अरे, बच्ची को रोको, कहां जा रही है?” लेकिन सिद्धार्थ बेसुध सा वहीं बैठा रहा।

कुछ ही पलों बाद पीहू सीढ़ियों से वापस नीचे उतरी। उसकी छोटी सी मुट्ठी में कुछ दबा हुआ था। वह सीधे रामनाथ जी के पार्थिव शरीर के पास गई। लोगों ने उसे रोकना चाहा, लेकिन काव्या ने हाथ के इशारे से सबको मना कर दिया। काव्या देखना चाहती थी कि पीहू क्या कर रही है।

पीहू ने रामनाथ जी के सिरहाने बैठकर उनकी सफेद चादर को थोड़ा सा खिसकाया। दादू का चेहरा एकदम शांत और पीला पड़ चुका था। पीहू ने अपनी मुट्ठी खोली। उसके हाथ में वही लाल कलावा और मिश्री की एक छोटी सी डली थी, जो उसने चंदन के संदूक से निकाली थी।

पूरे आंगन में जैसे पिन ड्रॉप साइलेंस हो गया। पंडित जी का मंत्रोच्चार भी कुछ पलों के लिए रुक गया। सबकी निगाहें उस छह साल की बच्ची पर टिकी थीं।

पीहू ने वह लाल धागा सिद्धार्थ की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “पापा, दादू को भगवान जी के पास जाने के लिए इतनी लंबी यात्रा पर जाना है न? रास्ते में उन्हें कोई बुरी नजर लग गई या कोई खतरा आ गया तो? आप प्लीज यह लाल धागा दादू की कलाई पर बांध दो न। दादू कहते थे कि यह धागा हर बुरी चीज से बचाता है।”

सिद्धार्थ के होंठ कांपने लगे, आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था।

पीहू ने फिर अपने नन्हे हाथों से मिश्री की डली रामनाथ जी के ठंडे पड़े होंठों के पास रखी और अपनी तोतली लेकिन दृढ़ आवाज में बोली, “और दादू, यह मिश्री खा लो। आप हमेशा कहते हो न कि नया काम शुरू करने से पहले मुंह मीठा करना चाहिए। वहां भगवान जी से भी मीठी-मीठी बातें करना, वो आपको बहुत प्यार करेंगे।”

पीहू का यह इतना कहना था कि वहां मौजूद हर एक शख्स की आंखें छलक उठीं। जो लोग अब तक खुद को संभाले हुए थे, वे भी सिसक-सिसक कर रो पड़े। काव्या ने दौड़कर पीहू को अपनी छाती से लगा लिया और दहाड़ मारकर रोने लगी।

एक छोटी सी बच्ची ने मौत की उस भयावह खामोशी और डर को अपने निश्छल प्रेम से भर दिया था। उसने यह साबित कर दिया था कि प्यार की डोर सांसों के टूट जाने के बाद भी नहीं टूटती। सिद्धार्थ ने कांपते हाथों से वह लाल धागा अपने पिता की ठंडी कलाई पर बांध दिया। उसे ऐसा लगा जैसे बाबूजी मुस्कुरा रहे हों और कह रहे हों, “देखा, मेरी पीहू ने मेरी कितनी अच्छी विदाई की है।”

जब रामनाथ जी की अर्थी उठी, तो पीहू रोई नहीं। वह बस काव्या की गोद में शांत होकर उन्हें जाते हुए देखती रही। उसे यकीन था कि उसके दादू ने लाल धागा पहना है और मिश्री खाई है, इसलिए उनकी यह लंबी यात्रा बहुत सुरक्षित और मीठी होने वाली है। घर के आंगन में अब सन्नाटा था, लेकिन रामनाथ जी के प्यार की वह लाल डोर अब हमेशा के लिए पीहू के संस्कारों में बंध चुकी थी।

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