जड़ों की उड़ान

“मैं इस घर को नहीं बेचूंगी विकास, बल्कि मैं इस घर को एक नया जीवन दूंगी,” कल्याणी देवी की आंखों में एक नई चमक थी। “मैं शांति कुंज के इस बड़े से दालान में एक ‘कला केंद्र’ खोलूंगी। मैं मोहल्ले की उन औरतों और लड़कियों को मुफ्त में पेंटिंग, सिलाई और हैंडीक्राफ्ट सिखाऊंगी जो कुछ … Read more

‘फर्ज’ और ‘हक’

सुमेधा ने हंसते हुए कहा, “दीदी, आप ‘फर्ज’ और ‘हक’ को अपनी सुविधानुसार नहीं चुन सकतीं। अगर बेटा ‘श्रवण कुमार’ बनकर सारे दुख और कर्ज ढोए, तो बेटी सिर्फ ‘लक्ष्मी’ बनकर पैसा लेकर नहीं जा सकती। अगर आप मॉडर्न जमाने की बात करती हैं और कानून का सहारा लेती हैं, तो कानून यह भी कहता … Read more

पुनर्जन्म 

“साहिल, तुमने कभी उस पुराने खंडहर को ध्यान से देखा है?” नीरा ने अचानक पूछा, अपनी कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए। हम दोनों कैफे की खिड़की के पास बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी, वैसी ही बारिश जैसी उस दिन हो रही थी जब मैं पहली बार नीरा से मिला था। नीरा, … Read more

दोहरे मापदंड 

रास्ते भर सुमन का दिमाग उबलता रहा। उसे याद आया कि कल रात जब उसने राकेश से कहा था कि ‘आज बर्तन तुम धो दो, मेरी कमर दुख रही है’, तो राकेश ने साफ़ मना कर दिया था। “मैं मर्द हूँ सुमन, ये औरतों वाले काम मुझसे नहीं होते,” यह कहकर वह टीवी देखने बैठ … Read more

सब दर्द एक जैसे होते हैं

सुमन के ये शब्द रिया के कानों में गूंजने लगे। अभी कल शाम ही तो उसने अपनी सास सुजाता जी से ठीक यही अल्फाज कहे थे। सुजाता जी ने तो सिर्फ सुई में धागा डालने को कहा था, बीमार भी नहीं थीं, फिर भी रिया ने उन्हें झिड़क दिया था। आज जब उसकी अपनी माँ … Read more

हम पिता भी गलत होते हैं

सुधीर जी ने खन्ना के कंधे पर हाथ रखा। “खन्ना, गलती हम पिता की ही होती है। हम अक्सर अपनी बेटियों के लिए ‘सुरक्षा’ ढूंढते हैं और हमें लगता है कि सुरक्षा सिर्फ पैसों में है। हम भूल जाते हैं कि एक लड़की को एसी कमरे और नौकर-चाकर से ज्यादा एक ऐसे साथी की ज़रूरत … Read more

माँ का घर

“माँ, मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हें यहाँ छोड़कर नहीं गया था। मुझे पता ही नहीं था… सुमन ने कहा तुम बुआ के घर…” रवि बच्चों की तरह फफक पड़ा। गायत्री देवी ने रवि का हाथ अपने हाथ में लिया। “मैं जानती हूँ बेटा… मैं जानती हूँ तू ऐसा नहीं कर सकता। बहू ने… बहू … Read more

धुंधली आँखे

“बाबूजी, अब बहुत हो गया,” रवि ने गंभीर स्वर में कहा। “मैंने सिडनी में सब इंतज़ाम कर लिया है। मेरा घर बहुत बड़ा है, वहां पार्क है, इंडियन कम्युनिटी है। आप यहाँ अकेले इस टूटे हुए घर में कैसे रह रहे हैं? मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती आपकी चिंता में। इस बार मैं आपको … Read more

स्वार्थी मैं ही हूँ

वंदना की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार ये गुस्से के नहीं, शर्मिंदगी के थे। उसे याद आया कि कैसे निलेश उसे रोक रहा था, कैसे सास ने कहा था कि ‘बेटा, अगर तुझे दिक्कत है तो हम साथ मिलकर करेंगे’, पर उसने किसी की नहीं सुनी। “माँ, मैंने बहुत बड़ी गलती कर … Read more

आस्था, अंधविश्वास और प्रेम की विजय

सुशीला देवी दरवाज़े के बाहर बैठी मंत्र जाप कर रही थीं, यह सोचकर कि वह अपनी बेटी का उद्धार कर रही हैं, जबकि असल में वह अपनी ही बेटी की हत्यारी बन रही थीं। उस दिन पल्लवी ने किसी तरह रोते हुए श्रुति से कहा था, “मुझे यहाँ से निकाल ले श्रुति, वरना मैं घुट-घुट … Read more

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