वंदना की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार ये गुस्से के नहीं, शर्मिंदगी के थे। उसे याद आया कि कैसे निलेश उसे रोक रहा था, कैसे सास ने कहा था कि ‘बेटा, अगर तुझे दिक्कत है तो हम साथ मिलकर करेंगे’, पर उसने किसी की नहीं सुनी।
“माँ, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी,” वंदना ने धीमे स्वर में कहा। “मुझे लगा था कि मैं मॉर्डन हूँ और वो लोग पिछड़े हुए हैं। पर असल में, मैं स्वार्थी हो गई थी।”
सावित्री देवी ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा, “गलती इंसान से ही होती है, पर उसे सुधारना भी इंसान का ही काम है। अभी देर नहीं हुई है। निलेश को फ़ोन कर और माफ़ी मांग। और सुन, शाम की बस पकड़कर वापस जा। कल से कथा की तैयारी शुरू करनी है न?”
दोपहर की चिलचिलाती धूप में ऑटो रिक्शा घर के गेट पर रुका। वंदना ने गुस्से में अपना पर्स कंधे पर टांगा और धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल हुई। घर के बरामदे में बैठी उसकी माँ, सावित्री देवी, चावल बीन रही थीं। अचानक बेटी को इस तरह बेवक़्त और तेवर में आया देख उनके हाथ ठिठक गए। वंदना ने न नमस्ते किया, न कोई बात, सीधे अंदर वाले कमरे की तरफ बढ़ गई और सोफे पर अपना बैग पटक दिया।
सावित्री देवी समझ गईं कि ज़रूर ससुराल में कुछ तूफ़ान मचा है। वंदना की शादी को अभी साल भर भी नहीं हुआ था। दामाद जी, निलेश, बैंक में मैनेजर थे और स्वभाव के बेहद सुलझे हुए इंसान थे। सास-ससुर भी पुराने ख्यालात के ज़रूर थे, लेकिन बुरे नहीं। फिर भी, वंदना की शिकायतें कम होने का नाम नहीं लेती थीं। कभी खाने को लेकर, कभी उठने-बैठने के समय को लेकर, तो कभी रिश्तेदारों की आवाजाही को लेकर।
सावित्री देवी ने चावल की थाली एक तरफ रखी और पानी का गिलास लेकर अंदर आईं। वंदना का चेहरा लाल था और आँखों में आंसू भरे थे।
“क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है? निलेश का फ़ोन तो नहीं आया था कि तू आ रही है,” सावित्री देवी ने नरमी से पूछा।
वंदना फट पड़ी, “माँ, अब मैं उस घर में एक पल भी नहीं रहूँगी। हद हो गई है। मुझे तो लगता है कि मैं कोई बहु नहीं, बल्कि उस घर की कैदी हूँ। मेरी कोई मर्ज़ी, कोई पसंद मायने ही नहीं रखती।”
“अरे, शांत हो जा। पहले पानी पी और बता तो सही कि बात क्या हुई?” सावित्री देवी ने उसे पानी थमाया।
वंदना ने एक घूंट पानी पिया और भड़ास निकालनी शुरू की, “माँ, आपको पता है, अगले हफ़्ते हमारे घर में ‘सत्यनारायण की कथा’ है। मैंने निलेश से कहा था कि हम कैटरिंग वाले को बुला लेते हैं, फालतू की झंझट कौन पालें। लेकिन माजी अड़ गईं। कहने लगीं कि घर की पूजा है, भोग घर पर ही बनेगा और खाना भी हम सब मिलकर बनाएंगे। कहती हैं कि रिश्तेदारों के लिए बाहर का खाना ठीक नहीं लगता। अब आप ही बताओ, बीस-पच्चीस लोगों का खाना घर पर बनाना क्या मज़ाक है? और जब मैंने मना किया, तो पापाजी ने भी कह दिया कि ‘बहु, माँ सही कह रही हैं, घर के हाथ के स्वाद की बात ही अलग है।’ मतलब मेरी सुविधा किसी को नहीं दिख रही। बस, मैंने भी कह दिया कि मुझसे यह मज़दूरी नहीं होगी और मैं यहाँ चली आई।”
सावित्री देवी ने चुपचाप वंदना की पूरी बात सुनी। उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी, बल्कि एक गहरी सोच थी। तभी रसोई से सावित्री देवी की बहु, यानी वंदना की भाभी ‘सुमन’ चाय और नाश्ता लेकर आई। सुमन के माथे पर पसीना था, शायद वह काफी देर से रसोई में खट रही थी क्योंकि आज शाम को सावित्री देवी के घर भी कीर्तन था।
सुमन ने मुस्कुराते हुए चाय वंदना के सामने रखी, “दीदी, चाय पीजिए। आप अचानक आईं, मुझे पता होता तो मैं आपके पसंद के पकोड़े भी बना लेती। अभी बस मठरी थी।”
वंदना ने चाय का कप उठाया और एक घूंट भरते ही मुंह बनाया, “भाभी, चीनी कितनी कम है इसमें। और अदरक भी नहीं कूटा ठीक से। आपको पता है न मुझे कड़क चाय पसंद है। और ये मठरी… यह तो बाज़ार की लग रही है। घर पर नहीं बनाई आपने?”
सुमन थोड़ा झेंप गई, “दीदी, कीर्तन की तैयारी में लगी थी, तो मठरी बनाने का समय नहीं मिला। हलवाई से मंगवा ली थी।”
वंदना ने चिढ़ते हुए कहा, “यही तो दिक्कत है आजकाल। घर का शुद्ध खाना खिलाने में सबको जोर आता है। माँ के हाथ की बनी मठरी का जो स्वाद था, वो इस बाज़ारू मैदे में कहाँ। थोड़ा कष्ट कर लेतीं तो क्या हो जाता? आखिर ननद आई है घर पर।”
सुमन ने नज़रें झुका लीं और चुपचाप खाली ट्रे लेकर वापस रसोई में चली गई।
सावित्री देवी अब तक खामोश थीं, लेकिन अब उन्होंने अपना मौन तोड़ा। उन्होंने वंदना की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “वंदना, एक बात पूछूं? बुरा तो नहीं मानेगी?”
“पूछो माँ,” वंदना ने लापरवाही से कहा।
“तुझे अपनी भाभी की बाज़ार से मंगाई हुई मठरी में कमी नज़र आई। तुझे लगा कि ननद आई है तो भाभी को मेहनत करके घर पर बनाना चाहिए था, चाहे वो सुबह से कीर्तन की तैयारी में क्यों न थकी हो। तुझे घर के स्वाद की अहमियत पता है, है न?”
वंदना को समझ नहीं आया कि माँ क्या कहना चाह रही हैं, “हाँ, तो? घर का खाना तो अच्छा होता ही है।”
“तो फिर बेटा,” सावित्री देवी की आवाज़ थोड़ी सख्त हो गई, “जब तेरी सास ने, जो उम्र में तुझसे बड़ी हैं, यही बात कही कि घर की पूजा में घर का बना खाना होना चाहिए, तो तुझे वो ‘मज़दूरी’ और ‘अत्याचार’ क्यों लगा? यहाँ तुझे सुमन का आराम करना अखर रहा है, और वहां तुझे अपना काम करना अखर रहा है।”
वंदना के हाथ से चाय का कप लगभग छूटते-छूटते बचा। वह अवाक होकर माँ को देखने लगी।
सावित्री देवी ने आगे कहा, “देख बेटा, दोहरा मापदंड नहीं चलता। तू यहाँ इस घर की बेटी है, तो तुझे अधिकार चाहिए, सम्मान चाहिए और विशेष व्यवहार भी चाहिए। और वहां तू बहु है, तो तुझे आराम चाहिए और आज़ादी चाहिए। जब सुमन ने शॉर्टकट लिया तो तूने उसे ताना मारा, लेकिन जब तेरी सास ने तुझे शॉर्टकट लेने से रोका तो तू घर छोड़कर भाग आई? सोच, अगर सुमन भी अभी अपना बैग उठाए और यह कहकर अपनी माँ के घर चली जाए कि ‘दीदी और मम्मीजी मुझसे बहुत काम करवाती हैं’, तो तुझे कैसा लगेगा?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। वंदना के पास कोई जवाब नहीं था। उसका अहंकार, जो कुछ देर पहले सातवें आसमान पर था, अब धरातल पर आ गिरा था। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था, लेकिन स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
सावित्री देवी ने नर्म स्वर में समझाया, “बेटा, घर ईंट-पत्थरों से नहीं, भावनाओं से बनते हैं। तेरी सास तुझे नौकरानी नहीं बनाना चाहतीं, वो तुझे उस घर का हिस्सा बनाना चाहती हैं। जब हम मिलकर काम करते हैं, तो थकान तो होती है, लेकिन रिश्तों में जो मिठास आती है, वो कैटरिंग वाले के खाने में नहीं होती। तूने सुमन को देखा? वो सुबह से लगी है, लेकिन तेरे ताने सुनकर भी मुस्कुराकर चली गई। क्योंकि वो जानती है कि यह उसका परिवार है। और तू? एक छोटी सी बात पर अपना परिवार छोड़कर आ गई।”
वंदना की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार ये गुस्से के नहीं, शर्मिंदगी के थे। उसे याद आया कि कैसे निलेश उसे रोक रहा था, कैसे सास ने कहा था कि ‘बेटा, अगर तुझे दिक्कत है तो हम साथ मिलकर करेंगे’, पर उसने किसी की नहीं सुनी।
“माँ, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी,” वंदना ने धीमे स्वर में कहा। “मुझे लगा था कि मैं मॉर्डन हूँ और वो लोग पिछड़े हुए हैं। पर असल में, मैं स्वार्थी हो गई थी।”
सावित्री देवी ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा, “गलती इंसान से ही होती है, पर उसे सुधारना भी इंसान का ही काम है। अभी देर नहीं हुई है। निलेश को फ़ोन कर और माफ़ी मांग। और सुन, शाम की बस पकड़कर वापस जा। कल से कथा की तैयारी शुरू करनी है न?”
वंदना ने आंसू पोंछे और मुस्कुराई। “नहीं माँ, बस से नहीं। निलेश आ रहे होंगे, मैंने उन्हें गुस्से में बहुत कुछ सुना दिया था। मैं उन्हें फ़ोन करती हूँ और मनाती हूँ। और हाँ…” उसने रसोई की तरफ देखा, “जाने से पहले मैं भाभी के साथ मिलकर कीर्तन के लिए पकोड़े तलवाऊंगी। बाज़ार की मठरी से सच में काम नहीं चलेगा।”
सावित्री देवी मुस्कुरा उठीं। उन्हें तसल्ली हुई कि उनकी बेटी को आज जीवन का एक अहम पाठ समझ आ गया था—कि अधिकार जताने से पहले, ज़िम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। और जो सम्मान हम दूसरों (जैसे भाभी) को नहीं दे सकते, उसकी उम्मीद हमें अपने लिए (ससुराल में) भी नहीं करनी चाहिए।
शाम को जब निलेश वंदना को लेने आया, तो वंदना ने कोई शिकायत नहीं की। उसने चुपचाप अपना बैग उठाया, माँ और भाभी के पैर छुए और कार में बैठ गई। जाते-जाते उसने सुमन से कहा, “भाभी, अगली बार आऊँगी तो आपके हाथ के बने दही-बड़े खाऊँगी, और हाँ, मदद मैं खुद करवाऊँगी।”
गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई, और सावित्री देवी ने राहत की सांस ली। उन्होंने एक घर को टूटने से बचा लिया था, सिर्फ़ एक आईना दिखाकर।
लेखिका : आरती कुशवाहा