एक बेनाम रिश्ते की दहलीज पर पश्चाताप

 विराज का गला सूख गया था। उसने भारी और रुंधे हुए गले से सिर्फ इतना कहा, “मुझे पता है मेरे पास तुम्हें कॉल करने का कोई हक नहीं है… लेकिन मुझे माफ कर दो अदिति। मैं उस दिन इंसान नहीं, एक अंधा और घमंडी जानवर बन गया था।” 

दूसरी तरफ कुछ पलों का भारी सन्नाटा रहा। और फिर एक बेहद शांत लेकिन नमी से भरी हुई आवाज आई, “तुमसे बाहरी इंसान का टैग पाकर मुझे समझ आ गया था विराज कि कभी-कभी हम अपनों से भी ज्यादा किसी को अपना मान लेते हैं। लेकिन इस फोन का इंतजार मुझे नब्बे दिन से था। दोस्ती खत्म हो सकती है, पर इंसानियत नहीं।” 

पिछले नब्बे दिनों से विराज का फोन उसके हाथ में ही मानो जम सा गया था। स्क्रीन पर ‘अदिति’ का नाम फ्लैश हो रहा था, लेकिन हरे रंग के उस ‘डायल’ बटन को दबाने भर की हिम्मत उसके अंदर नहीं बची थी। कोई तीन महीने की गहरी घुटन और रातों की नींद हराम करने के बाद, आज उसने तय किया था कि वह अपनी इस झूठी ईगो  को किनारे रखकर अदिति को कॉल करेगा। लेकिन फैसला कर लेना और उस पर अमल करना, दोनों के बीच एक बहुत गहरी खाई होती है। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। बार-बार यही डर उसे पीछे खींच लेता था कि कहीं अदिति ने फोन उठाते ही डांट दिया तो? या शायद उसने कॉल काटा ही नहीं, बल्कि एक ठंडी और चुभती हुई खामोशी ओढ़ ली, तो वह क्या करेगा? उसे डर था कि कहीं इस एक फोन कॉल से वह बचा-खुचा भ्रम भी न टूट जाए, जो उसे लगता था कि शायद उनके बीच कुछ तो बाकी है।

विराज अपनी बालकनी में खड़ा था। रात का सन्नाटा उसके मन के शोर को और बढ़ा रहा था। वह यह बात बहुत अच्छी तरह से जानता था कि उनके रिश्ते के इस कड़वे और शायद कभी न खत्म होने वाले इस अंधकारमय मोड़ के लिए सिर्फ और सिर्फ वही जिम्मेदार था। यह ख्याल उसे पिछले तीन महीनों में अनगिनत बार आ चुका था। जब भी वह खुद को आईने में देखता, उसे अपना अक्स एक ऐसे मूर्ख और घमंडी इंसान का लगता, जिसने अपने ही हाथों अपने जीवन के सबसे खूबसूरत और निस्वार्थ रिश्ते का कत्ल कर दिया था। फोन करने की तमाम हिम्मत जुटाने के बाद भी उसकी उंगलियां सुन्न पड़ जाती थीं।

यक़ीनन अदिति उसकी पत्नी नहीं थी। और सच कहें तो पत्नी से बात करने में इंसान को इतना सोचना भी नहीं पड़ता। विराज की पत्नी नम्रता कमरे में सो रही थी। विराज को याद आया कि नम्रता से भी उसकी कई बार भयंकर लड़ाइयां हुई थीं। कई बार नौबत घर छोड़कर जाने तक की आ गई थी। लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते में एक अदृश्य सुरक्षा कवच होता है। भले ही कितनी भी कड़वाहट आ जाए, दोनों को कहीं न कहीं यह एहसास होता है कि सुबह की चाय की मेज पर या रात के खाने पर कोई न कोई बहाना मिल ही जाएगा बात शुरू करने का। उनके पास एक सामाजिक और कानूनी बंधन होता है जो उन्हें जोड़े रखता है। 

लेकिन अदिति के साथ उसका यह रिश्ता किसी सात फेरों का मोहताज नहीं था। वे दोनों कॉलेज के जमाने के दोस्त थे, लेकिन वक्त के साथ अदिति उसके जीवन की वह मार्गदर्शक बन गई थी, जिसे हर सुख-दुख में विराज की जरूरत होती थी। जब विराज के पिता का देहांत हुआ था और उसका व्यापार डूबने की कगार पर था, तब अदिति ने एक दोस्त, एक बहन और एक गुरु की तरह उसका हाथ थामा था। दोनों के बीच कोई नाम वाला रिश्ता नहीं था, लेकिन एक ऐसा पवित्र बंधन जरूर था, जिसमें कोई स्वार्थ नहीं था। 

फिर वो मनहूस दिन आया, जब व्यापार की कुछ उलझनों और तनाव के चलते विराज अपना आपा खो बैठा। अदिति ने उसे एक गलत डील करने से रोकना चाहा था, लेकिन विराज के सिर पर घमंड सवार था। उसने भरी मीटिंग के बाद अदिति से बेहद कड़वे और तीखे शब्दों में कह दिया था, “तुम मेरी पत्नी या मेरे परिवार का हिस्सा नहीं हो अदिति। तुम एक बाहरी इंसान हो, इसलिए मेरे फैसलों में दखल देना बंद करो। तुम्हें क्या लगता है, तुम मेरी जिंदगी चलाओगी?” उन शब्दों ने अदिति को अंदर तक चीर दिया था। उसने विराज की तरफ एक ऐसी नजर से देखा था जिसमें गुस्सा नहीं, बल्कि एक असीम पीड़ा थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप वहां से चली गई। और उसके बाद से वह खामोशी आज तक नहीं टूटी थी।

विराज अब गिल्ट (अपराधबोध) की आग में जल रहा था। वह बार-बार खुद से पूछता कि क्या फर्क पड़ता है अगर अदिति उससे नाराज है? दोनों की जिंदगियां अलग हैं, रास्ते अलग हैं। अदिति अपनी दुनिया में है और वह अपने परिवार के साथ अपनी दुनिया में। लेकिन फर्क पड़ता था। क्योंकि कुछ रिश्ते खून या कागज से नहीं, रूह से जुड़ते हैं। अदिति की वो खामोशी उसे हर रात सोने नहीं देती थी। उसकी एक गलती ने एक ऐसे इंसान को उससे दूर कर दिया था, जिसने बिना किसी स्वार्थ के हमेशा उसका भला चाहा था। 

अंततः, विराज ने अपनी आंखें बंद कीं और अपनी कांपती उंगली से डायल का बटन दबा ही दिया। फोन के स्पीकर से ‘रिंग’ जाने की आवाज उसके दिल की धड़कनों से टकरा रही थी। एक बेल, दो बेल, तीन बेल… हर घंटी के साथ उसका डर बढ़ता जा रहा था। तभी अचानक फोन उठ गया। दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई। सिर्फ एक हल्की सी सांसों की आहट थी।

विराज का गला सूख गया था। उसने भारी और रुंधे हुए गले से सिर्फ इतना कहा, “मुझे पता है मेरे पास तुम्हें कॉल करने का कोई हक नहीं है… लेकिन मुझे माफ कर दो अदिति। मैं उस दिन इंसान नहीं, एक अंधा और घमंडी जानवर बन गया था।” 

दूसरी तरफ कुछ पलों का भारी सन्नाटा रहा। और फिर एक बेहद शांत लेकिन नमी से भरी हुई आवाज आई, “तुमसे बाहरी इंसान का टैग पाकर मुझे समझ आ गया था विराज कि कभी-कभी हम अपनों से भी ज्यादा किसी को अपना मान लेते हैं। लेकिन इस फोन का इंतजार मुझे नब्बे दिन से था। दोस्ती खत्म हो सकती है, पर इंसानियत नहीं।” 

उस रात विराज फूट-फूट कर रोया। वह रिश्ता शायद अब कभी पहले जैसा नहीं हो पाएगा, वह कांच चटक चुका था, लेकिन कम से कम अब उस कांच की चुभन से खून बहना बंद हो गया था। विराज को उस रात समझ आ गया कि जीवन में जो लोग बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़े होते हैं, वे किसी भी कानूनी रिश्ते से कहीं ज्यादा बड़े होते हैं।

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**आपकी क्या राय है?**

क्या विराज को माफ कर देना अदिति के लिए सही था? क्या बिना किसी नाम के, रूहानी रिश्तों की कीमत हमारे जीवन में सामाजिक रिश्तों से ज्यादा होती है? ऐसे रिश्ते जब टूटते हैं, तो उनकी कड़वाहट को भूलना इतना मुश्किल क्यों होता है? अपने विचार और अपने अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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