**सपनों की ज़मीन और उम्मीदों का आसमान**

“मुझे पता है पल्लवी,” विवेक ने बहुत ही धीमी लेकिन विश्वास से भरी आवाज़ में कहा, “मैं तुम्हारे पिता के सपनों का वो ‘सरकारी बाबू’ नहीं हूँ, और शायद यह घर और मेरी हैसियत तुम्हारी काबलियत के हिसाब से बहुत छोटी है। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी इन कीमती डिग्रियों की जगह इस सूटकेस के अंधेरे में बिल्कुल नहीं है।”

पल्लवी ने हैरानी से अपने आंसुओं को रोकते हुए विवेक की ओर देखा।

मास्टर दीनानाथ की सबसे बड़ी बेटी पल्लवी बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज़ थी। दीनानाथ जी गाँव के एक साधारण से प्राइमरी स्कूल में मास्टर थे, जिनकी पूरी ज़िंदगी चाक और ब्लैकबोर्ड के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी। पल्लवी ने जब एम.ए. की परीक्षा पूरे जिले में प्रथम श्रेणी से पास की, तो दीनानाथ जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। बेटी की लगन और उसकी आँखों की चमक देखकर उन्होंने अपनी छोटी सी जमा-पूंजी और पेंशन के कुछ पैसे निकालकर पल्लवी का दाखिला बी.एड. (B.Ed) में करवा दिया। पल्लवी ने भी पिता के विश्वास को टूटने नहीं दिया और रात-दिन एक करके बी.एड. की परीक्षा भी शानदार अंकों से उत्तीर्ण कर ली। अब दीनानाथ जी की आँखों में बस एक ही सपना तैरता था—अपनी इस सर्वगुण संपन्न, सुंदर और समझदार बेटी के लिए एक ऐसा जीवनसाथी ढूँढना, जो किसी बड़े सरकारी पद पर हो और उनकी बेटी को रानी बनाकर रखे।

लेकिन बंद कमरों में देखे गए सपनों की दुनिया और हकीकत के बाज़ार में बहुत बड़ा फासला होता है। जैसे ही दीनानाथ जी ने पल्लवी के लिए योग्य वर खोजना शुरू किया, उन्हें समाज की एक बेहद कड़वी और नंगी सच्चाई का सामना करना पड़ा। पल्लवी की सुंदरता, उसके संस्कार और उसकी डिग्रियां विवाह के इस बाज़ार में उन परिवारों के सामने बिल्कुल बौनी साबित हो रही थीं, जिनकी भूख सिर्फ दहेज की भारी भरकम रकम, सोने के गहनों और आलीशान गाडियों से शांत होती थी। दीनानाथ जी जिस भी सरकारी नौकरी वाले लड़के के घर रिश्ता लेकर जाते, वहाँ चाय-नाश्ते के बाद सीधे तौर पर एक लंबी-चौड़ी ‘मांगों’ की लिस्ट उनके हाथों में थमा दी जाती। एक निम्न-मध्यमवर्गीय पिता की हैसियत और उसकी टूटी हुई चप्पलें उन मांगों के सामने हमेशा घुटने टेक देतीं।

कई बार तो ऐसा हुआ कि लड़के वाले पल्लवी को देखने आए, उसकी काबलियत और सुंदरता की खूब तारीफें कीं। पल्लवी से दुनिया भर के सवाल पूछे गए, जिनका उसने बड़ी ही शालीनता से जवाब दिया। लेकिन जब बंद कमरे में बात ‘लेन-देन’ पर आई, तो दीनानाथ जी की आर्थिक तंगी और उनकी खाली जेब देखकर वे लोग ‘फिर सोच कर बताएंगे’ का बहाना बनाकर चुपचाप खिसक लिए। पल्लवी किसी खोटे सिक्के की तरह नहीं थी, वह तो खरा सोना थी। लेकिन समाज के उस तराजू में उसके गुण नहीं, बल्कि उसके पिता की हैसियत तौली जा रही थी। हर टूटते हुए रिश्ते के साथ दीनानाथ जी के कंधे झुकते जा रहे थे और पल्लवी के अंदर का स्वाभिमान जैसे तिल-तिल कर मर रहा था। मोहल्ले की औरतों की कानाफूसी और ताने अलग से पिता और पुत्री के सीने में तीर की तरह चुभते थे। 

अंततः, महीनों की भागदौड़, जूतियां घिसने और अनगिनत अपमान सहने के बाद, दीनानाथ जी की हिम्मत जवाब दे गई। उन्हें लगने लगा कि शायद उनकी बेटी की किस्मत में कोई बहुत बड़ा घर नहीं लिखा है। उन्होंने हार मानकर, अपनी सारी उम्मीदों से समझौता करते हुए पल्लवी का रिश्ता विवेक से तय कर दिया। विवेक एक बहुत ही साधारण, शर्मीले और शांत स्वभाव का लड़का था, जो शहर की एक प्राइवेट लॉजिस्टिक कंपनी में अकाउंट्स का काम देखता था। उसके पास कोई ‘सरकारी बाबू’ वाला रुतबा नहीं था, ना ही कोई बहुत बड़ा पुश्तैनी मकान था, लेकिन उसकी बातों में एक सच्चाई और आँखों में ईमानदारी थी, जिसने दीनानाथ जी को यह तसल्ली दे दी कि उनकी बेटी इस घर में कम से कम भूखी या दुखी नहीं रहेगी।

शादी का दिन भी आ गया। दीनानाथ जी ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी दिखावे के, सादगी से शादी संपन्न की। जब विदाई की बेला आई, तो पल्लवी अपने पिता के गले लगकर फूट-फूट कर रोई। वह जानती थी कि उसके पिता आज खुद को कितना हारा हुआ महसूस कर रहे हैं। विदाई के बाद, जब पल्लवी ससुराल जाने के लिए गाड़ी में बैठी, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी शून्यता थी।

ससुराल पहुँचकर, नई नवेली दुल्हन के रूप में रस्मों-रिवाज़ों के बीच पल्लवी ने अपने आप को एक मशीन की तरह ढाल लिया। अगले दिन, मुँह दिखाई की रस्म और मेहमानों के जाने के बाद जब पल्लवी अपने कमरे में आई, तो उसने अपनी भारी भरकम शादी की ज़री वाली साड़ी उतारकर एक बेहद साधारण और सौम्य हरे रंग की फ्लोरल साड़ी पहन ली। यह साड़ी उसे हमेशा से बहुत पसंद थी, क्योंकि इसका हरा रंग और फूलों का प्रिंट उसे उस खुले आसमान और आज़ाद प्रकृति की याद दिलाता था, जहाँ वो कभी बेखौफ उड़ना चाहती थी और अपने लिए एक मुकाम बनाना चाहती थी।

कमरे के एक कोने में उसका बड़ा सा सूटकेस रखा था। पल्लवी ने सूटकेस खोला। उसमें सबसे नीचे उसके एम.ए. और बी.एड. के सर्टिफिकेट, कुछ ज्ञानवर्धक किताबें और उसकी वो लाल डायरी रखी थी जिसमें उसने भविष्य के अनगिनत सपने बुने थे—एक अच्छी और स्वावलंबी शिक्षिका बनने का सपना। उसने उन कागजातों को बाहर निकाला, उन पर प्यार से हाथ फेरा और फिर एक गहरी ठंडी सांस लेकर उन्हें वापस उसी सूटकेस की सबसे निचली तह में दबा दिया। उसने अपने उन तमाम सपनों, अपनी उम्मीदों और अपनी पहचान की एक अदृश्य गठरी बांधी और उसे मन के एक बहुत गहरे, अंधेरे कोने में हमेशा के लिए दफन कर देने का मन बना लिया। 

तभी दरवाजे पर आहट हुई और विवेक कमरे में आया। उसने पल्लवी को खुले सूटकेस के पास उदास बैठे देखा। विवेक धीरे से उसके पास आया और बिना कुछ कहे, पल्लवी की उस लाल डायरी को सूटकेस के अंदर से बाहर निकाल लिया, जो शायद पल्लवी के हाथों से आधी बाहर ही रह गई थी।

“मुझे पता है पल्लवी,” विवेक ने बहुत ही धीमी लेकिन विश्वास से भरी आवाज़ में कहा, “मैं तुम्हारे पिता के सपनों का वो ‘सरकारी बाबू’ नहीं हूँ, और शायद यह घर और मेरी हैसियत तुम्हारी काबलियत के हिसाब से बहुत छोटी है। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी इन कीमती डिग्रियों की जगह इस सूटकेस के अंधेरे में बिल्कुल नहीं है।”

पल्लवी ने हैरानी से अपने आंसुओं को रोकते हुए विवेक की ओर देखा।

“अभी शायद मेरी आर्थिक स्थिति इतनी मज़बूत नहीं है कि मैं तुम्हें तुरंत कोई बड़ा मंच दे सकूँ, और अभी घर की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं जिन्हें तुम्हें समझना होगा,” विवेक ने पल्लवी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बहुत ही कोमलता से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें वादा करता हूँ कि तुम्हारे ये सपने मरेंगे नहीं। जिस दिन हालात थोड़े बेहतर होंगे, मैं खुद तुम्हें उस स्कूल तक छोड़कर आऊँगा जहाँ तुम पढ़ाना चाहोगी। तब तक, बस अपना यह हौसला और मुझ पर अपना भरोसा मत हारना।”

विवेक की उन चंद सच्ची बातों ने पल्लवी के अंदर महीनों से जमी बर्फ और निराशा को एक ही पल में पिघला दिया। उसकी आँखों से दो गर्म आंसू छलक कर उस हरे रंग की फ्लोरल साड़ी के पल्लू पर गिर पड़े। लेकिन ये आंसू हार या दुख के नहीं थे। पल्लवी ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने जो सपनों की गठरी अभी-अभी बांधी थी, उसे अब हमेशा के लिए बंद करने की ज़रूरत नहीं थी। एक अजनबी और छोटे से आंगन में ही सही, लेकिन उसे एक ऐसा हमसफर मिल गया था जिसने उसके सपनों की बंजर ज़मीन पर उम्मीद की एक नई धूप बिखेर दी थी।

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