तीसरा घर: एक पिता की अनोखी वसीयत – संगीता अग्रवाल 

“विदाई की बेला में जब पूरी दुनिया दुल्हन के गहने और दहेज का हिसाब लगा रही थी, तब एक पिता ने अपनी बेटी की हथेली पर कुछ ऐसा रख दिया, जिसने समाज की सदियों पुरानी रीत को हमेशा के लिए बदल दिया।” “पगली, बाप हूँ तेरा। मेरा फ़र्ज़ है तुझे शान से विदा करूँ। तू … Read more

वो बंद कमरा और बैग में सिमटी दुनिया – स्वाति जैन

“जिस घर की दीवारों का रंग कभी मेरी पसंद से तय होता था, आज उसी घर में मुझे अपनी एक साड़ी टांगने के लिए ‘इजाज़त’ और ‘जगह’ दोनों मांगनी पड़ी। क्या शादी के बाद बेटियों का हक सिर्फ यादों तक ही सिमट कर रह जाता है?” “सुमित, आपको नहीं लगता मायके का घर चाहे कितना … Read more

“मायके की सूनी देहरी और बूढ़ी आँखों की आस” – मुकेश पटेल 

“जब माता-पिता दुनिया से चले जाते हैं, तो एक बहन के लिए उसका भाई ही उसका मायका बन जाता है। वह दौलत या उपहारों की भूखी नहीं होती, वह तो बस अपने भाई की एक झलक पाकर ही अपने मायके को जीवित महसूस करती है… पर क्या आज का भाई इस मूक पुकार को सुन … Read more

सूने कमरों की गूंज – विभा गुप्ता

“ईंट और सीमेंट से दीवारें तो खड़ी हो सकती हैं, लेकिन उन दीवारों को थामने के लिए जिन रिश्तों की जरूरत होती है, अगर वही खोखले हो जाएं, तो करोड़ों का महल भी एक आलीशान खंडहर से ज्यादा कुछ नहीं होता। क्या एक पिता की पुरानी कुर्सी बेटे के नए इटालियन मार्बल की शोभा बिगाड़ … Read more

“कच्ची दीवारों का पक्का सच” – रश्मि प्रकाश 

“पिता के बनाए घर में रहकर दीवारों के रंग पर ताना मारना बहुत आसान होता है, लेकिन जब खुद की कमाई से सर छुपाने के लिए एक छत ढूंढनी पड़ती है, तब समझ आता है कि वो पुरानी दीवारें ईंटों से नहीं, पिता की रीढ़ की हड्डी से बनी थीं…” “पापा… मुझे माफ़ कर दीजिये। … Read more

रिश्तों की असली गिनती – करुणा मलिक

“एक सास को गुमान था कि उसका घर भरा-पूरा है और बहू ‘अकेलेपन’ से आई है, इसलिए उसे रिश्तों की कद्र नहीं। लेकिन जब घर में विपत्ति की आंधी चली, तो उस ‘भरे-पूरे’ परिवार की भीड़ तमाशबीन बन गई और वो ‘अकेली’ बहू ढाल बन गई। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपको सोचने पर मजबूर … Read more

*अच्छा बेटा बनने के चक्कर में अपनी पत्नी के साथ गलत तो नहीं कर सकता…* – तोषिका

मुझे नहीं खाना है ऐसा खाना जिसमें कुछ स्वाद ही ना हो, सारे मुंह का मजा किरकिरा कर देती हो तुम बहु…ताने मारते हुए दिव्या की सास बोली। दिव्या बस वहां मौन कड़ी रही। दूर से यह सब दिव्या के पति राम सुन रहे थे। मैं दफ्तर जा रहा हू, ये बोलते हुए राम निकल … Read more

महंगाई – एम. पी. सिंह  

आज बजट पेश करते ही गलिओं मैं महंगाई की फुस फुसाहट शुरू हो गई. सब्जियाँ बहुत महँगी हो गई, रसोई का बजट बिगड गया है,वगैरह वगैरह.  क्या किसी ने कभी चर्चा की कि हमारा रहन सहन, खान पान, दिन चर्या और न जाने क्या क्या बदल गया. सच बात तो ये है कि हमारा अपने … Read more

अपराध बोध – डाॅ संजु झा

पिछले कुछ वर्षों से विनय जी का मन रह-रहकर व्याकुल हो उठता है।उनके दिल में एक टीस-सी उठती रहती है -“काश!अपनी ग़लती का पश्चाताप करने का अवसर मिल जाता,तो अपराध-बोध से मुक्ति मिल जाती!” विनय जी को पता है कि अब उन्हें पश्चाताप का अवसर कभी नहीं मिलेगा।एक छटपटाहट सदा के लिए उनके दिल में … Read more

एक पति का अपराध बोध – गीतू महाजन

पूरे 15 दिन हो गए थे उसे गए हुए..वो सब कुछ छोड़कर जा चुकी थी हमेशा के लिए।एक ऐसी जगह जहां से कोई भी लौटकर नहीं आता और पीछे छोड़ गई थी अपना भरा पूरा घर परिवार।कितना ही सहेज कर रखती थी वह अपने घर को।कितनी तन्मयता से सब कुछ संभालती।बाहर की फुलवारी से लेकर … Read more

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