रद्दी में फेंका हुआ वो पुराना ‘नोट’ – मीना गुप्ता

*सरकार तो सिर्फ कागज के नोटों का रंग बदलती है, लेकिन जब अपनी ही खून-पसीने से पाली हुई औलाद का रंग बदलता है, तो इंसान जीते जी मर जाता है।* — *तुम्हारी हवेली के पैसे तुम्हें मुबारक हों। हमने उसे तुम्हें ‘दान’ कर दिया। लेकिन अपना स्वाभिमान हम तुम्हें दान नहीं कर सकते। मैं और … Read more

रिश्तों का तराजू – गरिमा चौधरी

*जब समर्पण का मूल्य केवल एक तरफ से चुकाया जाए, तो वह रिश्ता नहीं, सौदा बन जाता है। क्या एक पत्नी का धर्म सिर्फ पति के माता-पिता की सेवा करना है, जबकि पति उसके माता-पिता का हाल तक न पूछे?* — “मैं तुलना नहीं कर रही समीर, मैं समानता मांग रही हूँ,” रागिनी ने कहा। … Read more

रिमोट कंट्रोल वाली गृहस्थी – डॉ पारुल अग्रवाल

*शादी के बाद बेटी ‘परायी’ नहीं होती, लेकिन अगर वह अपने ससुराल को ‘अपना’ नहीं मानती, तो वह पूरी जिंदगी एक ऐसे सराय में गुजार देती है जहाँ उसका बिस्तर तो होता है, पर सुकून नहीं।*  “मीरा, क्या हम कभी एक बार भी बिना तुम्हारे ‘मायके’ के रेफरेंस के बात नहीं कर सकते? यह हमारा … Read more

माँ के बाद… बाबूजी का ‘मायका’ – रमा शुक्ला

 “माँ के जाने के बाद बेटी को लगा कि अब मायके के दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके हैं, वहां अब सिर्फ भाई-भाभी का राज होगा। लेकिन जब उसने ‘पराई’ होकर उस घर की देहरी लांघी, तो एक बूढ़े पिता ने अपनी कांपती हथेलियों में कुछ ऐसा थाम रखा था, जिसने ‘मायके’ की परिभाषा ही … Read more

 आशीर्वाद का मोल – कमलेश राणा 

 “एक बेटे को लगता था कि पिता के सामने झुकने से उसका ‘रुतबा’ कम हो जाएगा, लेकिन उसे क्या पता था कि जिस ऊंचाई पर वह आज खड़ा है, उसकी नींव में उसके पिता की झुकी हुई कमर का ही सहारा है। पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपकी रूह को झकझोर देगी।” — “पापा, अब … Read more

तमाशा – अमिता कुचया

“अपने घर का धुआं जब दूसरों को दिखाओगे, तो लोग आग बुझाने नहीं, हाथ सेकने आएंगे… क्योंकि टूटे हुए मकान की ईंटें लोग अक्सर उठा ले जाते हैं।” — “तुम्हें लगता है कि मैं इस घर की मालकिन हूँ?” अंजलि ने आखिरकार चुप्पी तोड़ी, आवाज़ में कड़वाहट थी। “नहीं सुमित, मैं तो बस एक सजावटी … Read more

अपराध-बोध – डाॅ संजु झा

पिछले कुछ वर्षों से विनय जी का मन रह-रहकर व्याकुल हो उठता है।उनके दिल में एक टीस-सी उठती रहती है -“काश!अपनी ग़लती का पश्चाताप करने का अवसर मिल जाता,तो अपराध-बोध से मुक्ति मिल जाती!” विनय जी को पता है कि अब उन्हें पश्चाताप का अवसर कभी नहीं मिलेगा।एक छटपटाहट सदा के लिए उनके दिल में … Read more

पहला प्यार – विनीता सिंह 

पहला प्यार सुबह की ओस की तरह होता है, उसका एहसास ज़िन्दगी भर मन में एक उत्साह और उमंग भर देता है।अमर गांव में रहता है वह आगे पढ़ाई के लिए शहर के एक कॉलेज में एडमिशन लेता है बहुत ही सीधा और बहुत ही अपने आप में चुप रहने वाला लड़का है केवल अपनी … Read more

बचपन के दोस्त बन गए हमसफ़र – पुष्पा जोशी

बस गजेन्द्र अब बहुत हो गया, तुम्हारी नौकरी लगे भी दो साल हो गए। हम लड़की वालों को क्या जवाब दे। एक से बढ़कर एक रिश्ते आऐ हैं, तुम्हें जो पसन्द हो हमें बता दो। अगर तुमने कोई पसंद कर रखी हो तो वह बता दो। बेटा शादी की उम्र निकल जाएगी तो अच्छे रिश्ते … Read more

दहलीज के इस पार, आँचल के उस पार – मुकेश पटेल 

“अक्सर पुरुष यह सोचकर सारी ज़िंदगी निकाल देते हैं कि उन्होंने घर में ‘संतुलन’ बना रखा है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि ‘माँ की ममता’ और ‘पत्नी के त्याग’ को तराजू पर तौला नहीं जा सकता, उन्हें सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है।” विहान को लगता था कि वह एक आदर्श बेटा और … Read more

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