दर्द – रंजना गुप्ता

माँ, आप चिंता मत करना। यहाँ आपका बहुत अच्छा ख्याल रखा जाएगा।

राहुल ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा। सामने वृद्धाश्रम का बड़ा सा फाटक था। फाटक के ऊपर लिखा था *स्नेह सदन वृद्धाश्रम*

कमला देवी ने बेटे की ओर देखा और मुस्कुरा दीं

अरे पगले, मैं कोई बच्ची हूँ क्या? तू अपनी चिंता कर। विदेश जाकर समय पर खाना खाया करना ।

दोनों मुस्कुरा रहे थे, लेकिन दोनों की आँखें झूठ बोल रही थीं।

राहुल अपनी माँ को वृद्धाश्रम छोड़ने आया था। रास्ते भर उसने हल्की-फुल्की बातें कीं, मजाक किए, लेकिन उसके भीतर एक तूफान चल रहा था। वह माँ को यह नहीं बता सकता था कि डॉक्टरों ने उसे कैंसर की अंतिम अवस्था बताई है। इलाज संभव था, लेकिन सफलता की उम्मीद बहुत कम थी। नौकरी पहले ही छूट चुकी थी। घर बिकने की कगार पर था। उसके पास जो भी सेविंग्स थी वह भी इलाज में खत्म हो रही थी।

उसने सोचा था कि अगर वह माँ को अपने साथ रखेगा, तो उसकी बीमारी का दर्द माँ को हर दिन मारता रहेगा और उसके बाद माँ अकेली कैसे रहेगी ?

इसलिए उसने एक कठिन फैसला लिया था माँ को वृद्धाश्रम में सुरक्षित छोड़ दे लेकिन उसने यह सच किसी को नहीं बताया था ।

उसके पिता नहीं थे माँ ने बहुत दर्द झेले थे वह चाहता था अपनी माँ को दुनिया की सारी खुशियाँ दे लेकिन नहीं दे पाया।

उधर कमला देवी भी एक सच छिपाए बैठी थीं। दो महीने पहले डॉक्टर ने उन्हें बताया था कि उनका हृदय बहुत कमजोर हो चुका है। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।

उन्होंने भी यह बात राहुल से छिपा ली थी। उन्हें लगता था कि बेटा पहले से ही अपनी नौकरी को लेकर बहुत परेशान है क्यों कि कोरोना आने से उसकी नौकरी चली गयी थी और अभीअगर उसे उनकी बीमारी का पता चल गया, तो वह और टूट जाएगा।

इसलिए दोनों एक-दूसरे को बचाने के लिए झूठी मुस्कान ओढ़े हुए थे।

वृद्धाश्रम के कमरे में सामान रखते समय कमला देवी बोलीं, राहुल, अब तू बेफिक्र होकर अपना काम कर। मैं यहाँ बिल्कुल ठीक रहूँगी।

हाँ माँ, और मैं जल्दी ही आपसे मिलने आऊँगा।

कमला देवी जानती थीं कि राहुल झूठ बोल रहा है कोई विदेश जाने के बाद वापस नहीं आता लेकिन वह यह भी जानती थीं कि पैसे की तंगी के कारण उसके चेहरे पर थकान थी, आँखों के नीचे काले घेरे थे और मुस्कान में दर्द छिपा था लेकिन वह रोकर उसके पैरों में बेड़ियाँ नहीं डालना चाहती थीं इसलिए उन्होंने कुछ नहीं पूछा। राहुल भी समझ रहा था कि माँ उसके सामनेज्यादा मजबूत बनने का नाटक कर रही हैं।

इसलिए उसने भी कुछ नहीं पूछा कभी-कभी प्यार सवाल नहीं करता बस शांत रहता है उस रात दोनों सो नहीं पाए।

राहुल अस्पताल के कमरे में बैठा अपनी रिपोर्ट देख रहा था। वहीं वृद्धाश्रम के कमरे में कमला देवी बेटे की बचपन की तस्वीर हाथ में लिए बैठी थीं। उन्होंने तस्वीर को सीने से लगाया और फुसफुसाईं, भगवान, मेरी उम्र भी मेरे बेटे को दे देना। उसी समय राहुल अस्पताल की खिड़की से आसमान देखकर कह रहा था, भगवान, मेरी जिंदगी चाहे जितनी बची हो, मेरी माँ को कभी कोई तकलीफ मत देना। दोनों की प्रार्थना एक जैसी थी।बस दोनों एक-दूसरे की बीमारी से अनजान थे।

दो दिन बीत गए और राहुल रविवार को मिलने आया और बोला माँ कल मेरी फ्लाइट है ।मैं आपसे फोन पर बात करता रहूँगा अब मिलना जल्दी नहीं हो सकेगा ।

अच्छा! बहुत बढ़िया। कमला देवी खुश होने का अभिनय करती हुयी बोली ।

असलियत यह थी कि राहुल नौकरी नहीं, बल्कि कीमोथेरेपी के लिए अस्पताल जा रहा था। उधर कमला देवी भी हर बार फोन पर कहतीं, देख, मैं तो यहाँ खूब मजे में हूँ। सुबह योग करती हूँ, सहेलियों से बातें करती हूँ और खा पीकर मस्त रहती हूँ।

असल में उनकी तबियत दिन-ब-दिन बिगड़ रही थी।सीढ़ियाँ चढ़ने में साँस फूल जाती थी लेकिन वे राहुल को बताना नहीं चाहती थीं।

रविवार आया राहुल का फोन नहीं आया। फिर अगला रविवार भी निकल गया। फिर तीसरा रविवार आया कोई फोन नहीं आया जब वह फोन करती तो उसका फोन बंद आता।

कमला देवी बेचैन हो गईं। उन्होंने कई बार फोन किया। फोन बंद था। वह पूरी रात सो नहीं पाईं। पहली बार उन्हें डर लगा। 

चौथे रविवार को वृद्धाश्रम के कार्यालय में एक युवक आया।उसके हाथ में एक लिफाफा था। क्या कमला देवी यहाँ रहती हैं? जी। मैनेजर ने कहा

युवक ने लिफाफा उन्हें दे दिया।

कमला देवी ने पत्र लिया और काँपते हाथों से उसे खोला। वह राहुल का पत्र था।

*माँ*

जब आप यह पत्र पढ़ रही होंगी, तब शायद मैं आपके सामने न रहूँ। मुझे कैंसर था माँ। 

मैं आपको इसलिए वृद्धाश्रम छोड़कर आया क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी बीमारी देखकर आप हर दिन टूटती रहें।

मैं चाहता था कि अगर मैं चला जाऊँ, तो आपके आसपास लोग हों,आपका ख्याल रखने वाले हों।

माँ, मुझे पता है कि दुनिया मुझे बुरा बेटा कहेगी। लेकिन आप तो मुझे जानती हैं ना?

मैं आपको अपने से दूर नहीं कर रहा था। मैं अपनी तकलीफ से आपको दूर रखना चाहता था।

और हाँ, जब भी मैं आपके सामने हँसता था, तब मेरे शरीर में दर्द असहनीय होता था। लेकिन आपकी मुस्कान देखने के लिए मैं हँसता था।

 *आपका राहुल* 

पत्र पढ़ते-पढ़ते कमला देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।उनका दिल रो रहा था। लेकिन उसी पत्र के साथ एक मेडिकल रिपोर्ट भी थी। तब उन्हें पहली बार बेटे की मजबूरी समझ आई और पत्र पढ़ते हुए वह गिर गयीं वहाँ लोगों ने देखा तो वह निष्प्राण थीं।

उस रात उनके तकिए के नीचे से एक लिफाफा निकला ।वह पत्र उन्होंने कई महीने पहले लिखा था।

जिसे कभी राहुल को देने की हिम्मत नहीं हुई।उसमें लिखा था

बेटा,

डॉक्टर कहते हैं कि मेरा दिल बहुत कमजोर हो चुका है।

लेकिन मैं तुझे यह बात नहीं बताऊँगी।

क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी चिंता में तू और परेशान हो।अगर कभी मैं अचानक चली जाऊँ, तो समझ लेना कि तेरी माँ बहुत खुश थी।

मैं इसलिए मुस्कुराती रही क्योंकि तेरी मुस्कान बची रहे।

*तेरी माँ*

दो पत्र। दो दर्द। दो लोग।दोनों एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में थे।दोनों अपनी तकलीफ छिपा रहे थे। दोनों सामने से खुश होने का नाटक करते रहे थे और शायद यही सच्चा प्रेम था।

जहाँ इंसान अपनी पीड़ा नहीं, बल्कि दूसरे के आँसू देखता है।

आश्रम के लोग अपने आँसू न रोक सके और वहाँ के संस्थापक जो स्वयं 85 वर्ष के थे उन्होंने बिलखते हुए कहा

पगले… तू अपनी माँ को दर्द से बचाता रहा, और वह तुझे। और तुम दोनों ही जिंदगी से हार गए लेकिन तुम्हारा प्यार जीत गया। आश्रम का हर व्यक्ति उन दोनों के प्यार को देखकर रोता रहा।

रंजना गुप्ता

स्वरचित एवं मौलिक

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