दूरदर्शन वाला प्यार – ऋतु गुप्ता 

कन्नू ओ कन्नु कहां जा रहा है मायके आई सुषमा ने अपने बेटे कनिष्क को आवाज लगाते हुए पूछा तो कन्नु बोल क्या मां यहां नानी के घर भी आपकी पहरेदारी चलती रहेगी क्या ? गर्मियों की छुट्टियां हैं और यहां लाइट भी कितनी कम आती है कैसे मन लगेगा? मैं बस पड़ोस वाली तन्वी … Read more

रिश्ते – खुशी

निलेश एक आदर्श बेटा था।जिसके परिवार में मां मीना पिताजी राजेश एक बहन पूनम और भाई राहुल थे।निलेश अपने पूरे परिवार में श्रवण कुमार के नाम से प्रसिद्ध था। मां का लाडला ।मां बाप की बात सुनने और मानने वाला कभी उनके सामने जबान नहीं खोली। सब कहते मामा बॉय है ये हर बात में … Read more

वेलेंटाइन डे – बीना शुक्ला अवस्थी

आज ” वेलेन्टाइन डे” है। हमेशा की तरह इस बार भी प्राची का मन 14 फरवरी आते आते अवश होने लगा है। वह लाख प्रयत्न करे परन्तु शाम होते होते कोई अनजान डोर उसे अपनी ओर खींचने लगती है। वर्ष भर किये सारे वादे, सारे प्रयत्न रेत के महल की तरह धराशाई होने लगते हैं। … Read more

सुखद एहसास – गीता वाधवानी

 पहला प्यार, यह एक ऐसा सुखद एहसास है जो दिल को खुशी से भर देता है। दिल को गुदगुदाता है और ना चाहते हुए भी चेहरे पर मुस्कान आ जाती है फिर भले ही पहला प्यार जिससे हुआ था, वह जीवन में मिला हो या ना मिला हो।   पहला प्यार एक खुबसूरत एहसास, जिसे प्यार … Read more

विधी का विधान कभी नहीं टलता – मंजू ओमर 

मांजी ओ मांजी लो खाना खा लो ।कमला के जोर से आवाज देने पर सुनैना जी की तन्द्रा टूटी ।अरे हां कमला क्या हुआ क्यों आवाज दे रही है । कहां खोई हुई है आप सुन ही नहीं रही है अब से आवाज दे रही हूं। खाना लाई हूं आपके लिए ,अरे रख दे अभी … Read more

पहला प्यार – डाॅ उर्मिला सिन्हा 

शाम हो चली थी।सामने लंबे वृक्षों की घनी छाया सीधे पहाड़ी से नीचे उतर रही थी। घने लंबे पेड़ों झाड़ियों से आच्छादित वह स्थान मंडप सा प्रतीत होता था। ऊंची पहाड़ी से निकलती जल की धारा उछाल मार रही थी।  गरिमा  को यह डूबते सूर्य की पीली रौशनी, पेड़-पौधों का झुरमुट उसपर चहचहाते चिड़ियों का … Read more

प्यार का एहसास – रश्मि वैभव गर्ग

प्रेम एक अनुपम एहसास है, जिसे लफ़्ज़ों में पिरोना संभव ही नहीं ।जीवन बगिया में प्रेम की नमी हो तो जीवन में वसंत लहलहाता रहता है । यूँ तो प्यार किसी दिन , महीने का मोहताज़ नहीं होता,लेकिन फिर भी फ़रवरी को माह ए इश्क़ कहा जाता है । इस महीने से जुड़ी मेरी भी … Read more

एक छत के नीचे दो दुनिया

*बुढ़ापे की लाठी वो नहीं जो घर के कोने में रखी हो, बल्कि वो है जो लड़खड़ाते वक्त हाथ थाम ले, चाहे वो हाथ सात समंदर पार से ही क्यों न बढ़ा हो।* फ़ोन रखने के बाद, रघुनाथ जी ने कड़वाहट से कहा, “विमला, तू कब तक झूठ बोलेगी? जो बेटी पांच सौ किलोमीटर दूर … Read more

मुखौटा और आईना – विभा गुप्ता

*दुनिया के लिए जिसकी जुबान पर शहद घुला रहता है, घर की चारदीवारी में वही जुबान अपनी जन्मदात्री के लिए खंजर कैसे बन जाती है? क्या एक रिश्ता दूसरे रिश्ते की हत्या करके ही पनप सकता है?* —  “समीर, मैं एक औरत हूँ। और मैं अपना भविष्य देख रही हूँ। आज तुम्हारे पास जवानी है, … Read more

डिग्रियां तो बहुत मिलीं, मगर संस्कार सिलेबस से बाहर थे – रश्मि प्रकाश

*जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को ‘जज’ बनाया, आज वही बेटा अपनी मां को ‘कटघरे’ में खड़ा करके पूछ रहा था—”तुम मेरे स्टेटस में कहां फिट होती हो?”* “मुझे बस एक बात बता दे बेटा,” जानकी की आवाज़ भर्रा गई, “तेरी उन मोटी-मोटी किताबों में, तेरे उस संविधान में, या तेरे उस बड़े … Read more

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