वो देहरी… – कविता झा ‘अविका’

मांँ के पास आए हुए रिती को एक महीना पूरा होने को था और उसकी वापसी का समय भी नजदीक था। अगले ही दिन की ट्रेन थी। स्कूल की छुट्टियांँ खत्म हो गई थी तो अब वापस जाना जरूरी था वरना प्राइवेट स्कूल वाले टीचर को छुट्टी कहांँ देते हैं। रिती अपने पिता के समझाने … Read more

बड़े को सदा बड़प्पन ही दिखाना चाहिए – भगवती सक्सेना गौड़

आज हरिद्वार से घूमकर एक माह बाद सिद्धेश्वर जी अपनी पत्नी के साथ घर आये। ट्रेन/बस की लंबी यात्रा के बाद भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी ताजगी थी—हरिद्वार की हवा, गंगा के किनारे की शांति, मंदिरों की घंटियों की आवाज़ और आरती की लौ… मानो मन के किसी कोने में वर्षों से जमी थकान … Read more

माँ से जुड़ाव – अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’

विनय और तनवी एक दूसरे के पूरक थे। घर में अगर किसी बात पर अंतिम मुहर लगती तो वह विनय की होती—और तनवी वह मुहर बिना शिकायत, बिना बहस, बिना “क्यों” पूछे स्वीकार कर लेती। क्या मजाल कि बिन अपने पापा की मर्जी के खिलाफ तनवी कोई तिनका भी उठा ले। वह कभी अपनी पसंद … Read more

रिश्तों के रंग – खुशी

हमारे मोहल्ले में एक बाबा आता था सबके घर नहीं पर गिने चुने घरों में वो भिक्षा लेता था।उनमें एक हमारा घर भी था।मेरी दादी मेरी मां कमला को बहुत गुस्सा करती थी कि क्यों देती हैं इस बूढ़े को रोज खाना बाकी लोग तो फिर भी बचा खुचा देते थे मां जैसे ही आवाज … Read more

रिश्तों के भी रंग -निधि गुप्ता

मांसी को बचपन से ही रंगों से बहुत प्यार था। उसके कमरे की दीवारें तरह-तरह की पेंटिंग से भरी रहती थीं। कहीं नीले आसमान में उड़ते पक्षी, कहीं हरे खेत, तो कहीं लाल-पीले फूल। मांसी कहती थी कि रंग सिर्फ कागज़ पर नहीं होते, रिश्तों में भी होते हैं। मांसी की मां अक्सर मुस्कुराकर कहती, … Read more

ममता का रंग’ – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

“मेरी मां बुआ के यहां शादी में नहीं जाएंगी….”वसुधा के कुछ कहने से पहले वसुधा की बेटी सौम्या ने जैसे ही कहा तो सब अवाक रह गए। “बेटा….” “मां प्लीज…, इस बार आप कुछ भी कहने से मुझे मत रोको….वैसे भी आज तक आप मुझे ही चुप करवाती आई हो और किसी से आप कुछ … Read more

रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से निभाते हैं – सीमा सिंघी 

आज मालती जी ने अपनी बहू सुमति को बार-बार अलमारी खोलकर कुछ ढूंढते हुए देखकर रूखे स्वर में बोल पड़ी। बहू आज तुम यह सुबह से अलमारी खोल कर बार-बार क्या ढूंढ रही हो। तुमने ऐसा कौन सा खजाना रख दिया था। जिसे तुम्हें इतनी ढूंढने की जरूरत पड़ गई है। जरा मैं भी तो … Read more

प्यार के दो मीठे बोल – सीमा सिंघी

जब से रामकिशन रमिया को इस घर में ब्याह कर लाया । तब से वह प्यार के दो मोर मीठे बोल के लिए तरस कर रह गया। उसने बहुत चाव से अपना ब्याह रचाया, घर बसाया की एक दिन उसका घर भी हंसी से गूंजेगा,आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजेगी मगर ठीक इसके विपरीत रमिया … Read more

छन्नाक – उषा

और अचानक सुलभा ने डर कर आंखें बंद कर ली, कान में सुनाई दिया करम जली बर्बाद करने पर तुली हे। और चटाक मगर यह क्या कंधे पर एक सुखद स्पर्श  क्या हुआ बेटा रो क्यों रही है, एक कांच का गिलास हीं तो टूटा है और सुलभा जैसे सपनों से जागी, यह स्पर्श और … Read more

कच्चे धागे के पक्के रिश्ते – डॉ हरदीप कौर

रवि के पिता जी और छवि के पिता जी साथ काम करते थे। दोनों एक ही दफ्तर में थे, एक ही छत के नीचे रोज़मर्रा की भागदौड़, फाइलों की गंध, चाय के छोटे-छोटे ब्रेक और दिन के अंत में घर लौटते समय का अपनापन—इन सबने उन्हें सिर्फ सहकर्मी नहीं, परिवार जैसा बना दिया था। रवि … Read more

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