रिश्तों के भी रंग -निधि गुप्ता

मांसी को बचपन से ही रंगों से बहुत प्यार था। उसके कमरे की दीवारें तरह-तरह की पेंटिंग से भरी रहती थीं। कहीं नीले आसमान में उड़ते पक्षी, कहीं हरे खेत, तो कहीं लाल-पीले फूल। मांसी कहती थी कि रंग सिर्फ कागज़ पर नहीं होते, रिश्तों में भी होते हैं। मांसी की मां अक्सर मुस्कुराकर कहती, … Read more

ममता का रंग’ – प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’

“मेरी मां बुआ के यहां शादी में नहीं जाएंगी….”वसुधा के कुछ कहने से पहले वसुधा की बेटी सौम्या ने जैसे ही कहा तो सब अवाक रह गए। “बेटा….” “मां प्लीज…, इस बार आप कुछ भी कहने से मुझे मत रोको….वैसे भी आज तक आप मुझे ही चुप करवाती आई हो और किसी से आप कुछ … Read more

रिश्ते अधिकार से नहीं करुणा से निभाते हैं – सीमा सिंघी 

आज मालती जी ने अपनी बहू सुमति को बार-बार अलमारी खोलकर कुछ ढूंढते हुए देखकर रूखे स्वर में बोल पड़ी। बहू आज तुम यह सुबह से अलमारी खोल कर बार-बार क्या ढूंढ रही हो। तुमने ऐसा कौन सा खजाना रख दिया था। जिसे तुम्हें इतनी ढूंढने की जरूरत पड़ गई है। जरा मैं भी तो … Read more

प्यार के दो मीठे बोल – सीमा सिंघी

जब से रामकिशन रमिया को इस घर में ब्याह कर लाया । तब से वह प्यार के दो मोर मीठे बोल के लिए तरस कर रह गया। उसने बहुत चाव से अपना ब्याह रचाया, घर बसाया की एक दिन उसका घर भी हंसी से गूंजेगा,आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजेगी मगर ठीक इसके विपरीत रमिया … Read more

छन्नाक – उषा

और अचानक सुलभा ने डर कर आंखें बंद कर ली, कान में सुनाई दिया करम जली बर्बाद करने पर तुली हे। और चटाक मगर यह क्या कंधे पर एक सुखद स्पर्श  क्या हुआ बेटा रो क्यों रही है, एक कांच का गिलास हीं तो टूटा है और सुलभा जैसे सपनों से जागी, यह स्पर्श और … Read more

कच्चे धागे के पक्के रिश्ते – डॉ हरदीप कौर

रवि के पिता जी और छवि के पिता जी साथ काम करते थे। दोनों एक ही दफ्तर में थे, एक ही छत के नीचे रोज़मर्रा की भागदौड़, फाइलों की गंध, चाय के छोटे-छोटे ब्रेक और दिन के अंत में घर लौटते समय का अपनापन—इन सबने उन्हें सिर्फ सहकर्मी नहीं, परिवार जैसा बना दिया था। रवि … Read more

बहती गंगा में हाथ धोना – शनाया अहम 

बात उन दिनों की है जब राधिका कॉलेज में पढ़ रही थी, ये उसका कॉलेज का पहला ही साल था। राधिका पढ़ाई में तो होशियार थी ही, वो पाक कला में भी निपुण थी। उसके हाथ में जादू था और हर तरह का खाना वो मिनटों–सेकेंडों में बना देती थी। जो भी उसका बनाया खाना … Read more

भूल अपना समझने की  – अंजना ठाकुर 

विनोद जी ने बहुत दौलत कमाई थी। मेहनत, लगन और अपने तेज़ दिमाग से उन्होंने अपना कारोबार गाँव-शहर तक फैला दिया था। लोगों की नज़र में विनोद जी की ज़िंदगी किसी राजा से कम नहीं थी—बड़ा सा घर, प्रतिष्ठा, नौकर-चाकर, और चारों तरफ़ नाम। पर उनके दिल के किसी कोने में एक मलाल हमेशा चुभता … Read more

अधूरे रिश्ते – किरण फुलवारी

ट्रेन में बैठी ख्याति के मन में कई सारे विचार चल रहे थे। खिड़की के बाहर पीछे छूटते खेत, दूर भागती बिजली की तारें और स्टेशन के छोटे-छोटे बोर्ड—सब जैसे उसके भीतर उठते तूफान के सामने फीके पड़ गए थे। रक्षाबंधन के एक दिन पहले ही वह अपने पीहर आई थी, बड़े भाई के बुलाने … Read more

बाबुल की यादें ” – कमलेश आहूजा

रमा बड़े दिनों बाद बहू-बेटे के साथ अपने पुराने घर आई थी। शहर में बेटे की नौकरी लग जाने के बाद वह वहीं रहने लगी थी, इसलिए यह घर कई महीनों से बंद पड़ा था। बाहर से देखने पर भी घर की खामोशी और भीतर की उदासी साफ झलकती थी—दरवाज़े की कुंडी पर जमी धूल, … Read more

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