फर्ज की आहुति

देवानंद को लगा कि इतने सालों बाद शायद भाभी का दिल पिघल गया हो, और वैसे भी अनन्य उनकी अपनी ही भतीजी थी। अपनी लाडली के सुनहरे भविष्य की खातिर देवानंद अपना आत्मसम्मान एक तरफ रखकर फिर से कामिनी के आलीशान बंगले पर पहुँचे। उन्होंने विनती करते हुए कहा, “भाभी, अनन्य का दाखिला यहाँ के … Read more

नेकी की कसौटी

“बस प्रह्लाद जी,” आलोक जी ने हाथ उठाकर उन्हें वहीं रोक दिया, “शब्दों का और अपमान मत कीजिए। झूठी तारीफों का जो नशा आप मुझे बेच रहे थे, उसकी कीमत मैंने बहुत अच्छे से चुका दी है।” इतना कहकर आलोक जी मुड़े और हॉल में लौट आए। अब उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका था। … Read more

एक नया रिश्ता – अर्चना सिंह

कितनी बार सुबह से फोन कर चुकी हूँ तब जा के तुम अब फोन उठाई हो” । शिखा की मम्मी संध्या जी ने शिखा को प्यार भरी झिड़की देते हुए ऐसे कहा । शिखा ने बहुत कठोरता से रूखे अंदाज में कहा… कोई काम था क्या मम्मी?  आपको तो सिर्फ रेखा दीदी को फोन मिलाना … Read more

तिनके की नाव

मैंने और अनुराग ने तय कर लिया था कि चाहे राहुल-मोनिका हमें कितना भी भला-बुरा कहें, हम चाची का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। हम उनके लिए वह सहारा बन गए थे, जो डूबते हुए इंसान को एक तिनका देता है। लेकिन सच तो यह था कि वह तिनका सिर्फ संबल था; तैरने की असली ताकत … Read more

ममता की धूल

प्रभावती सन्न रह गईं। उनके मुंह से बोल नहीं फूटे। उनकी ममता का महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया था। उन्होंने रोते हुए हाथ जोड़े, लेकिन गौरव ने दरवाजा बंद कर लिया। लाचार प्रभावती ने पड़ोसियों की मदद से किसी तरह एक एंबुलेंस बुलाई और सत्यनारायण जी को पास के एक सरकारी अस्पताल … Read more

अहसास का अंकुर

 शशांक की आँखों से आंसू बह निकले। उसके भीतर का अहंकार, उसका झूठा पुरुषत्व और संकीर्ण सोच ताश के पत्तों की तरह ढह गए। उसने मन ही मन सोचा—अगर एक अजनबी नौजवान मुझे अपने पिता का दर्जा दे सकता है क्योंकि मैंने उसे संवारा, तो जिस बच्चे को मेरी मल्लिका अपने खून-पसीने से नौ महीने … Read more

भाग्य की लकीरें

चांदी की चम्मच से मलाईदार रसमलाई का बड़ा सा टुकड़ा मुँह में रखते हुए कामिनी ने अपनी छोटी देवरानी सुधा की ओर देखा और एक बनावटी मुस्कान चेहरे पर चिपका ली। आँगन में अभी-अभी बच्ची के नामकरण की चहल-पहल धीमी पड़ी थी। कामिनी के दोनों बेटे, जो उस समय नए कुर्ते-पायजामे में इतराते हुए घूम … Read more

संभालने की डोर

“अरे मीनाक्षी बहू! ज़रा इधर तो आना बेटा, देखो बाज़ार से तुम्हारे पसंद की केसर-पिस्ता कुल्फी लाया हूँ। फ्रिज में रख दो और रात के खाने के बाद सबको परोस देना,” मुकुंद जी ने हॉल में कदम रखते ही आवाज़ लगाई। रसोई से हाथ पोंछते हुए बड़ी बहू मीनाक्षी तुरंत बाहर आई। “अरे बाबूजी, आप … Read more

स्वाभिमान की दहलीज

 जब कनक बदहवास होकर अपने मायके लौटी और भाई-भाभी को सच बताया, तो नीलिमा ने अपनी गलती मानने के बजाय सारा दोष किस्मत पर मढ़ दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। चंद हफ्तों बाद जब कनक को उल्टियां होने लगीं और डॉक्टर ने पुष्टि की कि वह गर्भवती है, तो कनक के मन में अपने … Read more

रस की मिठास

 “मां, आज अगर मैं रसोई में जाकर भाभी का हाथ नहीं बंटाती, तो शायद यह मिठाई ना बनती। लेकिन जब हम दोनों ने मिलकर इसे बनाया, तो यह और भी मीठी हो गई। बहू कोई मशीन नहीं होती मां, वह भी इंसान है। उसे नुक्स निकालने वाली सास की नहीं, एक ऐसी मां की ज़रूरत … Read more

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