ममता की धूल

प्रभावती सन्न रह गईं। उनके मुंह से बोल नहीं फूटे। उनकी ममता का महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया था। उन्होंने रोते हुए हाथ जोड़े, लेकिन गौरव ने दरवाजा बंद कर लिया। लाचार प्रभावती ने पड़ोसियों की मदद से किसी तरह एक एंबुलेंस बुलाई और सत्यनारायण जी को पास के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बताया कि गंभीर हार्ट अटैक था, अगर आधे घंटे की और देर होती तो जान बचाना नामुमकिन हो जाता। उन्हें तुरंत आईसीयू में भर्ती किया गया और जीवन रक्षक दवाओं पर रखा गया।

अस्पताल के आईसीयू के बाहर लगी नीली कुर्सियों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। डॉक्टर ने बाहर आकर जैसे ही गहरी सांस छोड़ते हुए कहा कि अब चिंता की कोई बड़ी बात नहीं है, मरीज खतरे से बाहर हैं, वैसे ही वहां बैठे लोगों के चेहरों पर हवा का रुख बदल गया। कोई राहत महसूस कर रहा था तो किसी के चेहरे पर अब भी हिसाब-किताब की लकीरें खिंची हुई थीं। स्ट्रेचर पर लेटे 64 वर्षीय सत्यनारायण जी की बंद आंखों के कोरों से दो बूंद आंसू चुपचाप बहकर तकिए में समा गए थे। वे होश में थे, सब सुन रहे थे, पर दिल इतना घायल था कि आंखें खोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। जीवन के इस मोड़ पर आकर इंसान शरीर की बीमारी से कम और अपनों के दिए उपेक्षा के घावों से ज्यादा टूटता है।

सत्यनारायण जी एक साधारण, स्वाभिमानी और संवेदनशील व्यक्ति रहे थे। उन्होंने डाक विभाग में क्लर्क के पद पर करीब साढ़े तीन दशक तक ईमानदारी से सेवा की थी। परिवार में पत्नी प्रभावती, दो बेटियां शारदा और विनीता, और सबसे छोटा बेटा गौरव था। दो बेटियों के जन्म के बाद जब गौरव का जन्म हुआ, तो प्रभावती के पैर जैसे जमीन पर पड़ते ही नहीं थे। खानदान का चिराग, बुढ़ापे की लाठी और वंश का नाम आगे बढ़ाने वाला—ये सारे विशेषण प्रभावती ने जन्म के पहले ही दिन से अपने लाडले बेटे के नाम कर दिए थे।

प्रभावती का पूरा संसार गौरव के इर्द-गिर्द सिमट गया था। इसके विपरीत, दोनों बेटियों का अस्तित्व उनके लिए केवल उस औपचारिकता जैसा था जिसे समाज के डर से निभाना पड़ता है। शारदा बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल थी। वह शिक्षिका बनना चाहती थी, किताबों से उसका गहरा नाता था। छोटी बेटी विनीता भी होनहार थी। जब शारदा ने दसवीं की परीक्षा में पूरे जिले में तीसरा स्थान प्राप्त किया, तो सत्यनारायण जी फूले नहीं समाए थे। वे मिठाई का डिब्बा लेकर घर आए और उत्साह से बोले, “प्रभावती, देखो हमारी शारदा ने कितना नाम रोशन किया! मैं इसे कॉलेज भेजूंगा, ये आगे चलकर अधिकारी या प्रोफेसर बनेगी।”

पर प्रभावती के माथे पर बल पड़ गए थे। उन्होंने चिढ़कर डिब्बा मेज पर पटकते हुए कहा, “रहने दो जी अपनी ये फिजूल की उम्मीदें! पराए धन पर इतना गुरूर किस बात का? लड़की जात है, कितना भी पढ़ा लो, अंत में दूसरे के घर जाकर चूल्हा-चौका ही संभालना है। शहर के कॉलेज भेजकर पैसे फूंकने की कोई जरूरत नहीं। हमारे पास कौन-सी तिजोरियां भरी हैं? जो भी पाई-पाई बचानी है, गौरव के लिए बचानी है। कल को लड़के का भविष्य बनेगा तो हमारा नाम होगा।”

सत्यनारायण जी ने बहुत समझाया कि शिक्षा बेटी का हक है, लेकिन प्रभावती के जिद्दी स्वभाव और रोज़-रोज़ के कलेश के आगे वे कमजोर पड़ जाते थे। घर की शांति बनाए रखने की खातिर उन्होंने हथियार डाल दिए। शारदा की आंखों में आंसू थे, लेकिन उसने अपनी किताबों को एक बक्से में बंद कर दिया। सत्रह की उम्र पूरी होते ही शारदा का विवाह एक सामान्य परिवार में कर दिया गया। दो साल बाद विनीता को भी बारहवीं के बाद विदा कर दिया गया। दोनों बेटियों ने अपनी सिसकियों को भाग्य का लिखा मानकर स्वीकार कर लिया और अपनी-अपनी ससुराल की जिम्मेदारियों में खप गईं। मायके से उन्हें कभी वह मान-सम्मान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं, क्योंकि प्रभावती का स्पष्ट कहना था कि बेटियों की विदाई के बाद उनका मायके की संपत्ति या खुशियों पर कोई अधिकार नहीं रहता।

अब घर में केवल गौरव था। प्रभावती के लाड़-प्यार ने गौरव को ऐसा बना दिया था कि उसे मेहनत की कीमत कभी समझ ही नहीं आई। वह दिनभर दोस्तों के साथ मटरगश्ती करता, महंगे कपड़े पहनता और बिना किसी उद्देश्य के दिन बिताता। सत्यनारायण जी जब भी उसकी पढ़ाई या भविष्य को लेकर चिंता जताते, प्रभावती ढाल बनकर सामने खड़ी हो जाती।

“अरे, क्यों हर वक्त बच्चे के पीछे लट्ठ लेकर पड़े रहते हो? अभी उम्र ही क्या है उसकी? ग्रेजुएशन कर तो रहा है प्राइवेट से! हमारा एकलौता बेटा है, कोई छोटा-मोटा काम थोड़ी करेगा।”

सत्यनारायण जी सिर पकड़ लेते, “प्रभावती, सिर्फ नाम की डिग्री से आजकल चपरासी की नौकरी भी नहीं मिलती। दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। अगर यह हुनर नहीं सीखेगा, अनुशासन नहीं जानेगा, तो कल को ठोकरें खाएगा।”

प्रभावती तपाक से कहती, “आपकी पेंशन किस दिन काम आएगी? और हमारे पुरखों की जो ज़मीन गांव में पड़ी है, वह किसके लिए है? गौरव कोई भूखा थोड़ी मरेगा!”

सत्यनारायण जी की आशंकाएं सच साबित हुईं। गौरव ने किसी तरह तृतीय श्रेणी में डिग्री तो ले ली, लेकिन उसके सपने हवा में उड़ने वाले थे। एक दिन उसने घर आकर घोषणा की, “पिताजी, मुझे चंडीगढ़ जाकर बड़ा बिजनेस करना है। मेरे एक दोस्त के साथ मिलकर रियल एस्टेट और इवेंट मैनेजमेंट की एजेंसी खोलूंगा। वहां बहुत स्कोप है, मुझे तुरंत पंद्रह लाख रुपये चाहिए।”

सत्यनारायण जी चौंक गए, “पंद्रह लाख? गौरव, तुमने कभी दुकान पर बैठकर एक रुपया नहीं कमाया, तुम्हें व्यापार का क्या तजुर्बा है? पहले कहीं छोटी नौकरी करके काम सीखो।”

लेकिन प्रभावती ने तुरंत बेटे का पक्ष लिया, “आप हमेशा मेरे बेटे के पर कतरने की कोशिश करते हैं। उसका मन बड़ा काम करने का है तो आप रुकावट क्यों बन रहे हैं? गांव वाली ज़मीन बेचिए। वैसे भी वहां कौन सा हम खेती करने जा रहे हैं!”

सत्यनारायण जी ने अपनी पुरखों की जमीन बेचने से साफ मना किया, लेकिन अगले सात दिनों तक घर में ऐसा भूचाल आया कि खाना-पीना बंद हो गया। प्रभावती ने अपनी बीमारी का ढोंग रचा, गौरव ने घर छोड़ने की धमकी दी। अंततः, अपनी पत्नी की हठ और बेटे के झूठे सपनों के आगे सत्यनारायण जी को झुकना पड़ा। उन्होंने भारी मन से गांव की उपजाऊ जमीन औने-पौने दाम में बेच दी और सारा पैसा गौरव के हाथ में सौंप दिया।

गौरव चंडीगढ़ चला गया। शुरुआत में कुछ महीने सब ठीक रहा, फिर वही हुआ जिसका डर था। अनुभवहीनता, फिजूलखर्ची और गलत संगत के कारण गौरव का काम डूब गया। लेकिन उसने घर पर सच्चाई नहीं बताई। छह महीने बाद वह वापस आया और इस बार उसने नया राग अलापा, “पिताजी, बिजनेस में मुनाफा तो बहुत है, लेकिन किराए के मकान और ऑफिस के किराए में सारा पैसा निकल जाता है। मकान मालिक रोज़ तंग करता है। अगर चंडीगढ़ में मेरा खुद का एक फ्लैट हो जाए, तो मेरा सारा ध्यान सिर्फ काम पर रहेगा और मेरी साख भी बढ़ जाएगी।”

संयोग से उसी महीने सत्यनारायण जी डाक विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और जीवन भर की बचत के करीब पच्चीस लाख रुपये खाते में आए थे। सत्यनारायण जी का सपना था कि वे अपने जिले के कस्बे में एक छोटा सा, शांत आशियाना बनाएंगे, जहां वे और प्रभावती अपने जीवन की संध्या सुकून से गुजार सकें, और कुछ पैसे बैंक में फिक्स डिपॉजिट कर देंगे ताकि दवाइयों और दैनिक खर्च के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।

पर प्रभावती के मन में तो कुछ और ही था। “सुनिए जी, हम तो बूढ़े हो गए, अब हमें नया घर बनाकर क्या करना है? इस पुराने सरकारी क्वार्टर को खाली करके हम भी बेटे के साथ चंडीगढ़ के बड़े शहर में रहेंगे। वहां सोसायटी में लिफ्ट होगी, बड़ा पार्क होगा। सारा पैसा गौरव को दे दीजिए, वह अपने नाम से फ्लैट की डाउन पेमेंट कर देगा और बाकी किश्तें अपने काम से भर देगा।”

सत्यनारायण जी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “प्रभावती, यह मेरी पूरी जिंदगी की कमाई है। बुढ़ापे में अगर हमारे पास एक पाई नहीं बची, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। सारा पैसा एक ही झटके में दांव पर मत लगाओ।”

प्रभावती ने ताना मारा, “आपको अपने ही खून पर भरोसा नहीं है? बेटा है हमारा, कोई गैर नहीं! वह कमाएगा तो हमारा ही नाम होगा।”

पुत्र-मोह में अंधी मां और लाचार पिता की इस कशमकश में जीत फिर से प्रभावती के अंधे मोह की हुई। सत्यनारायण जी ने अपनी सेवानिवृत्ति की पूरी जमा-पूंजी गौरव के खाते में ट्रांसफर कर दी। गौरव ने चंडीगढ़ के पॉश इलाके में एक फ्लैट बुक करा लिया और माता-पिता को वहां ले गया।

शुरुआती कुछ हफ्ते तो मेहमाननवाजी जैसे बीते, लेकिन धीरे-धीरे हकीकत की परतें खुलने लगीं। गौरव ने एक आधुनिक और तेज-तर्रार लड़की से शादी कर ली। नई बहू के आते ही घर के समीकरण पूरी तरह बदल गए। बहू को सास-ससुर का घर में रहना अपनी आजादी में दखल लगने लगा। गौरव के व्यापार में फिर घाटा होने लगा और फ्लैट की मासिक किश्तें भारी पड़ने लगीं।

अब घर में आए दिन कलह होने लगी। जिस प्रभावती ने अपनी पूरी दुनिया बेटे पर न्योछावर कर दी थी, उसे अब रसोई में अपनी मर्जी से चाय बनाने का भी हक नहीं था। बहू बात-बात पर सुनाती, “यह हमारा फ्लैट है, यहां हमारे नियम चलेंगे।” और जब प्रभावती अपने लाडले बेटे से शिकायत करतीं, तो गौरव अपनी पत्नी का पक्ष लेते हुए कहता, “मां, तुम भी बात का बतंगड़ बनाती हो। उसने क्या गलत कह दिया? वैसे भी तुम दोनों का यहां मन नहीं लगता तो किसी छोटे शहर में किराए पर क्यों नहीं चले जाते? मेरे ऊपर पहले ही लाखों का कर्ज है, मैं तुम लोगों की दवाइयों का खर्च नहीं उठा सकता।”

यह सुनकर प्रभावती के पैरों तले से जमीन खिसक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी दो बेटियों के सपनों की बलि चढ़ा दी थी, पति की जीवन भर की गाढ़ी कमाई लुटा दी थी, वही बेटा आज उन्हें बोझ समझ रहा था।

सत्यनारायण जी का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। उन्हें दिल की बीमारी ने घेर लिया था। एक रात अचानक सत्यनारायण जी के सीने में असहनीय दर्द उठा। वे पसीने से तर-बतर हो गए। प्रभावती घबराकर बेटे के कमरे की ओर भागीं, “गौरव! उठ बेटा, तेरे बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है, जल्दी गाड़ी निकाल, अस्पताल चलना पड़ेगा!”

गौरव ने नींद में आंखें मलते हुए झुंझलाहट से दरवाजा खोला और बोला, “मां, रात के दो बज रहे हैं। कल मेरी एक बहुत जरूरी मीटिंग है। गैस का दर्द होगा, कोई एंटासिड की गोली दे दो। सुबह देखेंगे।”

प्रभावती सन्न रह गईं। उनके मुंह से बोल नहीं फूटे। उनकी ममता का महल ताश के पत्तों की तरह ढह गया था। उन्होंने रोते हुए हाथ जोड़े, लेकिन गौरव ने दरवाजा बंद कर लिया। लाचार प्रभावती ने पड़ोसियों की मदद से किसी तरह एक एंबुलेंस बुलाई और सत्यनारायण जी को पास के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बताया कि गंभीर हार्ट अटैक था, अगर आधे घंटे की और देर होती तो जान बचाना नामुमकिन हो जाता। उन्हें तुरंत आईसीयू में भर्ती किया गया और जीवन रक्षक दवाओं पर रखा गया।

अस्पताल के बिल, दवाइयों की पर्चियां और सामने खड़ी मौत—प्रभावती के पास उस वक्त अपनी जेब में मात्र बारह सौ रुपये थे। गौरव सुबह एक बार औपचारिकता निभाने आया, डॉक्टर से मिला और बाहर आकर मां से बोला, “मेरे पास इस समय बिल्कुल लिक्विड कैश नहीं है। फ्लैट की ईएमआई बाउंस हो रही है। आप रिश्तेदारों से मांगिए या फिर बाबूजी के किसी पुराने दोस्त से फोन करवाइए।” इतना कहकर वह ऑफिस का बहाना बनाकर चला गया।

प्रभावती अस्पताल के ठंडे फर्श पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगीं। जीवन में पहली बार उन्हें अपनी संकीर्ण सोच और बेटियों के प्रति किए गए अन्याय का भयानक अहसास हो रहा था। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से माफी मांगी। उसी बेबसी के आलम में उन्होंने कांपते हाथों से अपनी बड़ी बेटी शारदा को फोन लगाया, जिसे उन्होंने पिछले तीन सालों से कभी ठीक से फोन तक नहीं किया था।

शारदा ने जैसे ही मां की रोती हुई आवाज सुनी, उसने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने न कोई पुरानी शिकायत दोहराई, न कोई ताना मारा। शारदा, जिसने शादी के बाद अपनी लगन से प्राइवेट पढ़ाई जारी रखी थी और अब एक सरकारी स्कूल में प्राथमिक शिक्षिका बन चुकी थी, अपने पति के साथ तुरंत अगली ट्रेन पकड़कर तीन सौ किलोमीटर का सफर तय करके शाम तक अस्पताल पहुंच गई।

शारदा जब आईसीयू के बाहर पहुंची, तो उसने देखा कि उसकी मां प्रभावती एक कोने में भूख-प्यास से बेहाल, फटे हाल बैठी रो रही थीं। शारदा ने बिना कुछ कहे मां को गले से लगा लिया। प्रभावती अपनी बेटी की छाती से लगकर फफक पड़ीं, “बेटी… मुझे माफ कर दे! मैंने तुम्हें कभी बेटी नहीं समझा, और जिस बेटे के लिए सब कुछ लुटा दिया, उसने हमें सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया!”

शारदा ने अपनी मां के आंसू पोंछे और दृढ़ स्वर में कहा, “मां, यह पुरानी बातें दोहराने का समय नहीं है। बाबूजी हमारे भी पिता हैं। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, जब तक मैं हूं, बाबूजी को कुछ नहीं होने दूंगी।”

शारदा ने अपनी सालों की बचत और अपनी शादी के कुछ कंगन बेचकर तुरंत अस्पताल का डेढ़ लाख का बिल चुकाया। बेहतरीन दवाइयों का प्रबंध किया। छोटी बेटी विनीता भी अपने स्तर पर जो बन सका, पैसे लेकर पहुंच गई। दोनों बहनों ने रात-दिन एक करके पिता की तीमारदारी की।

तीसरे दिन जब सत्यनारायण जी को होश आया और उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को अपने सिरहाने बैठे देखा, जो नम आंखों से उनके हाथ सहला रही थीं, तो सत्यनारायण जी की आंखों से अविरल आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, “बेटियों… मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया। तुम्हारी मां के दबाव में आकर मैंने तुम्हें पढ़ाने के बजाय विदा कर दिया, और आज तुम ही मेरा सहारा बनी हो…”

शारदा ने अपने पिता के माथे को चूमा और बोली, “बाबूजी, माता-पिता कभी पराये नहीं होते। आपने हमें संस्कार दिए, ईमानदारी सिखाई, वही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। आपने जो किया, उस समय की परिस्थितियों में किया, हमें आपसे कोई गिला नहीं है।”

अगले दिन जब गौरव अस्पताल आया, तो उसने सोचा कि अब सब संभल गया है तो वह माता-पिता को किसी वृद्धाश्रम या दूर के गांव में भेजने की बात करेगा। लेकिन इस बार प्रभावती का रूप बदला हुआ था।

गौरव ने अंदर आते ही कहा, “दीदी, अच्छा हुआ तुम लोग आ गईं। अब बाबूजी ठीक हैं तो इन्हें डिस्चार्ज कराकर तुम अपने साथ कुछ दिन रख लो, मेरे फ्लैट में जगह की थोड़ी दिक्कत है…”

इससे पहले कि गौरव अपनी बात पूरी करता, प्रभावती अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुईं। उनकी आंखों में अब वह अंधी ममता नहीं, बल्कि एक प्रताड़ित स्वाभिमानी स्त्री का आक्रोश था। उन्होंने गौरव के सामने आकर स्पष्ट शब्दों में कहा, “चुप रह गौरव! एक शब्द और मत बोलना। जिस फ्लैट को तू अपना कहता है, वह तेरे बाबूजी के पसीने की कमाई और उनकी पेंशन का है। लेकिन आज मैं यह समझ गई हूं कि ईंट-पत्थर के मकान से इंसान का चरित्र बड़ा होता है। तूने हमारे पैसे तो छीन लिए, लेकिन तू हमारा आत्मसम्मान नहीं छीन सकता। आज से और इसी वक्त से, तू हमारे लिए सिर्फ एक सपना था जो टूट गया। अब हमें तेरे किसी फ्लैट की जरूरत नहीं है।”

गौरव स्तब्ध रह गया। उसने कभी अपनी मां के मुंह से अपने खिलाफ एक शब्द नहीं सुना था। वह कुछ बोलने की कोशिश करने लगा, लेकिन शारदा के पति ने गरिमा के साथ कहा, “गौरव, अब तुम जा सकते हो। बाबूजी और मां जी अब हमारे साथ हमारे शहर में रहेंगे।”

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, सत्यनारायण जी और प्रभावती अपनी बेटी शारदा और दामाद के घर आ गए। शारदा ने अपने घर के सबसे हवादार और शांत कमरे को अपने माता-पिता के लिए सजाया था। दामाद ने कभी एक बार भी यह अहसास नहीं होने दिया कि वे ससुर हैं या बोझ हैं, बल्कि एक सच्चे बेटे की तरह उनकी सेवा की। विनीता भी हर हफ्ते अपने बच्चों के साथ मिलने आती थी।

शारदा के घर का माहौल प्यार, सम्मान और शांति से भरा था। धीरे-धीरे सत्यनारायण जी का स्वास्थ्य पूरी तरह सुधर गया। प्रभावती ने अपने जीवन का बचा हुआ समय अपनी बेटियों और नाती-पोतों को स्नेह देने में लगाया। वे हर शाम शारदा के साथ बैठतीं और उसकी स्कूल की बातें सुनतीं। एक दिन प्रभावती ने शारदा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, “बेटी, अगर उस समय मैंने तेरी पढ़ाई नहीं रोकी होती, तो तू आज और भी बड़ी अफसर होती। मुझे अपनी अज्ञानता पर जीवन भर पछतावा रहेगा।”

शारदा मुस्कुराई और बोली, “मां, जो बीत गया उसे भूल जाओ। आज मैं शिक्षिका हूं और स्कूल की दर्जनों बच्चियों को यह सिखाती हूं कि बेटियां किसी से कम नहीं होतीं। आपने मुझे जीवन दिया, अब मुझे आपका जीवन संवारने का मौका मिला है, यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।”

सत्यनारायण जी ने अपनी बची हुई पेंशन से शारदा के स्कूल की गरीब बालिकाओं की पढ़ाई के लिए एक छोटी सी छात्रवृत्ति शुरू की। परिवार में अब कड़वाहट की जगह सकारात्मकता और सम्मान का नया उजाला फैल चुका था। उस घर में यह साबित हो चुका था कि रिश्ते खून के अंधे मोह से नहीं, बल्कि दिल के सच्चे समर्पण और संस्कारों से निभाए जाते हैं।

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 मूल लेखिका : संजू झा

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