“बस प्रह्लाद जी,” आलोक जी ने हाथ उठाकर उन्हें वहीं रोक दिया, “शब्दों का और अपमान मत कीजिए। झूठी तारीफों का जो नशा आप मुझे बेच रहे थे, उसकी कीमत मैंने बहुत अच्छे से चुका दी है।”
इतना कहकर आलोक जी मुड़े और हॉल में लौट आए। अब उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका था। उन्होंने देखा कि प्रह्लाद का बेटा और दामाद भी उन्हें कुछ छोटे-मोटे झंझट भरे काम सौंपने आ रहे थे, यह कहते हुए कि “अंकल जी, आप तो हमारे बड़े हैं, आप ही संभालिए।” लेकिन इस बार आलोक जी ने मुस्कुराते हुए बड़ी शालीनता से कह दिया, “बेटा, अब तुम्हारा परिवार और रिश्तेदार आ चुके हैं। यह तुम्हारा पारिवारिक मामला है, तुम खुद संभालो।”
रेलवे की सिग्नल एवं टेलीकॉम शाखा में वरिष्ठ अभियंता के पद पर कार्यरत आलोक नारायण जब स्थानांतरित होकर प्रयागराज पहुंचे, तो शहर की चौड़ी सड़कों और शांत गंगा-यमुना के कछार में उनका मन शुरुआत में बिल्कुल नहीं रमा। घर-गृहस्थी की डोर अभी पिछले शहर में ही बंधी थी क्योंकि दोनों बेटों की बारहवीं और दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं सिर पर थीं। आलोक जी को नए शहर के सरकारी क्वार्टर में अकेले ही गृहस्थी जमानी पड़ी थी। दफ्तर से लौटने के बाद खाली कमरे की खामोशी उन्हें सालती थी। आलोक जी स्वभाव से इतने सरल, परोपकारी और संवेदनशील इंसान थे कि किसी भी अपरिचित का उतरा हुआ चेहरा देखकर उनका दिल पसीज जाता था। वे तुरंत पूछ बैठते, “भाई साहब, सब ठीक तो है? कोई परेशानी हो तो बेझिझक बताइएगा।”
उनकी इसी सहृदयता और सेवाभावी आदत के चलते नए शहर में जान-पहचान तो बहुत तेजी से बढ़ी, लेकिन उस भीड़ में सच्चे शुभचिंतक कम और उनकी शराफत की मलाई खाने वाले अवसरवादी ज्यादा जमा हो गए। कॉलोनी में कोई बीमार पड़े, तो आलोक जी अपनी गाड़ी निकाल कर आधी रात को अस्पताल पहुंचाने वाले पहले शख्स होते; किसी के घर में पानी का नल खराब हो जाए या बिजली का फॉल्ट, आलोक जी खुद मिस्त्री बुलवाकर खड़े रहते। उनकी धर्मपत्नी वंदना जब भी फोन पर बात करतीं, तो हमेशा टोकतीं, “सुनिए, आप हर किसी के फटे में पैर मत अड़ाया कीजिए। दुनिया उतनी सीधी नहीं है जितने आप हैं। लोग आपकी नेकी को आपकी कमजोरी मान बैठते हैं।” पर आलोक जी हमेशा हंसकर टाल देते, “अरे वंदना, इंसान ही इंसान के काम आता है। भगवान ने हमें इस लायक बनाया है कि दो कदम चलकर किसी का बोझ हल्का कर सकें, तो इसमें बुराई क्या है?”
इन्हीं दिनों उनकी मुलाकात अपनी ही कॉलोनी में रहने वाले प्रह्लाद स्वरूप से हुई। प्रह्लाद जी नगर निगम में बड़े बाबू थे, चेहरे पर हमेशा एक मीठी मुस्कान और जुबान पर शहद घोलकर बात करने की गजब की कला थी। प्रह्लाद जी ने बहुत जल्द भांप लिया कि आलोक जी स्वाभिमानी तो हैं, लेकिन तारीफ और सम्मान के दो मीठे बोलों के आगे पूरी तरह पिघल जाते हैं। धीरे-धीरे प्रह्लाद जी शाम की चाय पर आलोक जी के क्वार्टर में आने लगे। जब प्रह्लाद जी की छोटी बेटी तान्या की शादी तय हुई, तो उन्होंने एक शाम आलोक जी के हाथ थाम लिए और रुआंसे होकर बोले, “आलोक भाई, मेरी तो कोई बड़ी संतान बेटा नहीं है। दामाद वाले बड़े खानदानी और रसूखदार हैं। मैं अकेला आदमी कैसे इतना बड़ा पहाड़ उठाऊंगा? अगर आप भाई बनकर मेरी पीठ पर हाथ न रखेंगे, तो मेरी तो नाक कट जाएगी। तान्या तो आपकी भी अपनी बेटी जैसी है, सब आपको ही संभालना है।”
आलोक जी का भावुक मन इस आत्मीयता से भर आया। उन्होंने तुरंत प्रह्लाद के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “प्रह्लाद भाई, आप तान्या की शादी को लेकर रत्ती भर भी चिंता मत कीजिए। जब तक यह भाई जिंदा है, आपको किसी बात की फिक्र करने की जरूरत नहीं। जो हुक्म हो बताइए, मैं अपनी पूरी ताकत लगा दूंगा।”
बस फिर क्या था, उस दिन के बाद से आलोक जी की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई। सुबह दफ्तर जाने से पहले और शाम को दफ्तर से लौटते ही वे सीधे प्रह्लाद जी के घर पहुंचते। शादी का भव्य मैरिज लॉन शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर तय होना था। आलोक जी हर दूसरे दिन अपनी गाड़ी निकालते, प्रह्लाद जी और उनके कुछ खास रिश्तेदारों को बैठाते और शहर भर के चक्कर काटते। पेट्रोल का सारा खर्च आलोक जी अपनी जेब से भरते, कभी प्रह्लाद जी से एक धेला तक न मांगते। जब भी प्रह्लाद जी औपचारिकता में पर्स निकालते, आलोक जी डांट देते, “रहने दीजिए प्रह्लाद भाई, क्या अपनों में भी यह हिसाब-किताब अच्छा लगता है?” प्रह्लाद जी मन ही मन मुस्कुराते और पर्स वापस जेब में रख लेते।
शादी की तैयारियों के पूरे दो महीने आलोक जी ने एक पैर पर खड़े होकर बिताए। हलवाई से राशन की तौल कराना, टेंट वाले से पर्दों और फूलों के रंगों का तालमेल बिठाना, बैंड-बाजे और आतिशबाजी वाले से मोलभाव करना—सब आलोक जी के जिम्मे था। कई बार तो दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी लेकर वे धूप में खड़े होकर निमंत्रण पत्र छपवाने और मिठाई के डिब्बे पैक कराने का काम देखते रहे। दूसरी तरफ, प्रह्लाद जी नए-नए महंगे कुर्ते पहनकर रिश्तेदारों के बीच सोफे पर आराम से बैठकर चाय की चुस्कियां लेते और आलोक जी के गुजरते ही जोर से कहते, “अरे, हमारे आलोक भाई जैसा कर्तव्यनिष्ठ इंसान तो आज के जमाने में चिराग लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेगा! सच कहूं तो इनके बिना मेरी नैया पार ही नहीं हो सकती थी।” ऐसी प्रशंसा सुनकर आलोक जी अपनी दिनभर की थकान भूल जाते और दोगुनी ऊर्जा से काम में जुट जाते।
आखिरकार शादी का दिन आ गया। शहर का सबसे बड़ा बारात घर रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा था। आलोक जी सुबह से ही दौड़-भाग कर रहे थे। उन्होंने नाश्ते तक का एक निवाला मुंह में नहीं डाला था। कभी जनवासे में पानी के जार भिजवाना, तो कभी दूल्हे के फूफाजी के लिए स्पेशल चाय की व्यवस्था करना। प्रह्लाद जी दरवाजे पर सजे-धजे खड़े होकर वीआईपी मेहमानों का स्वागत कर रहे थे और जैसे ही कोई पेचीदा काम आता, वे तुरंत पुकारते, “आलोक भाई, जरा देखिए, समधियों के कमरे में एसी ठीक से कूलिंग नहीं कर रहा!” या “आलोक भाई, नाश्ते के काउंटर पर टिक्की खत्म हो गई है, हलवाई पर नजर रखिए!” आलोक जी बिना किसी शिकन के फौरन उधर दौड़ पड़ते।
रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। आलोक जी का बदन दर्द से टूट रहा था, भूख के मारे सिर चकरा रहा था। उन्होंने सोचा कि अब थोड़ा सा कुछ खा लेना चाहिए। वे प्लेट उठाकर एक कोने में खड़े होकर दो कौर खाने ही वाले थे कि प्रह्लाद जी की आवाज गूंजी, “आलोक भाई, जयमाल का समय हो गया है और स्टेज पर दूल्हा-दुल्हन के लिए विशेष गुलाबों की माला अभी तक नहीं पहुंची! जरा जल्दी देखिए, पुरोहित जी नाराज हो रहे हैं।”
आलोक जी ने हाथ में पकड़ी आधी भरी प्लेट तुरंत डस्टबिन के पास रखी, हाथ धोए और बिना कुछ खाए तेजी से मुख्य गेट की ओर बढ़े जहां फूलों का ठेकेदार बैठा था। वे कारीगर से विशेष जयमाला का बक्सा लेकर मुख्य हॉल की तरफ लौट ही रहे थे कि लॉन के पीछे बने वीआईपी लाउंज की खिड़की के पास उन्हें कुछ जानी-पहचानी आवाजें सुनाई दीं। प्रह्लाद जी अपने साले और एक समधी के साथ हाथ में कोल्ड ड्रिंक का गिलास लिए ठहाके लगा रहे थे। आलोक जी उन्हें माला सौंपने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाने लगे, उनके कान में प्रह्लाद जी के शब्द पड़े और उनके पैर वहीं जमीन में कील की तरह गड़ गए।
प्रह्लाद जी अपने साले की पीठ ठोकते हुए कह रहे थे, “अरे रमेश, तुम भी क्या बात करते हो! शादी में खुद खटने की क्या जरूरत है जब शहर में ऐसे मुफ्त के ‘इमोशनल मुर्ख’ टहल रहे हों? यह जो आलोक है ना, रेलवे वाला, बस इसकी जरा सी झूठी बड़ाई कर दो, इसे ‘भाई’ कह दो, फिर देखो इसका कमाल! गधे की तरह जुत जाता है। दो महीने से मेरी गाड़ी का एक बूंद पेट्रोल नहीं जला, शादी की हर माथापच्ची इसी ने झेली। मैं तो मजे से अपने रिश्तेदारों के साथ गपशप लड़ाता रहा और आलोक धूप में पसीना बहाता रहा।”
उनका साला हंसते हुए बोला, “पर जीजाजी, अगर उसने कभी पैसे मांग लिए या बुरा मान गया तो?”
प्रह्लाद जी ने सिगार का धुंआ छोड़ते हुए एक जोरदार ठहाका लगाया, “अरे खाक मांगेगा! ऐसे भावुक लोगों को पैसों की नहीं, बस झूठे मान-सम्मान और तारीफ की भूख होती है। चार लोगों के सामने उसकी पीठ थपथपा दो, वह अपनी जेब भी खाली कर देगा और जान भी दे देगा। मुझे काम निकालने वाले मजदूर की जरूरत थी, उसे तारीफ की… हिसाब बराबर! अब देखो, खुद भूखा मर रहा है और स्टेज की माला लेने दौड़ा है।”
तीनों की मिली-जुली ठहाकों की गूंज आलोक जी के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर गई। आलोक जी का पूरा शरीर कांप उठा। जिन हाथों में वे तान्या के लिए पवित्र जयमाला थामे हुए थे, वे हाथ सुन्न पड़ गए। सीने में एक तेज दर्द उठा—यह दर्द शारीरिक थकान का नहीं, बल्कि विश्वास और भावनाओं के निर्मम कत्ल का था। वे बेवकूफ नहीं थे, वे तो इंसानियत और रिश्ते के रिश्तेदार थे, जिसे प्रह्लाद ने एक सौदेबाजी और मुफ्त की मजदूरी समझ लिया था।
आलोक जी ने एक गहरी सांस ली। अपनी आंखों में तैर आए आंसुओं को उन्होंने पलकों के भीतर ही पी लिया। उन्होंने अपने चेहरे पर एक अविचल, शांत और गंभीर भाव ओढ़ा और धीरे-धीरे लाउंज के दरवाजे के सामने आ खड़े हुए।
प्रह्लाद जी की नजर जैसे ही सामने खड़े आलोक जी पर पड़ी, उनका ठहाका गले में ही अटक गया। हाथ से कोल्ड ड्रिंक का गिलास हल्का सा छलका और उनके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। वे बुरी तरह सकपका गए कि कहीं आलोक ने सब कुछ सुन तो नहीं लिया।
आलोक जी ने बहुत ही सधे हुए कदमों से आगे बढ़कर जयमाला का डिब्बा प्रह्लाद जी के हाथों में थमा दिया। उनकी आवाज में न कोई चीख थी, न गुस्सा, बल्कि एक ऐसी बर्फ जैसी ठंडक थी जिसने प्रह्लाद जी की रीढ़ में कंपकंपी दौड़ा दी। आलोक जी ने सीधे प्रह्लाद जी की आंखों में देखते हुए कहा, “प्रह्लाद जी, आपकी चालाकी और दुनियादारी की समझ को मेरा सलाम। आपने बिल्कुल सच कहा, मैं भावुक था, लेकिन याद रखिएगा, जो इंसान दिल से रिश्ते निभाता है वह लाचार या अक्ल का अंधा नहीं होता। उसकी शराफत उसकी इंसानियत होती है, मूर्खता नहीं। मैंने तान्या को अपनी बेटी मानकर यह जिम्मा उठाया था, इसलिए यह शादी मैं बिना किसी रुकावट के पूरी होने दूंगा। लेकिन आज तान्या की डोली उठने के साथ ही आपके और मेरे बीच का यह दिखावटी नाटक हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।”
प्रह्लाद जी हकलाते हुए आगे बढ़े, “अरे… अरे आलोक भाई, आप गलत समझ रहे हैं… मैं तो बस मजाक में… अरे आप तो मेरे जिगरी…”
“बस प्रह्लाद जी,” आलोक जी ने हाथ उठाकर उन्हें वहीं रोक दिया, “शब्दों का और अपमान मत कीजिए। झूठी तारीफों का जो नशा आप मुझे बेच रहे थे, उसकी कीमत मैंने बहुत अच्छे से चुका दी है।”
इतना कहकर आलोक जी मुड़े और हॉल में लौट आए। अब उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका था। उन्होंने देखा कि प्रह्लाद का बेटा और दामाद भी उन्हें कुछ छोटे-मोटे झंझट भरे काम सौंपने आ रहे थे, यह कहते हुए कि “अंकल जी, आप तो हमारे बड़े हैं, आप ही संभालिए।” लेकिन इस बार आलोक जी ने मुस्कुराते हुए बड़ी शालीनता से कह दिया, “बेटा, अब तुम्हारा परिवार और रिश्तेदार आ चुके हैं। यह तुम्हारा पारिवारिक मामला है, तुम खुद संभालो।” उन दोनों के चेहरे उतर गए।
जैसे ही फेरों का समय आया और कन्यादान की रस्में शुरू हुईं, आलोक जी ने दूर खड़े होकर तान्या के सिर पर मन ही मन ढेरों आशीर्वाद दिए। उस निर्दोष बच्ची से उनका कोई बैर नहीं था। लेकिन अब उस पंडाल में उनका कोई काम नहीं बचा था। वे चुपचाप अपने भारी लेकिन आत्मसम्मान से भरे कदमों से मंडप से बाहर निकल आए।
बाहर ठंडी रात की हवा चल रही थी। आलोक जी ने अपनी कार की चाबी निकाली। एक पल के लिए उनकी आंखें भीगीं, उस आत्मीयता के टूटने का मलाल हुआ जो उन्होंने सच मान ली थी। लेकिन अगले ही पल एक अजीब सा सुकून उनके दिल में भर गया। उन्हें लगा जैसे बरसों का एक भारी बोझ उनके सिर से उतर गया हो। उन्हें पत्नी वंदना की वह बात याद आई जो वह हमेशा समझाती थी—नेकी जरूर करो, लेकिन अपना आत्मसम्मान गिरवी रखकर नहीं।
उस रात के सबक ने आलोक जी के जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने अच्छाई करना नहीं छोड़ा, क्योंकि परोपकार उनकी आत्मा का स्वभाव था, लेकिन उन्होंने उस परोपकार को विवेक की ढाल पहना दी। कुछ ही महीनों बाद जब उनका परिवार प्रयागराज आ गया, तो आलोक जी ने एक नई शुरुआत की। अब वे अपनी ऊर्जा, समय और साधन उन लोगों पर खर्च करने लगे जिन्हें सच में उनकी जरूरत थी—जैसे अनाथ बच्चों की पढ़ाई, रेलवे कॉलोनी के सफाई कर्मचारियों के बच्चों को शाम को मुफ्त पढ़ाना और जरूरतमंद मरीजों की निस्वार्थ मदद करना।
अब यदि कोई दफ्तर या समाज में झूठी तारीफों का जाल बुनकर उनसे अनुचित फायदा उठाने की कोशिश करता, तो आलोक जी बहुत ही विनम्रता और दृढ़ता के साथ ‘ना’ कहना सीख चुके थे। उन्होंने समझ लिया था कि सीमाओं के बिना दी गई अच्छाई केवल शोषण को जन्म देती है। आलोक जी अब पहले से कहीं अधिक प्रसन्न, शांत और गरिमामय जीवन जी रहे थे, क्योंकि वे जान गए थे कि दूसरों का भला करने से पहले अपनी आत्मा और अपने सम्मान की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है।
जीवन में सच्चे और मतलबी लोगों की पहचान करना ही सबसे बड़ा विवेक है। क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि किसी ने आपकी अच्छाई और सीधेपन का फायदा उठाकर आपको सिर्फ अपने मतलब के लिए इस्तेमाल किया हो? ऐसे स्वार्थी रिश्तों से आपने खुद को कैसे संभाला? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।
मूल लेखिका : . संगीता त्रिपाठी