बेनाम रिश्ते का बोझ

पिछले तीन दिनों से घर में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। यह खामोशी घर की दीवारों में नहीं, बल्कि स्नेहा के स्वभाव में थी। स्नेहा, जो पूरे घर की जान थी, जिसकी चहचहाहट से सुबह होती थी और जिसकी हंसी पर पूरा परिवार निहाल रहता था, वो अब एक बुझी हुई मोमबत्ती की तरह हो गई थी। वह ऑफिस से आती, चुपचाप अपने कमरे में चली जाती, खाना भी बस नाम मात्र का खाती और किसी से नजरें नहीं मिलाती। माँ को लगा कि शायद ऑफिस में काम का तनाव होगा, लेकिन स्नेहा की बड़ी बहन, अंजलि से अपनी छोटी बहन का यह दर्द छिपा नहीं रह सका। अंजलि जानती थी कि स्नेहा की इस खामोशी और सूजी हुई आँखों के पीछे ऑफिस का काम नहीं, बल्कि ‘समर’ था। 

समर और स्नेहा पिछले डेढ़ साल से एक-दूसरे के बेहद करीब थे। आजकल की नई पीढ़ी में जिसे ‘सिटुएशनशिप’ (Situationship) कहा जाता है, उनका रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था। वे दोनों एक-दूसरे के हर सुख-दुख के साथी थे। घंटों फोन पर बातें करना, वीकेंड्स पर साथ घूमना, बीमारी में एक-दूसरे की रातों की नींद खराब करके फिक्र करना—उन्होंने वो सब किया जो एक प्रेमी जोड़ा करता है। लेकिन विडंबना यह थी कि दोनों ने कभी अपने इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया था। न समर ने कभी स्नेहा को अपनी गर्लफ्रेंड कहा और न ही स्नेहा ने कभी उस पर अपना पूरा अधिकार जताया। बस एक बेनाम सा रिश्ता था, जो स्नेहा के लिए उसकी पूरी दुनिया बन चुका था, लेकिन समर के लिए शायद सिर्फ एक ‘सहूलियत’।

तीसरे दिन की शाम जब स्नेहा ऑफिस से लौटकर अपने कमरे में अंधेरा करके बैठी थी, तब अंजलि ने उसके कमरे का दरवाजा खोला। अंजलि ने कमरे की बत्ती जलाई और देखा कि स्नेहा घुटनों में सिर दिए सिसक रही थी। अंजलि का दिल अपनी छोटी बहन को इस हाल में देखकर तड़प उठा। वह चुपचाप स्नेहा के पास बिस्तर पर बैठी और उसने स्नेहा का सिर अपने कंधे पर रख लिया। 

“कब तक ऐसे खुद को तकलीफ देती रहेगी? क्या समर ने कुछ कहा है?” अंजलि ने बहुत ही कोमलता से पूछा।

समर का नाम सुनते ही स्नेहा के सब्र का बांध टूट गया। वह फफक-फफक कर रोने लगी। आंसुओं के बीच उसने जो बताया, वह आज के दौर के इन ‘आधुनिक’ रिश्तों की सबसे कड़वी सच्चाई थी। 

“दीदी, कल समर का फोन आया था,” स्नेहा ने रुंधे हुए गले से कहना शुरू किया। “उसने बहुत ही सामान्य तरीके से मुझे बताया कि उसके घर वालों ने उसके लिए लड़की देख ली है और अगले महीने उसकी सगाई है। जब मैंने उससे रोते हुए पूछा कि ‘हमारा क्या?’, तो उसने बहुत ही ठंडेपन से जवाब दिया कि ‘हमारा क्या? स्नेहा, हम तो सिर्फ बहुत अच्छे दोस्त थे न? हमने कभी एक-दूसरे से कोई वादा तो नहीं किया था। तुम्हें पता था कि मेरी शादी घर वालों की मर्जी से होगी।'”

स्नेहा ने अपनी लाल हो चुकी आँखों से अंजलि की तरफ देखा और कहा, “दीदी, अगर हम सिर्फ दोस्त थे, तो उसने मुझे वो सारे अधिकार क्यों दिए जो एक दोस्त के नहीं होते? जब वो बीमार था, तो रात के तीन बजे तक मैंने जागकर उसका ख्याल रखा। मेरे हर फैसले में उसकी रजामंदी होती थी। क्या बिना ‘आई लव यू’ कहे जो प्यार जताया जाता है, उसकी कोई अहमियत नहीं होती? उसने मेरे जज्बातों का इस्तेमाल किया और अंत में बस एक ‘हम तो दोस्त हैं’ का बोर्ड लगाकर बड़ी आसानी से अपनी जिम्मेदारियों से भाग गया।”

अंजलि ने स्नेहा के आंसू पोछे और उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया। वह अपनी बहन की पीड़ा समझ रही थी। ऐसे रिश्तों में जब दिल टूटता है, तो इंसान किसी से शिकायत भी नहीं कर पाता, क्योंकि दुनिया यही कहती है कि ‘जब कोई रिश्ता था ही नहीं, तो रोना कैसा?’ 

“स्नेहा, मेरी बात बहुत ध्यान से सुन,” अंजलि ने स्नेहा का चेहरा अपने हाथों में लेकर कहा। “समर की बातों से ज्यादा तेरी ये उम्मीदें तुझे रुला रही हैं। आज के समय में ये जो बिना नाम के रिश्ते होते हैं न, ये सिर्फ जिम्मेदारियों से भागने का एक नया तरीका हैं। जब सब कुछ अच्छा लगता है, तो इंसान साथ रहता है, लेकिन जैसे ही कमिटमेंट (प्रतिबद्धता) की बात आती है, तो ‘हम तो बस दोस्त हैं’ का बहाना सबसे आसान होता है। तूने प्यार किया, पूरी सच्चाई से किया, लेकिन तूने उस इंसान से किया जिसे तेरे प्यार की कीमत नहीं पता थी।”

अंजलि ने थोड़ा और गहराई से समझाते हुए कहा, “जिस इंसान को सच में तेरी कद्र होती, वो कभी तुझे इस तरह के बेनाम रिश्ते की उलझन में नहीं रखता। वो पूरी दुनिया के सामने तेरा हाथ थामता और फख्र से कहता कि तू उसकी है। जो इंसान एक रिश्ते को नाम देने की हिम्मत नहीं जुटा सकता, वो जिंदगी भर तेरा साथ क्या निभाएगा? तुझे उसके जाने का दुख है, लेकिन सच कहूं तो तुझे खुश होना चाहिए कि एक डरपोक और स्वार्थी इंसान तेरी जिंदगी से चला गया। तेरी अहमियत इतनी सस्ती नहीं है कि कोई भी अपनी सहूलियत के हिसाब से तेरा इस्तेमाल करे और चला जाए।”

अपनी बड़ी बहन की इन बातों ने स्नेहा के अंदर चल रहे उस दर्द के तूफान को मानो एकदम शांत कर दिया। अंजलि के शब्दों में एक ऐसी सच्चाई थी जिसने स्नेहा को आईना दिखा दिया था। वह उस इंसान के लिए अपने आंसू बहा रही थी, जिसने कभी उसे वो सम्मान और वो दर्जा दिया ही नहीं जिसकी वह हकदार थी। एक लड़की अपना दिल, अपना समय और अपनी भावनाएं किसी पर तब लुटाती है जब उसे उस इंसान में अपनी दुनिया नजर आती है, लेकिन जब वही इंसान उसे महज़ एक ‘टाइमपास’ या ‘सहूलियत’ बता दे, तो दर्द तो होता है। 

स्नेहा ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने आंसू पोंछे और अंजलि की आँखों में देखकर एक फीकी लेकिन सच्ची मुस्कान दी। “आप सही कह रही हो दीदी। मैंने अपने जज्बात एक गलत इंसान पर जाया कर दिए। जो रिश्ता मुझे दुनिया के सामने एक पहचान नहीं दे सकता, उस रिश्ते के छिन जाने पर मुझे रोना नहीं चाहिए। उसने मुझे एक बहुत बड़ा सबक दिया है कि बिना नींव के बनाए गए मकान हमेशा गिरते ही हैं।”

उस रात स्नेहा ने अपना फोन उठाया और समर का नंबर हमेशा के लिए डिलीट और ब्लॉक कर दिया। उसने खुद को समर की यादों के उस बेनाम पिंजरे से आज़ाद कर लिया था। अगले दिन जब स्नेहा सुबह डाइनिंग टेबल पर आई, तो उसके चेहरे पर वो पुरानी वाली चमक तो पूरी तरह नहीं थी, लेकिन एक नया आत्मविश्वास जरूर था। उसने अपने परिवार के साथ बैठकर चाय पी और महसूस किया कि दुनिया में इकलौता सच्चा प्यार सिर्फ परिवार का होता है, जिसका न सिर्फ एक नाम होता है, बल्कि जो कभी आपको बीच मझधार में अकेला नहीं छोड़ता। बेनाम रिश्तों की उस चुभन से निकलकर स्नेहा ने अपनी जिंदगी की एक नई और मजबूत शुरुआत कर दी थी।

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लेखिका : गायत्री शर्मा

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