सुख का आंगन

“कैसी हो सुमित्रा?” निर्मला ने अपने माथे की सिलवटों को उंगलियों से सहलाते हुए फोन पर पूछा। उसकी आवाज में एक अजीब सी थकान और झुंझलाहट थी। दूसरी तरफ से सुमित्रा की खनकती हुई शांत आवाज आई, “मैं बिल्कुल ठीक हूँ दीदी, आप कैसी हैं? बहुत दिनों बाद आपने फोन किया। सब घर में कुशल … Read more

अपने ही घर में अजनबी

रोहन जैसे ही थका-हारा दफ्तर से घर लौटा, सोफे पर बैठी उसकी पत्नी रिया का पारा सातवें आसमान पर था। रोहन ने अभी अपने जूतों के फीते खोले ही थे कि रिया की तीखी आवाज पूरे ड्रॉइंग रूम में गूंज उठी, “मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती रोहन! तुम्हारी माँ से एक छोटा सा … Read more

एक अनकही दूरी

सावित्री देवी के कमरे की खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप भी आज उनके चेहरे की उदासी को कम नहीं कर पा रही थी। उनके हाथ में फोन था और दूसरी तरफ उनकी छोटी बहन लता थी। सावित्री देवी भारी आवाज़ में कह रही थीं, “सच ही कहती थी तू लता, जब तक बेटा … Read more

पराया आँगन, अपनी महक

“अंजलि, बेटा… सब ठीक तो है ना? तू मुंह से तो कुछ नहीं कहती, लेकिन एक माँ अपनी बेटी की खामोशी भी पढ़ लेती है। तेरी आवाज़ में वो पुरानी वाली खनक नहीं है, एक अजीब सी उदासी झलकती है। अगर कोई बात है तो मुझे बता दे।” फोन के दूसरी तरफ से अंजलि की … Read more

रिश्तों की बुनियाद

  “पापा, बस बहुत हो गया! मैं अब इस घर में एक पल भी और नहीं रह सकती। रोहन और उसके परिवार की पिछड़ी हुई सोच के साथ मेरा दम घुटता है। अगर आप कल सुबह तक यहाँ नहीं आए, तो मैं अकेले ही डिवोर्स के पेपर फाइल कर दूँगी।” काव्या ने बिना कोई जवाब सुने … Read more

मायके की देहरी और ससुराल का मान

सविता देवी का बंगला शहर के पॉश इलाके में स्थित था। घर की दीवारों पर सजी महंगी पेंटिंग्स और दहलीज़ पर रखी पीतल की मूर्तियाँ इस बात की गवाह थीं कि यह परिवार संपन्नता में जी रहा है। सविता देवी के दो बेटे थे—अभिषेक और रचित। अभिषेक की पत्नी रिद्धिमा एक रईस घराने से थी, … Read more

अपनापन या अधिकार

सुबह के करीब छह बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड ने दस्तक दे दी थी, लेकिन मीरा के माथे पर पसीने की कुछ बूंदें साफ झलक रही थीं। गैस के एक चूल्हे पर कुकर की सीटी बजने को तैयार थी, तो दूसरे पर वह ओट्स और ताजी सब्जियों का चीला बना रही थी। घर … Read more

अटूट बंधन – संगीता श्रीवास्तव

‘कुछ नहीं कर पाएगा नालायक! जब भी पी टीएम में जाता हूं तो रिपोर्ट कार्ड देखकर मुंह लटकाए चला आता हूं। इस लड़के को तो शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं !अब इन्हें बाइक चाहिए। जितनी मेरी तनख्वाह है ,उसी में ना अपनी गृहस्थी चलाऊंगा। तुम्हारे लिए चोरी- बाजारी तो नहीं करूंगा न! अरे … Read more

यह कैसा बंधन – लक्ष्मी कनोडिया ‘अनिका’

हवेली के आँगन में रखी वह पुरानी संदूकची पिछले पैंतीस वर्षों से बंद थी। उस पर जंग लगे पीतल का ताला था और ताले के ऊपर लाल रंग से किसी ने बहुत पहले लिख दिया था— “घर की मर्यादा।” नंदिनी ने बचपन से उस संदूकची को देखा था। घर की औरतों के लिए वह किसी … Read more

“ये कैसा बंधन” – कमलेश आहूजा

रमा के सामने वाले फ्लैट में सुबह से हलचल मची हुई थी। वह फ्लैट काफी समय से खाली पड़ा था। इस फ्लोर पर सिर्फ दो ही फ्लैट थे, इसलिए रमा बहुत खुश थी कि चलो, पड़ोसी आ जाने से उसका अकेलापन कुछ कम होगा। वह उत्सुक थी कि आखिर उसके नए पड़ोसी कौन हैं। उसने … Read more

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