टूटे भ्रम – निधि गुप्ता

अनामिका के लिए उसके पिता, प्रोफ़ेसर विद्यानाथ, किसी महापुरुष से कम नहीं थे। शहर के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज में समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष विद्यानाथ जी अक्सर मंचों से समानता, रूढ़िवाद के अंत और आधुनिक विचारों की बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। अनामिका बचपन से ही दर्शकों की पहली कतार में बैठकर अपने पिता को तालियों की … Read more

रेशमी धागों का अनकहा कर्ज – नेहा पटेल

सावन का महीना अपनी पूरी रंगत पर था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और मिट्टी की सौंधी खुशबू महानगर के उस आलीशान फ्लैट की बालकनी तक पहुँच रही थी। आज रक्षाबंधन का दिन था। सुबह से ही घर में एक खास तरह की चहल-पहल थी। अनिकेत अपने कमरे में तैयार हो रहा था। उसने … Read more

करवा चौथ: एक सुहाग की खातिर – रमा शुक्ला

अक्टूबर का महीना था और हवा में एक हल्की सी गुलाबी ठंडक घुलने लगी थी। त्योहारों का मौसम अपने पूरे शबाब पर था, और आज तो सुहागिनों का सबसे बड़ा त्योहार ‘करवा चौथ’ था। राधिका जी के घर में सुबह से ही एक अलग सी रौनक और उल्लास का माहौल था। राधिका जी स्वभाव से … Read more

एक अनकही सच्चाई – आरती देवी

दिल्ली जैसे महानगर की सुबह हमेशा एक भागदौड़ के साथ शुरू होती है। लोकल ट्रेन की सीटी, मेट्रो की उद्घोषणाएं और सड़कों पर रेंगता हुआ ट्रैफिक, यही इस शहर की धड़कन है। मैं भी इसी धड़कन का एक हिस्सा हूँ। एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हुए मैंने इस शहर की रफ्तार को अपना लिया … Read more

रिश्तों की राख पर – वर्षा मंडल

शाम के धुंधलके ने पूरे घर को अपनी चादर में लपेट लिया था, लेकिन उस दिन घर के भीतर का सन्नाटा किसी आने वाले भयानक तूफान की गवाही दे रहा था। बैठक में भारी खामोशी पसरी थी। सोफे पर ससुर जी, दीनानाथ जी, सिर पकड़े बैठे थे। उनके सामने उनके ही पुराने मित्र और उनके … Read more

सम्मान का मोल – रीमा साहू

सर्दियों की एक सर्द शाम थी, जब सुमेधा अपने कमरे में बैठी हुई फोन के रिसीवर को अपने हाथों में पकड़े हुए सुन्न सी रह गई थी। बाहर हल्की-हल्की धुंध छाने लगी थी, लेकिन सुमेधा के मन के भीतर विचारों का एक घना कोहरा उमड़ पड़ा था। फोन कट चुका था, लेकिन दूसरी तरफ से … Read more

बटवारा – एम. पी. सिंह 

सोहन के गुज़र जाने के बाद उसकी पत्नी कमला ने अकेले दोनों बेटों राम और मोहन क़ो सम्भला. उस समय राम 10 और मोहन 8 साल का था. कमला ने बच्चों की परवरिश में खुद क़ो पूरी तरह समर्पित कर दिया. सुबह 10 से शाम 5 बजे तक स्कूल में पढ़ाती ओर रात 8 से … Read more

*अपने और पराए – वक्त ने बताए* – तोषिका

आज मुझे *अपने और पराए – वक्त ने बताए* वरना मैं हमेशा ही धोखे में ही रहती रोते हुई मुस्कान बोली। उसकी साथ बैठी दोस्त रूपा ने उस से पूछा “ऐसे क्यों बोल रही हो? क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा क्या?” मुस्कान चाह कर भी अपने मुख से एक शब्द भी नहीं निकाल पा … Read more

अपनेपन की छांव का अहसास – डॉ बीना कुण्डलिया 

दरवाजे पर खटखटाहट और एक बुलन्द सी आवाज की चहक कुरियर कुरियर को सुनकर माया जी ने दरवाजा खोला कुरियर वाले से कुरियर लेकर अभी सोच ही रहीं थीं क्या होगा ? किसने भेजा होगा । दरवाजे पर आवाज सुनकर शुलभ बाबू भी जल्दी से बहार आ गये। अरे माया दिखाओ तो सही जरा किसने … Read more

खामोश ढाल: एक अनकहे समर्पण की दास्तान

सुहासिनी अक्सर खिड़की के पास बैठकर बाहर के कोलाहल को देखती रहती थी। शादी के छह साल बीत चुके थे, लेकिन उसे लगता था जैसे उसके और उसके पति, समर के बीच एक अदृश्य दीवार सी खड़ी है। समर एक बेहद शांत, काम में डूबा रहने वाला और कम बोलने वाला इंसान था। सुहासिनी को … Read more

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