जोगिनी – कल्पना मिश्रा
न जाने कितनी देर से वह अपनी अलमारी खोलकर एकटक निहारे जा रही थी। हैंगर पर करीने से लटकी हुई एक से बढ़कर एक सुंदर और कीमती साड़ियां भी आज उसे लालायित नही कर पा रही थीं। लाल,पीली, नारंगी, गुलाबी ,,,ज़्यादातर साड़ियां रवि की ही पसंद की तो थीं क्योंकि उनको यही सब रंग भाते … Read more