सच्ची दोस्ती – चंद्रमणि चौबे

मैं और अमीषा एक साथ एक ही स्कूल में बचपन से ही पढ़ती थी हम लोगो में बहुत ही घनिष्ठता थी ग्रेजुएशन के बाद मैं मास्टर करने दिल्ली चली गई अमीषा भी भोपाल जाकर अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की एक दिन अचानक अमीषा का कॉल आया बहुत घबड़ाई सी लगी पूरी बात तक नही … Read more

चल रे विभूति वृद्धाश्रम – मीनाक्षी सिंह

समीरा जी और विभूति जी ने नाजों से पाला अपने बच्चें ललित को ! पर जब बुढ़ापे में बेटा ,बहू दिल को ढेस पहुंचाते तो वो दोनों लोग अपने पुराने मित्र रवि प्रकाश से थोड़ा दुख बांटने चले ज़ाते ! आज फिर वो रवि जी के पास आयें हैँ ! रवि प्रकाशजी  उन्हे सांत्वना देते … Read more

अधूरी चीख –  बालेश्वर गुप्ता

 एक शोर उठा,भगदड़ मची,काफी लोग उसी दिशा में दौड़ लिये,कुछ अपने स्थान पर ही खड़े खड़े, क्या हुआ जानने का प्रयास करने लगे।कुली ने बताया कि एक कुलीन शालीन सा व्यक्ति यही बैंच पर काफी देर से बैठा था।सफेद झक धोती,ऊपर से सफेद ही कमीज।बस जैसे ही ट्रेन आयी वो एकदम झटके से उठकर  चलती … Read more

बट्टा – कंचन श्रीवास्तव

चार पैसे क्या कमाने लगी, वक्त ही नहीं मिलता,पास बैठकर हाल चाल पूछने का ,कहते हुए राधा ने श्याम को चाय की प्याली पकड़ाई और बगल में ही बैठते हुए बोली,सुनो- बिटिया अब सयानी हो गई कुछ सोचा, अरे उसके हाथ पीले कर दो वरना उमर बढ़ती जा रही है, आखिर और सब भी तो … Read more

इज्जत – ममता गुप्ता

अरे !! यार शिल्पा ये तो आजकल फैशन है। ड्रिंक करना,स्मोकिंग करना,क्लब में ये सब तो चलता है ना। तू भी हमारे साथ रहकर ये सब सीख जाएगी। देख” तू अभी नई नई आई इसलिए तुझे यह सब थोड़ा अजीब लगता है,लेकिन गर तुझे इस शहर में रहना है तो थोड़ा बहुत तो खुद को  … Read more

इज्जत कमाओ – भगवती सक्सेना गौड़

रीना सर्विस से रिटायर हुई, आजकल बड़े शांत भाव से आराम फरमाती थी। कई दिनों से अपनी बड़ी दीदी सीता की बहुत याद आ रही थी। बेटे से कहा, सुनो अगर हो सके तो ट्रेन का ही रिजर्वेशन करा दो, दीदी की बहुत याद आ रही, व्यस्तता के कारण कुछ वर्षों से मिलना नही हुआ। … Read more

छुट्टियां  – नन्दिनी

छुट्टियां गर्मी की, ये शब्द हमेशा से ही बड़ा लुभावना रहा है हेना ….  छोटे थे तो परीक्षा के बाद मामा नानी घर जाने की खुशी अलग ही होती थी। बड़े होकर शादी हुई तो मायके जाने की खुशी तो शब्दों से परे है ,बचपन को फिर से जीवंत करने के दिन ,बेपरवाह बिना अलार्म … Read more

 मनहूस रातों का रुदन ! – रमेश चंद्र शर्मा 

” नंदा, तुम यह सब कैसे बर्दाश्त कर लेती हो। तुम्हारी जगह दूसरी  औरत होती तो कुछ भी कर गुजरती।” नेहा ने अपनी सहेली नंदा से तीखा सवाल पूछ लिया। नंदा (नेहा से) ” सच कहूं ।गलती मेरी ही है। जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही मेरे कमजोर कदम लड़खड़ा गए।” दरअसल ग्रेजुएशन के … Read more

नृत्यांगना – अनुराधा श्रीवास्तव “अंतरा”

बहुत समय पहले की बात है। एक नृत्यांगना थी, दमयन्ती। बेहद खूबसूरत। उसकी खूबसूरती देखकर पुरूष तो पुरूष, महिलायें भी दांतों तले उंगलियां दबा लेती थीं। रूप ऐसा मनमोहन जैसे भगवान ने उसे गढ़ने में सदियाॅं लगायी हों, एक एक अंग तराशा हुआ, नृत्य की कला में ऐसी माहिर कि जिस राज्य में वह नृत्य … Read more

माँ की इच्छा – रीटा मक्कड़

हर त्योहार पर सारा परिवार एक साथ होता था। तीनो भाई ,बहुएं और उनके बच्चे सभी हर त्योहार को खूब धूम धाम से मनाते थे। माँ बाबू जी छोटे बेटे बहु के साथ थे । वो पहले से ही दोनो बड़े बेटों को आने के लिए बोल देते थे। माँ भी बहु के साथ मिल … Read more

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