कुंडली भाग्य – कमलेश राणा

हाय माधुरी, क्या बात है? आजकल तो ईद का चाँद हो गई हो, नजर ही नहीं आती।  क्या बताऊँ यार ! गृहस्थी की जिम्मेदारियों से फुर्सत ही नहीं मिलती। मैं तुम्हारे जैसी भाग्यशाली कहाँ हूँ। तुम्हारी तो बहुओं ने सारी जिम्मेदारी उठा ली है। मजे तो बस तुम्हारे ही हैं, सातों सुख भोग रही हो  … Read more

मां का अक्स – डा. मधु आंधीवाल

दीपा किस मनोदशा से गुजर रही थी कोई नहीं समझ पा रहा था । पूरी जिन्दगी औरत क्या दूसरों के लिये ही जीती है। अपनी शायद कोई इच्छा कोई भावना नहीं होती । अजय से जब शादी होकर इस घर में आई तब वह केवल 17 साल की थी । घर में दो देवर दो … Read more

“अपग्रेडिंग बुढ़ापा” (एक कदम साहस भरा) – कविता भड़ाना

क्या???? ये क्या सुन रहे है हम मां… क्या कह रही हो आप?? ऐसा भी कही होता है क्या… रेवती जी की बात सुनने के बाद दोनों बेटों और बहुओं के मुंह आश्चर्य से खुले रह गए…  क्यों बच्चो ऐसी क्या अनोखी बात कह दी मैने जो तुम लोग इतना हैरान हो रहे हों… आज … Read more

 सुकून – सीमा पण्ड्या

प्रिंसिपल साहब के कक्ष में सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर एक बैठक चल रही थी। बैठक में छात्रसंघ के पदाधिकारी, कुछ लेक्चर्स और प्रोफ़ेसर्स सम्मिलित थे। प्रिंसिपल साहब के पास एक फ़ोन आया उन्होंने कहा – “ ओह नो, बहुत ही दुखद”! सभी जिज्ञासु दृष्टि से देखने लगे वे बोले- “राजमल जी नहीं रहे”। “ओह”- सभी … Read more

इज्जत का मापदंड – संगीता त्रिपाठी

शिखा गुस्से में उबल रही थी, सारी जिंदगी बीता दी, इनलोगो की खुशी में, उसका आज ये सिला मिला.., “आप बैकवर्ड हो, पढ़ी -लिखी होकर भी इतने दकियानूसी विचार धारा… अरे मॉम दुनिया चाँद पर पहुँच गई और आप अभी तक जांति -पाति के बोझ को ढो रही हो,”बेटे की बात रह -रह कर शिखा … Read more

परवरिश – के कामेश्वरी

चित्रा एक अधेड़ महिला के साथ कॉफी हाउस में बैठी थी । ऐसा लग रहा था कि दोनों इस बात का इंतज़ार कर रही थी कि कौन बातचीत का सिलसिला पहले शुरू करेगा। अधेड़ महिला जिसका नाम सुगुणा था उन्होंने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा— हाँ तो तुमने अपना नाम क्या बताया था ।  चित्रा … Read more

इज्जत से – गीता वाधवानी 

जिंदगी एक पहेली है और हम सब इसका उत्तर ढूंढते ढूंढते कहीं खो जाते हैं। शायद ही किसी को इसका सही उत्तर मिल पाता है। ऐसे ही पहेली से उलझता जिंदगी के चक्रव्यूह से निकलने की कोशिश करता बिरजू एक दिहाड़ी मजदूर था। जब से होश संभाला था खुद को अकेला ही पाया था। थोड़ा … Read more

पंखों की उड़ान  – पुष्पा जोशी

आज निशा ने कई दिनों ,या यूँ कहैं ,कि कई वर्षों के बाद घर से बाहर कदम रखा था |जब से ब्याह कर आई  ,उसकी दुनियाँ इस चार दिवारी में सिमट कर रह गई  थी |उसनें अपनी खुशियाँ अपने परिवार में ढूंढी |सबकी ख्वाइशें पूरी करने में उसे सुकून मिलता |माँ(सास) की दवाइयों का,भोजन का … Read more

अनमोल रिश्ता – संगीता श्रीवास्तव

कांति का घर मौली के घर के पास ही था। उसका भी अपना खुशहाल ‌परिवार था। अपने 2 साल के बेटे और पति के साथ रहती थी। उसका पति ठेले पर खाने पीने का सामान बेचता था। दशहरे के मेले में अपना ठेला लगाया हुआ था। कांति भी बेटे के साथ गई थी।अचानक मेले में … Read more

प्रायश्चित..! – कामिनी सजल सोनी

देखो जी मैं कहे दे रही हूं बड़े भैया आ तो रहे हैं लेकिन अगर कुछ पैसों की मदद मांगे तो साफ मना कर देना मैंने सुना है कि इस बार गांव की फसल अच्छी नहीं हुई है…!! राघव के बड़े भाई सुरेंद्र जी  के आने की खबर सुनकर शीतल का मूड सुबह से ही … Read more

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