मिट्टी के रिश्ते

शारदा ने अपने पल्लू से विक्रांत के चेहरे को पोंछा, उसके उलझे हुए बालों में उंगलियाँ फेरीं और उसके माथे को चूमकर रोने लगी। “वीर, तू चिंता मत कर, तेरी दीदी आ गई है। तुझे कुछ नहीं होगा।”

इस निस्वार्थ प्रेम के स्पर्श ने विक्रांत के भीतर जमे अहंकार के आखिरी पहाड़ को भी पिघला दिया। वह बोल नहीं पा रहा था, लेकिन उसके गले से एक अजीब सी घुटती हुई सिसकी निकली। उसने अपने बाएं हाथ से, जो थोड़ा काम कर रहा था, केशव बाबू के कुर्ते का कोना कसकर पकड़ लिया और एक छोटे बच्चे की तरह फफक-फफक कर रो पड़ा।

 महज़ बारह सालों के भीतर रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन के धंधे ने विक्रांत को फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया था। शहर की सबसे ऊँची इमारतों में उसके दफ़्तर थे, कलाई पर पंद्रह लाख की घड़ी बंधी रहती थी और उसके इर्द-गिर्द हमेशा चापलूसों का एक हुजूम मंडराता रहता था। दौलत के इस अथाह समंदर ने विक्रांत की आँखों पर एक ऐसी पट्टी बाँध दी थी, जहाँ से उसे हर वो इंसान कीड़े-मकोड़े जैसा नज़र आता था जिसकी जेब में करोड़ों का बैंक बैलेंस न हो। वह अक्सर अपनी पार्टियों में जाम छलकाते हुए कहता था कि दुनिया में हर चीज़ की एक कीमत होती है, बस खरीदने वाले की जेब में दम होना चाहिए।

लेकिन इस चकाचौंध से कोसों दूर, हिमाचल की तराई में बसे एक छोटे से कस्बे ‘सुजानपुर’ में विक्रांत की असली जड़ें थीं, जिन्हें वह कब का अपने ज़ेहन से काट कर फेंक चुका था। सुजानपुर के पुराने पुश्तैनी मकान में रहते थे उसके बड़े भाई केशव बाबू। केशव बाबू कस्बे के ही एक पुराने डाकघर से पोस्टमास्टर के पद से रिटायर हुए थे। धुला हुआ सूती कुर्ता-पायजामा, कंधे पर एक साधारण सा झोला और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान—यही केशव बाबू की पहचान थी। पिता के गुज़र जाने के बाद केशव बाबू ने ही अपने पेट पर पट्टी बाँधकर विक्रांत को शहर भेजकर पढ़ाया था। उन्होंने अपनी जवानी की सारी ख्वाहिशें अपने छोटे भाई के सपनों की नींव में दफ़्न कर दी थीं। पर आज विक्रांत के लिए केशव बाबू सिर्फ़ एक ‘पिछड़े हुए कस्बाई बुड्ढे’ से ज़्यादा कुछ नहीं थे।

इन्हीं दो भाइयों के बीच एक तीसरी कड़ी भी थी—उनकी छोटी बहन शारदा। शारदा के पति का देहांत सात साल पहले एक सड़क हादसे में हो गया था। तब से केशव बाबू ने ही अपनी विधवा बहन और उसकी इकलौती बेटी ‘गौरी’ को अपने साए में पाला था। शारदा घरों में सिलाई-कढ़ाई का काम करके अपने स्वाभिमान को ज़िंदा रखे हुए थी, और केशव बाबू की पेंशन से घर का चूल्हा बड़े आराम से जल जाता था।

वक्त गुज़रा और गौरी सयानी हो गई। वह पढ़ने में बेहद होनहार थी, लेकिन शारदा की बढ़ती उम्र और गिरती सेहत को देखकर केशव बाबू ने एक अच्छे, संस्कारी परिवार में गौरी का रिश्ता तय कर दिया। लड़का बैंक में क्लर्क था और परिवार ने दहेज के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं माँगी थी। शादी की तारीख पक्की होते ही केशव बाबू के मन में सबसे पहला ख्याल अपने छोटे भाई विक्रांत का आया। पांच साल हो गए थे विक्रांत को सुजानपुर की दहलीज़ लांघे हुए। केशव बाबू ने खुद चंडीगढ़ जाकर विक्रांत को शादी का कार्ड दिया। विक्रांत ने अपने आलीशान एसी केबिन में बैठे-बैठे केशव बाबू को दस मिनट इंतज़ार करवाया और फिर बड़ी बेरुखी से कार्ड टेबल पर पटकते हुए कहा था, “देखूँगा भइया, अगर मेरी दुबई वाली डील जल्दी फाइनल हो गई तो एक-आध घंटे के लिए आ जाऊँगा।”

शादी का दिन आ पहुँचा। पुराना पुश्तैनी मकान गेंदे के फूलों और पीली लाइटों से दुल्हन की तरह सजाया गया था। आँगन में हलवाई की भट्टी सुलग रही थी, जहाँ से देसी घी की मिठाइयों की सोंधी खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल रही थी। केशव बाबू दरवाज़े पर खड़े हर आने-जाने वाले का हाथ जोड़कर स्वागत कर रहे थे, लेकिन उनकी बूढ़ी आँखें बार-बार सड़क के मोड़ पर टिक जाती थीं।

दोपहर के करीब तीन बजे, कस्बे की तंग गली में एक चमचमाती हुई काले रंग की विदेशी गाड़ी ने प्रवेश किया। गाड़ी के हॉर्न की तेज़ आवाज़ से गली के बच्चे सहम कर किनारे हो गए। गाड़ी रुकी और उसमें से सफेद रंग का बेहद महंगा सूट पहने, आँखों पर काला चश्मा लगाए विक्रांत बाहर निकला। उसके साथ उसका एक सेक्रेटरी भी था, जिसने हाथ में विक्रांत का ब्रीफकेस और मिनरल वाटर की बोतल पकड़ रखी थी।

केशव बाबू की आँखें खुशी से चमक उठीं। वे लगभग दौड़ते हुए गाड़ी के पास पहुँचे और विक्रांत को गले लगाने के लिए अपनी बाहें फैला दीं। “आ गए मेरे लाल! मैं कब से तेरी राह देख रहा था।”

लेकिन विक्रांत ने दो कदम पीछे हटकर केशव बाबू के बढ़े हुए हाथों को हवा में ही रोक दिया। उसने अपनी नाक पर रुमाल रखते हुए बेहद चिढ़े हुए स्वर में कहा, “भइया, ज़रा दूर से! पसीने और इस हलवाई के धुएँ की बदबू से मेरा सिर फटा जा रहा है। ये कैसी जगह पर टेंट लगवाया है आपने? चारों तरफ धूल ही धूल है। मेरे पचास हज़ार के जूते खराब हो गए।”

केशव बाबू की फैली हुई बाहें वहीं ठिठक कर नीचे गिर गईं। उनके चेहरे की मुस्कान एक फीकी और दर्द भरी लकीर में बदल गई, फिर भी उन्होंने बात संभालते हुए कहा, “कोई बात नहीं छोटे, तू अंदर चल। मैंने तेरे कमरे में नया कूलर लगवाया है।”

“कूलर?” विक्रांत ने ऐसे मुँह बनाया जैसे कोई ज़हरीली चीज़ सुन ली हो। “भइया, मुझे इस कबाड़खाने में रात नहीं गुज़ारनी है। मैं तो बस शारदा के कहने पर मुंह दिखाने चला आया। शाम तक वापस चंडीगढ़ निकल जाऊँगा।”

पूरे घर में जहाँ खुशियों की चहल-पहल थी, वहाँ विक्रांत की मौजूदगी ने एक अजीब सा तनाव पैदा कर दिया। वह आँगन में रखी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठने के बजाय अपनी कार में ही एसी चलाकर बैठा रहा। जब शारदा उसे घर की बनी ठंडी लस्सी देने आई, तो उसने यह कहकर गिलास लौटा दिया कि उसे अनहाइजीनिक चीज़ों से एलर्जी है। कस्बे के जो पुराने बुजुर्ग विक्रांत को बचपन में कंधे पर बिठाकर घुमाते थे, जब वे उससे मिलने आए तो विक्रांत ने अपने कान में ब्लूटूथ लगाकर फोन पर व्यस्त होने का नाटक किया और उन्हें अनदेखा कर दिया।

शाम ढलने लगी थी और बारात आने में कुछ ही घंटों का वक्त बाकी था। तभी घर के अंदर से अचानक कुछ बर्तनों के गिरने और शारदा के रोने की आवाज़ आई। केशव बाबू घबराकर अंदर की तरफ भागे। आँगन के कोने में देखा तो पता चला कि तेज़ आंधी के एक झोंके से हलवाई के तंबू का एक बांस उखड़कर सीधा मिठाइयों और पनीर के बड़े पतीले पर आ गिरा था। सारा खाना मिट्टी और राख में मिल कर बर्बाद हो गया था। साथ ही, जिस लोकल कैटरर को बाकी इंतज़ाम का जिम्मा दिया गया था, वह आधे पैसे लेकर रफूचक्कर हो गया था क्योंकि उसे किसी बड़ी पार्टी से दोगुने पैसे का ऑर्डर मिल गया था।

केशव बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। बारात दरवाज़े पर आने वाली थी और घरातियों-बारातियों के खाने का सारा इंतज़ाम मिट्टी में मिल चुका था। पास के होटल से तुरंत ढाई सौ लोगों का खाना मँगवाने का मतलब था कम से कम सत्तर-अस्सी हज़ार रुपये का तुरंत इंतज़ाम करना। केशव बाबू ने अपनी सारी जमा-पूंजी शादी की तैयारियों में लगा दी थी। इस वक्त उनकी जेब में बमुश्किल चार-पांच हज़ार रुपये ही बचे थे।

शारदा का रो-रोकर बुरा हाल था। “भइया, अब क्या होगा? समधी जी के सामने हमारी नाक कट जाएगी। मेरी गौरी की डोली कैसे उठेगी?” शारदा अपने भाई के पैरों के पास बैठकर बिलख रही थी।

तभी शारदा की नज़र आँगन के दरवाज़े पर खड़े विक्रांत पर पड़ी, जो अपनी घड़ी में समय देख रहा था। शारदा को डूबते को तिनके का सहारा नज़र आया। आखिर वह उसका सगा भाई था, करोड़ों में खेलता था। अस्सी हज़ार रुपये तो उसके लिए हाथ के मैल बराबर भी नहीं थे।

शारदा अपने आँसू पोंछते हुए उठी और दौड़कर विक्रांत के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और काँपती हुई आवाज़ में बोली, “विक्रांत… मेरे भाई, आज अपनी इस अभागन बहन की लाज बचा ले। देख न, सारा खाना बर्बाद हो गया है। बारात बस पहुँचने ही वाली है। मुझे बस सत्तर-अस्सी हज़ार रुपये उधार दे दे। मैं तेरे आगे भीख मांगती हूँ। मैं अपनी सिलाई की मशीन बेच दूँगी, दिन-रात एक करके तेरा एक-एक पाई सूद समेत लौटा दूँगी, पर आज मेरी बेटी के ब्याह में कलंक मत लगने दे मेरे वीर!”

विक्रांत ने अपने चेहरे से काला चश्मा उतारा और एक बेहद ठंडी, संवेदनहीन नज़र अपनी रोती हुई बहन पर डाली। उसके चेहरे पर तरस की एक शिकन तक नहीं उभरी, बल्कि होंठों के कोने पर एक तिरस्कार भरी मुस्कान तैर गई।

उसने अपने कोट की जेब से एक सिगार निकाला, उसे सुलगाया और धुएँ का एक छल्ला शारदा के चेहरे की तरफ छोड़ते हुए बोला, “वाह शारदा, वाह! क्या ड्रामा रचा है तुम दोनों भाई-बहन ने मिलकर! मुझे पहले ही शक था कि पाँच साल बाद मुझे इतने प्यार से क्यों बुलाया जा रहा है। तो ये बात थी? हलवाई का बांस गिरा या तुम लोगों ने जानबूझकर गिराया ताकि मुझसे पैसे ऐंठ सको?”

“छोटे!” केशव बाबू की आवाज़ में एक दर्द भरी गर्जना थी। “ज़ुबान संभाल कर बात कर! अपनी बहन की मजबूरी का मज़ाक मत उड़ा।”

विक्रांत ने पलटकर केशव बाबू को घूरा। “ओह हो! तो अब पोस्टमास्टर साहब मुझे तमीज़ सिखाएंगे? भइया, सच तो कड़वा होता ही है। आप लोगों की फितरत ही यही है। जब अपनी औकात नहीं थी ढाई सौ लोगों को खाना खिलाने की, तो ये तमाशा खड़ा ही क्यों किया? कोर्ट मैरिज कर देते लड़की की! मैंने चंडीगढ़ में जो साम्राज्य खड़ा किया है न, वो अपने दिमाग और पसीने से खड़ा किया है, आप लोगों की तरह किस्मत को रोकर नहीं। मेरी जूती की नोक पर टिकी है तुम्हारी ये पूरी गृहस्थी, समझे भइया! मेरे सामने अपने इन गरीब उसूलों की भीख मत मांगा करो। मैं कोई धर्मशाला नहीं चलाता जहाँ हर ऐरे-गैरे रिश्तेदार की मुसीबतों का ठेका लेता फिरूँ।”

शारदा सन्न रह गई। उसे लगा जैसे किसी ने खौलता हुआ सीसा उसके कानों में उड़ेल दिया हो। जिस छोटे भाई को उसने बचपन में अपनी गोद में खिलाया था, अपने हिस्से की मलाई चुपके से जिसकी कटोरी में डाल दी थी, आज वह उसे ‘भिखारी’ और ‘धोखेबाज़’ कह रहा था। शारदा का स्वाभिमान टुकड़े-टुकड़े होकर आँगन की धूल में बिखर गया।

केशव बाबू के सब्र का बाँध टूट गया। उनका चेहरा क्रोध और अपमान से तमतमा उठा, लेकिन उनकी आँखों में अपने भाई के इस पतन पर गहरा दुख था। उन्होंने शारदा को कंधे से पकड़कर पीछे किया और विक्रांत के ठीक सामने खड़े हो गए।

“बस कर विक्रांत! एक शब्द और मत बोलना,” केशव बाबू की आवाज़ काँप रही थी, पर उसमें गजब की दृढ़ता थी। “आज तूने साबित कर दिया कि तेरी तिजोरी तो भर गई है, लेकिन तेरा ज़मीर पूरी तरह से कंगाल हो चुका है। जिस बाप की टूटी चप्पलों और जिस भाई के फटे कुर्ते की बदौलत आज तू इस महंगी सूट में खड़ा है, आज तू उन्हीं को उनकी औकात दिखा रहा है? याद रख छोटे, ये कागज़ के नोट बहुत बेवफा होते हैं। जब वक्त का तमाचा पड़ता है न, तो यही सोने-चाँदी के महल ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं। तब कोई बैंक बैलेंस काम नहीं आता, सिर्फ़ यही मिट्टी के रिश्ते काम आते हैं जिन्हें आज तू पैरों तले रौंद रहा है। जा यहाँ से! मेरी भांजी भूखे पेट विदा हो जाएगी, पर तेरे इस अहंकार की एक कौड़ी भी हमारे आँगन को अपवित्र नहीं करेगी।”

विक्रांत ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया। “वाह भइया! फ़िल्मों के डायलॉग बहुत अच्छे मार लेते हैं आप। ठीक है, तो रखिए अपने ये महान संस्कार अपनी जेब में और खिलाइए बारातियों को अपने उसूलों की हवा! और हाँ, आज के बाद इस कस्बे का और आप लोगों का मेरे लिए मर जाना ही बेहतर है। कभी चंडीगढ़ की तरफ मुँह उठाकर भी मत देखिएगा।”

इतना कहकर विक्रांत ने ज़मीन पर थूका और अपनी कार में बैठकर धूल उड़ाता हुआ वहाँ से निकल गया।

आँगन में मरघट जैसा सन्नाटा पसर गया था। शारदा फूट-फूट कर रो रही थी। तभी कस्बे के ही कुछ पड़ोसी, जो केशव बाबू की ईमानदारी और भलमनसाहत के कायल थे, आगे आए। पास के गुरुद्वारे के प्रधान जी और मोहल्ले के बनिए ने केशव बाबू के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “मास्टर जी, आप चिंता मत करो। गौरी सिर्फ़ आपकी नहीं, पूरे सुजानपुर की बेटी है।” देखते ही देखते मोहल्ले की औरतों ने अपने-अपने घरों के चूल्हे जला लिए। किसी के घर से पूरियाँ बनकर आने लगीं, किसी ने हलवा बनाया, तो बनिए ने अपनी दुकान से पनीर और राशन भिजवा दिया। केशव बाबू के कमाए हुए ‘असली धन’ यानी उनके व्यवहार ने उस रात वो कर दिखाया जो विक्रांत की करोड़ों की दौलत न कर सकी। बारात आई, और कस्बे के लोगों के प्यार व अपनेपन की बदौलत गौरी की शादी बड़ी ही धूमधाम और इज़्ज़त के साथ संपन्न हुई।

समय का चक्र अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा। सुजानपुर की उस रात को बीते हुए करीब ढाई साल गुज़र चुके थे।

उधर चंडीगढ़ में विक्रांत की महत्वाकांक्षाएं अब पागलपन की हद पार कर चुकी थीं। उसे अब करोड़ों नहीं, अरबों में खेलना था। इसी लालच में उसने शहर के बाहर एक बहुत बड़े ‘ग्रीन सिटी प्रोजेक्ट’ में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। उसने बैंकों से भारी कर्ज लिया, बाज़ार से ऊँचे ब्याज पर पैसे उठाए और अपने कोठी के कागज़ात तक गिरवी रख दिए। उसे यकीन था कि यह प्रोजेक्ट उसे पूरे राज्य का सबसे अमीर आदमी बना देगा।

लेकिन कुदरत का न्याय बड़ा ही अचूक और क्रूर होता है। जिस ज़मीन पर विक्रांत वह प्रोजेक्ट बना रहा था, वह सरकारी वन विभाग की विवादित ज़मीन निकली। विक्रांत के ही सबसे करीबी बिज़नेस पार्टनर और उसके सेक्रेटरी ने, जिन्हें वह अपना दाहिना हाथ समझता था, अंदरूनी तौर पर उसके खिलाफ़ साज़िश रची। उन्होंने फर्जी कागज़ातों का सारा ठीकरा विक्रांत के सिर फोड़ दिया और कंपनी के खातों से करोड़ों रुपये गबन करके विदेश फरार हो गए।

एक ही रात में पासा पलट गया। सुबह के अखबारों के पहले पन्ने पर विक्रांत मल्होत्रा के दिवालिया होने और धोखाधड़ी के मामले में फंसने की खबरें छपी थीं। निवेशकों ने उसके दफ़्तर में तोड़फोड़ कर दी। बैंकों ने उसकी सेक्टर-9 वाली आलीशान कोठी, उसकी महंगी गाड़ियाँ और यहाँ तक कि उसके घर का सामान भी सील कर दिया। कोर्ट-कचहरी के चक्कर और वकीलों की भारी-भरकम फीस चुकाते-चुकाते उसकी जेब में रखे आखिरी कुछ लाख रुपये भी पानी की तरह बह गए।

वह विक्रांत, जिसके एक इशारे पर शहर के बड़े-बड़े रईस हाज़िर हो जाते थे, आज जब उसने मदद के लिए अपने उन ‘खास दोस्तों’ को फोन लगाया, तो किसी का फोन स्विच ऑफ आया, तो किसी ने अपने नौकर से कहलवा दिया कि साहब घर पर नहीं हैं। जिस क्लब में वह हर शाम हज़ारों की शराब पिलाता था, उसी क्लब के गार्ड ने उसे धक्के मारकर गेट से बाहर निकाल दिया क्योंकि उसकी मेंबरशिप खत्म हो चुकी थी।

दौलत का नशा जब उतरा, तो हकीकत की ज़मीन बहुत सख्त और पथरीली निकली। विक्रांत चंडीगढ़ की एक गंदी सी धर्मशाला के एक छोटे से कमरे में आ गिरा। कर्जदारों के गुंडे उसे हर जगह ढूंढ रहे थे। अपमान, धोखे और सब कुछ लुट जाने के इस भयानक सदमे को उसका शरीर झेल नहीं पाया। एक सर्द रात को, उस सीलन भरे कमरे में उसे लकवे (पैरालिसिस) का एक जबरदस्त दौरा पड़ा। उसके शरीर का दाहिना हिस्सा पूरी तरह से सुन्न हो गया। उसकी आवाज़ लड़खड़ाने लगी। धर्मशाला के मैनेजर ने उसे बिना किराए के रखने से मना कर दिया और उसे लावारिस हालत में शहर के एक बड़े सरकारी अस्पताल के बाहर छोड़ आया।

सरकारी अस्पताल के जनरल वॉर्ड के एक कोने में, जहाँ फिनायल और दवाइयों की तीखी बदबू भरी रहती थी, विक्रांत मल्होत्रा एक लोहे के जंग लगे पलंग पर पड़ा था। उसके बदन पर वही कपड़े थे जो पिछले एक हफ्ते से बदले नहीं गए थे। उसकी बढ़ी हुई दाढ़ी, धँसी हुई आँखें और लार टपकाता हुआ मुँह देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि यह वही शख्स है जो कभी पचास हज़ार के जूते पहनकर धूल से नफरत करता था। नर्सें आतीं, फाइल देखतीं और उसे एक लावारिस मरीज़ समझकर कोई सस्ता सा इंजेक्शन लगाकर चली जातीं। विक्रांत का दिमाग काम कर रहा था, वह सब देख और समझ रहा था, लेकिन उसका शरीर एक ज़िंदा लाश बन चुका था।

अकेलेपन के उस घुप अंधेरे में उसे बार-बार सिर्फ़ एक ही दृश्य दिखाई देता था—सुजानपुर का वह आँगन, हाथ जोड़े रोती हुई शारदा, और केशव बाबू के वे शब्द— “जब वक्त का तमाचा पड़ता है न, तो यही सोने-चाँदी के महल ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं…” विक्रांत की आँखों से गर्म आँसू बहकर उसके मैले तकिए में जज़्ब हो जाते, पर आज उन आँसुओं को पोंछने वाला दुनिया में कोई नहीं था।

संयोग से, सुजानपुर के ही एक युवक की ड्यूटी उस सरकारी अस्पताल में वार्ड बॉय के रूप में लगी थी। एक दिन जब वह उस वॉर्ड की सफाई कर रहा था, तो उसकी नज़र कोने के बेड पर पड़े विक्रांत पर गई। चेहरे की हालत बिगड़ चुकी थी, फिर भी उस युवक ने विक्रांत को पहचान लिया। उसने तुरंत सुजानपुर में अपने पिता को फोन किया और यह खबर हवा की तरह फैलती हुई केशव बाबू के कानों तक जा पहुँची।

खबर सुनते ही केशव बाबू के हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर गया और चकनाचूर हो गया। शारदा जो पास ही बैठी सब्ज़ी काट रही थी, उसने जब सुना कि उसका भाई अस्पताल में लावारिसों की तरह मौत से जूझ रहा है, तो उसकी चीख निकल गई। ढाई साल पहले का वह भयानक अपमान, वे कड़वे शब्द—सब कुछ एक पल में भाप बनकर उड़ गया। याद रहा तो बस इतना कि वह उनका छोटा भाई है, उनके पिता की आखिरी निशानी है।

“शारदा, जल्दी से मेरा बैग तैयार कर और बैंक की पासबुक निकाल!” केशव बाबू ने काँपते हुए हाथों से अपनी चप्पल पहनते हुए कहा।

“मैं भी चलूँगी भइया! मैं अपने वीर को उस हाल में अकेला नहीं छोड़ सकती,” शारदा ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा।

उसी शाम की बस पकड़कर दोनों भाई-बहन चंडीगढ़ पहुँचे। जब वे सरकारी अस्पताल के उस जनरल वॉर्ड में दाखिल हुए और कोने वाले बेड के पास पहुँचे, तो वहाँ का मंज़र देखकर दोनों की रूह काँप गई। विक्रांत की कलाई, जिस पर कभी हीरे जड़ी घड़ी चमकती थी, आज सूखकर हड्डी का ढांचा मात्र रह गई थी और उस पर अस्पताल का एक सस्ता सा टैग बंधा था।

विक्रांत ने जब धुंधली आँखों से अपने सामने केशव बाबू और शारदा को खड़े देखा, तो उसे लगा जैसे वह कोई सपना देख रहा है। शर्म और ग्लानि के मारे उसने अपनी आँखें मींच लीं और अपना चेहरा दूसरी तरफ मोड़ने की नाकाम कोशिश करने लगा। वह उन लोगों का सामना नहीं करना चाहता था जिन्हें उसने अपनी अमीरी के नशे में कीड़े-मकोड़े समझा था।

लेकिन केशव बाबू ने आगे बढ़कर विक्रांत के उस बेजान, काँपते हुए हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और अपने माथे से लगा लिया। केशव बाबू की आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। “यह क्या हाल बना लिया तूने अपना मेरे बच्चे? अपने भाई को एक बार खबर तो कर दी होती… क्या हम इतने पराये हो गए थे?”

उधर शारदा ने अपने पल्लू से विक्रांत के चेहरे को पोंछा, उसके उलझे हुए बालों में उंगलियाँ फेरीं और उसके माथे को चूमकर रोने लगी। “वीर, तू चिंता मत कर, तेरी दीदी आ गई है। तुझे कुछ नहीं होगा।”

इस निस्वार्थ प्रेम के स्पर्श ने विक्रांत के भीतर जमे अहंकार के आखिरी पहाड़ को भी पिघला दिया। वह बोल नहीं पा रहा था, लेकिन उसके गले से एक अजीब सी घुटती हुई सिसकी निकली। उसने अपने बाएं हाथ से, जो थोड़ा काम कर रहा था, केशव बाबू के कुर्ते का कोना कसकर पकड़ लिया और एक छोटे बच्चे की तरह फफक-फफक कर रो पड़ा।

केशव बाबू ने एक पल भी गंवाए बिना अस्पताल के डॉक्टरों से बात की। डॉक्टर ने बताया कि अगर इसे तुरंत बेहतर फिजियोथेरेपी, महंगी दवाइयाँ और निरंतर देखभाल न मिली, तो यह ज़िंदगी भर कभी बिस्तर से उठ नहीं पाएगा। केशव बाबू ने सुजानपुर में अपनी वह थोड़ी सी पुश्तैनी ज़मीन, जो उन्होंने अपने बुढ़ापे के आखिरी दिनों के लिए बचाकर रखी थी, कौड़ियों के दाम बेच दी।

वे विक्रांत को डिस्चार्ज कराकर अपने साथ वापस सुजानपुर के उसी पुराने मकान में ले आए, जिसे विक्रांत ने कभी ‘कबाड़खाना’ कहा था।

अगले छह महीने उस पुराने मकान ने सेवा, त्याग और समर्पण की एक ऐसी मिसाल देखी जो आज के कलयुग में कम ही देखने को मिलती है। केशव बाबू रोज़ सुबह उठकर विक्रांत को अपने हाथों से नहलाते, उसकी दाढ़ी बनाते और डॉक्टर के बताए अनुसार घंटों उसके सुन्न पड़े हाथ-पैरों की कसरत करवाते। शारदा अपने भाई के लिए बिना तेल-मसाले का परहेज़ी खाना बनाती और एक माँ की तरह चम्मच से उसके मुँह में निवाला डालती। जब कभी रात को विक्रांत को दर्द से नींद नहीं आती, तो केशव बाबू जागकर उसके सिरहाने बैठते और उसे रामायण की चौपाइयाँ सुनाते।

गौरी और उसका पति भी हर हफ्ते आकर अपने मामा का हाल-चाल लेते और अपनी तरफ से दवाइयों का खर्च उठाने की ज़िद करते। विक्रांत अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा यह सब देखता और हर पल अपने अतीत पर शर्मिंदा होता। उसे समझ आ गया था कि चंडीगढ़ की उस संगमरमर की कोठी में वह दरअसल कितना गरीब और अकेला था, और आज इस कच्चे आँगन वाले मकान में, बिना एक पैसे के भी, वह दुनिया का सबसे अमीर इंसान है।

दवाइयों से ज़्यादा अपनों की दुआओं और निस्वार्थ सेवा ने असर दिखाया। धीरे-धीरे विक्रांत के शरीर में हरकत लौटने लगी। उसकी लड़खड़ाती ज़ुबान साफ होने लगी और वह सहारे के साथ उठकर बैठने लगा।

बैसाखी के पर्व का दिन था। आँगन में सुबह की गुनगुनी धूप खिली हुई थी। केशव बाबू आँगन में चारपाई पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे और शारदा तुलसी के चौरे पर दीपक जला रही थी। तभी कमरे के दरवाज़े से एक खट-खट की आवाज़ आई।

केशव बाबू और शारदा ने पलटकर देखा—विक्रांत एक लकड़ी की छड़ी के सहारे, धीरे-धीरे अपने पैरों पर चलकर आँगन की तरफ आ रहा था। आज छह महीने बाद वह बिना किसी के सहारे के खुद चलकर बाहर आया था।

केशव बाबू खुशी से उठ खड़े हुए, “अरे वाह छोटे! तू तो चलने लगा!”

विक्रांत धीरे-धीरे चलता हुआ केशव बाबू के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर आज वह पुराना रौब या घमंड नहीं था, बल्कि एक गहरा पश्चाताप और परम शांति थी। केशव बाबू के पास पहुँचते ही विक्रांत ने अपनी छड़ी छोड़ दी और घुटनों के बल बैठकर केशव बाबू के दोनों पैर पकड़ लिए। उसने अपना सिर अपने बड़े भाई के कदमों में रख दिया और उसके आँसुओं से केशव बाबू के पैर भीग गए।

“मुझे माफ कर दीजिए भइया… इस पापी को हो सके तो माफ कर दीजिए,” विक्रांत की आवाज़ भावनाओं के आवेग से काँप रही थी। “मैं अंधा हो गया था भइया। कागज़ के उन टुकड़ों की चमक ने मेरी आँखें छीन ली थीं। मैंने आपको, अपनी माँ जैसी बहन को क्या-क्या नहीं कहा… आपकी पगड़ी उछाली, शारदा के आँसुओं का मज़ाक उड़ाया। फिर भी, जब मुझे मेरे ही पाले हुए साँपों ने डस लिया और दुनिया ने मुझे कूड़े के ढेर पर फेंक दिया, तब आप दोनों ने मुझे अपने सीने से लगाया। भइया, मुझे मेरे कर्मों की सज़ा मिल गई, पर आपके इस प्यार के कर्ज को मैं सात जन्मों में भी नहीं उतार पाऊँगा।”

फिर उसने पीछे खड़ी शारदा की तरफ हाथ जोड़े, “दीदी, तेरे इस भाई ने तेरी बेटी के ब्याह में तुझे खाली हाथ लौटाया था, आज चाहे तो मुझे जूते मार ले दीदी, पर मुझे माफ कर दे।”

शारदा दौड़कर आई और उसने विक्रांत को ज़मीन से उठाकर अपने गले से लगा लिया। “चुप कर पगले! भाई-बहन में कहीं हिसाब-किताब होता है क्या? मेरा भाई मौत के मुँह से वापस आ गया, मेरे लिए इससे बड़ी दौलत और कुछ नहीं है।”

केशव बाबू ने विक्रांत के कंधे पर हाथ रखा और अपनी धोती के छोर से उसके आँसू पोंछते हुए बोले, “छोटे, पेड़ से जब पत्ते सूखकर गिरते हैं, तभी तो नई कोंपलें फूटती हैं। तेरी वो दौलत गई, तो उसके साथ तेरा वो अहंकार भी चला गया जिसने तुझे हमसे दूर कर दिया था। मेरे लिए तो आज का दिन ही असली दिवाली है, क्योंकि आज मुझे मेरा वो बचपन वाला विक्रांत वापस मिल गया है जो मेरी उंगली पकड़कर मेला देखने जाता था। बीती बातों को एक बुरा सपना समझकर भूल जा मेरे भाई।”

उस दिन सुजानपुर के उस आँगन में सिर्फ़ एक बीमार शरीर ही स्वस्थ नहीं हुआ था, बल्कि एक भटकी हुई आत्मा को अपना असली घर मिल गया था।

पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद विक्रांत ने वापस चंडीगढ़ की उस बनावटी दुनिया में न लौटने का फैसला किया। उसके पास अनुभव और व्यापार की समझ तो थी ही, बस पहले नीयत में खोट आ गया था। उसने सुजानपुर में ही रहकर स्थानीय किसानों और शारदा जैसी मेहनतकश महिलाओं को जोड़कर जैविक मसालों और हस्तशिल्प (हैंडीक्राफ्ट) का एक छोटा सा सहकारी व्यापार शुरू किया।

कुछ ही सालों में उनकी मेहनत रंग लाई। यह काम चल निकला, लेकिन इस बार विक्रांत मालिक बनकर नहीं, बल्कि एक सेवक और परिवार के मुखिया के तौर पर काम कर रहा था। अब जो भी मुनाफा होता, वह कस्बे के लोगों की भलाई और परिवार की खुशियों में लगता। विक्रांत ने समझ लिया था कि ज़िंदगी की असली कामयाबी ऊँची इमारतों में अकेले बैठने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ ज़मीन पर बैठकर सूखी रोटी बाँट कर खाने में है।

क्या आपने भी अपने आस-पास ऐसे लोग देखे हैं जिन्हें थोड़ा सा पैसा आते ही अपने गरीब रिश्तेदारों से शर्म आने लगती है? क्या वाकई बुरे वक्त में सिर्फ़ परिवार ही काम आता है? इस कहानी के बारे में अपनी राय और अपने जीवन के अनुभव हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें, हमें आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा!

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