शुरुआत में देवर और देवरानी ने भी इस पर सहज सहमति जताई थी, क्योंकि उनके पहले से ही एक बेटा था। लेकिन जब नौ महीने बाद देवरानी ने एक और स्वस्थ लड़के को जन्म दिया, तो ममता का आंचल बीच में आ गया। बच्चे का मासूम चेहरा देखकर माता-पिता का मन डोल गया। उन्होंने बच्चा देने से साफ इंकार कर दिया। हमारे समाज में आज भी पुत्र प्राप्ति को कुल का दीपक और भविष्य का सहारा माना जाता है,
मेरा नाम अनघा है और मेरी प्रिय सहेली का नाम नंदिनी था। हम दोनों न केवल कक्षा छह से बारहवीं तक एक ही कक्षा में साथ थीं, बल्कि हमारी दोस्ती ऐसी थी कि स्कूल के शिक्षक भी हमें एक ही नाम से पुकारा करते थे—अनघा-नंदिनी। लड़कियों की फितरत होती है कि वे स्कूल के दिनों में कई सहेलियाँ बनाती हैं, लेकिन दिल के सबसे करीब कोई एक ही पक्की सहेली होती है, जिसके बिना उनका दिन पूरा नहीं होता। हमारी भी कुछ ऐसी ही जोड़ी थी।
लेकिन वक्त का पहिया घूमा। कॉलेज की दहलीज पर पहुँचते ही मेरे पिता का तबादला एक पहाड़ी शहर से देश के दूसरे छोर पर स्थित एक बड़े व्यवसायिक केंद्र, अहमदाबाद, में हो गया। उस दौर में आज की तरह स्मार्टफ़ोन और सोशल मीडिया का नाम-ओ-निशान नहीं था। कुछ महीनों तक तो डाक के ज़रिए खतों का सिलसिला चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ाई की व्यस्तता और दूरियों के चलते संपर्क टूट गया। यह इंसानी फितरत है कि इंसान नई जगहों, नए लोगों और नए माहौल में ढल जाता है और पुरानी यादें किसी बंद संदूक में कैद होकर रह जाती हैं।
भला हो आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया का, कि पूरे बंतालीस साल बाद फेसबुक के एक गुमनाम कोने में हम दोनों ने एक-दूसरे को ढूँढ निकाला। स्क्रीन पर जब नंदिनी का नाम और उसकी वही जानी-पहचानी मुस्कان उभरी, तो लगा जैसे बीता हुआ पूरा वक्त एक पल में सिमट आया हो। इसके बाद संदेशों और फिर फोन पर लंबी-लंबी बातों का सिलसिला शुरू हो गया।
शुरुआती कुछ हफ़्तों तक हमारी बातें बेहद औपचारिक और पुरानी यादों तक सीमित थीं। इतने लंबे अंतराल में हमारे चेहरों पर झुर्रियाँ आ चुकी थीं, बाल सफेद हो चुके थे और जीवन के तौर-तरीके बदल चुके थे। लेकिन जैसे-जैसे संवाद गहरा हुआ, हमारे बीच का संकोच पिघल गया और हम फिर से वही स्कूली लड़कियाँ बन गईं जो टिफिन बाँटकर खाया करती थीं। बातचीत का दायरा बढ़ा तो सुख-दुःख के पन्ने भी खुलने लगे।
एक दिन फोन पर बात करते हुए नंदिनी ने अपनी जिंदगी का वह दर्द साझा किया जो उसने बरसों से अपने दिल में छुपा रखा था। विवाह को पंद्रह साल बीत जाने के बाद भी उसकी सूनी गोद नहीं भर पाई थी। बड़े-बड़े डॉक्टरों, वैद्यों और हकीमों के चक्कर काटे गए, अनगिनत मन्नतें माँगी गईं, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। सामाजिक दबाव और खुद के भीतर के सूनेपन ने उसे अंदर से तोड़ दिया था। परिवार और समाज में यह बात स्थापित सी है कि जीवन की गाड़ी को सुसंगत चलाने के लिए संतान का होना अनिवार्य माना जाता है, अन्यथा जीवन एक थकाऊ मरुस्थल सा प्रतीत होने लगता है।
आखिरकार, परिवार में लंबी बैठकों और वैचारिक मंथन के बाद यह निर्णय लिया गया कि अब और अधिक इलाज के चक्कर में न पड़कर किसी बच्चे को गोद ले लिया जाए।
नंदिनी का परिवार एक संयुक्त और पारंपरिक विचारों वाला परिवार था। इसलिए घर के बुजुर्गों की जिद थी कि यदि बच्चा लेना ही है, तो वह किसी अजनबी का नहीं, बल्कि परिवार के ही खून का होना चाहिए ताकि खानदान की मर्यादा बनी रहे। संयोगवश, उस समय नंदिनी के छोटे देवर के घर में किलकारियाँ गूँजने वाली थीं। आपसी सहमति यह बनी कि इस बार छोटी बहू के यहाँ जो भी संतान होगी, उसे बड़े भैया-भाभी यानी नंदिनी और उसके पति को सौंप दिया जाएगा।
शुरुआत में देवर और देवरानी ने भी इस पर सहज सहमति जताई थी, क्योंकि उनके पहले से ही एक बेटा था। लेकिन जब नौ महीने बाद देवरानी ने एक और स्वस्थ लड़के को जन्म दिया, तो ममता का आंचल बीच में आ गया। बच्चे का मासूम चेहरा देखकर माता-पिता का मन डोल गया। उन्होंने बच्चा देने से साफ इंकार कर दिया। हमारे समाज में आज भी पुत्र प्राप्ति को कुल का दीपक और भविष्य का सहारा माना जाता है, और उस दौर में तो इस मानसिकता की जड़ें और भी गहरी थीं। यदि वह बच्ची होती, शायद वे दे भी देते, लेकिन लड़का होने के कारण उनका मोह जाग गया।
नंदिनी और उसके पति ने उस परिवार के मनोविज्ञान को भाँप लिया और बिना किसी विवाद के खुद ही इस विषय पर बात करना हमेशा के लिए बंद कर दिया। नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।
उधर मेरी स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। मेरे ससुराल पक्ष के लोग पारंपरिक और रूढ़िवादी थे। वे इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि मैं अपने मायके की तरफ से या किसी बाहरी माध्यम से कोई कदम उठाऊँ, लेकिन मेरे पति ने मेरी मानसिक स्थिति को समझते हुए चुपचाप मेरा साथ दिया। हमने भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, लेकिन कारोबार में मंदी और आर्थिक उतार-चढ़ाव के कारण उस समय चारों तरफ से निराशा ही हाथ लगी। ऐसे कठिन समय में अपने भी मुँह फेर लेते हैं।
मैं धीरे-धीरे गहरे अवसाद और तनाव के काले कुएँ में धकेलती जा रही थी। मानसिक संताप ने मेरे शरीर को भी घेर लिया और एक के बाद एक कई बीमारियाँ मुझे जकड़ने लगीं। मेरा हँसता-खेलता घर एक खामोश कैदखाने में बदल गया था।
तभी, अंधकार के उस सघन समंदर में एक उम्मीद की छोटी सी लौ टिमटिमाई। मेरी एक बेहद करीबी परिचित का फोन आया। उसने कांपती हुई आवाज़ में बताया कि एक हसमुख और संस्कारी दंपत्ति की एक भयानक सड़क दुर्घटना में अचानक मृत्यु हो गई है। उनके पीछे उनके दो छोटे-छोटे मासूम बच्चे छूट गए हैं—बेटा चार साल का और बेटी मात्र डेढ़ साल की। उनके दोनों तरफ के दादा-दादी और नाना-नानी या तो इस दुनिया में नहीं हैं या इतने वृद्ध और असहाय हैं कि बच्चों की जिम्मेदारी उठाने में असमर्थ हैं। वे चाहते हैं कि कोई समझदार और निसंतान दंपत्ति दोनों भाई-बहन को एक साथ गोद ले ले, ताकि उनका बचपन बिखरे नहीं और वे एक ही छत के नीचे सुरक्षित रह सकें।
जब यह बात फोन पर मेरी परिचित ने मुझे बताई, तो ऐसा लगा जैसे किसी ने बुझते हुए दीये में घी डाल दिया हो। उन दिनों शारदीय नवरात्रि चल रहे थे और मैं लगातार माँ दुर्गा की आराधना में लीन थी। बिना एक पल गँवाए, मैंने अपने पति से सलाह ली और हम दोनों तुरंत उस परिचित के घर के लिए निकल पड़े।
वहाँ पहुँचकर हमने वीडियो कॉल के माध्यम से बच्चों के वृद्ध संरक्षकों से बात की। दिलों की भाषा ने कागजी दूरियों को पाट दिया। बच्चों को जब सामने देखा, तो उनकी मासूमियत ने हमारे दिल को पूरी तरह मोह लिया। बिना किसी संकोच या झिझक के हमने दोनों बच्चों को अपने गले लगाने का फैसला कर लिया।
सभी कानूनी और सामाजिक प्रक्रियाएं पूरी हुईं और एक दिन हमारे सूने और वीरान आँगन में दो सुंदर फूल एक साथ खिल गए। उन दोनों नन्हें परिंदों के आने से हमारे घर की फिज़ा ही बदल गई। मेरी बरसों पुरानी बीमारियाँ और अवसाद न जाने कहाँ हवा हो गए। मातृत्व के अहसास ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से पुनर्जीवित कर दिया।
वे दोनों बच्चे बड़े होकर बेहद होनहार और गुणी निकले। हमारी प्यारी सी बिटिया का विवाह पिछले ही साल एक बहुत ही प्रतिष्ठित और सुसंभल परिवार में हुआ है। उसका पति एक बहुत ही सौम्य, शिक्षित और बड़े व्यापार से जुड़ा युवक है, जो हमारी बेटी को पलकों पर बिठाकर रखता है। हमारा बेटा भी अपने पिता के स्थापित कारोबार को न केवल संभाल रहा है, बल्कि अपनी आधुनिक सोच, मेहनत और ईमानदारी से उसे नई ऊँचाइयों पर पहुँचा रहा है। अब हम उसके लिए एक ऐसी ही सुशिक्षित, संस्कारवान और शालीन जीवनसंगिनी की तलाश में हैं, जो हमारे परिवार को और आगे बढ़ा सके।
यही सब बातें साझा करते हुए आज मेरी वही बचपन की पक्की सहेली नंदिनी, अपने पति और अपने बेटे के साथ मेरे घर की देहली पर खड़ी थी। बंतालीस साल के लंबे अंतराल के बाद जब हमने एक-दूसरे को सामने आमने-सामने देखा, तो उम्र के सारे बंधन टूट गए। हम दोनों बच्चे की तरह गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़े—वह खुशी के आँसू थे।
मेरे घर में इस समय उत्सव का माहौल है। मेरे पति, बेटा-बहू और हमारे प्यारे पोते-पोती सब मिलकर नंदिनी और उसके परिवार की आवभगत में जुटे हैं। और सबसे खूबसूरत इत्तेफाक यह हुआ कि जब मैंने अपने परिवार की एक बहुत ही संस्कारी और योग्य रिश्तेदार युवती का प्रस्ताव नंदिनी के सामने रखा, तो उन्हें वह पहली ही नजर में भा गई। आज वे लोग उसी सिलसिले में विशेष तौर पर उस बेटी को देखने और आशीर्वाद देने हमारे घर आए हैं।
इस भरे-पूरे, हँसते-खेलते और खुशहाल परिवार को देखकर मेरे मन-मस्तिष्क में बस एक ही विचार बार-बार गूँज रहा है—ईश्वर की रचना और उसकी लीला वास्तव में अपरंपार है। कब अपने पराए हो जाते हैं और कब अजनबी लोग अपने खून के रिश्तों से भी बढ़कर अपनी जान से प्यारे बन जाते हैं, इसका अनुमान लगाना किसी के बस में नहीं होता। जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है।
हरि की माया, हरि ही जानें।
सौभाग्य के अनछुए मोड़
“जब अपनों ने ही मोड़ लिए मुँह, तब अजनबी हवाओं ने थाम लिया हमारा हाथ, और सूने आँगन में फिर से खिल उठी जिंदगी की बहार।”
क्या आपको भी लगता है कि जीवन के सबसे कठिन दौर में खून के रिश्तों से ज़्यादा वो मानवीय रिश्ते मायने रखते हैं जो बिना किसी शर्त के आपका हाथ थाम लेते हैं? इस कहानी में प्रेमा और नंदिनी के जीवन के संघर्ष और अंततः मिले सकारात्मक मोड़ के बारे में आपकी क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में अवश्य साझा करें।
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