इंसाफ़ की नई सुबह

 वंदना के गालों पर आंसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “हां मेधा… कैसे भूल सकती हूं? पूरी कॉलोनी जानती थी कि ईशान एक पवित्र आत्मा है, पर कचहरी के कागज़ों में तो वह एक अपराधी बन चुका था। गोविंद ताऊ जी ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी, अपनी पेंशन, यहां तक कि शांति ताई के गहने तक वकीलों की फीस में बेच दिए। पर आरोप इतने संगीन और गैर-जमानती धाराओं में लगाए गए थे कि उस मासूम बच्चे को महीनों तक जेल की अंधेरी कोठरी में सड़ना पड़ा। उसका मेडिकल कॉलेज से नाम काट दिया गया, अखबारों में उसका नाम छपा, और जिन दोस्तों के साथ वह बैठता था, उनके माता-पिता ने अपने बच्चों को ईशान से दूर रहने की हिदायत दे दी।”

 मेधा और वंदना का रिश्ता केवल दो सहेलियों का नहीं था, बल्कि वे दोनों बचपन से एक ही आंगन की दो डालियों की तरह साथ-साथ पली-बढ़ी थीं। मायके में दोनों के घरों की छतें आपस में मिलती थीं, जहां दोपहर को अचार के मर्तबान सुखाते हुए और शाम को छत की मुंडेर पर बैठकर भविष्य के सपने बुनते हुए उनका बचपन बीता था। तकदीर का सुखद संयोग ऐसा रहा कि विवाह के बाद दोनों की डोलियां भी एक ही शहर, देहरादून के दो अलग-अलग कोनों में उतरीं। भले ही अब छतें आपस में नहीं जुड़ती थीं, पर दिल के तार पहले से भी ज्यादा मज़बूत हो गए थे। मेधा के पति सौरभ और वंदना के पति राजीव के बीच भी बहुत जल्दी गहरी छनने लगी थी, इसलिए हर दूसरे-तीसरे हफ्ते दोनों परिवारों का मिलना-जुलना और साथ बैठकर ठहाके लगाना एक नियम सा बन गया था।

उस शाम वंदना अपनी रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थी कि अचानक मेज पर रखा उसका फोन बज उठा। स्क्रीन पर ‘मेधा’ का नाम चमक रहा था। वंदना ने आटे से सने हाथ तौलिए से पोंछे और चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान लिए फोन उठाया।

“अरे वाह! आज तो सूरज पश्चिम से निकला है क्या? इस वक्त कैसे याद आ गई मेरी?” वंदना ने अपनी चिर-परिचित चुलबुली आवाज़ में छेड़ा।

लेकिन दूसरी तरफ से मेधा की जो आवाज़ आई, उसमें न तो कोई खनक थी और न ही कोई उत्साह। एक गहरी, भारी और भीगी हुई सी आवाज़ में मेधा ने कहा, “वंदना… तू आज शाम को घर पर ही है न? मैं अभी तेरे पास आना चाहती हूं।”

मेधा के स्वर का वह असामान्य भारीपन वंदना के दिल को तुरंत छू गया। उसकी मुस्कान पल भर में गायब हो गई। उसने चूल्हे की आंच बंद करते हुए संजीदगी से कहा, “हां-हां मेधा, मैं और राजीव घर पर ही हैं। तुम दोनों अभी आ जाओ। वैसे भी राजीव तो सौरभ भाई साहब के नाम पर अपनी सारी थकान भूल जाते हैं। पर यह तो बता, तेरी आवाज़ इतनी डूबी-डूबी सी क्यों लग रही है? तबीयत तो ठीक है न? या सौरभ जी से किसी बात पर अनबन हो गई है? अरे पगली, मियां-बीवी में तो नोकझोंक चलती ही रहती है, दिल छोटा मत कर।”

“नहीं वंदना, सौरभ से कोई झगड़ा नहीं हुआ है,” मेधा ने एक लंबी सांस खींचते हुए कहा, “बात कुछ और ही है… फोन पर नहीं बता पाऊंगी। बस आधे घंटे में तेरे घर पहुंच रही हूं, वहीं बैठकर बात करेंगे।”

फोन कट गया, लेकिन वंदना को एक अजीब सी चिंता में छोड़ गया। उसने तुरंत बैठक के कमरे को व्यवस्थित किया और राजीव को आकर सारी बात बताई। ठीक पैंतीस मिनट बाद दरवाजे की घंटी बजी। वंदना ने दरवाजा खोला तो सामने मेधा अकेली खड़ी थी। उसकी आंखें सूजी हुई थीं, जैसे वह रास्ते भर रोते हुए आई हो, और उसके हाथ में एक मुड़ा-तुड़ा अखबार दबा हुआ था।

“अरे मेधा, सौरभ भाई साहब कहां हैं? वे अंदर नहीं आए?” राजीव ने सोफे से उठते हुए हैरानी से पूछा।

मेधा ने फीकी सी मुस्कान के साथ हाथ जोड़े और वंदना की तरफ देखते हुए बोली, “जीजाजी, सौरभ घर पर ही हैं। आज मेरा मन बस वंदना के साथ अकेले बैठकर अपने मन का बोझ हल्का करने का था, इसलिए मैं अकेली ही चली आई।”

वंदना ने अपनी सहेली के चेहरे के भाव पढ़ लिए। उसने आंखों ही आंखों में राजीव को इशारा किया। राजीव भी समझदार इंसान थे, उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ी की चाबी उठाई और बोले, “अच्छा हुआ मेधा तुम आ गईं, मुझे भी बाजार से कुछ जरूरी दवाइयां लानी थीं और सौरभ से भी एक फाइल के सिलसिले में मिलना था। मैं सीधा तुम्हारे घर ही चला जाता हूं, वहीं सौरभ के साथ चाय पियूंगा। तुम दोनों सहेलियां आराम से बैठकर बातें करो।”

राजीव के जाते ही वंदना ने मेधा का हाथ थामा और उसे सोफे पर बिठाते हुए पानी का गिलास आगे बढ़ाया, “अब बता मेधा, ऐसी क्या बात हो गई जिसने तुझे इतना तोड़ कर रख दिया है? मेरे हाथ-पांव ठंडे हो रहे हैं तुझे ऐसे देखकर।”

मेधा ने पानी का एक घूंट पिया और अपने पर्स के पास रखा वह मुड़ा हुआ अखबार खोलकर वंदना की गोद में रख दिया। अखबार के तीसरे पन्ने पर लाल पेन से एक खबर के चारों ओर घेरा बनाया गया था।

“वंदना, आज सुबह की भागदौड़ में तूने शायद यह खबर नहीं पढ़ी होगी,” मेधा ने भर्राई आवाज़ में कहा, “इसे पढ़… कोर्ट का एक बहुत बड़ा फैसला आया है। एक महिला ने अपने पति के पूरे परिवार को झुकाने के लिए ससुराल वालों पर दहेज प्रताड़ना और अपने शांत, सीधे-सादे देवर पर छेड़छाड़ व शोषण का संगीन झूठा मुकदमा दर्ज करवाया था। सालों की जांच के बाद जब यह साबित हुआ कि सारे आरोप मनगढ़ंत और बदले की भावना से लगाए गए थे, तो माननीय न्यायालय ने अब उस महिला को ही कड़ी फटकार लगाते हुए जेल की सजा और भारी जुर्माने का दंड सुनाया है।”

वंदना ने वह खबर पढ़ी और जैसे ही उसने कागज़ से नज़रें उठाईं, उसकी आंखों में भी ठीक वही दर्द और अतीत की परछाइयां तैरने लगीं, जो मेधा की आंखों में थीं। दोनों सहेलियों के बीच कुछ पलों के लिए एक गहरा सन्नाटा पसर गया। उस एक खबर ने उनके अतीत के उस ज़ख्म को फिर से हरा कर दिया था, जिस पर वक्त की धूल तो जम गई थी, पर टीस आज भी बाकी थी।

दोनों का मन उड़कर आज से छह साल पीछे अपने मायके की उसी पुरानी कॉलोनी में पहुंच गया, जहां उनके घर के ठीक सामने रिटायर्ड पोस्टमास्टर गोविंद प्रसाद जी का हरा-भरा, खुशहाल परिवार रहता था। गोविंद जी और उनकी पत्नी शांति ताई पूरे मोहल्ले के लिए आदर्श थे। घर में दो बेटे थे—बड़ा बेटा प्रतीक, जो किसी प्राइवेट कंपनी में ऊंचे पद पर था, और छोटा बेटा ईशान।

ईशान का नाम याद आते ही वंदना के गले में जैसे कोई कांटा अटक गया। केवल अठारह-उन्नीस बरस का वह गोरा, छरहरा और बेहद होनहार लड़का, जिसकी आंखों में बड़े-बड़े सपने तैरते थे। अभी तो उसने बारहवीं में पूरे जिले में अव्वल आकर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था। सफेद कोट पहनकर डॉक्टर बनने का उसका सपना पूरे मोहल्ले का गौरव था। वह इतना मृदुभाषी और संस्कारी था कि मेधा और वंदना को हमेशा ‘दीदी-दीदी’ कहकर उनके हर छोटे-बड़े काम में दौड़ पड़ता था। कभी किसी बुजुर्ग को अस्पताल ले जाना हो या बच्चों को गणित के सवाल समझाने हों, ईशान हर वक्त मुस्कुराते हुए हाजिर रहता था।

लेकिन उस हंसते-खेलते आंगन को जैसे किसी की काली नज़र लग गई। बड़े बेटे प्रतीक का विवाह बड़े अरमानों के साथ एक संपन्न परिवार की लड़की अनामिका से हुआ। अनामिका पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों की थी, जिसका स्वागत गोविंद जी के परिवार ने पलकों पर बिठाकर किया था। लेकिन शादी के कुछ ही हफ्तों बाद यह स्पष्ट हो गया कि अनामिका को संयुक्त परिवार का साथ रहना और सास-ससुर की उपस्थिति किसी बंधन जैसी लगती थी। वह चाहती थी कि प्रतीक अपने माता-पिता और छोटे भाई की जिम्मेदारी छोड़कर उसके साथ अलग फ्लैट में रहे और पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा तुरंत मांग ले।

जब स्वाभिमानी प्रतीक ने अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़ने से इनकार कर दिया, तो अनामिका का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने एक दिन घर में भयंकर क्लेश मचाया और धमकी देते हुए मायके चली गई कि वह इस पूरे खानदान को सड़क पर लाकर छोड़ेगी। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक पढ़ी-लिखी लड़की अपने गुस्से और स्वार्थ में इतनी नीचे गिर सकती है।

महज चार दिन बाद गोविंद प्रसाद जी के दरवाजे पर पुलिस की जीप आकर रुकी। अनामिका ने केवल पति और सास-ससुर पर दहेज का झूठा केस ही नहीं ठोका था, बल्कि परिवार की कमर पूरी तरह तोड़ने के लिए उसने उन्नीस साल के मासूम ईशान पर अपनी आबरू पर हाथ डालने और गंभीर दुर्व्यवहार करने का घिनौना आरोप लगा दिया था।

“याद है वंदना वह काला दिन?” मेधा ने अपनी सिसकी रोकते हुए कहा, “जब पुलिस ईशान को हथकड़ी लगाकर खींच रही थी, तो वह बच्चा कैसे कांप रहा था। उसके हाथ से उसकी डॉक्टरी की किताबें छूटकर आंगन की धूल में गिर गई थीं। शांति ताई पुलिस वालों के पैरों में गिरकर अपनी पल्लू फैलाकर भीख मांग रही थीं कि उनके निर्दोष बच्चे को छोड़ दें, वह तो अपनी भाभी की तरफ कभी आंख उठाकर भी नहीं देखता था। पर कानून की धाराएं इतनी सख्त थीं कि किसी ने उन बूढ़े मां-बाप की एक न सुनी।”

वंदना के गालों पर आंसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “हां मेधा… कैसे भूल सकती हूं? पूरी कॉलोनी जानती थी कि ईशान एक पवित्र आत्मा है, पर कचहरी के कागज़ों में तो वह एक अपराधी बन चुका था। गोविंद ताऊ जी ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी, अपनी पेंशन, यहां तक कि शांति ताई के गहने तक वकीलों की फीस में बेच दिए। पर आरोप इतने संगीन और गैर-जमानती धाराओं में लगाए गए थे कि उस मासूम बच्चे को महीनों तक जेल की अंधेरी कोठरी में सड़ना पड़ा। उसका मेडिकल कॉलेज से नाम काट दिया गया, अखबारों में उसका नाम छपा, और जिन दोस्तों के साथ वह बैठता था, उनके माता-पिता ने अपने बच्चों को ईशान से दूर रहने की हिदायत दे दी।”

करीब डेढ़ साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, जब अनामिका के बयानों में विरोधाभास पाया गया और पड़ोसियों की गवाही व सबूतों से यह साबित हुआ कि जिस दिन की घटना बताई गई थी, उस दिन ईशान अपने कॉलेज के कैंपस में परीक्षा दे रहा था—तब जाकर कोर्ट ने ईशान और उसके परिवार को बाइज्जत बरी किया।

पर क्या वह ‘बाइज्जत बरी’ होना ईशान का छीना हुआ मान-सम्मान और उसका टूटा हुआ मन वापस लौटा सका?

जब ईशान जेल से छूटकर घर आया, तो वह पहले वाला चहकता हुआ ईशान नहीं था। वह एक जिंदा लाश की तरह घर लौटा था। उसकी आंखों की चमक बुझ चुकी थी। वह कमरे के एक अंधेरे कोने में घंटों चुपचाप बैठा दीवार को घूरता रहता। अगर बाहर से किसी के हंसने की भी आवाज आती, तो उसे लगता कि लोग उसी पर हंस रहे हैं, उसे ही चरित्रहीन कह रहे हैं। समाज की संदिग्ध नजरों और उस झूठे कलंक के डंक ने उसकी कोमल आत्मा को इतना छलनी कर दिया था कि वह भीषण मानसिक अवसाद में चला गया। और फिर एक मनहूस सुबह, जब शांति ताई उसे जगाने उसके कमरे में गईं, तो उन्हें बिस्तर पर ईशान अचेत मिला। तेज मानसिक आघात और घुटन के कारण इतनी कम उम्र में ही उसका दिल बैठ गया था, और डॉक्टरों की लाख कोशिशों के बाद भी उसने अस्पताल के बिस्तर पर हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।

एक झूठे आरोप ने एक होनहार डॉक्टर की जान ले ली थी, और सजा के नाम पर उस वक्त अनामिका का कुछ भी नहीं बिगड़ा था—वह बस दूसरा समझौता करके अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई थी। ईशान के जाने के बाद गोविंद ताऊ जी और शांति ताई रातों-रात वह शहर छोड़कर कहीं चले गए थे, क्योंकि उस घर की हर ईंट से उन्हें अपने छोटे बेटे की सिसकियां सुनाई देती थीं।

“मेधा, आज इस अखबार की खबर को पढ़कर कलेजे को थोड़ी ठंडक तो मिली कि चलो, अब कम से कम न्यायालय इस जहर को पहचानने लगा है, पर साथ ही यह कसक भी उठ रही है कि काश! ऐसा सख्त फैसला उस वक्त भी हुआ होता,” वंदना ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “सच बात तो यह है मेधा कि जैसे किसी स्त्री के साथ हुआ कोई भी अपराध उसकी आत्मा को रौंद डालता है और उसके अपराधी को कठोरतम दंड मिलना ही चाहिए, ठीक उसी तरह किसी निर्दोष पुरुष या किशोर के चरित्र पर लगाया गया झूठा कलंक भी उसकी आत्मा की हत्या कर देता है। स्त्री की सुरक्षा के लिए बने कानून हमारी ढाल हैं, पर जब कोई इन्हें अपने अहंकार और बदला लेने के लिए तलवार की तरह इस्तेमाल करता है, तो वह न केवल एक निर्दोष परिवार को तबाह करता है, बल्कि उन लाखों असली पीड़िताओं के दर्द का भी मजाक उड़ाता है जिन्हें सच में न्याय की जरूरत है।”

तभी दरवाजे की घंटी बजी। वंदना ने उठकर दरवाजा खोला तो राजीव और सौरभ दोनों साथ खड़े थे। अंदर आकर जब दोनों ने अपनी पत्नियों की लाल आंखें और मेज पर पड़ा वह अखबार देखा, तो माहौल की गंभीरता को समझने में उन्हें देर नहीं लगी।

राजीव ने मेधा के सिर पर बड़े भाई की तरह हाथ रखा और शांत स्वर में बोले, “मेधा, रास्ते में मुझे भी आज एक ऐसी बात पता चली है, जिसे सुनकर तुम्हारा और वंदना का यह दर्द शायद किसी सार्थक उम्मीद में बदल जाएगा।”

मेधा और वंदना दोनों ने चौंककर राजीव की तरफ देखा।

सौरभ ने सोफे पर बैठते हुए बात आगे बढ़ाई, “हां मेधा, जब राजीव मेरे पास आए और बताया कि तुम यह अखबार लेकर इतनी दुखी होकर यहां आई हो, तो हमने अपने पुराने शहर के एक परिचित वकील साहब को फोन लगाया, जो गोविंद ताऊ जी का केस देखते थे। हम जानना चाहते थे कि ताऊ जी और ताई जी अब कहां हैं और किस हाल में हैं।”

“कहां हैं वे जीजाजी? क्या पता चला उनका?” वंदना ने उत्सुकता और घबराहट के साथ पूछा।

राजीव के चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि और आदर का भाव उभर आया। उन्होंने कहा, “गोविंद ताऊ जी और शांति ताई अब हरिद्वार के पास एक शांत कस्बे में रहते हैं। और सुनो… वे टूटे नहीं हैं। ईशान के जाने के बाद उन्होंने अपने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया। उन्होंने अपनी बची हुई जमीन और मकान बेचकर ईशान के नाम पर ‘ईशान न्याय एवं परामर्श ट्रस्ट’ की स्थापना की है।”

मेधा और वंदना की आंखें आश्चर्य और श्रद्धा से फैल गईं।

सौरभ ने बताया, “वकील साहब बता रहे थे कि आज गोविंद ताऊ जी की संस्था में कई संवेदनशील वकील और मनोवैज्ञानिक निःशुल्क काम करते हैं। वे उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को कानूनी मदद देते हैं जिन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर ब्लैकमेल किया जाता है। और शांति ताई खुद उन युवाओं की काउंसलिंग करती हैं जो झूठे आरोपों के कारण समाज के डर से अवसाद में चले जाते हैं और आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सोचते हैं। वे हर लड़के में अपने ईशान को देखती हैं और उन्हें हिम्मत देती हैं कि झूठ के आगे मरना नहीं है, बल्कि सच के लिए डटकर लड़ना है। यहां तक कि आज अखबार में तुमने जिस केस का फैसला पढ़ा है, उस पीड़ित परिवार को कानूनी राह दिखाने और अंत तक लड़ने का हौसला देने के पीछे भी ताऊ जी की इसी संस्था का हाथ था!”

यह सुनते ही मेधा और वंदना के रोंगटे खड़े हो गए। जो आंसू अब तक बेबसी और दुख के कारण बह रहे थे, वे अचानक गर्व और प्रेरणा के मोतियों में बदल गए। उन दोनों बूढ़े माता-पिता ने अपने जवान बेटे की राख से बैठकर मातम मनाने के बजाय, समाज में न्याय और सत्य की एक ऐसी मशाल जला दी थी जो अब किसी दूसरे ईशान को अंधेरे में खोने नहीं दे रही थी।

“यह तो ईश्वर का चमत्कार है!” मेधा ने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “ईशान आज जहां भी होगा, अपने माता-पिता को देखकर मुस्कुरा रहा होगा। उसने अपनी जान गंवाकर भी कितनों की जान बचा ली।”

वंदना ने तुरंत मेज से अपना फोन उठाया और मेधा का हाथ थामकर बोली, “मेधा, अब हम भी सिर्फ कमरे में बैठकर आंसू नहीं बहाएंगी। इस रविवार हम चारों हरिद्वार चलेंगे, ताऊ जी और ताई जी के चरण छूएंगे और उनकी इस मुहिम में तन-मन-धन से जुड़ेंगे। हम सोशल मीडिया और अपने समाज के हर मंच पर इस बात की आवाज उठाएंगे कि कानून की नजर में ‘समान अपराध के लिए समान सजा’ का नियम सख्ती से लागू हो। जो कोई भी पवित्र कानूनों का दुरुपयोग करके किसी निर्दोष की जिंदगी से खेले, उसे भी उतनी ही कड़ी सजा मिले जितनी एक असली गुनहगार को मिलती है।”

चारों ने मिलकर चाय बनाई और देर रात तक इस बात की रूपरेखा बनाते रहे कि कैसे वे अपने शहर देहरादून में भी ताऊ जी के ट्रस्ट की एक शाखा शुरू करने में मदद करेंगे। जब मेधा रात को सौरभ के साथ अपने घर लौटने के लिए उठी, तो उसके कदमों में अब बोझिलता नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था। बाहर बारिश थम चुकी थी और बादलों की ओट से निकला पूरा चांद देहरादून की वादियों को अपनी दूधिया रोशनी से नहला रहा था—बिल्कुल वैसे ही, जैसे झूठ के घने कोहरे को चीरकर सच का उजाला आखिरकार अपनी राह बना ही लेता है।

क्या आप भी इस बात से सहमत हैं कि कानून का दुरुपयोग करके किसी निर्दोष पर झूठा इल्ज़ाम लगाने वालों को भी उतनी ही सख्त सजा मिलनी चाहिए जितनी असली अपराधी को मिलती है? इस गंभीर सामाजिक विषय पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें!

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