“मुझे माफ कर दो भैया,” कुणाल की आवाज में इतनी पीड़ा थी कि पत्थर का दिल भी पसीज जाए। “पैसे की चमक ने मेरी आंखों पर ऐसी पट्टी बांध दी थी कि मुझे आपके त्याग का अंधेरा दिखाई ही नहीं दिया। मैंने जिस दौलत के लिए अपने भगवान जैसे भाई का दिल तोड़ा, मां की ममता को ठुकराया, आज उसी दौलत ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। भैया, मैं हार गया… मैं बहुत बुरी तरह टूट गया हूं।”
आंगन में खड़ी शारदा देवी और मीरा की आंखों से भी आंसू बह निकले। सिद्धार्थ की आंखों से गर्म आंसू टपककर कुणाल के झुकें हुए सिर पर गिर रहे थे। सिद्धार्थ ने तुरंत नीचे झुककर कुणाल को कंधों से पकड़कर उठाया और अपने सीने से कसकर लगा लिया।
पंडित हरिशंकर वशिष्ठ और उ शारदा देवी के दो बेटे थे—बड़ा बेटा सिद्धार्थ और छोटा बेटा कुणाल। दोनों भाइयों में जमीन-आसमान का अंतर होते हुए भी एक अजीब सा चुंबकीय खिंचाव था। सिद्धार्थ स्वभाव से शांत, धैर्यवान और पिता की तरह अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ इंसान था, जबकि कुणाल तेज-तर्रार, महत्वाकांक्षी और आसमान को मुट्ठी में कैद कर लेने का ख्वाब देखने वाला युवक था।
बचपन में जब कुणाल को तेज बुखार आता, तो सिद्धार्थ रात-रात भर जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखता था। स्कूल के दिनों में अपने हिस्से की जेबखर्च बचाकर कुणाल के लिए महंगी किताबें और क्रिकेट का बल्ला खरीदना सिद्धार्थ की आदत बन चुकी थी। पिता हरिशंकर जी की छोटी सी हस्तशिल्प और लकड़ी के खिलौने बनाने की कार्यशाला थी। जब सिद्धार्थ ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की, तो कुणाल की इंजीनियरिंग और फिर एमबीए की महंगी फीस भरने के लिए उसने अपनी आगे की पढ़ाई छोड़ दी और पिता के साथ उसी कार्यशाला में लकड़ी का बुरादा झाड़ने लगा।
कुणाल जब पुणे से एमबीए करके लौटा, तो उसकी आंखों में उदयपुर की सादगी के लिए सम्मान नहीं, बल्कि एक अजीब सी घुटन थी। उसे अपने पुश्तैनी घर की दीवारें छोटी और पिता का काम पिछड़ा हुआ लगने लगा। इसी बीच सिद्धार्थ की शादी मीरा से हुई, जो स्वभाव से बिल्कुल शारदा देवी की परछाई थी। उसने आते ही घर की जिम्मेदारियों को ऐसे संभाला जैसे वह जन्म से इसी आंगन का हिस्सा हो।
कुछ ही समय बाद, कुणाल का विवाह शहर के एक बड़े कारोबारी की बेटी नंदिनी से तय हो गया। नंदिनी अपने साथ आधुनिक सोच के साथ-साथ अमीरी का दंभ भी लेकर आई थी। उसे वशिष्ठ सदन का संयुक्त परिवार, रसोई में सबका एक साथ बैठकर खाना और हर छोटे-बड़े फैसले में बड़े भैया-भाभी की राय लेना किसी कैद से कम नहीं लगता था। वह अक्सर रात के सन्नाटे में कुणाल के कान भरती, “कुणाल, तुम्हारे पास इतना टैलेंट है, फिर भी तुम इस पुरानी हवेली और भैया की छत्रछाया में क्यों दबे हुए हो? आज का जमाना प्रैक्टिकल होने का है। भैया तो बस इमोशनल कार्ड खेलकर तुम्हारी तरक्की के रास्ते में रोड़ा बन रहे हैं।”
शुरुआत में कुणाल नंदिनी की बातों को टाल देता, लेकिन पानी की बूंदें भी अगर लगातार पत्थर पर गिरें, तो निशान छोड़ ही देती हैं। धीरे-धीरे कुणाल को सिद्धार्थ की सादगी में गंवारपन और पिता के आदर्शों में गरीबी नजर आने लगी।
इसी बीच हरिशंकर जी का स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया और दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हो गया। पिता के जाने के बाद सिद्धार्थ ने टूटे हुए परिवार को समेटने की हर संभव कोशिश की, लेकिन कुणाल के भीतर महत्वाकांक्षा का ज्वालामुखी फूटने को तैयार था। उसे देहरादून के एक बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में पार्टनरशिप का ऑफर मिला था, जिसके लिए उसे एक करोड़ रुपये की तत्काल आवश्यकता थी।
एक शाम, जब पूरा परिवार आंगन में बैठा था, कुणाल ने बिना किसी भूमिका के अपनी बात रखी, “भैया, मुझे देहरादून शिफ्ट होना है। वहां एक बहुत बड़ी कंपनी में मुझे पार्टनर बनने का मौका मिल रहा है। इसके लिए मुझे अपने हिस्से की प्रॉपर्टी का पैसा चाहिए। अगर हम पिताजी की कार्यशाला और इस घर का आधा हिस्सा बेच दें, तो मेरी जिंदगी बन जाएगी।”
सन्नाटा इतना गहरा था कि आंगन में लगे नीम के पेड़ से गिरते पत्तों की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। मां शारदा देवी के हाथ से चाय का प्याला छूटते-छूटते बचा। सिद्धार्थ ने अपने छोटे भाई की आंखों में देखा, जहां कभी उसके लिए असीम आदर हुआ करता था, आज वहां केवल आंकड़ों का हिसाब-किताब तैर रहा था।
सिद्धार्थ ने शांत स्वर में कहा, “कुणाल, यह घर और कार्यशाला सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं हैं, पिताजी की पूरी उम्र की कमाई और उनकी पहचान हैं। रही बात पैसों की, तो हम बैंक से लोन ले सकते हैं, मैं अपनी जमा-पूंजी तुम्हें दे देता हूं, पर बंटवारे की बात मत कर मेरे भाई।”
कुणाल के चेहरे पर एक तल्ख मुस्कान आ गई। “भैया, आपकी वह दो-चार लाख की जमा-पूंजी मेरे किसी काम की नहीं है। आप चाहते ही नहीं हैं कि मैं इस कस्बे से बाहर निकलकर बड़ा आदमी बनूं। आपने हमेशा बड़े भाई होने का एहसान जताकर मुझे अपने नीचे दबाकर रखना चाहा है। मुझे भीख नहीं, अपना कानूनी हक चाहिए।”
कुणाल के शब्दों ने सिद्धार्थ के सीने को छलनी कर दिया। जिस भाई की पढ़ाई के लिए उसने अपने सपनों की आहुति दे दी, आज वही उसे स्वार्थी कह रहा था। शारदा देवी रोते हुए कुणाल को समझाने आगे बढ़ीं, लेकिन सिद्धार्थ ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया।
अगले ही हफ्ते, सिद्धार्थ ने बिना किसी विवाद के पुश्तैनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा और अपनी पत्नी मीरा के सारे गहने गिरवी रखकर कुणाल के हाथों में एक करोड़ का चेक थमा दिया। यहां तक कि उसने कुणाल से कागजों पर यह भी लिखवा कर नहीं लिया कि उसने अपना हिस्सा ले लिया है। सिद्धार्थ ने बस इतना कहा, “जा कुणाल, अपनी उड़ान भर। बस इतना याद रखना कि जब भी पंख थक जाएं, इस आंगन के दरवाजे तेरे लिए हमेशा खुले मिलेंगे।”
कुणाल ने बिना पीछे मुड़े वह चेक लिया और नंदिनी के साथ देहरादून चला गया। शुरुआती कुछ महीनों में तो तीज-त्योहार पर एकाध फोन आ जाया करता था, लेकिन जैसे-जैसे कुणाल के पास दौलत और शोहरत बढ़ने लगी, उदयपुर के उस पुराने घर का नंबर उसके फोन की कॉल लिस्ट से नीचे खिसकता चला गया।
उधर देहरादून में कुणाल ने दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की की। आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियां, हाई-प्रोफाइल पार्टियां और बड़े-बड़े रसूखदार दोस्त—कुणाल को लगने लगा था कि पैसे से दुनिया की हर खुशी खरीदी जा सकती है। जब दो साल बाद शारदा देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं, तो सिद्धार्थ ने कुणाल को फोन किया। कुणाल ने मीटिंग में व्यस्त होने का बहाना बनाकर पचास हजार रुपये सिद्धार्थ के खाते में ट्रांसफर कर दिए और कहा, “भैया, अभी मेरा आना नामुमकिन है, आप अच्छे से अच्छे अस्पताल में मां का इलाज करवाइए, पैसों की चिंता मत कीजिएगा।”
सिद्धार्थ ने वे पचास हजार रुपये उसी पल वापस कुणाल के खाते में भेज दिए और जवाब में सिर्फ एक मैसेज लिखा— “मां को तेरे नोटों की गड्डी नहीं, तेरे सिर पर हाथ फेरने की तलब थी। खैर, तू खुश रह।”
इधर सिद्धार्थ और मीरा ने कड़ी मेहनत से पिताजी की छोटी सी कार्यशाला को फिर से खड़ा किया। मीरा ने स्थानीय महिलाओं को जोड़कर राजस्थानी हस्तशिल्प को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ा। उनके घर में करोड़ों की दौलत तो नहीं थी, लेकिन सुकून, सम्मान और शारदा देवी के आशीर्वाद की कोई कमी नहीं थी।
वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और देखते ही देखते पांच साल बीत गए। देहरादून की चकाचौंध में डूबे कुणाल को पता ही नहीं चला कि कब उसके चारों तरफ बुना गया खुशियों का जाल एक छलावा मात्र था। उसके बिजनेस पार्टनर विक्रम ने, जिस पर कुणाल आंख मूंदकर भरोसा करता था, एक बड़े सरकारी प्रोजेक्ट के नाम पर फर्जी कागजात तैयार करवाए और सारा दोष कुणाल के सिर मढ़कर विदेश फरार हो गया।
रातों-रात कुणाल की कंपनी दिवालिया घोषित हो गई। बैंक ने उसका बंगला और गाड़ियां नीलाम कर दीं। जिन दोस्तों के साथ वह हर शाम जाम छलकाता था, उन्होंने उसके फोन उठाने बंद कर दिए। लेकिन सबसे बड़ा आघात तो तब लगा, जब इस मुसीबत की घड़ी में नंदिनी ने भी उसका साथ छोड़ दिया। नंदिनी ने साफ कह दिया, “कुणाल, मैंने तुम्हारी कामयाबी और रुतबे से शादी की थी, तुम्हारे कर्ज और मुकदमों का बोझ ढोने के लिए मैं अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकती।” वह अपने पिता के घर वापस लौट गई और तलाक के कागजात भिजवा दिए।
कुणाल सड़क पर आ चुका था। कर्जदारों का दबाव और धोखाधड़ी के इल्जाम से बचने के लिए उसे अपनी बची-खुची हर चीज बेचनी पड़ी। जब सारे केस निपटे, तो उसकी जेब में महज कुछ सौ रुपये और दिल में पश्ताताप का अथाह समंदर बचा था। बुखार से तपते शरीर और टूटे हुए स्वाभिमान के साथ, जब वह देहरादून के रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठा था, तब उसे पहली बार समझ आया कि जिसे वह अपनी काबिलियत की चमक समझ रहा था, वह तो उसके बड़े भाई के त्याग की राख पर खड़ी की गई एक खोखली इमारत थी।
अचानक उसके कदम खुद-ब-खुद उदयपुर जाने वाली ट्रेन की ओर बढ़ चले। पूरे रास्ते उसके दिमाग में अतीत के दृश्य घूमते रहे—भैया का अपनी पढ़ाई छोड़ना, भाभी का मुस्कुराते हुए अपने कंगन उतारकर देना, और मां की वह सूनी आंखें जो दरवाजे पर उसकी राह ताकती रही होंगी।
शाम के धुंधलके में जब कुणाल वशिष्ठ सदन की दहलीज पर पहुंचा, तो उसके कदम कांप रहे थे। घर के अंदर से आरती की घंटियों की आवाज आ रही थी। उसने कांपते हाथों से लोहे का गेट खोला। आंगन में सिद्धार्थ तुलसी के चौरे के पास दिया जला रहा था। आहट पाकर जैसे ही सिद्धार्थ ने पीछे मुड़कर देखा, उसके हाथ से पीतल की थाली छूटकर गिर पड़ी।
सामने कुणाल खड़ा था—बढ़ी हुई दाढ़ी, धंसी हुई आंखें, मैले-कुचैले कपड़े और झुके हुए कंधे। सिद्धार्थ की आंखों में न कोई सवाल था, न कोई शिकायत। वह दौड़कर कुणाल के पास पहुंचा, लेकिन इससे पहले कि सिद्धार्थ उसे छू पाता, कुणाल घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़ा और सिद्धार्थ के दोनों पैर पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा।
“मुझे माफ कर दो भैया,” कुणाल की आवाज में इतनी पीड़ा थी कि पत्थर का दिल भी पसीज जाए। “पैसे की चमक ने मेरी आंखों पर ऐसी पट्टी बांध दी थी कि मुझे आपके त्याग का अंधेरा दिखाई ही नहीं दिया। मैंने जिस दौलत के लिए अपने भगवान जैसे भाई का दिल तोड़ा, मां की ममता को ठुकराया, आज उसी दौलत ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। भैया, मैं हार गया… मैं बहुत बुरी तरह टूट गया हूं।”
आंगन में खड़ी शारदा देवी और मीरा की आंखों से भी आंसू बह निकले। सिद्धार्थ की आंखों से गर्म आंसू टपककर कुणाल के झुकें हुए सिर पर गिर रहे थे। सिद्धार्थ ने तुरंत नीचे झुककर कुणाल को कंधों से पकड़कर उठाया और अपने सीने से कसकर लगा लिया।
सिद्धार्थ का गला रुंध गया था, फिर भी उसने अपने भाई की पीठ सहलाते हुए कहा, “पागल है क्या? भाई के पैरों में नहीं, भाई के गले लगते हैं। जो बीत गया, उसे एक बुरा सपना समझकर भूल जा कुणाल। पैसा तो हाथ का मैल है मेरे भाई, आज है तो कल नहीं, पर तू तो मेरे कलेजे का टुकड़ा है। तुझे क्या लगा था, तू हारकर लौटेगा तो तेरा भाई तुझे अकेला छोड़ देगा? जब तक तेरे इस बड़े भाई की सांस चल रही है, तुझे दुनिया की कोई ताकत हरा नहीं सकती।”
शारदा देवी ने आगे बढ़कर अपने छोटे बेटे का माथा चूमा और मीरा दौड़कर रसोई से पानी का गिलास ले आई। उस रात पांच साल बाद वशिष्ठ सदन की रसोई में फिर से चारों प्राणी एक साथ जमीन पर बैठकर खाना खा रहे थे। कुणाल का हर निवाला उसके आंसुओं से भीग रहा था, लेकिन आज उन आंसुओं में पछतावे के साथ-साथ अपने परिवार को वापस पा लेने का असीम सुकून भी था।
अगले दिन से कुणाल ने अपने अतीत के अहंकार को वहीं दफना दिया और सिद्धार्थ के साथ पिताजी की उसी लकड़ी की कार्यशाला में काम संभाल लिया। इस बार कुणाल के पास एमबीए का ज्ञान तो था ही, साथ में ठोकर खाकर सीखा हुआ विनम्रता का पाठ भी था। दोनों भाइयों की जोड़ी ने मिलकर अपने पारंपरिक व्यवसाय को एक नई ऊंचाई दी। कुछ ही वर्षों में ‘वशिष्ठ हैंडीक्राफ्ट्स’ का नाम पूरे राजस्थान में गूंजने लगा, लेकिन इस बार कमाई का एक भी रुपया तिजोरी में अलग-अलग नहीं रखा गया, बल्कि सब कुछ मां शारदा देवी के चरणों में अर्पित होता रहा। कुणाल को समझ आ चुका था कि असली अमीरी बैंक के खातों में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में होती है जो आपके सबसे बुरे वक्त में भी आपका हाथ थामे खड़े रहते हैं।
आज के दौर में जहां चंद कागज के टुकड़ों और जमीन के हिस्सों के लिए भाई-भाई का दुश्मन बन जाता है, क्या आपको लगता है कि सिद्धार्थ जैसा बड़ा भाई हर किसी के नसीब में होता है? अगर आप सिद्धार्थ की जगह होते, तो क्या अपने छोटे भाई को इतनी आसानी से माफ कर पाते? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें!
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