बड़प्पन की सीख

वंदना जी ने तुरंत झुककर अपनी बहू को उठाया और अपने गले से लगा लिया। उन्होंने शिखा के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली, अगर मुझे निखिल या तुम्हारे पापा से कहकर घर में तमाशा खड़ा करना होता, तो मैं रात को ही कर देती। तुम इस घर की लक्ष्मी हो शिखा, तुम्हारा अपमान इस पूरे घर का अपमान है। गलतियां हर इंसान से होती हैं, मुझसे भी तुम्हारी उम्र में कई गलतियां हुई थीं। लेकिन बड़प्पन गलती को छुपाने या दूसरों पर मढ़ने में नहीं, बल्कि उसे सुधारने में है। मुन्नी गरीब है, पर उसका भी स्वाभिमान है। चलो, आज हम दोनों मिलकर उसके घर चलते हैं और उसे ससम्मान वापस लाते हैं।”

 घड़ी की सुइयां रात के ग्यारह बजा रही थीं। घर के सभी सदस्य अपने-अपने कमरों में सो चुके थे, लेकिन वंदना जी की आंखों से नींद कोसों दूर थी। आज उन्होंने रात का भोजन भी नहीं किया था। सिर में तेज दर्द और थकान का बहाना बनाकर वे जल्दी ही अपने शयनकक्ष में आ गई थीं और कमरे की बत्ती बुझाकर बिस्तर पर लेट गई थीं।

अंधेरे कमरे में छत के पंखे की एकसमान आवाज के बीच वंदना जी बार-बार करवटें बदल रही थीं। उनके पति राजेंद्र जी, जो पास ही लेटे थे, अपनी पत्नी की इस बेचैनी को भांप गए। उन्होंने वंदना जी के माथे पर हाथ रखते हुए स्नेह से पूछा, “क्या बात है वंदना? अगर सिर में ज्यादा दर्द है तो डॉक्टर के पास चलें? या मैं बाम लगा दूं?”

वंदना जी ने एक गहरी सांस को अपने भीतर ही दबाते हुए धीरे से कहा, “नहीं जी, ऐसी कोई बात नहीं है। बस आज काम की वजह से थोड़ी थकान ज्यादा हो गई है, सो जाऊंगी तो सुबह तक ठीक हो जाएगा। आप सो जाइए।”

राजेंद्र जी तो कुछ देर बाद निश्चिंत होकर सो गए, लेकिन वंदना जी के मन-मस्तिष्क में विचारों का एक भयंकर तूफान चल रहा था। बंद आंखों के पर्दे पर आज शाम से लेकर पिछले एक सप्ताह तक के सारे दृश्य किसी चलचित्र की भांति एक-एक करके घूम रहे थे।

आज शाम जब घर का सारा काम निपटाकर वंदना जी कॉलोनी के पार्क में अपनी रोजाना की सैर के लिए निकलीं, तो उनका मन थोड़ा उचाट था। पिछले आठ दिनों से उनके घर की पुरानी और भरोसेमंद सहायिका मुन्नी बिना कुछ बताए अचानक काम पर आना बंद कर चुकी थी। पार्क के कोने वाली बेंच पर उन्हें उनकी पुरानी परिचित और पड़ोसन मिसेज मल्होत्रा बैठी मिल गईं। दोनों ही महिलाएं शांत और सुलझे हुए स्वभाव की थीं, इसलिए दोनों में खूब जमती थी।

सैर के बाद जब दोनों बेंच पर बैठीं, तो स्वाभाविक रूप से गृहस्थी की बातें शुरू हो गईं। और जब दो गृहिणियां आपस में बैठें, तो कामवालियों की चर्चा न हो, यह तो संभव ही नहीं। वंदना जी ने अपने पैरों को थोड़ा आराम देते हुए कहा, “मिसेज मल्होत्रा, अगर आपकी नजर में कोई अच्छी और ईमानदार कामवाली हो तो जरा बताइएगा। क्या बताऊं, पिछले एक हफ्ते से तो कमर ही टूट गई है। हमारी मुन्नी को तो आप जानती ही हैं, मैंने उसे हमेशा अपनी बेटी की तरह रखा। तीज-त्योहार पर नए कपड़े, बच्चों की पुरानी किताबें, खाने-पीने का सामान—कभी किसी चीज की कमी नहीं रखी। पर देखिए न, बिना एक शब्द कहे अचानक काम छोड़कर बैठ गई। फोन करो तो उठाती ही नहीं है। सच कहा है किसी ने, इन लोगों को कितना भी अपना बना लो, पर कहीं दो-चार सौ रुपये ज्यादा मिलते हैं तो तुरंत आंखें फेर लेते हैं। जरा भी नहीं सोचते कि उनके ऐसे अचानक छोड़ देने से घर की मालकिन पर क्या बीतती है।”

वंदना जी की बात सुनकर मिसेज मल्होत्रा के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता आ गई। उन्होंने कुछ पल सोचने के बाद वंदना जी के हाथ पर अपना हाथ रखा और बोलीं, “वंदना बहन, आप मुन्नी को गलत समझ रही हैं। असल में परसों दोपहर को मुन्नी की मां फूलमती मेरे घर आई थी। वह हाथ जोड़कर विनती कर रही थी कि मैं मुन्नी को अपने घर काम पर रख लूं या किसी और की कोठी में काम दिलवा दूं।”

वंदना जी ने चौंककर पूछा, “आपके पास आई थी? पर उसने हमारे यहां काम क्यों छोड़ा? क्या मैंने कभी उसे कुछ कहा?”

मिसेज मल्होत्रा ने झिझकते हुए कहा, “बहन, अब बात निकली है तो आपसे क्या छुपाना। मैंने भी फूलमती को यही डांट लगाई थी कि मिसेज वर्मा (वंदना जी) जैसी नेक और नरम दिल मालकिन पूरे मोहल्ले में नहीं मिलेगी, फिर तेरी बेटी ने वहां काम क्यों छोड़ा? तब फूलमती की आंखों में आंसू आ गए। उसने जो बताया, वह सुनकर मुझे भी बहुत दुख हुआ।”

वंदना जी की धड़कनें तेज हो गईं, “ऐसा क्या बताया उसने?”

मिसेज मल्होत्रा ने विस्तार से बताना शुरू किया, “फूलमती कह रही थी कि बड़ी मालकिन यानी आप तो साक्षात देवी हैं, जो मुन्नी का अपनी औलाद की तरह ख्याल रखती थीं। लेकिन आपकी बहू शिखा का व्यवहार मुन्नी के प्रति शुरू से ही बहुत रूखा था। वह बात-बात पर मुन्नी को ताने मारती और झिड़कती रहती थी। फूलमती अपनी बेटी को समझा-बुझाकर काम पर भेजती रही कि बड़े घरों में थोड़ा-बहुत सुनना ही पड़ता है। लेकिन पिछले हफ्ते तो हद ही हो गई।”

“हुआ यह था कि उस दिन सुबह शिखा के सोने के कंगन ड्रेसिंग टेबल से गायब थे। शिखा ने बिना सोचे-समझे सीधे मुन्नी को अपने कमरे में बुलाया और उस पर चोरी का इल्जाम लगा दिया। मुन्नी कसम खाती रही कि उसने कंगन नहीं देखे, लेकिन आपकी बहू ने गुस्से में आकर उस अठारह साल की लड़की के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया और पुलिस में देने की धमकी दी। मुन्नी अपमान और डर से फूट-फूटकर रोने लगी। तभी शिखा का चार साल का बेटा गोलू अपने खिलौनों के डिब्बे से वे सोने के कंगन निकालकर ले आया, जो उसने खेल-खेल में वहां छुपा दिए थे।”

मिसेज मल्होत्रा ने एक लंबी सांस ली और आगे कहा, “कंगन मिलते ही शिखा का गुस्सा तो शांत हो गया, लेकिन अपनी गलती पर माफी मांगने के बजाय उसने उल्टा मुन्नी को ही डराया कि अगर उसने इस थप्पड़ और कंगन वाली बात का जिक्र बड़ी मम्मी जी यानी आपसे किया, तो वह उस पर कोई बड़ा इल्जाम लगाकर जेल भिजवा देगी। उस दिन मुन्नी सदमे और अपमान की वजह से इतनी रोई कि उसे तेज बुखार चढ़ गया। जब आपने बाहर आकर उसका लाल चेहरा और बुखार देखा, तो आपने अनजाने में ही सही, पर ममता दिखाते हुए उसे दवाई दी और ऑटो के पैसे देकर घर भेज दिया। मुन्नी ने घर जाकर अपनी मां को सब बताया। फूलमती कह रही थी कि बीबीजी, हम गरीब जरूर हैं, पेट पालने के लिए जूठे बर्तन मांजते हैं, पर हमारी भी इज्जत है। बिना कसूर के चोरी का दाग और गाल पर तमाचा खाकर मैं अपनी जवान बेटी को उस घर में दोबारा कैसे भेज दूं?”

पार्क की बेंच पर बैठी वंदना जी के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके मुंह पर कालिख पोत दी हो। जिस घर की वे मुखिया थीं, उसी घर की चारदीवारी के भीतर एक गरीब, बेकसूर लड़की के साथ इतना बड़ा अन्याय हो गया और उन्हें कानों-कान खबर तक नहीं हुई! शर्म और ग्लानि के मारे वे मिसेज मल्होत्रा से नजरें भी नहीं मिला पा रही थीं। किसी तरह ‘घर में काम है’ का बहाना बनाकर वे भारी कदमों से वापस लौट आई थीं।

अंधेरे कमरे में लेटी वंदना जी के सीने में यह पहला दृश्य कांटे की तरह चुभ रहा था, तभी उनकी आंखों के सामने दो दिन पहले का दूसरा दृश्य तैरने लगा, जिसने उनके घाव पर नमक छिड़कने का काम किया था।

दो दिन पहले जब घर में मेहमान आने वाले थे और रसोई में काम का बोझ बढ़ गया था, तब बहू शिखा ने अपने पति निखिल के सामने ही बड़बड़ाते हुए कहा था, “निखिल, मैं तो इस घर के काम से पक चुकी हूं। पता नहीं मम्मी जी का क्या स्वभाव है, कोई भी कामवाली इस घर में टिकती ही नहीं है! जब देखो, मम्मी जी अपने ही कामों की रट लगाए रहती हैं—अरी मुन्नी, जरा मेरे घुटनों में तेल मल दे, जरा मेरी पीठ दबा दे, जरा मुझे तुलसी वाली चाय बना दे! अब चौबीस घंटे कोई नौकरानी को अपने आगे-पीछे नचाएगा, तो वह भाग ही जाएगी न! भुगतना मुझे पड़ रहा है।”

उस दिन शिखा के मुंह से यह सफेद झूठ सुनकर वंदना जी सन्न रह गई थीं। वंदना जी तो खुद इतनी स्वाभिमानी और कर्मठ महिला थीं कि अपना सारा काम स्वयं करती थीं, यहां तक कि अपने कपड़े भी खुद ही धोती थीं। उन्होंने तो कभी मुन्नी से एक गिलास पानी तक नहीं मंगवाया था, तेल मालिश करवाना तो बहुत दूर की बात थी! और सबसे ज्यादा दुख तो उन्हें तब हुआ, जब उनका बेटा निखिल भी अपनी पत्नी की इस बात पर मौन रहकर वंदना जी की तरफ ऐसे देख रहा था, जैसे वाकई मुन्नी के काम छोड़ने की जिम्मेदार वही हों। तब तो वंदना जी ने यह सोचकर चुप्पी साध ली थी कि शिखा काम के बोझ से चिड़चिड़ी हो रही है, पर आज पार्क में सच जानने के बाद उनका रोम-रोम क्रोध और पीड़ा से सुलग रहा था।

बिस्तर पर लेटी वंदना जी के भीतर एक भयंकर अंतर्मंथन चल रहा था। उनके मन का एक हिस्सा चीख-चीखकर कह रहा था— ‘वंदना, चुप मत बैठ! अभी सुबह होते ही निखिल और राजेंद्र जी के सामने शिखा का पर्दाफाश कर दे। उसे बता कि कैसे उसने अपनी गलती छुपाने के लिए एक गरीब लड़की पर हाथ उठाया और फिर बेशर्मी से सारा दोष अपनी सास के सिर मढ़ दिया। अगर आज तूने इसे सबक नहीं सिखाया, तो कल यह तेरे सिर पर बैठकर तांडव करेगी!’

क्रोध के मारे वंदना जी की मुट्ठियां भिंच गईं। लेकिन तभी उनके संस्कारों और वर्षों के अनुभव ने उनके मन के दूसरे हिस्से को जागृत किया।

‘ठहर जा वंदना,’ उनकी अंतरात्मा ने शांत स्वर में कहा। ‘अगर कल सुबह तूने सबके सामने शिखा की पोल खोल दी, तो क्या होगा? निखिल अपनी पत्नी पर चिल्लाएगा, राजेंद्र जी नाराज होंगे, शिखा अपमानित महसूस करके या तो बदतमीजी पर उतर आएगी या फिर रो-धोकर मायके चली जाएगी। घर का जो माहौल तूने पिछले तीस सालों में अपने त्याग और धैर्य से स्वर्ग जैसा बनाकर रखा है, वह पल भर में नर्क बन जाएगा। शिखा अभी उम्र में छोटी है, उसमें परिपक्वता और ठहराव की कमी है। उससे एक बड़ी भूल हुई है, और फिर उस भूल के डर से उसने झूठ का सहारा लिया। लेकिन क्या एक मां और सास होने के नाते मेरा यह फर्ज नहीं है कि मैं घर को तोड़ने के बजाय अपनी भटकी हुई बहू को सही रास्ता दिखाऊं, वो भी बिना उसकी इज्जत उछाले?’

वंदना जी को अपने इष्ट देव भगवान शिव का स्मरण हो आया। समुद्र मंथन से जब विष निकला था, तो महादेव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उसे अपने कंठ में धारण कर लिया था—न उसे बाहर उगला कि संसार भस्म हो जाए, और न ही भीतर उतारा कि स्वयं को नुकसान हो। परिवार की मुखिया होने के नाते एक सास को भी तो कभी-कभी नीलकंठ बनना पड़ता है।

पर क्या इसका मतलब यह था कि उस गरीब मुन्नी के साथ हुए अन्याय को भुला दिया जाए? नहीं! वंदना जी ने अंधेरे में ही एक दृढ़ संकल्प लिया। उनके चेहरे पर अब बेचैनी के बजाय एक अद्भुत शांति और समाधान की मुस्कान थी।

अगली सुबह जब राजेंद्र जी की आंख खुली, तो उन्होंने देखा कि वंदना जी नहा-धोकर पूजा कर चुकी हैं और उनके चेहरे पर रोज जैसी ही सौम्यता और ताजगी है। राजेंद्र जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे वाह, आज तो लगता है सिरदर्द बिल्कुल गायब हो गया है। लाओ, आज सुबह की चाय मैं अपने हाथों से बनाकर अपनी धर्मपत्नी को पिलाता हूं।” वंदना जी ने मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिलाया।

दोपहर को जब राजेंद्र जी और निखिल अपने-अपने दफ्तर चले गए और गोलू स्कूल के बाद सो गया, तो वंदना जी ने शिखा को आवाज लगाई, “शिखा बेटा, जरा दस मिनट के लिए तैयार हो जाओ, मुझे तुम्हारे साथ पास की बस्ती तक चलना है।”

शिखा ने हैरानी से पूछा, “मम्मी जी, इतनी धूप में बस्ती में किसलिए?”

वंदना जी ने शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा, “मुन्नी के घर चलना है। मैंने फल और मिठाई का डिब्बा रख लिया है।”

मुन्नी का नाम सुनते ही शिखा के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। उसने हकलाते हुए कहा, “म… मम्मी जी, वहां जाने की क्या जरूरत है? उसने खुद काम छोड़ा है, हम दूसरी बाई ढूंढ लेंगे।”

वंदना जी ने शिखा के करीब जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा और उसकी आंखों में झांकते हुए बहुत ही शांत स्वर में बोलीं, “शिखा बेटा, कल शाम मुझे पार्क में मिसेज मल्होत्रा मिली थीं, और उन्होंने मुझे कंगन और उस थप्पड़ वाली सारी बात बता दी है।”

यह सुनते ही शिखा के पैरों से जैसे जान ही निकल गई। उसका सिर शर्म से झुक गया और आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगे। उसे लगा कि अब सास उसे जीने नहीं देंगी और निखिल को सब बता देंगी। उसने रोते हुए वंदना जी के पैर पकड़ लिए, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए! उस दिन गुस्से में मेरी मति मारी गई थी, और फिर निखिल और आपके डर से मैंने आप पर झूठा इल्जाम लगा दिया। प्लीज, निखिल से मत कहिएगा…”

वंदना जी ने तुरंत झुककर अपनी बहू को उठाया और अपने गले से लगा लिया। उन्होंने शिखा के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली, अगर मुझे निखिल या तुम्हारे पापा से कहकर घर में तमाशा खड़ा करना होता, तो मैं रात को ही कर देती। तुम इस घर की लक्ष्मी हो शिखा, तुम्हारा अपमान इस पूरे घर का अपमान है। गलतियां हर इंसान से होती हैं, मुझसे भी तुम्हारी उम्र में कई गलतियां हुई थीं। लेकिन बड़प्पन गलती को छुपाने या दूसरों पर मढ़ने में नहीं, बल्कि उसे सुधारने में है। मुन्नी गरीब है, पर उसका भी स्वाभिमान है। चलो, आज हम दोनों मिलकर उसके घर चलते हैं और उसे ससम्मान वापस लाते हैं।”

अपनी सास की इस असीम उदारता, सहनशीलता और बड़प्पन को देखकर शिखा निशब्द हो गई। आज उसे अपने किए पर जितनी शर्मिंदगी हो रही थी, उससे कहीं ज्यादा अपनी सास पर गर्व और श्रद्धा उमड़ रही थी।

दोनों सास-बहू जब मुन्नी के छोटे से कच्चे घर पर पहुंचीं, तो मालकिनों को अपने दरवाजे पर देखकर फूलमती और मुन्नी घबरा गईं। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कह पातीं, शिखा ने आगे बढ़कर मुन्नी के दोनों हाथ पकड़ लिए और भरी आंखों से कहा, “मुन्नी, मुझे अपनी बड़ी बहन समझकर माफ कर दे। उस दिन मेरी ही गलती थी जो मैंने बिना सोचे-समझे तुझ पर शक किया और हाथ उठाया। यह ले, तेरे लिए मिठाई और नया सूट लाई हूं। चल, अब घर चल, गोलू और हम सब तुझे बहुत याद कर रहे हैं।”

वंदना जी ने भी फूलमती से कहा, “बहन, बच्चों से नादानी हो गई थी, पर मैं तुम्हें वचन देती हूं कि आज के बाद मुन्नी को उस घर में कभी कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।”

इतने बड़े घर की बहू को अपनी झोपड़ी में आकर इस तरह माफी मांगते देख फूलमती और मुन्नी की आंखें भी छलक आईं। सारा मैल आंसुओं के साथ बह गया। अगले दिन से मुन्नी फिर से काम पर आने लगी, लेकिन अब उस घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। शिखा न केवल मुन्नी के साथ बेहद प्यार से पेश आती, बल्कि अपनी सास वंदना जी की सेवा और सम्मान में तो जैसे उसने अपनी जान ही न्योछावर कर दी थी। वंदना जी के एक सही फैसले और अंतर्मंथन ने न केवल एक गरीब लड़की का सम्मान लौटाया था, बल्कि अपने परिवार की नींव को हमेशा के लिए अटूट बना दिया था।

दोस्तों, वंदना जी ने अपनी बहू की गलती को सबके सामने उजागर कर घर में क्लेश करने के बजाय, अकेले में उसे समझाकर और गरीब नौकरानी से माफी मंगवाकर जो रास्ता चुना, क्या वह सही था? आज के समय में घरों में काम करने वाले सहायकों (हाउस हेल्प) के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!

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 लेखिका : रमा शुक्ला

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