“अम्मा जी, जरा अपनी आँखें तो खोलिए… देखिए आज हमारे आंगन में कौन आया है,” मृदुला ने अपनी सासू माँ सावित्री देवी के कमरे का पर्दा हटाते हुए बेहद चहकते हुए स्वर में कहा।
सावित्री देवी, जो अपनी आरामकुर्सी पर बैठी माला जप रही थीं, उन्होंने अपनी झुर्रियों भरी आँखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा चढ़ाया और दरवाजे की ओर देखा। “कौन है बहू? इस वक्त भला कौन आ सकता है?” उन्होंने अपनी छड़ी का सहारा लेकर उठने की कोशिश करते हुए पूछा।
“आप खुद ही पहचानिए तो सही,” मृदुला ने मुस्कुराते हुए अपने पीछे खड़े एक लंबे, छरहरे और सलीके से कोट-पैंट पहने युवक को आगे करते हुए कहा।
इससे पहले कि सावित्री देवी अपने दिमाग पर जोर डाल पातीं, वह युवक तेजी से आगे बढ़ा और घुटनों के बल बैठकर उसने सावित्री देवी के दोनों पैर पकड़ लिए। “प्रणाम दादी माँ! कैसी हैं आप?” युवक की आवाज में एक गहरापन और आदर था।
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ फेरा और गौर से उसका चेहरा देखने लगीं। “अरे… यह तो… अरे तू केशव है क्या? वही अपना किशनू?”
“जी दादी माँ, मैं आपका वही किशनू हूँ, केशव!” युवक ने उठकर मुस्कुराते हुए कहा, उसकी आँखों के कोरों में खुशी की नमी साफ झलक रही थी।
“अरे मेरे बच्चे! कितना बड़ा हो गया है तू! पूरे पांच साल बाद शक्ल दिखाई है तूने। इधर आ, मेरे पास बैठ। कैसी चल रही है तेरी डॉक्टरी की पढ़ाई?” सावित्री देवी ने उसे स्नेह से अपने तख्त के पास बिठाते हुए पूछा, उनके चेहरे की सारी थकान जैसे पल भर में गायब हो गई थी।
“दादी माँ, आपकी और भाभी माँ की दुआओं से मेरी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी हो गई है। और सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि शहर के बड़े सरकारी अस्पताल में मेरी नियुक्ति भी हो गई है। अगले महीने से मुझे कार्यभार संभालना है। बस, अपनी पहली तनख्वाह मिलने से पहले आपका और भाभी माँ का आशीर्वाद लेने चला आया,” केशव ने गर्व और कृतज्ञता के मिले-जुले भाव से कहा।
“भगवान तुझे खूब तरक्की दे मेरे लाल! सुना बहू, अपना किशनू अब डॉक्टर साहब बन गया है। जा, जल्दी से रसोई में जाकर इसके लिए बढ़िया सी अदरक वाली चाय बना ला और हाँ, डिब्बे में जो बेसन के लड्डू रखे हैं, वो भी ले आना। आज तो मेरे बच्चे का मुंह मीठा कराना बनता है,” सावित्री देवी की आवाज में आज जो मिठास और अपनत्व था, वह पूरे कमरे में गूंज रहा था।
“जी अम्मा जी, अभी लाई,” कहकर मृदुला रसोई की ओर बढ़ गई।
रसोई में पहुंचकर मृदुला ने गैस जलाई और पतीले में चाय का पानी चढ़ाया। पानी में उबाल आने लगा था, लेकिन मृदुला का मन तो जैसे भाप के साथ उड़कर आज से आठ साल पीछे के उस भयावह अतीत में चला गया था। चाय की पत्ती डालते हुए उसके हाथ अचानक ठिठक गए। उसे वह दिन याद आ गया, जिस दिन इसी सावित्री देवी के कठोर ताने उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतरते थे, और फिर घटी थी वह एक घटना, जिसने उनके घर और रिश्तों का पूरा भूगोल ही बदल कर रख दिया था।
वह अगस्त के महीने की एक शाम थी। बाहर बादलों ने डेरा डाल रखा था और मूसलाधार बारिश हो रही थी। मृदुला के पति विक्रम एक सरकारी बैंक में वरिष्ठ अधिकारी थे। नागपुर जैसे बड़े और सुविधासंपन्न शहर में बारह साल नौकरी करने के बाद, तीन महीने पहले ही उनका तबादला ‘चंदनगढ़’ नाम के एक छोटे से पहाड़ी कस्बे में हुआ था। विक्रम इस तबादले से बिल्कुल खुश नहीं थे। उन्हें अपने दोनों बच्चों—आर्यन और तन्वी—की पढ़ाई की बहुत चिंता थी।
विक्रम ने तो मृदुला से साफ कहा था, “मृदुला, तुम अम्मा और बच्चों को लेकर नागपुर में ही रहो। चंदनगढ़ बहुत छोटा कस्बा है, मैं वहां अकेले रह लूंगा और महीने में एक-दो बार आ जाया करूंगा।”
लेकिन मृदुला ने पति के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। वह जानती थी कि उसकी सास सावित्री देवी का स्वभाव बेहद उग्र, शक्की और चिड़चिड़ा है। ससुर जी के देहांत के बाद से वे और भी ज्यादा कठोर हो गई थीं। बात-बात पर टोका-टाकी करना, मृदुला के मायके वालों को कोसना और उसके काम में मीन-मेख निकालना उनकी आदत बन चुकी थी। मृदुला खुद एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिला थी; शादी से पहले और बाद में भी उसने एक प्रतिष्ठित संस्था में शिक्षिका के रूप में काम किया था। वह जानती थी कि अगर विक्रम साथ नहीं रहे, तो सावित्री देवी के साथ अकेले रहना उसके और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत कठिन हो जाएगा। इसलिए उसने जिद पकड़ ली कि परिवार साथ ही रहेगा। सौभाग्य से चंदनगढ़ में एक अच्छा कॉन्वेंट स्कूल मिल गया और बच्चों के दाखिले की समस्या हल हो गई।
चंदनगढ़ में उन्हें जो सरकारी आवास मिला था, वह मुख्य कस्बे की बस्ती से काफी हटकर, थोड़ा एकांत में था। घर बड़ा और हवादार था, आंगन में फलों के पेड़ थे, इसलिए विक्रम और मृदुला को पहली नजर में ही पसंद आ गया था। अभी उन्हें यहां आए मुश्किल से दो-ढाई महीने ही हुए थे। घर का सामान व्यवस्थित करने और बच्चों के नए स्कूल की भागदौड़ में मृदुला इतनी व्यस्त रही कि आस-पड़ोस में किसी से कोई जान-पहचान ही नहीं हो पाई थी।
उस शाम विक्रम बैंक के किसी ऑडिट के सिलसिले में पास के जिले में गए हुए थे और उन्हें दो दिन बाद लौटना था। बच्चे अपने कमरे में बैठकर होमवर्क कर रहे थे और मृदुला रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थी। बाहर बिजली कड़क रही थी और बारिश की तेज आवाज के अलावा चारों तरफ सन्नाटा था।
अचानक, घर के पिछले हिस्से में बने पूजा घर की तरफ से किसी भारी चीज के गिरने और साथ ही एक दिल दहला देने वाली चीख की आवाज आई।
“अरे राम रे… मर गई…” सावित्री देवी की दर्द भरी कराह सुनकर मृदुला के हाथ से आटे की परात छूटते-छूटते बची। उसने तुरंत हाथ पोंछे और तेजी से पूजा घर की ओर भागी।
वहां का मंजर देखकर मृदुला के पैरों तले जमीन खिसक गई। सावित्री देवी फर्श पर औंधे मुंह गिरी पड़ी थीं। दरअसल, पूजा के लिए तांबे का बड़ा कलश ऊपर के ताक से उतारते समय उनका पैर फिसल गया था। गिरते वक्त उनका सिर पास रखे लोहे के भारी संदूक के नुकीले कोने से जा टकराया था। संदूक की जंग लगी लोहे की पत्ती ने उनके माथे के बाएं हिस्से से लेकर भौं के पास तक एक गहरा घाव कर दिया था। वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा था और सफेद संगमरमर का फर्श तेजी से लाल हो रहा था।
“अम्मा जी! अम्मा जी, ये कैसे हो गया!” मृदुला चीखती हुई उनके पास घुटनों के बल बैठ गई। सावित्री देवी दर्द से बुरी तरह छटपटा रही थीं, उनके मुंह से सिर्फ अस्पष्ट कराह निकल रही थी।
मृदुला ने बिना एक पल गंवाए अपनी सूती साड़ी का पल्लू फाड़ा और सावित्री देवी के माथे पर कसकर बांध दिया, ताकि खून का बहना रुक सके। लेकिन घाव इतना गहरा था कि देखते ही देखते साड़ी का वह कपड़ा भी खून से तरबतर हो गया। उसने अपने दोनों हाथों से घाव को दबाए रखा, लेकिन खून उसकी उंगलियों के पोरों से रिसकर बाहर आ रहा था। सावित्री देवी का शरीर ठंडा पड़ने लगा था और उनकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो रही थीं।
मृदुला का दिल जोरों से धड़कने लगा। दोनों बच्चे भी डरे-सहमे वहां आ खड़े हुए थे और दादी की हालत देखकर रोने लगे थे। “आर्यन, बेटा रो मत, अंदर से तौलिया लेकर आओ,” मृदुला ने खुद को संभालते हुए कहा और फिर लपक कर बैठक में रखे लैंडलाइन टेलीफोन की तरफ भागी।
उस जमाने में मोबाइल फोन का चलन नहीं था। घरों में वही काले रंग के चोगे वाले टेलीफोन हुआ करते थे, जो थोड़ी सी हवा या बारिश चलते ही दम तोड़ देते थे। मृदुला ने कांपते हाथों से रिसीवर उठाया और कान से लगाया, लेकिन दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई। फोन पूरी तरह ‘डेड’ था। बाहर की तूफानी बारिश में टेलीफोन की लाइन कहीं टूट चुकी थी। अगर फोन चालू भी होता, तो ट्रंक कॉल बुक कराकर विक्रम से बात करने में घंटों लग जाते, और यहां तो एक-एक सेकंड कीमती था।
मृदुला ने अपने जीवन में कभी खुद को इतना असहाय, लाचार और बेबस महसूस नहीं किया था। वह एक ऐसी महिला थी जिसने बड़े शहर में रहकर हर मुश्किल का डटकर सामना किया था, लेकिन आज इस अनजान कस्बे के सुनसान कोने में, बाहर बरसती आफत और अंदर जिंदगी और मौत से जूझती सास के बीच वह बिल्कुल अकेली खड़ी थी। बस्ती यहां से कम से कम दो किलोमीटर दूर थी। इस मूसलाधार बारिश में वह छोटे बच्चों को और बेहोश होती सास को छोड़कर मदद मांगने पैदल कैसे जाती? और अगर नहीं जाती, तो ज्यादा खून बह जाने से अनर्थ हो सकता था।
वह रोते हुए भगवान को पुकार ही रही थी और बार-बार मुख्य दरवाजे की खिड़की से बाहर झांक रही थी कि शायद कोई राहगीर दिख जाए। तभी उसे अपने घर के बाहर के छज्जे के नीचे कोई परछाई दिखाई दी। उसने गौर से देखा—एक पंद्रह-सोलह साल का दुबला-पतला लड़का, जो बारिश से बचने के लिए उनके घर के बरामदे के कोने में दुबक कर खड़ा था। उसने फटी हुई पुरानी शर्ट और घुटनों तक मुड़ी हुई पैंट पहन रखी थी, और उसके हाथ में सब्जियों का एक खाली टोकरा था।
मृदुला ने आव देखा न ताव, तुरंत मुख्य दरवाजा खोला और बाहर भागी। “सुनो! ए लड़के, मेरी बात सुनो!”
वह लड़का अचानक दरवाजा खुलने और एक महिला के इस तरह घबराए हुए बाहर आने से डर गया। मृदुला के हाथों और कपड़ों पर लगा खून देखकर तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
“भाभी जी… क्या हुआ? ये खून कैसा है?” लड़के ने हकलाई हुई आवाज में पूछा।
“भाई, मेरी सासू माँ अंदर गिर गई हैं, उनके सिर में बहुत गहरी चोट लगी है। खून रुक नहीं रहा है और मेरे घर का फोन खराब है। मेरे पति घर पर नहीं हैं। भगवान के लिए मेरी मदद करो, वरना वे नहीं बचेंगी!” मृदुला लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोली, उसकी आँखों से आंसू और बारिश का पानी एक साथ बह रहे थे।
उस किशोर लड़के ने एक पल के लिए भी संकोच नहीं किया। उसने अपना टोकरा वहीं कोने में फेंका और सीधा घर के अंदर दौड़ा। पूजा घर के पास बेसुध पड़ी सावित्री देवी की हालत देखकर वह तुरंत स्थिति की गंभीरता समझ गया।
“भाभी जी, इन्हें तुरंत कस्बे के बड़े अस्पताल ले जाना होगा। यहां से अस्पताल तीन किलोमीटर दूर है और इस बारिश में कोई तांगा या रिक्शा इधर नहीं आएगा,” लड़के ने तेजी से कहा।
“तो फिर अब क्या होगा? हम इन्हें कैसे ले जाएंगे?” मृदुला का गला रुंध गया।
“आप घबराइए मत भाभी जी। पास की सड़क के मोड़ पर मेरा हाथ-ठेला खड़ा है, जिस पर मैं मंडी से सब्जी लाता हूँ। मैं अभी दौड़कर उसे लाता हूँ। आप तब तक कुछ मोटे कंबल और एक बड़ी पॉलिथीन या तिरपाल का इंतजाम कीजिए,” इतना कहकर वह लड़का तीर की तरह बारिश में बाहर निकल गया।
मृदुला को उस अंधेरे में जैसे उम्मीद की एक किरण दिखी। उसने तुरंत अलमारी से दो मोटे गद्दे, कंबल और सामान पैक करने वाली बड़ी प्लास्टिक की शीट निकाली। उसने तौलिए को कसकर सावित्री देवी के सिर पर बांधा।
मुश्किल से दस मिनट के भीतर वह लड़का हाँफता हुआ अपना लकड़ी का ठेला लेकर गेट के अंदर आ गया। वह ऊपर से नीचे तक भीग चुका था और ठंड से कांप रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा दृढ़ संकल्प था।
मृदुला और उस लड़के ने मिलकर पहले ठेले पर गद्दा बिछाया। फिर दोनों ने बड़ी मशक्कत से सावित्री देवी को सहारा देकर उठाया और ठेले पर लिटा दिया। मृदुला ने अपने दोनों बच्चों को अंदर से दरवाजा बंद करके घर में ही रहने की सख्त हिदायत दी। इसके बाद उन्होंने सावित्री देवी के ऊपर कंबल डाला और ऊपर से प्लास्टिक की बड़ी शीट से उन्हें अच्छी तरह ढक दिया ताकि बारिश का पानी उन पर न पड़े।
और फिर शुरू हुआ वह संघर्षपूर्ण सफर। बाहर सड़क पर घुटनों तक पानी भरा था, तेज हवाएं पेड़ों को झकझोर रही थीं। वह दुबला-पतला लड़का आगे से ठेले को पूरी ताकत लगाकर खींच रहा था, और मृदुला पीछे से ठेले को धक्का दे रही थी, साथ ही एक हाथ से प्लास्टिक की शीट को पकड़े हुए थी। रास्ते में कई जगह गड्ढे आए, कई बार ठेले का पहिया कीचड़ में फंसा, लड़के के पैरों में पत्थर चुभे और खून निकल आया, लेकिन वह रुका नहीं। मृदुला भी अपनी सारी ताकत झोंक कर उसका साथ दे रही थी। उस वक्त वह यह भूल चुकी थी कि इस ठेले पर वह औरत लेटी है, जिसने शादी के बाद से आज तक उसे कभी एक मीठा बोल नहीं बोला था। उसे सिर्फ इतना याद था कि यह उसके पति की माँ है और एक इंसान की जान बचाना उसका सबसे बड़ा धर्म है।
करीब पैंतालीस मिनट की जानलेवा मशक्कत के बाद वे दोनों सरकारी अस्पताल के आपातकालीन कक्ष के बाहर पहुंचे। लड़के ने दौड़कर अंदर से स्ट्रेचर और वार्ड बॉय को बुलाया। डॉक्टरों ने तुरंत सावित्री देवी को अंदर लिया और इलाज शुरू किया।
डॉक्टर ने बाहर आकर मृदुला से कहा, “देखिए, आप लोग बिल्कुल सही वक्त पर इन्हें ले आए। अगर आधा घंटा भी और देर हो जाती, तो अत्यधिक रक्तस्राव के कारण हम इन्हें बचा नहीं पाते। इनके माथे पर बारह टांके आए हैं और खून चढ़ाने की जरूरत है।”
जब खून के ग्रुप की जांच हुई, तो पता चला कि अस्पताल के ब्लड बैंक में वह ग्रुप उपलब्ध नहीं है। मृदुला का ब्लड ग्रुप अलग था। इससे पहले कि मृदुला फिर से घबराती, पास खड़े उस भीगे हुए लड़के ने आगे बढ़कर कहा, “डॉक्टर साहब, मेरा खून जांच लीजिए। मैं खून दूंगा दादी जी को।”
संयोग से उस लड़के का ब्लड ग्रुप सावित्री देवी से मिल गया। इतनी थकान और ठंड के बावजूद उस लड़के ने बिना हिचकिचाए अपना खून दिया। रात के करीब बारह बजे डॉक्टर ने बताया कि अब खतरा टल गया है और मरीज को होश आ रहा है।
मृदुला ने जब मुड़कर उस लड़के को देखा, तो वह अस्पताल के बेंच के एक कोने में सिकुड़ कर बैठा था। मृदुला की आँखें भर आईं। वह उसके पास गई और अपने हाथ जोड़ लिए, “भाई, आज तुम भगवान बनकर मेरे दरवाजे पर आए थे। तुम्हारा नाम क्या है और तुम कौन हो?”
लड़के ने सकुचाते हुए मृदुला के हाथ थाम लिए, “भाभी जी, ऐसा मत कीजिए। मेरा नाम केशव है, लोग मुझे किशनू कहते हैं। मेरे माता-पिता नहीं हैं, मैं पास की बस्ती में अपने चाचा के यहां रहता हूँ और सब्जी का ठेला लगाता हूँ। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है, दसवीं में मैंने पूरे जिले में टॉप किया है, पर चाचा ने आगे पढ़ाने से मना कर दिया है।”
अगले दिन सुबह जब सावित्री देवी को पूरी तरह होश आया और शाम तक विक्रम भी भागते हुए अस्पताल पहुंचे, तो डॉक्टर और नर्सों के मुंह से पिछली रात की पूरी कहानी सुनकर सावित्री देवी सन्न रह गईं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस बहू को वे दिन-रात कोसती थीं, जिसे वे पराया समझती थीं, उसने उनकी जान बचाने के लिए आधी रात को तूफानी बारिश में एक हाथ-ठेले को धक्का लगाया, कीचड़ में सनी और पूरी रात उनके सिरहाने खड़ी रही। और वह अनाथ लड़का केशव, जिससे उनका कोई खून का रिश्ता नहीं था, उसने अपना खून देकर उनकी रगों में नई जिंदगी दौड़ाई।
जब मृदुला उनके पास आई, तो सावित्री देवी ने पहली बार अपनी बहू का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया और फूट-फूट कर रो पड़ीं। “बहू… मुझे माफ कर दे। मेरी आँखों पर अहंकार और अज्ञान की पट्टी बंधी थी। मैं तुझे कभी बेटी नहीं समझ पाई, लेकिन तूने आज फर्ज निभाने में सगी औलाद को भी पीछे छोड़ दिया। आज से तू मेरी बहू नहीं, मेरी बड़ी बेटी है।”
उस एक दुर्घटना ने सावित्री देवी के हृदय के सारे मैल को धो दिया था। अस्पताल से घर लौटने के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। और केशव? केशव तो जैसे उस परिवार का हिस्सा ही बन गया। मृदुला और विक्रम ने केशव के चाचा से बात करके उसकी आगे की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। मृदुला ने खुद उसे पढ़ाया, उसे किताबें दिलाईं और उसके सपनों को पंख दिए। अपनी मेहनत और मृदुला के मार्गदर्शन से केशव ने मेडिकल की प्रवेश परीक्षा पास की और आज वह एक काबिल डॉक्टर बनकर उनके सामने बैठा था।
“बहू… अरे ओ मृदुला! चाय में अदरक कूट रही है या पूरा अदरक का खेत ही उगा रही है? जल्दी ला भाई, मेरा किशनू कब से इंतजार कर रहा है!” सावित्री देवी की प्यार भरी आवाज ने मृदुला की तंद्रा भंग की।
मृदुला ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखों की कोर पर आ गए खुशी के आंसू पोंछे। उसने ट्रे में गरमागरम चाय के प्याले और बेसन के लड्डू सजाए और बैठक की ओर बढ़ गई। आज उस चाय की भाप में सिर्फ अदरक और इलायची की खुशबू नहीं थी, बल्कि उसमें रिश्तों की वह मिठास और इंसानियत की वह गर्माहट भी घुली हुई थी, जिसने एक टूटते हुए परिवार को जन्नत बना दिया था।
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लेखिका : गरिमा चौधरी