कुल पर कलंक – गीता वाधवानी

 सरला देवी ने निराशा और गुस्से में चीखते हुए कहा-” इंस्पेक्टर साहब,ले जाइए इसे मेरी आंखों के सामने से और हो सके तो फांसी पर लटका दीजिए। इसने तो हमारे कुल की इज्जत की धज्जियां उड़ा दी। इस कुल कलंकिनी को जल्द से जल्द सजा दिलवाइए।” 

 गर्विता-” मम्मी यह तुम क्या कह रही हो, कौन मां अपनी बेटी को फांसी दिलवाना चाहती है। ” 

 सरला देवी -” चुप हो जा बेशर्म, मैंने बड़ी खुशी से तेरा नाम गर्विता रखा था लेकिन तूने कोई ऐसा काम नहीं किया कि मैं तुझ पर गर्व कर सकूं। हां मैं तुझे फैंसी दिलवाना चाहती हूं। क्या तूने एक बार भी उसे मासूम के बारे में नहीं सोचा, तू भी तो उस मासूम की मां थी। कौन सी  माँ  ऐसा करती है। तुझे तो उस पर जरा भी दया नहीं आई। तू तो माँ  कहलाने  के भी लायक नहीं है। ” 

 गर्विता-” पर मैंने कुछ नहीं किया है, परी तो अपने आप छत से गिर गई थी। ” 

 सरला देवी -” चुप हो जा कमीनी, वरना तेरी जबान खींच लूंगी। ” 

 उस नन्ही सी गुड़िया ने मरने से पहले बयान दे दिया था। 

 पुलिस गर्विता को गिरफ्तार करके ले गई। जेल में पुलिस ने गर्विता से सच उगलवाने की कोशिश की और उसने मार खाकर सब कुछ बता दिया। 

 दरअसल गर्विता एक लालची लड़की थी। उसे ऐशो आराम की जिंदगी की चाह थी। उसे पैसा बहुत प्यारा  था। 

 वह देखने में स्मार्ट और सुंदर थी। वह अक्सर अपनी सहेलियों के साथ पास के मॉल में मटरगश्ती करने जाती थी। वहां पर वह सुंदर और स्मार्ट लड़कों को देखा करती थी और सोचती थी कि इसमें से किसी से मेरी शादी हो जाए, तो कितना अच्छा हो। 

      एक बार आलोक नाम के लड़के से उसकी टक्कर हो गई। दोनों ने एक दूसरे को सॉरी बोला और उसके बाद उनकी जान पहचान हो गई और फिर दोस्ती भी हो गई। एक दिन मॉल में आलोक एक छोटी सी बच्ची के साथ गर्विता को दिखाई दिया। 

 उसने पूछा -” आलोक, यह प्यारी सी बच्ची कौन है? ” 

 आलोक -” यह मेरी बिटिया है परी, परी आंटी को नमस्ते करो। ”     गीता वाधवानी

 गर्विता-” बड़ी प्यारी बच्ची है, लेकिन आप इसकी मम्मी को साथ क्यों नहीं लाए? ” 

 आलोक- परी की मां, मेरी प्रिया हमें 4 साल पहले सदा के लिए छोड़ कर चली गई। तब परी सिर्फ 2 साल की थी। 3 साल तक मेरी मां इसकी देखभाल करती रही और अब वह भी गुजर गई है। ” 

 गर्विता समझ गई कि आलोक को बच्ची के लिए मां की जरूरत है और वह परी से बहुत प्यार करने लगी। धीरे-धीरे परी भी उसको पसंद करने लगी थी। आखिर एक दिन उसकी मन की मुराद पूरी हो गई, जब आलोक ने उसे प्रपोज किया। उसने आलोक से कहा कि मेरे मम्मी पापा से बात करो। आलोक ने उसके घर जाकर मम्मी पापा से बात की। 

 मम्मी पापा उसके नेचर को जानते थे इसीलिए आलोक के जाने के बाद उन्होंने गर्विता से कहा- देखो बेटा, एक बच्ची को संभालना आसान काम नहीं होता और वह है भी अभी बहुत छोटी, कहीं तुम आलोक के ऐशो आराम को देखकर बहक तो नहीं रही हो। परी को तुम्हें मां का प्यार देना होगा। ” 

 गर्विता-” हां हां मम्मी पापा, मैं संभाल लूंगी परी को आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। ” 

 आलोक और गर्विता का विवाह हो गया। परी भी अपनी मम्मी को पाकर खुश थी। धीरे-धीरे गर्विता अपने असली रंग में आने लगी। वह कभी-कभी परी को बुरी तरह पीट देती थी और कहती थी कि अगर पापा को बताया तो तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगी। बेचारी बच्ची थर-थर करती थी लेकिन पापा से कुछ नहीं कहती थी। आलोक ने गर्विता को हर खुशी दी थी। 

      एक दिन उसने आलोक से कहा-” आलोक, दिवाली पर मुझे सोने के गहने दिलवाना। ” 

 आलोक ने हंसते हुए कहा-” हां हां क्यों नहीं और जो गहने मेरी प्रिया के हैं, वह भी तो तुम्हारे ही है। ” 

 गर्विता ने खुशी से चहकते हुए कहा-” सच्ची ” 

 आलोक ने कहा-” हां, चलो मैं तुम्हें दिखाता हूं। ” 

 आलोक ने उसे सारे जेवर दिखाए और कहा की यह सब तुम रख लो लेकिन उसने एक डिब्बा अपने पास ही रखा।       गीता वाधवानी

 उसने आलोक से पूछा-” इसमें क्या है? मुझे नहीं दिखाओगे? ” 

 आलोक ने कहा-” दिखा तो दूंगा, लेकिन दूंगा नहीं। क्योंकि यह मेरी प्रिया ने अपनी परी के लिए बड़े ही शौक से खरीदा था। वह कहती थी कि परी के बड़े होने पर उसे दूंगी। इतना कह कर आलोक ने डिब्बा खोला। उसे लाल डिब्बे में एक चमचमाता हुआ हीरों का सेट था। बहुत ही खूबसूरत था। गर्विता मन ही मन जल भुन गई। उसने ठान लिया था कि येन केन प्रकारेण ये सेट मै लेकर रहूंगी। 

 एक दिन अचानक आलोक जल्दी आ गया तो उसने देखा की परी बहुत रो रही थी और उसके गाल पर उंगलियों के निशान छपे थे। उसे तेज गुस्सा आ गया और उसने गर्विता को आवाज़ लगाई। उसने पूछा -” तुमने परी को क्यों मारा? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? ” 

      उसने कहा-” परी ने मुझे गाली दी तभी मुझे गुस्सा आ गया और मैंने इसे थप्पड़ लगा दिया। ” 

 आलोक यह सुनकर हैरान था की परी ने गाली दी। उसने परी से प्यार से पूछा, वह बहुत डरी हुई थी उसने कुछ नहीं बोला। 

 आलोक ने गर्विता के माता-पिता को पूरी बात बताई। उन्होंने उसे समझाया की बच्ची को इस तरह मारना नहीं चाहिए। अगर उसने गलती की है तो उसे प्यार से समझाओ  

 थोड़े दिन बाद आलोक जानबूझकर घर जल्दी आ गया, तब उसने देखा कि उसने परी को सोफे के साथ बांधकर बिठा रखा है और वह रो रही है। गर्विता ने फिर बहाना बनाया, इसके नंबर कम आए हैं फेल हो गई है इसीलिए मैं इसे पढा रही थी और यह नहीं पढ़ रही थी।      गीता वाधवानी 

 परी के फेल होने की बात सुनकर अगले दिन आलोक उसके साथ उसके स्कूल गया। टीचर ने बताया कि परी अब बहुत चुप चुप रहने लगी है और बात बात पर रोने लगती है पढ़ाई और खेलकूद में पिछड गई है। यह बात हमने उसकी मम्मी को भी बताई थी। अब आलोक की समझ में सब कुछ आ गया था। 

 परी के सोने के बाद उसने गर्विता को बुलाकर कहा-” देखो,मैंने तुमसे शादी अपनी बच्ची के लिए की थी। तुम मेरी बच्ची का ध्यान नहीं रख रही हो बल्कि उसे मारपीट रही हो। मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता,तुम अपने मायके जा सकती हो और अगर तुम यहां रहना चाहती हो, तो तुम्हें सुधारना होगा।” 

 उस समय गर्विता हर बात में हां हां करती रही और सुबह नींद में सोई हुई परी को गोद में उठाकर छत पर चली गई और उसके पैरों से उसे पकड़ कर नीचे की तरफ लटका दिया और जोर-जोर से आलोक को आवाज देने लगी। आलोक ने जैसे ही यह दृश्य देखा उसके होश उड़ गए। 

 वह चिल्लाया -” यह क्या पागलपन है गर्विता, परी को ऊपर खींचो, कहीं मेरी बच्ची को कुछ हो ना जाए। ” 

 गर्विता-” पहले अपनी सारी प्रॉपर्टी के कागजात लेकर आओ, उन्हें मेरे नाम करो और हीरो का सेट मुझे दो, सारे पैसे मेरे अकाउंट में ट्रांसफर करो। वरना मैं इसे यहीं से अभी छोड़ दूंगी। ” 

 आलोक ने चिल्ला कर कहा -” ठीक है ठीक है, मैं सब कुछ तुम्हें दे दूंगा। तुम मेरी बच्ची को सही सलामत नीचे ले आओ। ” 

 वह जोर से चीखी -” नहीं पहले वादा करो। ” 

 उधर परी बहुत घबरा गई थी और पापा पापा करके रो रही थी। 

 आलोक के वादा करने पर वह परी को पैरों से ऊपर खींचने लगी लेकिन परी उसके हाथ से छूट गई और नीचे पक्के फर्श पर गिरते ही उसका सिर फट गया।

 आलोक अपनी बच्ची की हालत देखकर फफक फफक कर रो रहा था। आसपास के लोगों ने पुलिस को कॉल किया और गर्विता के माता-पिता को भी बुलाया। 

 इसीलिए उसकी मां उसे कुल कलंकिनी कह रही थी और इंस्पेक्टर से कह रही थी कि इसे फांसी पर चढ़ा दो। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

साप्ताहिक प्रतियोगिता विषय #कुल कलंकिनी 

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