गाँव बिरनपुर में सरपंच दीनदयाल की बेटी नंदिनी को देखकर लोग कहते, “इससे अच्छी बहू पूरे जिले में नहीं मिलेगी।” संस्कार, सेवा, सलीका – सब में अव्वल। हाथ का बना आम का अचार जिसकी महक से पूरा मोहल्ला पूछता, “दीनदयाल जी, ये किसने बनाया?” नंदिनी मुस्कुराकर सिर झुका लेती।
18 की उम्र में उसकी शादी ठाकुर खानदान के बड़े बेटे विक्रम से तय हुई। ठाकुरों का रुतबा, 50 बीघा जमीन, पक्का मकान। दहेज में दीनदयाल ने 11 बीघा खेत और 20 तोले सोना दिया। बारात आई तो शहनाई से पूरा गाँव गूंज उठा। नंदिनी डोली में बैठी तो माँ ने कान में कहा, “बेटी, ससुराल ही तेरा मंदिर है। कुल की लाज रखना।”
ससुराल पहुँचते ही नंदिनी का नाम “नंदिनी” से “नंदू” कर दिया गया। सास कमला देवी ने गृह प्रवेश पर ही ताकीद कर दी, “बहू, ठाकुरों की इज्जत तेरे पल्लू में बंधी है। कुलकलंकिनी बनने की गलती मत करना, वरना जिंदा गाड़ दूंगी।” नंदिनी ने घूँघट और झुका लिया। वो तो कुल का नाम रोशन करने आई थी।
पहले 2 साल हँसी-खुशी बीते। फिर गाँव की औरतों की नजर नंदिनी के पेट पर टिक गई। “2 साल हो गए, अभी तक बच्चा नहीं हुआ।” “ठाकुर का खानदान आगे कैसे बढ़ेगा?” “बाँझ को घर में रखना भी पाप है।” कमला देवी ताने मारतीं, “हमने 11 बीघा जमीन दी थी, वारिस नहीं दिया। तूने तो हमारा कुल ही बाँझ कर दिया।”
पति विक्रम नंदिनी से प्यार करता था। रात को चुपके से कहता, “नंदू, तू परेशान मत हो। ऊपर वाले की मर्जी।” पर माँ के सामने वो भी चुप हो जाता। नंदिनी हर व्रत रखती, हर पीर-फकीर के पास जाती। पर कोख सूनी ही रही।
एक दिन गाँव में सरकारी स्वास्थ्य कैंप लगा। महिला डॉक्टर आई थीं। नंदिनी डरते-डरते चेकअप कराने गई। 3 दिन बाद रिपोर्ट आई। डॉक्टर ने धीरे से कहा, “बहन, तुम बिल्कुल ठीक हो। समस्या तुम्हारे पति में है। उनके शुक्राणु कम हैं। इलाज संभव है, पर समय लगेगा।”
नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई। अगर ये बात सास को पता चली तो वो विक्रम को दूसरी शादी के लिए मजबूर कर देंगी। और गाँव वाले? वो तो उसे ही कुलकलंकिनी कहेंगे। मर्द में कमी हो तो “भगवान की मर्जी”, औरत में हो तो “कुल की कलंकिनी”। यही तो दस्तूर था।
उसी महीने गाँव का सालाना मेला लगा। विक्रम का बचपन का दोस्त अजय शहर से आया – पढ़ा-लिखा, सरकारी स्कूल में टीचर। नंदिनी ने अजय को पूरी बात बताई। अजय ने नंदिनी को मुरझाते हुआ देखा तो एक दिन खेत के रास्ते में रोककर बोला, “भाभी, सच छुपाने से कलंक नहीं मिटता। सच बोल दो। वरना पूरी उम्र आप कुलकलंकिनी कहलाओगी, जबकि गलती आपकी है ही नहीं।”
नंदिनी डर गई। “अजय, तुम नहीं समझोगे। सच बोलूंगी तो लोग मुझे ही चरित्रहीन कहेंगे। कहेंगे बहू ने बदनामी के लिए पति पर इल्जाम लगाया। मेरा चरित्र उछाला जाएगा। पंचायत मुझे गाँव से निकाल देगी।”
मेले की रात अनहोनी हो गई। विक्रम ठेके से पीकर लौट रहा था। अंधेरे में कुएँ के पास फिसल गया। अजय ने शोर सुना तो दौड़कर उसे बचा लिया। गाँव के 2-3 लोगों ने देख लिया – अजय, नंदिनी और बेहोश विक्रम कुएँ के पास। बस, आग लग गई।
अगली सुबह पूरा गाँव यही बात कर रहा था, “देखा? बाँझ बहू का चक्कर चल रहा है टीचर के साथ। ठाकुरों की नाक कटवा दी। यही है कुलकलंकिनी!” किसी ने सच जानने की कोशिश नहीं की।
पंचायत बैठी। बरगद के नीचे 50 मर्द जमा हुए। कमला देवी लाठी पटकते हुए चिल्लाईं, “इसी दिन के लिए 11 बीघा जमीन दी थी? इसी दिन के लिए सोना दिया था? निकल जा यहाँ से, कुल की कलंकिनी! आज से तेरा-मेरा कोई रिश्ता नहीं।”
विक्रम सर झुकाए खड़ा था। एक बार भी नंदिनी का हाथ नहीं पकड़ा। नंदिनी ने कांपते हाथों से डॉक्टर की रिपोर्ट पंचायत के बीच में फेंक दी। “पढ़ो इसे ठाकुरों। कलंकिनी मैं नहीं हूँ। बाँझ मैं नहीं हूँ। मेरे पति में कमी है। पर आप लोगों की नजर में औरत की कोख ही इज्जत का पैमाना है। मर्द बाँझ हो तो उसे इज्जत, औरत बाँझ हो तो उसे कुलकलंकिनी।”
सरपंच ने रिपोर्ट उठाकर देखी भी नहीं। फाड़कर फेंक दी। “कागज का टुकड़ा दिखाकर कुल की बदनामी करेगी? हमारे खानदान में ऐसी औरतें नहीं रहतीं। चल निकल यहाँ से।”
नंदिनी ने एक बार विक्रम को देखा। विक्रम ने नजरें चुरा लीं। नंदिनी बिना रोए, बिना पलटे गाँव से निकल गई। पीछे सिर्फ ताने थे – “जा कुलकलंकिनी, जा।”
शहर जाकर नंदिनी टूट गई। पर हारी नहीं। उसने नर्सिंग का कोर्स किया। रात को ड्यूटी, दिन को पढ़ाई। 5 साल बाद वो बिरनपुर के सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स बनकर लौटी। अब वो सफेद वर्दी में आती थी।
तकदीर का खेल देखो। 2 साल बाद कमला देवी को लकवा मार गया। बेटा-बहू शहर चले गए। गाँव में कोई सेवा करने वाला नहीं। नंदिनी रोज अस्पताल से लौटकर कमला देवी के पैर दबाती, दवा देती, खाना खिलाती।
एक दिन कमला देवी ने नंदिनी का हाथ पकड़कर रोते हुए कहा, “बेटी, मैं अंधी थी। तुझे कुलकलंकिनी कहती रही। तूने तो कुल की लाज बचा ली। माफ कर दे।”
नंदिनी ने सास के माथे पर हाथ रखा। “माँ जी, कलंक वो नहीं जो सच बोल दे। कलंक वो है जो सच सुनकर भी आँख बंद कर ले। मैं कुलकलंकिनी नहीं थी। मैं बस एक पत्नी थी जो अपने पति का सच छुपाकर उसकी इज्जत बचा रही थी।”
गाँव वालों ने अब नंदिनी का नाम बदल दिया। “कुलतारणी नंदिनी”। स्कूल में बच्चियों को उसकी मिसाल दी जाती। पंचायत में औरतों की बात सुनी जाती।
नंदिनी ने कभी बदला नहीं लिया। उसने बस अपना किरदार इतना ऊँचा कर लिया कि कलंक लगाने वालों को खुद शर्म आ गई।
*सीख*: समाज औरत पर “कुलकलंकिनी” का ठप्पा बहुत जल्दी लगा देता है। पर सच, सेवा और सब्र से बड़ा कोई तिलक नहीं। इज्जत कोख से नहीं, किरदार से बनती है। जिसे दुनिया कलंकिनी कहे, वक्त आने पर वही कुल की शान बन जाती है।
Thanks & Regards,
Ranu Jain