अनुपमा का आत्मसम्मान

मेघा ने व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए कहा, “ओहो! कितनी भोली बन रही है। जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं। अरे, नौकरानी तो बाहर आंगन में थी। माँ पूजा घर में थीं और मैं सो रही थी। तो फिर गहने किसने उड़ाए? तू ही तो पूरे घर में नागिन की तरह घूम रही थी।”

दीवाली का त्योहार सिर पर था और पूरे घर में रंग-रोगन और साफ-सफाई का काम जोरों पर चल रहा था। घर की बहू अनुपमा सुबह पांच बजे से उठकर मशीन की तरह काम में जुटी थी। पकवानों की खुशबू से पूरी रसोई महक रही थी, लेकिन अनुपमा के चेहरे पर थकान के साथ-साथ एक अजीब सी घुटन भी थी। यह घुटन काम की नहीं, बल्कि उस तिरस्कार की थी जो उसे इस घर में रोज सहना पड़ता था। आंगन में धूप सेंकती हुई सास, कौशल्या देवी, आराम से बैठी नौकरानी को निर्देश दे रही थीं। तभी दरवाजे पर एक चमचमाती कार आकर रुकी। कार का दरवाजा खुला और रेशमी साड़ी, भारी मेकअप और घमंड से भरी चाल के साथ घर की इकलौती बेटी मेघा ने अंदर कदम रखा।

शादी को आठ साल हो चुके थे, लेकिन मेघा जब भी मायके आती, उसका रुतबा किसी महारानी से कम नहीं होता था। मायके की हर चीज पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझना और बहू को पैर की जूती समझना उसकी फितरत थी।

“अरे मेरी लाडो आ गई!” कौशल्या देवी खुशी से उछल पड़ीं और बेटी को गले से लगा लिया।

“हां माँ, सोचा इस बार दीवाली के मजे मायके में ही लूट लूँ। ससुराल में तो वही रोज की किच-किच है,” मेघा ने इतराते हुए कहा। उसकी नजर रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आती अनुपमा पर पड़ी। अनुपमा ने मुस्कुराकर नमस्ते की, लेकिन मेघा ने सिर्फ एक नजर उसे ऊपर से नीचे तक घूरा और बिना जवाब दिए माँ के साथ अंदर चली गई। अनुपमा ने एक गहरी सांस ली। वह जानती थी कि ननद के आने का मतलब है उसके आत्मसम्मान की रोज नई परीक्षा होना।

दो दिन यूं ही बीत गए। मेघा पूरा दिन सोफे पर पसरी रहती और कौशल्या देवी अनुपमा को फरमान सुनाती रहतीं—”बहू, मेघा के लिए गाजर का हलवा बना दे, बहू, मेघा के कपड़े प्रेस कर दे।” अनुपमा चुपचाप सब करती रही। धनतेरस की शाम थी। कौशल्या देवी ने अपनी लोहे की पुरानी तिजोरी खोली और पुश्तैनी सोने के कंगन और भारी चांदी की करधनी बाहर निकाली। ये गहने दीवाली की पूजा में रखे जाने थे।

“मेघा बेटा, जरा ये कंगन वापस लाल मखमल की डिब्बी में रखकर तिजोरी में रख दे। मैं तब तक पूजा की थाली सजा लूँ,” कौशल्या देवी ने तिजोरी की चाबी मेघा के हाथ में थमाते हुए कहा। मेघा ने चाबी ली और कमरे में चली गई।

रात के आठ बज रहे थे। अनुपमा रसोई में दीये तैयार कर रही थी कि अचानक कौशल्या देवी के कमरे से एक दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी।

“हाय राम! मैं तो लुट गई! मेरे पुश्तैनी कंगन गायब हैं! तिजोरी खुली पड़ी है!”

पूरा घर दौड़कर उस कमरे में इकट्ठा हो गया। विक्रम, जो अनुपमा का पति था, वह भी घबराकर भागा आया। तिजोरी का दरवाजा खुला था और अंदर रखे सोने के कंगन और करधनी गायब थे। कौशल्या देवी सिर पीटकर रोने लगीं।

तभी मेघा ने अपनी तिरछी निगाहों से अनुपमा की तरफ देखते हुए जहर उगला, “माँ, इसमें रोने की क्या बात है? चोर कहीं बाहर से थोड़े ही आया है। जब से यह औरत इस घर में आई है, इसकी नजर हमारे खानदानी गहनों पर ही थी। गरीब घर से आई है ना, इतना सोना एक साथ देखा कहाँ होगा!”

अनुपमा सन्न रह गई। “यह आप क्या कह रही हैं दीदी? मैं उन गहनों को छूना तो दूर, उस कमरे में गई तक नहीं हूँ।”

मेघा ने व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए कहा, “ओहो! कितनी भोली बन रही है। जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं। अरे, नौकरानी तो बाहर आंगन में थी। माँ पूजा घर में थीं और मैं सो रही थी। तो फिर गहने किसने उड़ाए? तू ही तो पूरे घर में नागिन की तरह घूम रही थी।”

कौशल्या देवी ने तुरंत बेटी की सुर में सुर मिलाया, “सच कह रही है मेरी बच्ची। मैंने तो तुझे पहले ही कहा था विक्रम, यह लड़की हमारे खानदान के लायक नहीं है। आज इसने अपने असली रंग दिखा ही दिए।”

विक्रम ने बिना सोचे-समझे अपनी पत्नी की तरफ गुस्से से देखा। “अनुपमा! यह क्या तमाशा है? अगर तुमने गहने लिए हैं तो चुपचाप निकालकर रख दो। मेरी बहन और मेरी माँ कभी झूठ नहीं बोलते।”

अनुपमा की आँखों में आंसू थे, लेकिन अब वे आंसू गुस्से में बदल रहे थे। “विक्रम! आप भी? बिना किसी सबूत के आप अपनी पत्नी को चोर मान रहे हैं? माँ जी, आप तो भूल ही गईं कि तिजोरी की चाबी आपने मुझे नहीं, अपनी लाडली बेटी को दी थी। और जब चाबी उनके पास थी, तो मैं गहने कैसे निकाल सकती हूँ?”

मेघा आग-बबूला हो उठी। “तेरी इतनी हिम्मत कि तू मुझ पर शक करे? मैं इस घर की बेटी हूँ। मेरी माँ का सोना है वह। मैं अपने ही घर में चोरी क्यों करूँगी? तू अपनी औकात में रह। यह घर मेरी माँ का है और यहाँ सिर्फ मेरा हुक्म चलता है।”

अनुपमा ने भी आज अपनी खामोशी की चादर उतार फेंकी थी। उसने तेज आवाज में कहा, “औकात की बात मत कीजिए दीदी! जब आपकी माँ बीमार पड़ती हैं, तब आपका यह हुक्म और आपका यह हक कहाँ चला जाता है? तब तो महीनों तक आप मायके की शक्ल नहीं देखतीं। रात-रात भर जागकर मैं इनकी सेवा करती हूँ। और आज जब गहने गायब हुए और चाबी आपके पास थी, तो शक मुझ पर क्यों? क्या बेटियां दूध की धुली होती हैं और बहुएं जन्म से चोर?”

“चुप कर बदचलन औरत!” मेघा जोर से चीखी। “भैया, आप खड़े-खड़े तमाशा देख रहे हैं? इस औरत की जुबान खींच क्यों नहीं लेते? आज अगर इसने मुझसे माफी नहीं मांगी, तो मैं इसी वक्त यह घर छोड़कर चली जाऊंगी।”

विक्रम ने आगे बढ़कर अनुपमा का हाथ झटकते हुए कहा, “अनुपमा, अपनी हद पार मत करो। मेघा मेरी बहन है, वह ऐसा नीच काम नहीं कर सकती। तुम अभी के अभी उससे माफी मांगो।”

अनुपमा ने विक्रम की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “मैं माफी नहीं मांगूंगी विक्रम। क्योंकि मैंने चोरी नहीं की है। अगर आपको इतना ही यकीन है कि मैं चोर हूँ, तो बुलाइए पुलिस। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।”

पुलिस का नाम सुनते ही मेघा के चेहरे का रंग हल्का पड़ गया। “प…पुलिस क्यों बुलानी है? घर की बात घर में रहने दो भैया। बस इससे कहो कि गहने वापस कर दे।”

तभी दरवाजे के पीछे से एक कांपती हुई आवाज आई। “पुलिस को मत बुलाइए साहिब… वरना दीदी जी जेल चली जाएंगी।”

सबने पलटकर देखा। दरवाजे पर पुरानी नौकरानी, शांति खड़ी थी। उसके हाथ कांप रहे थे।

कौशल्या देवी ने डांटते हुए कहा, “क्या बकवास कर रही है शांति? कौन सी दीदी?”

शांति ने अपनी सूती साड़ी के पल्लू से पसीना पोंछा और डरते-डरते बोली, “माझी… शाम को जब मैं झाड़ू लगाने मेघा दीदी के कमरे में गई थी, तो मैंने अपनी आँखों से देखा था। दीदी लाल मखमल की डिब्बी से गहने निकालकर अपनी साड़ियों के बीच सूटकेस में छिपा रही थीं। मुझे लगा माझी ने ही उन्हें ससुराल ले जाने के लिए दिए होंगे, इसलिए मैं चुप रही। पर अब जब बहू जी पर बात आ गई है, तो मुझसे चुप नहीं रहा गया।”

कमरे में श्मशान जैसी खामोशी छा गई। विक्रम के पैरों तले जमीन खिसक गई थी। उसने अविश्वास से मेघा की तरफ देखा। “मेघा… क्या यह सच है?”

मेघा अब भी बेखौफ खड़ी थी। उसके चेहरे पर शर्मिंदगी की कोई लकीर नहीं थी। उसने सीना तानकर कहा, “हाँ! सच है! मैंने लिए हैं वो कंगन और करधनी। तो क्या गुनाह कर दिया? मैं इस घर की बेटी हूँ। माँ के मरने के बाद यह सब इसी औरत को तो मिलता। मैंने अपना हक पहले ही ले लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?”

कौशल्या देवी धड़ाम से बिस्तर पर बैठ गईं। जिस बेटी के मोह में वह अंधी हो चुकी थीं, उसी ने आज उनके भरोसे की धज्जियां उड़ा दी थीं।

अनुपमा ने एक गहरी, ठंडी सांस ली और विक्रम की तरफ देखकर कहा, “देख लिया आपने विक्रम? यही है आपके इस घर का सच। बेटी अगर डाका भी डाले, तो वह उसका ‘हक’ बन जाता है। और बहू अगर अपना खून-पसीना भी एक कर दे, तो वह ‘नौकरानी’ और ‘चोर’ ही कहलाती है। मेरी माँ-बाप ने मुझे संस्कार देकर विदा किया था, चोरी करना नहीं सिखाया।”

विक्रम का सिर शर्म से झुक गया। “अनुपमा… मुझे माफ कर दो। मैं अपनी बहन के प्यार में अंधा हो गया था।”

अनुपमा ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, “माफी से मेरे दिल पर लगे वो घाव नहीं भरेंगे विक्रम, जो आपने और आपकी माँ ने आज मुझे दिए हैं। आपने आज सिर्फ एक गहना नहीं ढूंढा है, बल्कि मेरा वो भरोसा हमेशा के लिए खो दिया है, जो मैंने इस परिवार पर किया था।”

मेघा वहां से पैर पटकते हुए अपने कमरे की तरफ चली गई, लेकिन पीछे छोड़ गई रिश्तों की एक ऐसी टूटी हुई तिजोरी, जिसकी चाबी अब कभी किसी को नहीं मिलने वाली थी। घर में अब सिर्फ पछतावे की खामोशी गूंज रही थी, और अनुपमा का आत्मसम्मान उस खामोशी से भी कहीं ज्यादा ऊंचा खड़ा था।

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