अंश

 आलोक ने आसमान में चमकते अनगिनत तारों की ओर देखा, फिर नीचे आंगन में बैठी अपनी दोनों बेटियों को देखा जो आपस में खिलखिला रही थीं। आलोक ने गहरी सांस ली और कहा, “माधवी, बेटा केवल एक कुल का नाम चला सकता है, लेकिन अगर बेटियों को पंख और हौसला दिया जाए, तो वे पूरे समाज की सोच और इतिहास को बदल सकती हैं। मुझे कभी वारिस नहीं चाहिए था, मुझे बस अपने अंश को समर्थ बनाना था। आज मेरी बेटियां सिर्फ मेरा नाम नहीं चला रहीं, बल्कि वे उन लाखों बेटियों के माता-पिता के लिए एक रोशनी बन गई हैं जो अपनी ही कोख के फूल को बोझ समझने की भूल करते हैं।”

अस्पताल के उस गलियारे में फिनाइल की तीखी गंध और घड़ियों की सुइयों की टिक-टिक के बीच एक भारी खामोशी पसरी हुई थी। लेबर रूम का लाल बल्ब जैसे ही बुझा, चालीस वर्षीय आलोक की धड़कनें तेज हो गईं। दरवाजे से बाहर निकली नर्स के चेहरे पर न तो कोई मुस्कान थी और न ही उत्साह। उसने बेहद सपाट और थके हुए स्वर में कहा, “बधाई हो, बिटिया हुई है।”

उन शब्दों का गिरना था कि आलोक के ठीक बगल में बैठी उनकी मां कौशल्या देवी के हाथ से माला की लड़ी छूटकर फर्श पर गिर पड़ी। कौशल्या देवी का चेहरा ऐसे बुझ गया जैसे किसी भरे-पूरे त्योहार के दिन घर की बिजली गुल हो गई हो। उनके होंठों से अनायास ही निकला, “हे भगवान! फिर वही? हमारे कर्म ही ऐसे फूटे थे क्या! अब कुल का दिया कौन जलाएगा?”

आलोक के छोटे भाई की पत्नी, जो हाथ में लड्डुओं का डिब्बा लिए खड़ी थी, ने चुपचाप वह डिब्बा अपने बैग में छिपा लिया। कोई किलकारी नहीं गूंजी, किसी ने बधाई का एक शब्द नहीं कहा। रिश्तेदार ऐसे मुंह लटकाए खड़े थे मानो अस्पताल में किसी नए जीवन का आगमन नहीं, बल्कि कोई अनहोनी घट गई हो। सात साल पहले जब पहली बेटी पीहू ने जन्म लिया था, तब लोगों ने कहा था, “कोई बात नहीं, पहली लक्ष्मी आई है।” लेकिन आज जब दूसरी बेटी आई, तो समाज की उस तथाकथित ‘लक्ष्मी’ का स्वागत केवल गहरी सांसों, सहानुभूति और दबी-छुपी सांत्वनाओं से हुआ।

आलोक धीरे-धीरे कदमों से कमरे के अंदर गए। बिस्तर पर उनकी पत्नी माधवी पसीने से तर-ब-तर, बेहद कमजोर हालत में लेटी हुई थीं। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बहकर तकिए में समा रही थी। वे प्रसव की शारीरिक पीड़ा से नहीं, बल्कि समाज के उस अदृश्य दबाव और अपराधबोध से रो रही थीं जो एक बेटी को जन्म देते ही हर मां की छाती पर पत्थर बनकर बैठ जाता है। आलोक को देखते ही माधवी ने कांपते होंठों से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए आलोक… मैं आपके खानदान को एक वारिस, एक बेटा नहीं दे सकी। अम्मा जी की उम्मीदें फिर टूट गईं।”

आलोक ने एक पल के लिए अपनी पत्नी को देखा, फिर आगे बढ़कर उनके माथे पर बिखरे बालों को सहलाया और उनके माथे को चूम लिया। उन्होंने नवजात बच्ची को अपनी गोद में उठाया। वह गुलाबी पंखुड़ी जैसी नन्ही जान अपनी बंद आंखों से अपनी नई दुनिया को महसूस करने की कोशिश कर रही थी। आलोक की आंखों में आंसू थे, पर वे लाचारी के नहीं, बल्कि एक अजीब से संकल्प के थे।

उन्होंने माधवी का हाथ थामते हुए कहा, “माधवी, तुम किस बात की माफी मांग रही हो? उस ईश्वर की देन के लिए, जिसने हमारे आंगन में एक और फूल खिलाया है? बेटा वंश चलाता है, यह किसने तय किया? क्या यह नन्ही जान मेरा अंश नहीं है? क्या मेरी रगों का खून इसमें नहीं बह रहा? अगर हमारा समाज बेटियों को सिर्फ विदाई और पराया धन समझता है, तो यह उस समाज की दृष्टि का दोष है, हमारी बेटी की किस्मत का नहीं।”

बाहर निकलते ही कौशल्या देवी ने अपनी व्यथा का पिटारा खोल दिया, “आलोक, तू अभी समझ नहीं रहा है। दो-दो बेटियां! कल को इनकी शादियां, इनका ब्याह, भारी-भरकम दहेज, दुनिया भर के खर्चे… और बुढ़ापे में तेरे पास कौन बचेगा? हमारी पुश्तैनी जमीन, यह घर-बार, इस नाम को आगे कौन ले जाएगा? तीसरे के बारे में सोचना ही पड़ेगा, वरना लोग कहेंगे कि आलोक का वंश यहीं खत्म हो गया।”

आलोक ने बड़ी शांति से अपनी मां की ओर देखा और कहा, “मां, हमारे पास ऐसी कौन सी अकूत जागीर है जिसके लिए मुझे वारिस की चिंता सताए? और अगर नाम ही चलाना है, तो नाम बेटों की वजह से नहीं, कर्मों और संस्कारों की वजह से चलता है। अगर बेटा नालायक निकल जाए, तो सदियों पुरानी इज्जत को दो कौड़ी का होने में दो दिन नहीं लगते। मैं अपनी बेटियों को बोझ नहीं, अपना संबल बनाऊंगा। हम दो और हमारे दो—हमारा परिवार पूरा हो चुका है। अब न तो कोई तीसरा बच्चा होगा और न ही वंश के नाम पर कोई समझौता।”

उस दिन अस्पताल से घर तक का सफर बहुत भारी था। पड़ोस की औरतें मिलने आईं, पर किसी के चेहरे पर खुशी नहीं थी। सब ऐसे कह रही थीं, “धीरज धरो माधवी, ईश्वर की यही मर्जी थी। अब जैसा भी है, निभाना तो पड़ेगा ही।” वे सांत्वनाएं नहीं थीं, वे मीठे जहर में बुझे हुए तीर थे जो हर घड़ी माधवी के आत्मसम्मान को छलनी कर रहे थे।

दिन बीतते गए। आलोक ने अपनी दोनों बेटियों—बड़ी बेटी पीहू और छोटी बेटी काव्या—को किसी राजकुमारी की तरह नहीं, बल्कि एक योद्धा की तरह पालना शुरू किया। उन्होंने समाज के उन दकियानूसी बंधनों को अपने घर की चौखट पर ही रोक दिया जो लड़कियों को बचपन से ही यह सिखाते हैं कि उन्हें दबकर, सहकर और पराया होकर रहना है।

आलोक एक साधारण बैंक कर्मचारी थे। रिश्तेदारों ने कई बार सलाह दी कि बेटियों के नाम पर फिक्स डिपॉजिट करो ताकि शादी में अच्छा दहेज दिया जा सके। लेकिन आलोक और माधवी का नजरिया बिल्कुल अलग था। आलोक हमेशा कहते, “मैं अपनी बेटियों के दहेज के लिए एक पैसा भी नहीं जोडूंगा। मैं अपनी पाई-पाई उनकी शिक्षा, उनके खेल, उनके आत्मविश्वास और उनके हुनर पर खर्च करूंगा। मैं उन्हें इतना मजबूत बनाऊंगा कि उन्हें किसी की दया या किसी के नाम के सहारे की जरूरत न पड़े।”

पीहू को बचपन से ही विज्ञान और तकनीकी चीजों में गहरी रुचि थी। वह अक्सर घर के खराब रेडियो, खिलौने और घड़ियां खोलकर बैठ जाती थी। जहां रिश्तेदार कहते कि लड़की को सिलाई-कढ़ाई और रसोई सिखाओ, वहीं आलोक उसके लिए रोबोटिक्स की किताबें और टूल्स लाकर देते। दूसरी तरफ, छोटी बेटी काव्या को दौड़ने और खेलने का जुनून था। धूप में काली पड़ जाएगी, शादी में दिक्कत होगी—जैसी बातें जब भी पड़ोस से उठतीं, माधवी ढाल बनकर खड़ी हो जातीं और कहतीं, “मेरी बेटी का रंग उसके सपनों से बड़ा नहीं है।”

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। बेटियां बड़ी हो रही थीं, और उनके साथ-साथ आलोक और माधवी की तपस्या भी। कई बार ऐसा दौर भी आया जब आर्थिक तंगी ने घेरा। आलोक ने अपनी पुरानी स्कूटर से काम चलाया, माधवी ने सालों तक अपने लिए कोई नई साड़ी नहीं खरीदी, पर कभी बेटियों की कोचिंग, उनकी किताबों या उनके सपनों में कोई कमी नहीं आने दी।

समाज ने ताने मारने कभी बंद नहीं किए। जब पीहू का दाखिला देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान में हुआ, तो परिवार के ही एक चाचा ने कहा, “इतना दूर लड़की को अकेले भेज रहे हो? कल को कुछ ऊंच-नीच हो गई तो समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे। शादी की उम्र हो रही है, हाथ पीले कर दो।”

आलोक ने उस दिन मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, “भाई साहब, पंख उड़ने के लिए होते हैं, पिंजरे में सजाने के लिए नहीं। मैंने अपनी बेटियों को गिरना भी सिखाया है और गिरकर संभलना भी। मेरी बेटियां मेरा नाम डुबोएंगी नहीं, बल्कि उस मुकाम तक ले जाएंगी जहां पहुंचने की आप कल्पना भी नहीं कर सकते।”

काव्या ने भी राज्य स्तर की एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में पदक जीतने शुरू कर दिए थे। वह मैदान में ऐसे दौड़ती थी मानो हवा से बातें कर रही हो। आलोक रोज सुबह चार बजे उठकर काव्या को मैदान ले जाते, उसके पसीने के हर कतरे में अपने संघर्ष की सार्थकता देखते।

साल बीतते गए। पीहू ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) की वैज्ञानिक टीम में चुनी गई। जिस दिन उसके चयन का पत्र आया, पूरे मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया—वही मोहल्ला जो कभी आलोक की दूसरी बेटी होने पर संवेदनाएं जताने आया था। काव्या ने भी अपनी मेहनत के दम पर राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय खेल प्राधिकरण में एक अधिकारी का पद हासिल किया।

अब आलोक के बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और उनके चेहरे पर उम्र की लकीरें उभर आई थीं, लेकिन उनकी रीढ़ की हड्डी पहले से भी ज्यादा सीधी थी और आंखों में एक बेमिसाल चमक थी।

एक शाम, आलोक के पुश्तैनी गांव में एक बड़ा पारिवारिक समारोह था। वही परिवार, वही रिश्तेदार, जिन्होंने पच्चीस साल पहले आलोक को ‘बे-वारिस’ और ‘अभागा’ मान लिया था, आज सब वहां मौजूद थे। आलोक के छोटे भाई का बेटा, जिसे कभी कुल का दीपक बताकर खूब लाड़-प्यार से पाला गया था, वह आज आवारागर्दी और जुए की लत में पड़कर परिवार की बची-खुची जमीनें बेच चुका था। वह बुजुर्ग माता-पिता से सीधे मुंह बात तक नहीं करता था। कौशल्या देवी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं और एक कोने में लाचार बैठी थीं।

तभी आंगन में एक सरकारी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी पर तिरंगा लगा हुआ था और सुरक्षाकर्मी मुस्तैद थे। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से नीले रंग के शानदार फॉर्मल सूट में पीहू और ट्रैक सूट में काव्या बाहर निकलीं। दोनों बहनों ने सबसे पहले आगे बढ़कर अपनी दादी कौशल्या देवी के चरण स्पर्श किए।

दादी की धुंधली आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उन्होंने कांपते हुए हाथों से दोनों पोतियों के सिर पर हाथ रखा और सुबकते हुए कहा, “मुझे माफ कर देना बच्चियों… मैंने पूरी जिंदगी पत्थर को पूजने में बिता दी और मेरे घर में साक्षात देवियां जन्म ले चुकी थीं। अगर आज तुम्हारा बाप मेरी संकीर्ण सोच के आगे झुक गया होता, तो आज यह परिवार सिर उठाने लायक भी न बचता।”

पूरे आंगन में गहरा सन्नाटा था। वही लोग जो कभी आलोक को बेटियों की संख्या पर घेरते थे, आज उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे और अपनी बेटियों के भविष्य के लिए आलोक से सलाह मांग रहे थे।

उस रात छत पर टहलते हुए माधवी ने आलोक का हाथ पकड़ा और नम आंखों से पूछा, “सुनिए, क्या आपको कभी एक पल के लिए भी यह मलाल हुआ कि काश हमारा एक बेटा होता जो आपका नाम चलाता?”

आलोक ने आसमान में चमकते अनगिनत तारों की ओर देखा, फिर नीचे आंगन में बैठी अपनी दोनों बेटियों को देखा जो आपस में खिलखिला रही थीं। आलोक ने गहरी सांस ली और कहा, “माधवी, बेटा केवल एक कुल का नाम चला सकता है, लेकिन अगर बेटियों को पंख और हौसला दिया जाए, तो वे पूरे समाज की सोच और इतिहास को बदल सकती हैं। मुझे कभी वारिस नहीं चाहिए था, मुझे बस अपने अंश को समर्थ बनाना था। आज मेरी बेटियां सिर्फ मेरा नाम नहीं चला रहीं, बल्कि वे उन लाखों बेटियों के माता-पिता के लिए एक रोशनी बन गई हैं जो अपनी ही कोख के फूल को बोझ समझने की भूल करते हैं।”

उस रात घर का हर कोना बेटियों के आत्मसम्मान और माता-पिता के अटूट विश्वास की रोशनी से जगमगा रहा था।

यदि आप भी आज के समाज में बेटियों के माता-पिता हैं या बेटियों को समाज की असली ताकत मानते हैं, तो आपके विचार से एक परिवार और समाज की सोच में सबसे बड़ा बदलाव क्या होना चाहिए? क्या आज भी हमारे आस-पास ‘वंश’ के नाम पर बेटियों को कमतर आंका जाता है? अपनी राय नीचे जरूर व्यक्त करें।

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 मूल लेखिका : सुल्ताना ख़ातून

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