उम्मीदों का नया सबेरा – मंजू ओमर

सावित्री के घर जैसे आज एक नया सबेरा हुआ है। सभी के चेहरे खुशी से खिले हैं। आठ सालों के लंबे इंतजार के बाद सावित्री की बहू की खुशी की खबर आई है। अब घर मे किलकारियां गूंजेगी, मै भी उसे गोद मे लेकर अपने सारे अरमान पूरे करूगीं। कितना तरसी हूँ ऐसा समय देखने … Read more

प्यार और त्याग से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती – हर्षिता सिंह

“नहीं भाभी, यह तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। आप चाहे कितना भी इमोशनल ड्रामा कर लें, लेकिन मुझे वह कमरा हर हाल में खाली चाहिए ही चाहिए।” सुमेधा ने अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के बिल्कुल साफ-साफ शब्दों में अपनी जेठानी विशाखा से कह दिया। सुमेधा की आवाज़ में एक अजीब सी कठोरता … Read more

असली खुशी…अपनों के साथ… – मोहिनी मिश्रा

दोपहर के करीब दो बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर जूठे बर्तनों का ढेर लगा था और विशाखा जल्दी-जल्दी उन्हें समेट कर सिंक में डाल रही थी। अभी-अभी उसके पति सुमित और दोनों बच्चे खाना खाकर अपने-अपने कमरों में गए थे। विशाखा की नज़र बार-बार दीवार घड़ी पर जा रही थी। आज महीने का वो … Read more

निस्वार्थ

इस बार देवकीनंदन ने भी अपने जोड़े हुए आखिरी तीन हज़ार रुपये उस फंड में डाल दिए। उन्हें पता था कि 100 लोगों में से उनका नाम निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता है। उन्होंने रात भर अपनी आँखों में आंसू लिए भगवान विश्वनाथ से … Read more

मैं समाज के डर से तुझे मौत के मुंह में धकेलने जा रही थी। – शारदा सक्सेना 

ड्राइंग रूम में एक ऐसा भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे वहां मौजूद हर शख्स की तेज सांसें और उलझनें और भी गहरा कर रही थीं। वीरेंद्र जी सोफे पर सिर थामे बैठे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थीं और आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। उनके सामने उनकी पत्नी सुषमा, … Read more

सुमन ताई

“सुमन ताई, आज ये सूखी लाल मिर्च, लहसुन और राई का मसाला आप सिलबट्टे पर पीस देंगी क्या?” काव्या ने रसोई के दरवाज़े पर खड़ी अपनी कामवाली ताई से बेहद झिझकते हुए और धीमी आवाज़ में पूछा। सुमन ताई ने एक पल के लिए काव्या की तरफ देखा और फिर घबराकर अपने दोनों कान पकड़ … Read more

अटूट बंधन

घर की मंझली बहू रितु बार-बार छज्जे पर आ रही थी और गली के नुक्कड़ की तरफ देखकर भारी कदमों से वापस लौट जा रही थी। उसकी देवरानी श्रेया और जेठानी नेहा भी मायके से घर आ चुकी थीं और नीचे आंगन में बहुत ही ज्यादा चहल-पहल थी। घर के सभी लोग होली के त्योहार … Read more

संतोष के आंसू – प्रियंका नाथ

“क्या कर रही हो तुम मीरा? पागल हो गई हो क्या?” कमरे में घुसते ही कमला जी की आवाज़ में एक तीखापन और गहरी हैरानी थी। उनकी नज़र बिस्तर पर रखे उस लाल मखमली डिब्बे पर थी, जिसमें मीरा का पुश्तैनी भारी सोने का हार और कंगन रखे हुए थे। साथ ही मेज पर बैंक … Read more

खुशियां बांटने से बढ़ती हैं – मोहिनी मिश्रा

दीवाली के त्योहार की सुबह थी। सूरज ने अभी तक अपनी किरणें नहीं बिखेरी थीं, लेकिन निर्मला जी की सुबह हमेशा की तरह अलार्म बजने से पहले ही हो चुकी थी। भोर के चार बज रहे थे। घर में गहरी शांति थी, सिर्फ रसोई से बर्तनों की हल्की खनक और बेसन भूनने की सोंधी महक … Read more

रिश्तों में अधिकार से ज्यादा प्रेम और भरोसे की ज़रूरत होती है? – मीना सहाय 

रक्षाबंधन का त्यौहार नज़दीक था, इसलिए कुंती अपनी भतीजी की शादी की तारीख पक्की होने की खुशी में अपने मायके, यानी अपने भाई के घर आई हुई थी। यहाँ आए उसे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन इन तीन दिनों में उसने इस घर में जो कुछ देखा, वह उसकी अपनी सोच और जीवनशैली से … Read more

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