जड़ों की पुकार

 सुमित्रा की बात सुनते ही मेरे मन का सारा बोझ, सारा अपराधबोध जैसे आंसुओं के साथ बह गया। मैंने सुमित्रा की ओर देखा। एक स्त्री जब माँ बनती है तो त्याग की प्रतिमूर्ति होती है, और जब वह बहू बनती है तो बिखरते हुए रिश्तों को एक सूत्र में पिरोने वाली डोरी बन जाती है। … Read more

स्वाभिमान की दहलीज

“नहीं मानव, आज बात कमरे में नहीं, सबके सामने होगी,” अवंतिका ने अपनी आवाज़ में बिना कोई कड़वाहट लाए कहा। “तुमने मुझसे वादा किया था कि तुम मेरा सम्मान करोगे, मुझे समझोगे। लेकिन तुमने तो मुझे सिर्फ एक भूमिका में बाँध दिया। मैंने प्रेम विवाह किया था क्योंकि मुझे तुम पर भरोसा था। मैंने अपनी … Read more

अनकही कसक और ममता का सच

रात के करीब दस बज रहे थे। जयपुर की गुलाबी ठंड धीरे-धीरे अपने पैर पसार रही थी। पूरे दिन की गहमागहमी के बाद घर में सन्नाटा उतरने लगा था। रसोई का सारा काम निबटाकर, गैस का चूल्हा पोंछकर अवनि ने भारी सांस छोड़ी। सुबह पांच बजे से वह लगातार पैरों पर खड़ी थी। घर के … Read more

दीवार के उस पार का आँगन

 तन्वी ने उँगली उठाकर उस छह फीट ऊँची ईंटों की दीवार की तरफ इशारा किया, “यह दीवार… यह दीवार सिर्फ पत्थरों की नहीं है। यह आप दोनों के अहम् की वो खूनी लकीर है जिसने नानी की छाती को दबा रखा है। जब एक माँ ने आप दोनों को नौ महीने अपनी कोख में रखा, … Read more

आईना और अनुभव

 “मुझे माफ कर दे नंदिनी,” सुमित्रा का गला भर आया। “मैं यह भूल गई थी कि किसी पौधे को बड़ा करने के लिए उस पर धूप बरसाने से ज्यादा जरूरी उसे खाद और पानी देना होता है। मैंने तुझसे उस समझदारी की उम्मीद की, जिसे हासिल करने में मुझे खुद पच्चीस साल लग गए। तूने … Read more

मान का तराजू

अवनि की आंखों में अपमान और बेबसी के आंसू उमड़ आए, लेकिन उसके संस्कारों ने उसे अपनी सास के सामने पलटकर जवाब देने की अनुमति नहीं दी। उसने अपने होंठ भींचे, सिर झुकाया और बिना एक शब्द कहे भारी कदमों से अपने शयनकक्ष की ओर चली गई। कमरे का दरवाजा बंद करते ही उसका संयम … Read more

सिंदूरी साँझ का इंतज़ार

 नैना के मुँह से कोई शब्द नहीं फूटा। उसने काँपते हाथों को आगे बढ़ाया, जैसे यह तस्दीक करना चाहती हो कि सामने खड़ा इंसान हाड़-मांस का सच है या कोई छलावा। जैसे ही उसकी उंगलियों ने अनिरुद्ध के खुरदुरे कोट को छुआ, अनिरुद्ध ने एक झटके में उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचकर अपने सीने … Read more

ममता की अधूरी देहरी

कल्याणी जी ने प्रज्ञा के आंसुओं को अपने हाथों से पोंछा और उसके माथे को चूमते हुए कहा, “अब कभी मत रोना। तेरी माँ तुझे छोड़कर कहीं नहीं गई थी, शायद वह मेरे ही रूप में तुझ तक पहुँचना चाहती थी। पर मेरी मूर्खता ने तुझे बहुत सताया। अब यह घर, यह परिवार और यह … Read more

रिश्तों की छाँव : एक नई शुरुआत

भोपाल शहर के कोलाहल से दूर एक शांत इलाके में स्थित ‘आश्रय’ वृद्धाश्रम की इमारत वैसे तो बहुत खूबसूरत थी, लेकिन इसके भीतर रहने वालों के दिलों में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता था। इसी आश्रम के एक कोने में स्थित बेंच पर सावित्री देवी का पूरा दिन बीत जाता था। सावित्री देवी को … Read more

पंछी, परवाज़ और खाली घोंसला

सूरत की एक शांत और प्रतिष्ठित कॉलोनी में बने दो मंजिला बंगले ‘आनंद निकेतन’ के बड़े से दालान में बैठी सुमित्रा देवी अपने कांपते हाथों से चाय की चुस्कियां ले रही थीं। सुबह की धूप आंगन में उतर आई थी, लेकिन उस विशाल घर का कोना-कोना एक अजीब से सन्नाटे में डूबा हुआ था। दीवार … Read more

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