यह डिबिया उन्होंने कल शाम को ही खरीदी थी। कल करवा चौथ से ठीक एक दिन पहले की शाम थी। दीनानाथ जी बाजार गए थे और न जाने किस अंतःप्रेरणा से उनके कदम एक पुरानी सुनार की दुकान पर रुक गए थे। उन्होंने अपनी पेंशन के बचे हुए पैसों से सोने की एक पतली सी, नक्काशीदार पायल खरीदी थी। वही पायल, जिसकी इच्छा शारदा ने अपनी शादी के दूसरे साल बड़े संकोच से जताई थी और दीनानाथ ने ‘फिजूलखर्ची’ कहकर टाल दिया था।
अस्पताल के आईसीयू के बाहर फैली सफेद रोशनी बहुत ठंडी और चुभने वाली लग रही थी। दीवार पर लगी घड़ी की सुइयां जैसे थम सी गई थीं। हर टिक-टिक के साथ सन्नाटा और गहरा होता जा रहा था। कॉरिडोर की लोहे की बेंच पर सिर झुकाए बैठे थे दीनानाथ जी। उनके कांपते हुए हाथ घुटनों पर टिके थे और आँखें फर्श की उन बेजान टाइलों पर गड़ी थीं, जिनका रंग शायद उन्होंने पहले कभी ध्यान से देखा भी नहीं था। भीतर कांच के उस पार, उनकी धर्मपत्नी शारदा वेंटिलेटर की नलियों और मॉनिटर की धड़कनों के बीच ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ रही थीं।
सब कुछ कितनी तेजी से बदल गया था। कल रात तक सब कुछ आम दिनों जैसा ही था। रात के करीब दो बजे शारदा ने अचानक सीने में भयानक दर्द की शिकायत की थी। उन्होंने बस इतना ही कहा था, “सुनिए, घबराहट बहुत ज्यादा हो रही है…” और इसके पहले कि दीनानाथ जी कुछ समझ पाते या पानी का गिलास बढ़ा पाते, शारदा निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी थीं। पड़ोस के लड़के की मदद से किसी तरह उन्हें आधी रात को एम्बुलेंस से अस्पताल लाया गया। डॉक्टरों ने जब देखा तो सीधा आईसीयू में भर्ती कर लिया—गंभीर मैसिव हार्ट अटैक। डॉक्टर ने सुबह हाथ खड़े करते हुए कह दिया था, “दीनानाथ जी, अगले बारह घंटे बहुत नाजुक हैं। दिल का दौरा बहुत बड़ा था। आप बस भगवान से प्रार्थना कीजिए, विज्ञान के हाथ से बात बाहर निकल रही है।”
बेटा समीर और बहू गरिमा दूसरे शहर से पहली फ्लाइट पकड़कर दोपहर तक अस्पताल पहुंच चुके थे। बेटी पल्लवी भी अपने ससुराल से रोती-बिलखती दौड़ी आई थी। दोनों बच्चे बदहवास थे, लेकिन दीनानाथ जी जैसे पत्थर की मूरत बन चुके थे। न आँख से एक बूंद आंसू गिर रहा था, न होठों से कोई शब्द निकल रहा था। समीर ने कई बार पिता के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “पापा, आप कुछ खा लीजिए… बैठिए आराम से… माँ ठीक हो जाएंगी।” पर दीनानाथ जी ने न तो पलकें झपकाईं और न ही अपनी जगह से एक इंच हिले। उनका मौन किसी भीषण तूफान से पहले की खामोशी जैसा था।
दीनानाथ जी के सीने में उस वक्त जो बवंडर चल रहा था, उसे दुनिया की कोई भाषा बयां नहीं कर सकती थी। उनकी बंद आँखों के पीछे पैंतीस साल का बीता हुआ जीवन किसी पुरानी रील की तरह तेजी से घूमने लगा था।
पैंतीस साल पहले जब शारदा नई-नवेली दुल्हन बनकर इस घर की देहरी पर आई थीं, तो उनकी आँखों में न जाने कितने सपने थे। लेकिन दीनानाथ जी का जीवन कांटों और जिम्मेदारियों से भरा हुआ था। वे एक साधारण से सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। पिता का साया शादी से पहले ही उठ चुका था। बूढ़ी माँ की लगातार चलने वाली दवाइयां, दो छोटे भाइयों की कॉलेज की पढ़ाई और तीन छोटी बहनों की शादी का पूरा दारोमदार अकेले दीनानाथ के कंधों पर था। तनख्वाह इतनी सीमित थी कि महीने के बीस दिन गुजरते ही जेब खाली हो जाती थी।
उन कठिन दिनों में शारदा ने कभी किसी चीज़ की फरमाइश नहीं की। घर में कब नया कपड़ा आया, कब कोई गहना बना, शारदा ने कभी पूछा तक नहीं। जब बहन की शादी के लिए पैसों की तंगी हुई, तो शारदा ने बिना एक पल गंवाए अपनी शादी की सोने की चूड़ियां उतारकर दीनानाथ की हथेली पर रख दी थीं। दीनानाथ की आँखें भर आई थीं, पर उन्होंने केवल इतना कहा था, “समय आने पर वापस बनवा दूंगा।” लेकिन वह ‘समय’ गृहस्थी की चक्की में ऐसा पिसा कि कभी आया ही नहीं।
भाइयों की नौकरियां लगीं, वे अपने-अपने परिवारों के साथ अलग हो गए। बहनों की शादियां हो गईं। बच्चे बड़े हुए, समीर और पल्लवी की शादियां हुईं। दीनानाथ जी जिम्मेदारियों के बोझ तले ऐसे दबे रहे कि उन्होंने कभी ठहरकर अपनी अर्धांगिनी की ओर देखा ही नहीं। नौकरी की भागदौड़, फाइलों का ढेर, बच्चों की फीस और रिश्तेदारों की मान-मनौव्वल में वे इतने उलझे रहे कि पत्नी को केवल घर चलाने वाली एक मशीन समझ बैठे।
सुबह उठकर चाय की प्याली से लेकर रात को बिस्तर लगाने तक, शारदा की मौजूदगी हवा की तरह स्वाभाविक मान ली गई थी—जिसकी कद्र तब तक नहीं होती जब तक सांसें रुकने न लगें। दीनानाथ जी स्वभाव से बहुत रूखे और मितभाषी बन चुके थे। उन्होंने कभी शारदा से मीठे बोल नहीं बोले, कभी उनकी थकान के बारे में नहीं पूछा, कभी किसी तीज-त्योहार पर उनके हाथों में कोई छोटा सा तोहफा नहीं रखा। अगर शारदा कभी नई साड़ी की बात छेड़तीं, तो दीनानाथ झुंझलाकर कह देते, “क्या करोगी इतने तामझाम का? घर में ही तो रहना है।” और शारदा चुपचाप अपनी पुरानी सूती साड़ी का पल्लू कसकर फिर से रसोई के चूल्हे में अपनी ख्वाहिशों को झोंक देती थीं।
अचानक दीनानाथ जी के कानों में पंडित जी की पुरानी कही एक बात गूंजने लगी। वे हड़बड़ा कर खड़े हो गए। उनकी नजर अपने कुर्ते की जेब पर गई। कांपती हुई उंगलियों से उन्होंने कुर्ते की ऊपरी जेब को छुआ। भीतर मखमल की एक छोटी सी डिबिया रखी हुई थी।
यह डिबिया उन्होंने कल शाम को ही खरीदी थी। कल करवा चौथ से ठीक एक दिन पहले की शाम थी। दीनानाथ जी बाजार गए थे और न जाने किस अंतःप्रेरणा से उनके कदम एक पुरानी सुनार की दुकान पर रुक गए थे। उन्होंने अपनी पेंशन के बचे हुए पैसों से सोने की एक पतली सी, नक्काशीदार पायल खरीदी थी। वही पायल, जिसकी इच्छा शारदा ने अपनी शादी के दूसरे साल बड़े संकोच से जताई थी और दीनानाथ ने ‘फिजूलखर्ची’ कहकर टाल दिया था।
कल शाम जब वे घर लौटे थे और उन्होंने वह डिबिया चुपचाप शारदा के तकिए के पास रख दी थी, तो शारदा ने चौंककर उसे खोला था। सोने की पायल की चमक देखकर शारदा की आँखें फटी की फटी रह गई थीं। उन्होंने घबराकर पूछा था, “यह… यह किसके लिए लाए हैं? क्या समीर की बहू के लिए है या पल्लवी के मायके आने की खुशी में?”
दीनानाथ जी ने नजरें चुराते हुए रूखे स्वर में कहा था, “तुम्हारे लिए है। कल करवा चौथ है न।”
शारदा अवाक रह गई थीं। उनकी आँखों के कोरों से दो बूंद आंसू ढुलक कर गालों पर आ गए थे। उन्होंने फीकी सी मुस्कान के साथ कहा था, “अब इस ढलती उम्र में, जब पाँव में गठिया का दर्द रहता है, इन सोने की पायलों की क्या जरूरत थी? जवानी तो सूखी बीत गई, अब इन उपहारों का क्या मोल?”
उस वक्त दीनानाथ जी को गुस्सा आ गया था। उनका पुरुषोचित अहंकार जाग उठा था। उन्होंने चिढ़कर कहा था, “ठीक है, अगर नहीं चाहिए तो फेंक दो। उपहार कभी लाकर नहीं दिए, इसका यह मतलब तो नहीं कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ किया ही नहीं। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी जवानी, अपना चैन सब इस परिवार को ही तो समर्पित किया है। क्या मेरा वो समर्पण कोई उपहार नहीं था?”
और शारदा ने बिना कुछ कहे वह डिबिया वहीं ड्रेसिंग टेबल पर रख दी थी और चुपचाप पानी का लोटा लेकर रसोई की तरफ बढ़ गई थीं।
और आज… आज वह डिबिया दीनानाथ जी की जेब में थी और शारदा उस ठंडे कमरे में मौत से लड़ रही थीं। दीनानाथ जी के भीतर अपराधबोध की ज्वाला धधक उठी। वे मन ही मन चीख पड़े, “कैसा समर्पण? कैसा विश्वास? जो इंसान अपनी जीवनसंगिनी के चेहरे पर एक पल की सच्ची मुस्कान न ला सका, जिसने कभी उसके त्याग को शब्दों में मान न दिया, उसका समर्पण कैसा? मैंने उसे सब कुछ दिया सिवाय उस प्यार के, उस सम्मान के, जिसकी वह हकदार थी। मैंने उसकी खामोशी को उसकी आदत समझ लिया। मैंने समझा कि छत और रोटी दे देना ही पति का कर्तव्य है।”
तभी आईसीयू का दरवाजा खुला। डॉक्टर बाहर निकले। उनका चेहरा बेहद गंभीर था। समीर और पल्लवी दौड़कर डॉक्टर के पास पहुंचे, “डॉक्टर अंकल! माँ कैसी हैं?”
डॉक्टर ने थके हुए स्वर में कहा, “स्थिति बहुत नाजुक है। उनका बीपी लगातार गिर रहा है और दवाइयां असर नहीं कर रही हैं। ऐसा लग रहा है मानो उनके भीतर से जीने की इच्छा ही खत्म हो चुकी हो। मेडिकल साइंस में एक मरीज की ‘विल पावर’ यानी जीने की चाहत बहुत मायने रखती है। अगर अगले एक घंटे में उनकी स्थिति नहीं सुधरी, तो हम उन्हें खो देंगे। आप लोग चाहें तो एक-एक करके उनसे आखिरी बार मिल सकते हैं।”
‘आखिरी बार’… यह शब्द सुनते ही पल्लवी दहाड़ मारकर रो पड़ी। समीर दीवार से टिककर बैठ गया।
लेकिन दीनानाथ जी के चेहरे पर अब पत्थर जैसा सन्नाटा नहीं था। उनकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन, एक विद्रोही संकल्प जाग उठा था। उन्होंने अपनी लाठी वहीं फर्श पर छोड़ दी और सीधे आईसीयू के दरवाजे की तरफ बढ़ गए।
नर्स ने उन्हें रोकना चाहा, “सर, आप ऐसे अंदर नहीं जा सकते, मास्क और गाउन…”
“हटो सामने से!” दीनानाथ जी की आवाज में ऐसी गरज थी कि नर्स सहम कर पीछे हट गई। उनके भीतर का सारा संकोच, सारी मर्यादाएं उस पल टूट चुकी थीं। वे भारी कदमों से आईसीयू के भीतर दाखिल हुए।
अंदर केवल मशीनों की बीप-बीप की आवाज़ गूंज रही थी। सामने बिस्तर पर शारदा लेटी थीं। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था, होंठ सूखे थे और आँखों की पलकें बिल्कुल स्थिर थीं। छाती पर कई तार बंधे थे और मुंह में ऑक्सीजन की नली लगी थी।
दीनानाथ जी धीरे-धीरे उस बिस्तर के पास पहुंचे। उन्होंने कांपते हाथों से शारदा के ठंडे पड़ चुके पैर को छुआ। वे पैर, जो पैंतीस साल तक पूरे घर की सेवा में सुबह चार बजे से रात बारह बजे तक बिना रुके चलते रहे थे। आज वे पैर बर्फ जैसे ठंडे थे।
दीनानाथ जी वहीं घुटनों के बल फर्श पर बैठ गए। उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से कुर्ते की जेब से मखमल की डिबिया निकाली। डिबिया खोलकर उन्होंने वह सोने की पायल बाहर निकाली।
दीनानाथ जी ने शारदा के निर्जीव से लग रहे दाहिने पैर को अपनी हथेलियों में उठाया। उनकी आँखों से बरसों का जमा हुआ बांध टूट गया। आंसुओं की अविरल धारा शारदा के पैर के पंजों पर गिरने लगी।
“शारदा…” दीनानाथ जी की आवाज रुंध गई, पर उसमें रूह को चीर देने वाला दर्द था। “तुम ऐसे नहीं जा सकतीं। तुम मुझे इस तरह बीच राह में छोड़कर नहीं भाग सकतीं। तुमने पूरी ज़िंदगी मेरी खामोशी को सहा है, आज तुम्हें मेरी आवाज सुननी होगी।”
उन्होंने अपनी कांपती हथेलियों से वह सोने की पायल शारदा के पैर में पहना दी। पायल के घुंघरुओं की हल्की सी रुनझुन उस सन्नाटे भरे आईसीयू में गूंज उठी।
दीनानाथ जी ने अपनी जेब से सिंदूर की एक छोटी सी पुड़िया निकाली, जो वे घर से निकलते वक्त पूजा के मंदिर से उठा लाए थे। उन्होंने कांपती उंगलियों से चुटकी भर सिंदूर लिया और शारदा के माथे पर, जहां बाल सफेद हो चुके थे, उनकी मांग में भर दिया।
आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ दीनानाथ जी ने शारदा का सिर अपनी गोद में रख लिया। वे बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोने लगे।
“शारदा, मुझे माफ कर दो! मैं बहुत अहंकारी था। मैंने समझा कि बाहर की दुनिया से लड़कर घर में पैसे ले आना ही प्यार है। मैं कभी नहीं समझ पाया कि एक औरत के लिए उसके पति के दो मीठे बोल, उसकी कद्र और उसकी आँखों में दिखने वाला अपनापन दुनिया की हर दौलत से बड़ा होता है। मैंने तुम्हें कभी पत्नी का सुख नहीं दिया, सिर्फ एक सेवक की तरह तुम्हारा इस्तेमाल किया। मैंने तुम्हें कभी तोहफा नहीं दिया, और जब दिया भी तो उस पर अपने एहसानों की मुहर लगा दी। मैं गलत था शारदा, मैं बिल्कुल गलत था!”
दीनानाथ जी ने शारदा के ठंडे माथे पर अपना सिर टिका दिया और रोते हुए बोले, “आज करवा चौथ है शारदा। तुम हर साल मेरी लंबी उम्र के लिए भूखी-प्यासी रहकर व्रत रखती थीं ना? आज मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ, आज मैं तुम्हारे जीवन की भीख मांगता हूँ। तुम्हें उठना होगा। तुम्हें मेरी इस पायल को पहनकर चलना होगा। मुझे मौका दो शारदा, मुझे अपने उन पैंतीस सालों के गुनाहों का प्रायश्चित करने दो। अगर तुम चली गईं, तो मैं इस दुनिया में एक पल भी जी नहीं पाऊंगा। मेरी सांसें तुम्हारे दम से हैं… उठो शारदा, अपनी पायल की छन-छन मुझे सुनाओ…”
दीनानाथ जी के गर्म आंसू लगातार शारदा के गालों और माथे पर गिर रहे थे। उनका समर्पण, उनका पश्चाताप और उनकी आत्मा की पुकार उस पल किसी अलौकिक शक्ति से कम नहीं थी।
तभी, कमरे में बज रही मशीनों की रफ्तार बदलने लगी। मॉनिटर पर एक सीधी लकीर की ओर बढ़ रही धड़कनें अचानक तेज होने लगीं। ‘बीप… बीप… बीप…’ की आवाज में एक नई लय आ गई।
दीनानाथ जी ने घबराकर सिर उठाया।
शारदा की बंद पलकों के कोरों से आंसुओं की एक पतली सी धार धीरे-धीरे बहकर तकिए में समा रही थी। और फिर, एक चमत्कार हुआ। शारदा की निर्जीव पड़ी उंगलियों में हल्की सी हरकत हुई। उनकी कांपती हुई उंगली ने दीनानाथ जी के हाथ को आहिस्ता से छू लिया।
शारदा ने बहुत धीरे से अपनी भारी पलकें खोलीं। उनकी धुंधली नजरों ने सामने रोते हुए दीनानाथ जी को देखा। उनके सूखे होंठों पर एक बहुत ही हल्की, पर बेहद तृप्त मुस्कान तैर गई। ऑक्सीजन मास्क के भीतर से उनकी सांसें गहरी होने लगी थीं।
डॉक्टर और नर्स दौड़ते हुए अंदर आए। मॉनिटर के आंकड़े देखकर डॉक्टर की आँखें फटी की फटी रह गईं। डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप लगाकर जांच की और चकित होकर बोले, “अनबिलीवेबल! पल्स वापस आ रही है, बीपी सामान्य हो रहा है। यह किसी मेडिकल साइंस का कमाल नहीं है दीनानाथ जी, यह साक्षात ईश्वर की कृपा और आपकी सच्ची प्रार्थना का चमत्कार है। आपकी पत्नी खतरे से बाहर हैं!”
समीर, पल्लवी और गरिमा दरवाजे पर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। सबकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था।
शारदा ने कमजोर आवाज में अपने होंठ हिलाए। दीनानाथ जी ने फौरन अपना कान उनके चेहरे के पास किया।
शारदा ने बेहद धीमे स्वर में कहा, “पायल… बहुत सुंदर है…”
दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए अपनी दोनों आँखों को पोंछा और शारदा के कमजोर हाथों को अपने दोनों हाथों में थामकर चूम लिया। उन्होंने कहा, “अब पूरी ज़िंदगी यह पायल तुम्हारे पैरों में खनकेगी, और मैं हर पल इस आवाज को सुनकर अपनी गलतियों को सुधारूंगा।”
उस दिन अस्पताल के उस कमरे में करवा चौथ का सबसे बड़ा पर्व मनाया गया था। किसी ने पानी का घूंट नहीं पिया था, किसी ने चांद नहीं देखा था, लेकिन दो आत्माओं ने एक-दूसरे को उस दिन सचमुच पा लिया था। प्रेम जो बरसों से जिम्मेदारियों की धूल में दबा हुआ था, वह पश्चाताप और सच्ची स्वीकारोक्ति की बारिश में पूरी तरह धुल चुका था। उस दिन दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी को सिर्फ सोने की पायल का उपहार नहीं दिया था, बल्कि उसे जीवन भर के सच्चे आदर, प्रेम और अपनी आत्मा का उपहार सौंप दिया था—एक ऐसा उपहार, जिसने मौत के मुंह से ज़िंदगी को छीन लिया था।
क्या आपको भी लगता है कि गृहस्थी की जिम्मेदारियों और भागदौड़ में हम अक्सर अपने जीवनसाथी की भावनाओं और उनके छोटे-छोटे अरमानों को अनदेखा कर देते हैं? क्या प्यार को सिर्फ दिल में रखना काफी है, या उसे शब्दों और आदर से जताना भी उतना ही जरूरी है? इस भावुक कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।