यह सब सुनकर जयंत की मुट्ठियों में खून उतर आया। उसका मन किया कि वह अभी जाकर उस दरिंदे का गिरेबान पकड़ ले। लेकिन जयंत जानता था कि केवल गुस्से से काम नहीं चलेगा। अगर उसने कोई कानूनी या सामाजिक तमाशा खड़ा किया, तो यह पुरुष प्रधान समाज उस वहशी को सजा देने से पहले वंदना के चरित्र पर सैकड़ों लांछन लगाकर उसे आत्महत्या की कगार पर धकेल देगा। वंदना को केवल उस घर से बाहर नहीं निकालना था, बल्कि उसे एक सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वतंत्र जीवन देना था।
दिसंबर की सुनहरी धूप में बालकनी की रेलिंग से पीठ टिकाए जयंत अपने हाथ में रखी चाय की प्याली को देख रहा था। सामने बने छोटे से पार्क में एक युवा जोड़ा बेंच पर बैठा धीरे-धीरे बातें कर रहा था। लड़के ने झुककर बड़े जतन से उस लड़की के हाथ पर अपनी हथेली रखी, तो लड़की के चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान बिखर गई। उस मासूम दृश्य को देखते ही जयंत का मन वर्तमान की सीमाएं लांघकर सीधे सात साल पीछे, विश्वविद्यालय के उन पुराने गलियारों में पहुंच गया, जहां जिंदगी ने उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती और सबसे सुंदर एहसास एक साथ रख दिया था।
जयंत को अच्छी तरह याद था वह दिन, जब उसने स्नातकोत्तर के पहले वर्ष में दाखिला लिया था। विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग में एक से बढ़कर एक आधुनिक, फैशनेबल और प्रभावशाली परिवारों से आने वाले छात्र-छात्राएं मौजूद थे। चारों तरफ हंसी-ठहाके, नए चलन के कपड़े और अंग्रेजी के रटे-रटाए मुहावरों का शोर रहता था। लेकिन उस पूरे हुजूम के बीच, जयंत की आंखें पहली ही क्लास में पिछली बेंच के सबसे कोने में बैठी उस सांवली सी, शांत लड़की पर जाकर ठहर गई थीं।
उसका नाम था वंदना। साधारण सी सूती साड़ी या फीके रंग का सलवार-सूट, चेहरे पर बिना किसी बनावट के फैली एक गहरी उदासी और आंखों में एक अजीब सा खौफ। वह कभी किसी से बात नहीं करती थी। क्लास खत्म होते ही अपना भारी सा झोला सीने से चिपकाकर सीधे बाहर निकल जाती, मानो कोई उसका पीछा कर रहा हो।
जयंत ने शुरुआत में सोचा कि शायद वह स्वभाव से संकोची है। एक दिन जब लाइब्रेरी से बाहर निकलते हुए वंदना की किताबें फर्श पर गिर पड़ीं, तो जयंत ने झुककर उन्हें समेटा और आगे बढ़कर बहुत शालीनता से कहा, “नमस्ते, मैं जयंत हूँ… फाइनल ईयर के प्रोजेक्ट में हम दोनों का एक ही ग्रुप हो सकता है, अगर तुम चाहो तो हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं।”
वंदना ने कांपते हाथों से अपनी किताबें उसके हाथ से छीनीं। उसकी आंखों में दोस्ती का कोई स्वागत नहीं था, बल्कि एक गहरा, दहला देने वाला डर था। उसने बिना नजरें मिलाए रूखे स्वर में कहा, “मुझे किसी से कोई दोस्ती नहीं करनी। आप अपने रास्ते रहिए और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए।” इतना कहकर वह लगभग दौड़ते हुए वहां से निकल गई।
जयंत कोई साधारण, आवारा लड़का नहीं था। वह छात्र संघ का सम्मानित सदस्य था, प्रोफेसर उसका आदर करते थे और पूरे कॉलेज में उसकी पहचान एक सुलझे हुए, मददगार नौजवान के रूप में थी। वंदना के उस रूखेपन ने जयंत को आहत नहीं किया, बल्कि उसके मन में एक बेचैनी भर दी। उसने महसूस किया कि वंदना का यह रूखापन घमंड नहीं, बल्कि अपने इर्द-गिर्द बनाया गया एक सुरक्षा कवच था, जिसके पीछे कोई भयानक दर्द कराह रहा था। जयंत ने कभी उसके बाद उसका रास्ता नहीं रोका, न कभी उसे तंग किया, लेकिन उसकी नजरें हमेशा भीड़ में वंदना की सुरक्षा को तलाशती रहीं।
सच्चाई का पर्दा तब उठा जब कुछ महीनों बाद जयंत के एक पुराने सहपाठी, दीपक, ने बातों-बातों में शहर के पुराने इलाके का जिक्र किया। बातचीत के दौरान पता चला कि वंदना उसी के मोहल्ले के एक पुराने, बदहाल मकान में रहती थी। दीपक ने इधर-उधर देखकर बहुत दबी जुबान में जयंत को जो बताया, उसने जयंत के पैरों तले से जमीन खिसका दी।
वंदना जब महज बारह साल की थी, तब एक भीषण सड़क दुर्घटना में उसके माता-पिता दोनों की मौत हो गई थी। उसकी एक छोटी बहन थी, जिसे नाना-नानी अपने साथ गांव ले गए थे क्योंकि वे दो-दो बच्चियों का खर्च उठाने में असमर्थ थे। वंदना को उसके सगे मौसा ने अपने संरक्षण में ले लिया था। वह मौसा शहर के एक रसूखदार, लेकिन चरित्रहीन और हिंसक प्रवृत्ति का आदमी था। उसकी अपनी पत्नी यानी वंदना की मौसी कई साल पहले उस आदमी के जुल्मों से तंग आकर अपनी जान दे चुकी थी।
अनाथ और असहाय वंदना को उस घर में आश्रय के नाम पर केवल नर्क मिला था। वह मौसा वंदना को एक बंधुआ नौकरानी और अपने हवस के साए में घुटने वाली लाचार दासी बनाकर रखता था। मोहल्ले के लोग सब जानते थे, लेकिन उस दबंग आदमी के डर और समाज की तथाकथित ‘इज्जत’ के पाखंड के चलते सबने अपनी आंखें मूंद रखी थीं। वंदना की पढ़ाई बस इसलिए जारी थी ताकि दुनिया को दिखाने के लिए एक पर्दा बना रहे कि वह अपनी भांजी को पढ़ा रहा है। हर शाम उस घर में लौटना वंदना के लिए जीते जी चिता पर लेटने जैसा था।
यह सब सुनकर जयंत की मुट्ठियों में खून उतर आया। उसका मन किया कि वह अभी जाकर उस दरिंदे का गिरेबान पकड़ ले। लेकिन जयंत जानता था कि केवल गुस्से से काम नहीं चलेगा। अगर उसने कोई कानूनी या सामाजिक तमाशा खड़ा किया, तो यह पुरुष प्रधान समाज उस वहशी को सजा देने से पहले वंदना के चरित्र पर सैकड़ों लांछन लगाकर उसे आत्महत्या की कगार पर धकेल देगा। वंदना को केवल उस घर से बाहर नहीं निकालना था, बल्कि उसे एक सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वतंत्र जीवन देना था।
अगले दिन कॉलेज में वंदना जब उदास कदमों से कैंपस में दाखिल हुई, तो जयंत ने दूर से ही कॉलेज के पुराने माली रामू काका को बुलाया। उसने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला, जिसमें एक पत्र था, और रामू काका से कहा कि वह चुपचाप इसे वंदना की मेज पर रख आएं।
वंदना जब अपनी सीट पर पहुंची, तो उसने उस सादे लिफाफे को देखा। उसने कांपती उंगलियों से उसे खोला। पत्र में लिखा था:
“वंदना, मैं तुम्हारी लाचारी, तुम्हारी खामोशी और उस नर्क की पूरी सच्चाई जान चुका हूँ जिससे तुम हर रोज़ गुजरती हो। मैं तुम्हें किसी दया की नजर से नहीं देखता, बल्कि उस असीम साहस की नजर से देखता हूँ जो इतनी भयानक आग में जलकर भी अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। कल दिवाली है, जब पूरी दुनिया रोशनी के दीये जलाएगी। अगर तुम चाहो, तो इस अंधेरे को हमेशा के लिए अपने जीवन से मिटा सकती हो। तुम जैसी भी हो, जिस भी हाल में हो, मुझे पूरे सम्मान और समर्पण के साथ स्वीकार हो। अगर तुम्हें मुझ पर रत्ती भर भी भरोसा है, तो कल सुबह दस बजे शहर के प्राचीन शिव मंदिर के पीछे वाले पुस्तकालय में आ जाना। वहां से एक नई, स्वाभिमानी जिंदगी की शुरुआत होगी। फैसला पूरी तरह तुम्हारा है।”
पत्र पढ़कर वंदना के हाथ कांपने लगे। उसकी आंखों से आंसुओं की दो मोटी बूंदें उस कागज पर गिरकर स्याही को फैलाने लगीं। बरसों से जिस समाज ने उसे सिर्फ नोचने या अनदेखा करने की नजर से देखा था, उसी समाज के एक नौजवान ने उसके सामने सम्मान, सुरक्षा और बराबरी का हाथ बढ़ाया था। उस रात वंदना सो नहीं पाई। उसके सामने दो रास्ते थे—या तो उस घिनौने दलदल में घुट-घुट कर अपनी जान दे दे, या फिर उस अजनबी हाथ को थामकर अपनी किस्मत की नई इबारत लिखे।
अगली सुबह, दिवाली की वह शांत बेला थी। मंदिर के पीछे बने शांत पुस्तकालय के बगीचे में जयंत बेचैनी से टहल रहा था। उसकी नजर बार-बार घड़ी की सुइयों पर जा रही थी। ठीक दस बजकर पांच मिनट पर बगीचे के लोहे के गेट की हल्की सी चरमराहट हुई। जयंत ने पलटकर देखा।
सामने वंदना खड़ी थी। उसके हाथ में एक छोटा सा फटा हुआ थैला था, जिसमें उसकी कुछ जरूरी किताबें और कपड़े थे। उसके चेहरे पर खौफ तो था, लेकिन उस खौफ के आर-पार आत्मनिर्णय की एक ऐसी लौ जल रही थी जो जयंत ने पहले कभी नहीं देखी थी।
जयंत ने न कोई सवाल पूछा, न कोई दिलासा देने वाले खोखले शब्द कहे। वह बस दो कदम आगे बढ़ा, उसने बहुत अदब से अपने दोनों हाथ जोड़े और फिर एक खुला हाथ वंदना की ओर बढ़ा दिया।
वंदना की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने बिना किसी झिझक के अपना कांपता हुआ हाथ जयंत की मजबूत हथेली में रख दिया। उस एक स्पर्श में बरसों का छूटा हुआ आत्मसम्मान, टूटे हुए सपनों का सहारा और एक असीम सुरक्षा का अहसास सिमट आया था।
जयंत ने पहले से ही सब योजना बना रखी थी। वह वंदना को सीधे महिला कल्याण आयोग की एक वरिष्ठ वकील और अपनी परिचित समाजसेवी नीलिमा जी के पास ले गया। वहां वंदना के कानूनी बयान दर्ज करवाए गए। पुलिस प्रशासन की मदद से उस दरिंदे मौसा के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में मामला दर्ज करवाकर उसे सलाखों के पीछे भिजवाया गया।
शुरुआत में समाज ने उंगलियां उठाईं, कुछ रिश्तेदारों ने नाक-भौं सिकोड़ी, लेकिन जयंत चट्टान की तरह वंदना के आगे खड़ा रहा। उसने अपने परिवार को बिठाकर साफ शब्दों में कहा, “यदि हम किसी गिरते हुए इंसान को हाथ पकड़कर उठा नहीं सकते, तो हमें खुद को इंसान कहने का कोई हक नहीं है। वंदना किसी पाप की भागीदार नहीं, वह तो जुल्म की शिकार थी। उसका सम्मान अब मेरा सम्मान है।”
जयंत के माता-पिता संस्कारी और संवेदनशील थे। जब उन्होंने वंदना की आंखों में निर्दोषता और संघर्ष की चमक देखी, तो उन्होंने आगे बढ़कर उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया। शादी बहुत सादगी से मंदिर में हुई।
शादी के बाद जयंत ने कभी भूलकर भी वंदना के अतीत का कोई जिक्र नहीं किया। उसने कभी यह अहसास तक नहीं होने दिया कि उसने उस पर कोई उपकार किया है। उसने वंदना की पढ़ाई पूरी करवाई, उसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रेरित किया। वंदना ने भी अपनी रात-दिन की तपस्या से राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की और आज वह महिला एवं बाल विकास विभाग में एक जिम्मेदार राजपत्रित अधिकारी के रूप में सैकड़ों असहाय लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा कर रही थी।
“अरे! कहाँ खोए हुए हो? कब से आवाज दे रही हूँ, चाय ठंडी हो रही है आपकी!”
एक बहुत ही मीठी और आत्मीय आवाज ने जयंत के विचारों की तंद्रा तोड़ दी। जयंत ने चौंककर देखा। सामने वंदना खड़ी थी। मांग में गहरा सिंदूर, चेहरे पर एक गरिमामयी मुस्कान और आंखों में अगाध प्रेम। उसके हाथ में गरम चाय की नई प्याली थी।
जयंत ने मुस्कुराते हुए चाय का कप थामा और वंदना का दूसरा हाथ बड़े प्यार से अपनी हथेलियों में थाम लिया।
“क्या देख रहे थे इतनी देर से पार्क में?” वंदना ने लाड़ से पूछा।
जयंत ने खिड़की से बाहर देखते हुए बहुत कोमलता से कहा, “बस उस सामने बैठे जोड़े को देख रहा था… और सोच रहा था कि आज से सात साल पहले दिवाली के उस पावन दिन जब तुमने उस पुस्तकालय में अपना हाथ मेरे हाथ में सौंपा था, वह केवल एक हाथ नहीं था, वह मेरी जिंदगी का सबसे अनमोल उपहार था। उस दिन तुमने मुझ पर जो भरोसा किया था, मैं हर रोज़ ऊपर वाले से यही दुआ करता हूँ कि उस भरोसे की लाज हमेशा रख सकूं।”
वंदना की आंखें खुशी से भर आईं। उसने धीरे से अपना सिर जयंत के कंधे पर टिका दिया। उसने भर्राए गले से कहा, “जयंत, दुनिया कहती है कि तुमने मुझे नई जिंदगी दी, पर सच तो यह है कि तुमने मुझे उस नर्क से निकालकर एक इंसान होने का अहसास दिया। जब तक मेरी सांसें हैं, मेरा हर कतरा सिर्फ तुम्हारा ऋणी रहेगा।”
बालकनी में सुबह की ताजी धूप खिल चुकी थी और दोनों के चेहरे पर आत्मसम्मान, अटूट विश्वास और सच्चे प्रेम का एक ऐसा उजाला दमक रहा था जिसे वक्त का कोई भी अंधकार कभी धुंधला नहीं कर सकता था।
जीवन में किसी के टूटे हुए अतीत को कुरेदना बहुत आसान होता है, लेकिन किसी के बिखरे हुए सम्मान को समेटकर उसे नई जिंदगी देना ही इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल है। क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्रेम और संबल किसी भी इंसान की किस्मत को पूरी तरह बदल सकता है? अपनी राय और विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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