मां के हाथ से दाल की कलछी छूटते-छूटते बची। पिता जी ने नजरें झुका लीं। अवनि के हलक में निवाला अटक गया। उसकी आंखें डबडबा आईं। उसके आत्मसम्मान पर ऐसा गहरा वार हुआ था कि वह अंदर तक कांप गई। मां-बाप को दुख न पहुंचे, इसलिए उसने जैसे-तैसे दो घूंट पानी पिया, अपनी थाली किनारे सरकाई और चुपचाप उठकर छत के कोने में बने पुराने बरामदे की तरफ चली गई।
सावन की फुहारों ने दिल्ली की तपती सड़कों को तरबतर कर दिया था। बादलों की ओट से छनकर आती हल्की धूप में कनॉट प्लेस की सजी-धजी दुकानों के बाहर लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही थी। शादी के बाद पहला रक्षाबंधन था, इसलिए अवनि के मन में एक अलग ही उल्लास और उमंग की तरंगे हिलोरें ले रही थीं। ससुराल से मायके जाने की खुशी तो हर बेटी के लिए खास होती है, लेकिन जब अपने छोटे भाई के सुनहरे भविष्य की पहली सीढ़ी और पूरे परिवार से मिलने की लालसा हो, तो कदम खुद-ब-खुद हवा में तैरने लगते हैं।
अवनि ने पिछले तीन दिनों से घूम-घूम कर सबके लिए उपहार चुने थे। छोटे भाई आरव के लिए उसने उसकी पसंद का नया ब्रांडेड लैपटॉप बैग, एक शानदार कलाई घड़ी और उसका पसंदीदा परफ्यूम खरीदा था। मां के लिए हल्की बनारसी साड़ी और पिता जी के लिए आरामदायक शॉल। उसने अपने पति समर के साथ मिलकर हर एक चीज को बड़े सलीके से मखमली कागजों में पैक कराया था।
जब अवनि मायके की चौखट पर पहुंची, तो पुरानी लकड़ी के दरवाजे की वही जानी-पहचानी खुशबू ने उसका स्वागत किया। लेकिन जैसे ही उसने बैठक में कदम रखा, देखा कि बड़ी बहन राधिका दीदी पहले से ही सोफे पर विराजमान थीं। राधिका दीदी का विवाह चार साल पहले मुंबई के एक बड़े कारोबारी घराने के चार्टर्ड अकाउंटेंट से हुआ था।
“अरे वाह! साहिबा के कदम आखिरकार मायके में पड़ ही गए,” राधिका ने हाथ में पकड़ी ठंडी कॉफी का घूंट लेते हुए व्यंग्य से कहा।
अवनि ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर दीदी के पैर छुए, “प्रणाम दीदी, आप कब आईं? मुझे लगा आप कल सुबह पहुंचेंगी।”
“हम तो कल रात ही आ गए थे। पर तुम्हारी तरह हमें उड़ते हुए आने की फुर्सत कहाँ? मुंबई में जिंदगी इतनी आसान नहीं होती। फ्लैट की ईएमआई, दोनों गाड़ियों की किस्तें और ऊपर से सोसाइटी के खर्चे… इंसान को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती,” राधिका ने अपने हाथ के सोने के कंगन को घुमाते हुए कहा।
रात बातों-बातों में ही कट गई। कुछ पुरानी खट्टी-मीठी यादें, कुछ औपचारिकताएं। लेकिन राधिका के चेहरे पर एक अजीब सा असंतोष और तुलनात्मक भाव बार-बार उभर आता था।
अगले दिन रक्षाबंधन की सुबह घर में उल्लास का माहौल था। आंगन में रंगोली सजी थी और रसोई से शुद्ध घी की पूरियों और खीर की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। पूजा के बाद जब बहनों ने आरव की कलाई पर राखी बांधी, तो उपहारों के लेन-देन का सिलसिला शुरू हुआ।
अवनि ने बड़े स्नेह से आरव के सामने वह लैपटॉप बैग, कलाई घड़ी और परफ्यूम का डिब्बा रख दिया। आरव की आंखें खुशी से चमक उठीं, “अरे वाह दीदी! आपको कैसे पता चला कि मुझे जर्मनी जाने से पहले इसी बैग की सख्त जरूरत थी? थैंक यू सो मच दीदी!”
यह देखकर राधिका के माथे पर सिलवटें उभर आईं। उसने अपनी चाय की प्याली खट से मेज पर रखी और अपनी तिरछी नजरों से अवनि को घूरते हुए बोली, “वाह भाई! रईसी हो तो ऐसी हो। बना-बनाया आलीशान बंगला मिल गया, दो-दो गाड़ियां दरवाजे पर खड़ी हैं और करोड़ों का भरा-पूरा खानदान मिल गया, तो महंगे तोहफे बांटना बहुत आसान होता है। हमारी तरह अगर हर महीने लाखों की ईएमआई और बजट संभालना पड़ता, तो समझ आता कि एक-एक रुपया कैसे जुटता है।”
अवनि के चेहरे का रंग हल्का सा उड़ गया। उसने बहुत धीमे और शालीन स्वर में कहा, “दीदी, ऐसा नहीं है। यह पहली राखी थी और आरव अगले हफ्ते रिसर्च के लिए जर्मनी जा रहा है। बस इसलिए मन हुआ कि उसके काम की चीजें ले लूं।”
“हां-हां, हमें मत सिखाओ। तुम्हारे तो बड़े ठाठ हैं। बिना मेहनत के ही किस्मत का लॉटरी का टिकट जो लग गया तुम्हारा,” राधिका ने मुंह बनाते हुए ताना मारा।
अवनि खामोश रह गई। वह कहना चाहती थी कि दीदी, किसी दूसरे के बनाए घोंसले में अपने वजूद को नए सिरे से स्थापित करना, उसके अतीत के खालीपन को अपनी आत्मीयता से भरना और हर कदम पर खुद को साबित करना कितना कठिन होता है, यह केवल वही जानती है। तिनका-तिनका जोड़कर अपना आशियाना बनाने में जो स्वाभिमान और खुशी होती है, वह बनी-बनाई छत के नीचे अपनी पहचान तलाशने में कहाँ मिलती है। लेकिन उसने पारिवारिक शांति के लिए अपनी जुबान पर ताला लगा लिया।
दोपहर के खाने की मेज पर जब अवनि ने समर द्वारा विशेष रूप से भिजवाए गए कश्मीरी सेब, सूखे मेवे और हाथ से बने विशेष आचार की बरनियां निकालीं, तो राधिका फिर खिलखिला कर हंस पड़ी।
“ओहो! तो हमारे डाइवोर्सी और उम्रदराज जीजाजी ने विदाई में इतना सब कुछ लाद दिया है? सच है, जब इंसान पहली शादी में मात खा जाता है, तो दूसरी बीवी को खुश रखने के लिए दुनिया भर की दौलत कदमों में बिछा देता है!”
मेज पर अचानक एक भयानक सन्नाटा पसर गया।
मां के हाथ से दाल की कलछी छूटते-छूटते बची। पिता जी ने नजरें झुका लीं। अवनि के हलक में निवाला अटक गया। उसकी आंखें डबडबा आईं। उसके आत्मसम्मान पर ऐसा गहरा वार हुआ था कि वह अंदर तक कांप गई। मां-बाप को दुख न पहुंचे, इसलिए उसने जैसे-तैसे दो घूंट पानी पिया, अपनी थाली किनारे सरकाई और चुपचाप उठकर छत के कोने में बने पुराने बरामदे की तरफ चली गई।
धूप अब तेज हो चुकी थी। अवनि पुराने संदूक के पास रखी लकड़ी की बेंच पर बैठकर अतीत के पन्नों को पलटने लगी।
वह दृश्य उसकी आंखों के सामने किसी चलचित्र की तरह घूमने लगा। चार साल पहले जब राधिका दीदी का विवाह हुआ था, तब पिता जी बैंक के जोनल मैनेजर पद पर कार्यरत थे। उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी और मान-मर्यादा झोंककर दीदी की शादी शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल से करवाई थी। लड़के की हर मांग पूरी की गई थी, लाखों का दान-दहेज दिया गया था। दीदी के ससुराल वालों की खातिरदारी में पिता ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
लेकिन नियति का खेल बड़ा विचित्र होता है। जब अवनि अपनी मास्टर डिग्री के अंतिम वर्ष में थी, पिता जी सेवानिवृत्त हो गए। रिटायरमेंट के ठीक बाद परिवार पर दोहरी जिम्मेदारी आ पड़ी। आरव को दुनिया की प्रतिष्ठित म्यूनिख टेक्निकल यूनिवर्सिटी से रिसर्च स्कॉलरशिप का प्रस्ताव मिला, लेकिन वहां शुरुआती खर्चों और वीजा के लिए एकमुश्त बड़ी रकम की जरूरत थी। ठीक उसी समय अवनि के लिए जो भी रिश्ते आ रहे थे, वे लाखों का दहेज और भव्य शादी की मांग कर रहे थे। पिता की पूरी पेंशन और रिटायरमेंट फंड या तो बेटे के भविष्य में लग सकते थे या फिर अवनि के लिए किसी दहेज-लोभी परिवार की तिजोरी में।
अवनि ने उस समय अपने पिता को रात-रात भर जागकर हिसाब-किताब की कॉपियों पर आंसू बहाते देखा था।
तभी उनके पारिवारिक मित्र के माध्यम से समर का प्रस्ताव आया था। समर एक सफल सॉफ्टवेयर कंसल्टेंट थे, जिनका विवाह महज छह महीने में ही उनकी पहली पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ चले जाने के कारण टूट गया था। उस धोखे ने समर को पूरी तरह खामोश और अंतर्मुखी बना दिया था। वे उम्र में अवनि से छह साल बड़े थे, लेकिन उनके परिवार ने साफ कह दिया था कि उन्हें एक पाई भी दहेज नहीं चाहिए, बस एक सुलझी हुई और संस्कारी बेटी चाहिए जो उनके बेटे के बिखरे जीवन को प्रेम से संवार सके।
पिता जी अवनि के सामने गिड़गिड़ाए नहीं थे, लेकिन उनकी खामोश, झुकी हुई आंखें सब बयां कर रही थीं। अवनि ने अपने करियर और अपनी प्राथमिकताओं को एक तरफ रखकर उस रिश्ते के लिए मुस्कुराते हुए ‘हां’ कह दी थी, ताकि उसके पिता का सिर न झुके और उसके भाई के सपनों की बलि न चढ़े।
“दीदी को तो तुम बचपन से जानती हो अवनी, जब उसका प्रोजेक्ट पूरा नहीं होता था तो वह तुम्हारी ड्राइंग शीट पर पानी गिरा देती थी।”
एक बहुत ही अपनत्व भरी, कोमल आवाज ने अवनि की तंद्रा तोड़ी। उसने मुड़कर देखा तो आरव हाथ में पानी का गिलास लिए उसके पीछे खड़ा था।
अवनि ने जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछीं और मुस्कुराने का प्रयास किया, “अरे आरव, कुछ नहीं… बस ऐसे ही धूप लग रही थी।”
“मुझसे झूठ मत बोलो दीदी,” आरव उसके पास बेंच पर बैठ गया और उसका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। “मुझे सब पता है। मेरठ वाले उस लड़के का परिवार पच्चीस लाख कैश और बड़ी गाड़ी मांग रहा था। अगर पापा तुम्हारी शादी वहां करते, तो उन्हें अपनी पूरी जमीन और पेंशन का पैसा देना पड़ता। और मेरा जो जर्मनी जाकर पढ़ाई करने का सपना था, वह हमेशा के लिए एक फाइल में दबकर रह जाता।”
“आरव, प्लीज पुरानी बातें मत निकालो। जो हुआ, बहुत अच्छा हुआ,” अवनि ने रुंधे गले से कहा।
“अच्छा कैसे हुआ दीदी?” आरव की आवाज भर्रा गई, “आज मुझे विदेश जाकर अपने सपनों को पूरा करने का जो मौका मिला है, वह तुम्हारी खुशियों और तुम्हारे अधिकारों की बलि देकर ही मिला है न? दीदी, राधिका दीदी चाहे जो कहें, लेकिन मुझे पता है कि तुमने इस परिवार के लिए कितना बड़ा त्याग किया है।”
आरव की आंखों से आंसू छलक कर अवनि की हथेली पर गिरे। उसने आगे कहा, “लेकिन दीदी, एक बात मैं अपनी आत्मा से जानता हूँ। समर जीजाजी दुनिया के सबसे बेहतरीन इंसान हैं। जब मैं पिछले महीने उनके पास दिल्ली रुका था, मैंने देखा था कि वे तुम्हारी कितनी कद्र करते हैं। तुम्हारी पसंद-नापसंद, तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा स्वाभिमान—वे हर चीज को पलकों पर रखते हैं। जो इंसान तुम्हें रानी बनाकर रख रहा है, उसे यह दुनिया ‘सेकेंड हैंड’ कहे, तो यह दुनिया की घटिया सोच है, तुम्हारी बदकिस्मती नहीं।”
अवनि के होंठों पर एक गहरी, सच्ची और तृप्त मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से कहा, “हां आरव, वे सचमुच बहुत अच्छे हैं। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि उनका कोई अतीत था। वे मुझे पूरा सम्मान देते हैं।”
“तो फिर मेरी प्यारी अवनी, तुम उस बात पर आंसू क्यों बहा रही हो जो तुम्हारी ताकत है, कमजोरी नहीं?” आरव ने हंसते हुए उसके दोनों गाल खींच दिए। “और वैसे भी, बचपन में जब तुम रोती थीं तो बिल्कुल भीगी बिल्ली लगती थीं!”
“अच्छा! और तुम जो बंदर की तरह पूरे घर में कूदते थे, उसका क्या?” अवनि ने मुस्कुराते हुए आरव की पीठ पर एक हल्का सा मुक्का मारा।
दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को देखकर खिलखिला कर हंस पड़े। बचपन की वही मासूम छेड़छाड़, वही निस्वार्थ स्नेह एक बार फिर उस पुराने बरामदे में जीवंत हो उठा था। उनके बीच का नेह-बंधन किसी भी सांसारिक ताने, ईर्ष्या या तुलना से कहीं ऊपर उठ चुका था।
शाम ढलने लगी थी। घर के मुख्य द्वार पर एक कार के रुकने का हॉर्न बजा। आरव ने नीचे झांक कर देखा और खुशी से चिल्लाया, “दीदी, समर जीजाजी आ गए!”
अवनि और आरव नीचे उतरे। समर हल्के नीले रंग के कुर्ते में दरवाजे पर खड़े थे। उनके चेहरे पर वही शांत, गरिमामयी और सौम्य मुस्कान थी। उन्होंने आगे बढ़कर पिता जी और मां के चरण स्पर्श किए।
“अरे दामाद जी! आप अचानक? आपने तो कहा था कि आपका कोई बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है,” पिता जी ने हड़बड़ाते हुए उनका स्वागत किया।
समर ने मुस्कुराते हुए अवनि की ओर देखा, “बाबूजी, प्रोजेक्ट तो चलते रहेंगे। पर शादी के बाद अवनि की पहली राखी थी। मुझे लगा कि अगर मैं खुद आकर इसे और आप सबको रक्षाबंधन की बधाई न दूं, तो त्योहार अधूरा रह जाएगा।”
समर ने अपने साथ लाए खूबसूरत उपहार पिता जी और मां के हाथों में सौंपे। फिर वे राधिका की ओर मुड़े और हाथ जोड़कर शालीनता से बोले, “प्रणाम दीदी। मैंने आपके और जीजाजी के लिए भी कुछ लाने की कोशिश की है, आशा है आपको पसंद आएगा।”
राधिका ने झेंपते हुए वह पैकेट थामा। समर का यह सहज आचरण, उनकी शालीनता और अवनि के प्रति उनका अगाध सम्मान देखकर राधिका की नजरें अपने आप झुक गईं। जिस इंसान को वह कुछ घंटे पहले ही हीन भावना से देख रही थी, उसका व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उसके सामने राधिका के सारे ताने और अहंकार तिनके की तरह बिखर गए थे।
तभी समर ने अपनी जेब से एक औपचारिक लिफाफा निकाला और आरव की ओर बढ़ा दिया।
“यह क्या है जीजाजी?” आरव ने अचरज से पूछा।
“यह म्यूनिख में हमारे एक पारिवारिक मित्र और प्रोफेसर का संपर्क सूत्र और वहां तुम्हारे रहने की अग्रिम व्यवस्था का दस्तावेज है आरव,” समर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े भाई के अधिकार से कहा। “तुम बाहर जा रहे हो, तो तुम्हें किसी अजनबी शहर में भटकना न पड़े। और हां, अगर कभी भी किसी भी चीज की जरूरत हो, तो यह मत सोचना कि तुम अकेले हो। तुम्हारा यह बड़ा भाई हमेशा तुम्हारे पीछे खड़ा है।”
आरव ने भावुक होकर समर को गले से लगा लिया।
मां की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। पिता जी ने चुपचाप हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए जो निर्णय लिया था, वह दुनिया के झूठे दिखावे से लाखों गुना पवित्र और सच्चा था।
अवनि ने जब समर की ओर देखा, तो समर ने बहुत हौले से अपनी पलकें झुकाकर उसे आश्वस्त किया। उस एक खामोश संवाद में शब्दों की कोई जरूरत नहीं थी। अवनि को महसूस हुआ कि सच्चा रिश्ता वह नहीं होता जो समाज के तय किए गए पैमानों पर खरा उतरे, बल्कि सच्चा रिश्ता वह होता है जो आत्मा को सुकून दे, सम्मान दे और जीवन के हर मोड़ पर ढाल बनकर साथ खड़ा रहे।
उस रात मायके का वह आंगन बरसों बाद एक सच्ची और निश्चल हंसी से गूंज रहा था। तानों का जहर प्रेम के अमृत में पूरी तरह घुल चुका था।
जीवन में अक्सर हम बाहरी दिखावे, समाज के खोखले पैमानों और दूसरों के तानों के आधार पर रिश्तों को तौलने की भूल कर बैठते हैं, जबकि असली सुख त्याग, सम्मान और एक-दूसरे की भावनाओं को समझने में ही छिपा होता है। क्या आपने भी कभी अपने जीवन में यह महसूस किया है कि त्याग और सच्चे समर्पण से बना रिश्ता किसी भी दिखावटी रिश्ते से कहीं अधिक मजबूत और पावन होता है? इस मार्मिक कहानी पर अपने विचार और अनुभव कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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