मुखौटे के पीछे का सच

यह सुनते ही जैसे राजेश्वरी देवी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनके सीने पर एक जोरदार हथौड़ा लगा। बिजली की कौंध में उन्होंने उस लड़के के चेहरे को ध्यान से देखा। वही सांवला चेहरा, वही बेबस आँखें, जो उस दिन उनकी कार के पीछे हांफती हुई दौड़ी थीं।

राजेश्वरी देवी का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। शर्म, पश्चाताप और आत्मग्लानि का ऐसा बवंडर उनके भीतर उठा कि उनकी जुबान तालू से चिपक गई। वे जिस लड़के को पचास रुपये के लिए सड़क पर बेबस छोड़ आई थीं, आज उसी लड़के ने अपनी जान जोखिम में डालकर, घुटनों तक कीचड़ में सनकर उनकी जान बचाई थी।

राजधानी के सबसे भव्य प्रेक्षागृह में सुबह से ही गहमागहमी थी। मौका था बाल दिवस और पर्यावरण संरक्षण के संयुक्त उपलक्ष्य में आयोजित एक राज्य स्तरीय चैरिटी कार्यक्रम का। सभागार का मंच ताजे फूलों से सजा था और आगे की कतारों में नगर के बड़े-बड़े उद्योगपति, प्रशासनिक अधिकारी और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि विराजमान थे। आज के कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं शहर के सबसे धनी और प्रभावशाली व्यापारी गिरधर गोपाल की धर्मपत्नी, राजेश्वरी देवी। राजेश्वरी देवी का समाज के उच्च तबके में बड़ा रसूख था। वे कई क्लबों की अध्यक्ष थीं और उनकी अगुवाई में चलने वाली महिलाओं की टोली में हमेशा उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाली सहेलियों का एक पूरा हुजूम रहता था, जो उनके हर छोटे-बड़े काम की प्रशंसा करते नहीं थकता था।

मंच संचालक ने बड़े ही आदर और प्रशंसात्मक शब्दों के साथ राजेश्वरी देवी को उद्बोधन के लिए आमंत्रित किया। हाथ में मोतियों का पर्स दबाए और कांजीवरम सिल्क की साड़ी को शालीनता से संभाले हुए वे मंच की ओर बढ़ीं। सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। माइक थामते ही उनके चेहरे पर एक बनावटी गंभीरता और करुणा के भाव तैरने लगे। अपने भाषण में उन्होंने समाज में वंचित और गरीब बच्चों की स्थिति पर बड़ा ही मार्मिक भाषण दिया।

“बंधुओ और बहनों, यह देखकर मेरा कलेजा कांप उठता है कि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में वे जीवन की कठोर धूप में मजदूरी करने को विवश हैं। बाल श्रम हमारे समाज के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे धोना हम सब का नैतिक कर्तव्य है। जब तक हर मासूम को उसकी मेहनत का सही मोल और सिर पर छत नहीं मिलती, तब तक हमारा समाज सभ्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। हमें इन बच्चों के हक को छीनने वालों और उनका शोषण करने वालों के खिलाफ आवाज उठानी होगी।”

राजेश्वरी देवी के इस ओजस्वी और करुणा से सिक्त भाषण ने सभागार में बैठे हर व्यक्ति की आँखों में लगभग नमी ला दी थी। भाषण समाप्त होते ही उन्होंने एक ट्रस्ट के प्रतिनिधियों को मंच पर बुलाकर अनाथ और बेसहारा बच्चों की शिक्षा व पुनर्वास के लिए ग्यारह लाख रुपये का चेक सौंपा। मीडिया के कैमरों की फ्लैश लाइटें चमक उठीं, पत्रकारों ने उनके इस कदम को सदी का सबसे बड़ा त्याग बताया और साथ में बैठी उनकी महिला मित्र मंडली ने मंच के नीचे खड़े होकर तालियाँ बजाते हुए पूरे हॉल को सिर पर उठा लिया।

कार्यक्रम के बाद पत्रकारों को बाइट देकर और ढेर सारी प्रशंसा समेटकर राजेश्वरी देवी अपनी चमचमाती लग्जरी एसयूवी में सवार हुईं। उनके साथ उनकी दो बेहद करीबी सहेलियां, नीलिमा और प्रमिला भी थीं। गाड़ी एक निजी पारिवारिक सगाई समारोह की ओर बढ़ रही थी, जहाँ उन्हें समय पर पहुँचना था। वातानुकूलित कार के भीतर ठंडी हवा बह रही थी और तीनों सहेलियां आज के कार्यक्रम, मीडिया कवरेज और मिलने वाली वाहवाही पर इतरा रही थीं।

“राजेश्वरी, सच में तुम्हारा कोई जवाब नहीं! जिस अंदाज में तुमने ग्यारह लाख का चेक सौंपा, पूरे शहर के अखबारों के पहले पन्ने पर कल तुम्हारी ही तस्वीर होगी,” नीलिमा ने चहकते हुए कहा।

राजेश्वरी देवी ने अपने होठों पर एक संतोषी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, “समाज में नाम ऐसे ही नहीं बनता नीलिमा। थोड़ा त्याग और सही समय पर सही जगह दिखना बहुत जरूरी होता है।”

कार अभी शहर के सबसे व्यस्त चौराहे पर पहुँची ही थी कि ट्रैफिक सिग्नल लाल हो गया। ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। दोपहर की चिलचिलाती धूप में डामर की सड़क तप रही थी। सिग्नल होते ही सड़क पर गाड़ियों के बीच कुछ बच्चे सामान बेचने के लिए दौड़ने लगे। उसी समय लगभग ग्यारह-बारह वर्ष का एक दुबला-पतला, सांवला सा लड़का राजेश्वरी देवी की गाड़ी की खिड़की के पास आया। उसके फटे हुए सूती कुर्ते पर पसीने के धब्बे थे, पर उसके हाथ में बांस की टोकरी में सजाए गए ताजे गुलाबों और मोगरे के बेहद खूबसूरत, करीने से बंधे गुलदस्ते थे।

लड़के ने कार के काले शीशे पर धीरे से उंगली की दस्तक दी। राजेश्वरी देवी ने खिड़की के पार देखा और अपनी भौंहें सिकोड़ लीं। उन्होंने हाथ के इशारे से उसे हटने को कहा, मानो कोई गंदी चीज उनकी नजरों के सामने आ गई हो। लेकिन लड़का फिर से विनती भरे स्वर में बोला, “मेमसाब, बहुत ताजे फूल हैं। अभी-अभी मंदिर के पास से सजाकर लाया हूँ। एक गुलदस्ता ले लीजिए ना, आपकी गाड़ी और सुंदर लगेगी।”

प्रमिला ने बाहर झांकते हुए कहा, “अरे राजेश्वरी, आगे सगाई में जाना है और समधन जी को देने के लिए हमें फूलों का एक अच्छा गुलदस्ता चाहिए ही था। बाहर बहुत सुंदर लग रहा है, ले लो यहीं से। समय भी बच जाएगा।”

राजेश्वरी देवी ने थोड़ा मुंह बनाते हुए कार का शीशा आधा नीचे गिराया। धूप और बाहर की गर्म हवा का एक झोंका अंदर आया तो उन्होंने अपनी नाक पर रुमाल रख लिया।

“कितने का है यह?” राजेश्वरी देवी ने तीखी आवाज में पूछा।

लड़के के चेहरे पर उम्मीद की एक चमक दौड़ी। वह जल्दी से दो कदम आगे बढ़ा और बोला, “मेमसाब, एक गुलदस्ता एक सौ बीस रुपये का है। दोनों ले लीजिए, दो सौ बीस में दे दूँगा।”

“क्या? दिमाग तो ठिकाने है तुम्हारा?” राजेश्वरी देवी की त्योरियां चढ़ गईं। “सड़क पर खड़े होकर बेचते हो, न कोई दुकान, न कोई टैक्स, और दाम ऐसे मांग रहे हो जैसे किसी बड़े मॉल के शोरूम से लाए हो! लूट मचा रखी है तुम लोगों ने। साठ रुपये में दोनों देने हैं तो दो, वरना रास्ता नापो।”

लड़का सहम गया। उसकी आँखों में एक बेबसी तैर गई। उसने हाथ जोड़कर कहा, “मेमसाब, सुबह चार बजे उठकर मंडी गया था। खुद अपने हाथों से कांटे साफ करके एक-एक फूल पिरोया है। साठ रुपये में तो मुझे लागत भी नहीं मिलेगी। दुकान वाले यही बुके चार-चार सौ रुपये में बेचते हैं। आप बहुत बड़े घर की लगती हैं, कम से कम डेढ़ सौ रुपये दोनों के दे दीजिए, मेरी माँ बीमार है और घर में राशन नहीं है।”

उसी समय ट्रैफिक सिग्नल हरा हो गया। पीछे खड़ी गाड़ियों ने कानफोड़ू हॉर्न बजाना शुरू कर दिया। ड्राइवर ने धीरे से क्लच छोड़ा और गाड़ी रेंगने लगी। लड़का गाड़ी के साथ-साथ तेज कदमों से चलने लगा। उसके चेहरे पर माल न बिकने का गहरा डर था।

“अरे हटो सामने से, गाड़ी चढ़ जाएगी!” राजेश्वरी देवी ने चिल्लाकर कहा।

लड़का दौड़ते हुए बोला, “अच्छा मेमसाब, आप एक सौ बीस रुपये ही दे दीजिए दोनों के! ले लीजिए प्लीज!”

राजेश्वरी देवी ने पलक झपकते ही अपनी चालाकी का पासा फेंका। उन्होंने अपने बटुए से पचास रुपये का एक पुराना, मुड़ा-तुड़ा नोट निकाला और तेजी से खिड़की से बाहर करते हुए लड़के के हाथ से दोनों गुलदस्ते झपट लिए। “चल, पचास रुपये ही बहुत हैं तेरे लिए!”

लड़के ने नोट देखा तो उसके होश उड़ गए। “मेमसाब! यह तो सिर्फ पचास का नोट है! मेमसाब, रुकिए… मेरे बाकी पैसे!” लड़का चिल्लाता रहा, लेकिन सिग्नल पूरी तरह खुल चुका था और ड्राइवर ने एक्सीलेटर दबा दिया। कार फर्राटे भरती हुई धूल उड़ाती आगे निकल गई। लड़का बीच सड़क पर हाथ में पचास का नोट लिए हांफता हुआ पीछे छूट गया। उसकी आँखों में आंसू और चेहरे पर गहरी लाचारी थी।

गाड़ी के भीतर राजेश्वरी देवी ने दोनों सुंदर गुलदस्तों को पिछली सीट पर सहेज कर रखा और विजयी मुस्कान के साथ अपनी सहेलियों की ओर देखा। “देखा? इसे कहते हैं मोलभाव। जो काम डेढ़ सौ में हो रहा था, उसे पचास में निपटा दिया। ऐसे लोगों को अगर ढील दो तो ये सिर पर चढ़ जाते हैं।”

नीलिमा और प्रमिला खिलखिलाकर हंस पड़ीं। “वाह राजेश्वरी! सच में मान गए तुम्हारी होशियारी को। ग्यारह लाख का दान देने वाली हमारी राजेश्वरी देवी ने एक गरीब लड़के को कैसा उल्लू बनाया! सुबह ही हमने मॉल के बाहर ऐसी ही एक टोकरी साढ़े चार सौ में खरीदी थी।”

कार के भीतर ठहाके गूंज रहे थे। जिस महिला ने आधे घंटे पहले बाल श्रम और बच्चों के शोषण पर मंच से आँसू बहाए थे, वह इस समय एक मासूम अनाथ बच्चे के पसीने की कमाई से सौ रुपये मार लेने पर अपनी पीठ थपथपा रही थी। किसी को भी उस लड़के के चेहरे की लाचारी या उसके हक के छीने जाने का रत्ती भर भी मलाल नहीं था।

समय बीतता गया। इस घटना को लगभग चार महीने गुजर चुके थे। राजेश्वरी देवी की जिंदगी अपनी उसी ठाठ-बाट, आयोजनों और समाज सेवा के पाखंड के साथ मजे में चल रही थी। वे उस सड़क वाली घटना को पूरी तरह भूल चुकी थीं।

एक दिन शहर में एक भयंकर आंधी-तूफान के साथ मूसलाधार बारिश हुई। शाम के समय राजेश्वरी देवी अपने एक रिश्तेदार के यहाँ से अकेली अपनी गाड़ी में लौट रही थीं। उनका ड्राइवर किसी पारिवारिक कार्य से छुट्टी पर था, इसलिए वे खुद गाड़ी चला रही थीं। शहर के बाहरी इलाके की एक सुनसान सड़क पर अचानक एक बड़ा पेड़ टूटकर सड़क पर गिर पड़ा। रास्ता पूरी तरह बंद था। राजेश्वरी देवी ने घबराकर गाड़ी को पीछे मोड़ने की कोशिश की, लेकिन तेज बारिश के कारण सड़क के किनारे जमा कीचड़ में गाड़ी का पिछला पहिया बुरी तरह धंस गया।

उन्होंने बार-बार गाड़ी को निकालने का प्रयास किया, पर पहिया और गहरा धंसता चला गया। बाहर घनघोर अंधेरा था, बिजली कड़क रही थी और लगातार गिरते पानी के बीच सड़क पर दूर-दूर तक कोई इंसान नजर नहीं आ रहा था। राजेश्वरी देवी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उन्होंने अपना फोन निकाला ताकि अपने पति को फोन कर सकें, लेकिन नेटवर्क गायब था। एक अकेली, असहाय महिला उस वीरान सड़क पर बंद गाड़ी के भीतर अपनी जान बचाने की चिंता में कांपने लगी। उनकी सारी रईसी, सारा रसूख और समाज में उनका बड़ा नाम उस कीचड़ और बारिश के आगे बेबस हो चुका था।

लगभग आधे घंटे तक वे उसी हाल में बैठी रोती रहीं। तभी अचानक कार की खिड़की पर एक रोशनी चमकी। राजेश्वरी देवी बुरी तरह चौंक गईं। उन्होंने देखा कि एक लड़का सिर पर प्लास्टिक की बोरी ओढ़े, हाथ में एक पुरानी टॉर्च लिए उनकी गाड़ी के पास खड़ा था। राजेश्वरी देवी ने डरते-डरते शीशा थोड़ा सा नीचे किया।

“मेमसाब, आप ठीक तो हैं? डरिए मत, गाड़ी कीचड़ में फंस गई है क्या?” लड़के की आवाज में घबराहट की जगह एक स्वाभाविक चिंता थी।

राजेश्वरी देवी ने कांपती आवाज में कहा, “हाँ बेटा… पहिया धंस गया है और नेटवर्क भी नहीं आ रहा। मुझे बहुत डर लग रहा है।”

लड़के ने बिना एक पल गंवाए कहा, “आप चिंता मत करिए मेमसाब, मैं अभी कुछ करता हूँ।”

उस लड़के ने बारिश में भीगते हुए सड़क के किनारे से कुछ बड़े-बड़े पत्थर और लकड़ी के तख्ते बटोरे। वह घुटनों तक कीचड़ में उतर गया। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर पहिये के नीचे पत्थर फंसाए। बारिश में उसका पूरा शरीर भीगकर कांप रहा था, हाथ कीचड़ और पत्थरों की रगड़ से छिल गए थे, लेकिन उसने हार नहीं मानी। लगभग बीस मिनट की कड़ी मशक्कत के बाद उसने कहा, “मेमसाब, अब आप गाड़ी स्टार्ट कीजिए और धीरे से आगे बढ़ाइए, मैं पीछे से धक्का लगाता हूँ।”

राजेश्वरी देवी ने गाड़ी स्टार्ट की और एक्सीलेटर दिया। उस लड़के ने अपनी पूरी जान झोंककर गाड़ी को पीछे से धक्का दिया। पहिया पत्थरों पर चढ़ा और एक झटके के साथ गाड़ी कीचड़ से बाहर पक्की सड़क पर निकल आई।

राजेश्वरी देवी की जान में जान आई। उन्होंने राहत की गहरी सांस ली। गाड़ी रोककर वे तुरंत बाहर निकलीं। उनका मन उस मददगार लड़के के प्रति कृतज्ञता से भर गया था। उन्होंने देखा कि वह लड़का कीचड़ से लथपथ, हांफता हुआ सड़क के किनारे खड़ा होकर अपनी फटी हुई बोरी को संभाल रहा था।

राजेश्वरी देवी ने अपने पर्स से पांच सौ-पांच सौ के चार नए करारे नोट निकाले—पूरे दो हजार रुपये। वे आगे बढ़ीं और उन नोटों को लड़के के हाथ में थमाते हुए बहुत ही भावुक होकर बोलीं, “बेटा, आज अगर तुम न होते तो पता नहीं इस सुनसान रास्ते पर मेरे साथ क्या हो जाता। तुमने मेरी जान बचाई है। यह लो, यह तुम्हारी मेहनत और मदद का इनाम है।”

लड़के ने नोटों को देखा, फिर धीरे से अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसने टॉर्च की रोशनी राजेश्वरी देवी के चेहरे पर डाली। कुछ पलों के लिए वह ठिठका, उसकी आँखों में एक अजीब सी पहचान कौंधी। फिर उसके होठों पर एक बहुत ही शांत, दर्द भरी मगर गरिमामयी मुस्कान तैर गई।

“मेमसाब, मुझे इनाम नहीं चाहिए। किसी मुसीबत में फंसे इंसान की मदद करने के पैसे नहीं लिए जाते,” लड़के ने सहज भाव से कहा।

राजेश्वरी देवी ने जोर देकर कहा, “अरे रख लो बेटा, तुम बहुत गरीब दिखते हो। इस बारिश में इतनी मेहनत की है तुमने, ये तुम्हारे काम आएंगे।”

लड़के ने बहुत ही अदब से अपनी नजरें झुकाईं और धीमी आवाज में बोला, “मेमसाब, मैं वही लड़का हूँ जिससे चार महीने पहले आपने सिग्नल पर डेढ़ सौ रुपये के दो गुलदस्ते जबरदस्ती पचास रुपये का नोट थमाकर छीन लिए थे। मेरी बीमार माँ के लिए मुझे उस दिन सौ रुपयों की सख्त जरूरत थी, पर आप गाड़ी भगा ले गई थीं।”

यह सुनते ही जैसे राजेश्वरी देवी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनके सीने पर एक जोरदार हथौड़ा लगा। बिजली की कौंध में उन्होंने उस लड़के के चेहरे को ध्यान से देखा। वही सांवला चेहरा, वही बेबस आँखें, जो उस दिन उनकी कार के पीछे हांफती हुई दौड़ी थीं।

राजेश्वरी देवी का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। शर्म, पश्चाताप और आत्मग्लानि का ऐसा बवंडर उनके भीतर उठा कि उनकी जुबान तालू से चिपक गई। वे जिस लड़के को पचास रुपये के लिए सड़क पर बेबस छोड़ आई थीं, आज उसी लड़के ने अपनी जान जोखिम में डालकर, घुटनों तक कीचड़ में सनकर उनकी जान बचाई थी।

लड़के ने आगे कहा, “उस दिन बहुत रोया था मेमसाब मैं। माँ को बिना दवाई के रात काटनी पड़ी थी। लेकिन मेरी माँ ने मुझे एक बात सिखाई थी कि गरीबी चाहे कितनी भी हो, कभी किसी का बुरा मत सोचना और न ही अपने ईमान को बेचना। अगर आज मैं आपकी लाचारी का फायदा उठाकर आपसे पैसे ले लूँ, तो मुझमें और उस दिन वाली आपमें क्या फर्क रह जाएगा? मुझे बस ऊपर वाले ने सही सलामत रखा है, यही बहुत है।”

लड़के के ये शब्द राजेश्वरी देवी के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। वे नोट उनके कांपते हाथों से छूटकर नीचे कीचड़ में गिर पड़े। जिस समाज सेवा और दान का वे ढिंढोरा पीटती थीं, वह सब एक पल में राख का ढेर साबित हो चुका था। आज उस सड़क पर फटेहाल खड़े एक अनाथ बच्चे ने उन्हें जीवन का सबसे बड़ा संस्कार और इंसानियत का असली पाठ पढ़ा दिया था।

राजेश्वरी देवी की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उनका सारा घमंड, सारा रुतबा और अहंकार बहकर उस गंदे पानी में समा गया। वे बिना कुछ सोचे-समझे कीचड़ में ही घुटनों के बल बैठ गईं और उन्होंने उस अनाथ, गरीब बच्चे के हाथ पकड़ लिए।

“मुझे माफ कर दे मेरे बच्चे… मुझे माफ कर दे,” राजेश्वरी देवी फूट-फूट कर रो पड़ीं। उनकी आवाज में पश्चाताप की ऐसी तड़प थी जो शायद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी महसूस नहीं की थी। “मैं अंधी थी, मैं झूठी शान और दिखावे के अंधे कुएं में जी रही थी। मैंने तेरा हक छीना, तेरे आंसुओं का मजाक उड़ाया। आज तूने मुझे मेरी औकात दिखा दी। तू मुझसे कहीं ज्यादा अमीर है, तेरा दिल इस पूरी दुनिया की दौलत से बड़ा है।”

लड़का हड़बड़ा गया। उसने झुककर राजेश्वरी देवी को सहारा देकर उठाया। “अरे मेमसाब, यह क्या कर रही हैं आप? आप बड़ी हैं, माँ जैसी हैं। रोइए मत, पुरानी बातें भूल जाइए।”

उस रात राजेश्वरी देवी जब घर लौटीं, तो वे वह महिला नहीं थीं जो सुबह घर से निकली थीं। उनके भीतर का पाखंडी और अहंकारी इंसान हमेशा के लिए मर चुका था और उसकी जगह एक सच्ची, संवेदनशील माँ ने जन्म ले लिया था।

अगले ही दिन सुबह, बिना किसी मीडिया को बुलाए, बिना किसी फोटोग्राफर या सहेलियों के आडंबर के, राजेश्वरी देवी अपनी गाड़ी लेकर उस लड़के की झुग्गी में पहुँचीं। लड़के की माँ सचमुच बहुत बीमार थी और टूटी हुई झोपड़ी में जिंदगी की अंतिम सांसें गिन रही थी। राजेश्वरी देवी ने उस महिला को शहर के सबसे बेहतरीन अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में भर्ती करवाया और उनके इलाज का सारा जिम्मा खुद उठाया।

इतना ही नहीं, उन्होंने उस लड़के, जिसका नाम कबीर था, को कानूनी रूप से संरक्षण में लिया और शहर के एक प्रतिष्ठित आवासीय विद्यालय में उसका दाखिला करवाया। उन्होंने अपनी सहेलियों की उस दिखावे वाली मंडली से हमेशा के लिए दूरी बना ली जो दूसरों का मजाक उड़ाकर खुश होती थी। अब राजेश्वरी देवी जब भी किसी की मदद करतीं, तो उनके हाथ में कोई चेक या कैमरा नहीं होता था, बल्कि उनके दिल में एक सच्ची करुणा और आंखों में कबीर की उस रात वाली सीख होती थी।

उन्होंने अपने जीवन की दिशा ही बदल ली। उन्होंने शहर के चौराहों पर फूल, गुब्बारे और अखबार बेचने वाले बच्चों के लिए एक ऐसा केंद्र खोला जहाँ उन्हें शाम को निःशुल्क शिक्षा, भोजन और सम्मान दिया जाता था। आज राजेश्वरी देवी सही मायनों में एक समाज सेविका बन चुकी थीं, क्योंकि अब उनके पास केवल धन का भंडार नहीं था, बल्कि उनके पास वह संवेदनशील हृदय था जो किसी गरीब के आंसुओं की कीमत और उसके स्वाभिमान का मोल बखूबी समझता था।

समाज में अक्सर हम बड़े-बड़े मंचों से आदर्शों की बातें करते हैं, दान-पुण्य का दिखावा करते हैं, लेकिन असल जिंदगी में किसी कमजोर और लाचार के प्रति हमारा व्यवहार ही हमारे असली चरित्र का आईना होता है। क्या आपने भी कभी अपने आस-पास ऐसे लोगों को देखा है जो समाज में अपनी झूठी साख बनाने के लिए लाखों लुटा देते हैं, पर किसी गरीब की चंद रुपयों की मजदूरी में भी बेईमानी करने से नहीं चूकते? आपकी नजर में सच्ची समाज सेवा और इंसानियत की असली परिभाषा क्या होनी चाहिए? अपने अनमोल विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।

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