असली श्रृंगार

“मैं सच कह रहा हूँ माँ,” आदित्य ने दृढ़ता से कहा। “मुझे ऐसी जीवनसाथी की ही तलाश थी जो सिर्फ हां में हां मिलाने वाली न हो, बल्कि जिसकी अपनी एक स्वतंत्र सोच हो। जो मुश्किल वक्त में मेरे बैंक बैलेंस की मोहताज न हो, बल्कि अपने संस्कारों और आत्मविश्वास से मेरा साथ दे सके। मास्टर जी, मुझे मीरा जी बिना किसी और शर्त के, बिना किसी और सवाल के पसंद हैं। अगर मीरा जी को मुझ पर और मेरे परिवार पर विश्वास हो, तो मैं इस रिश्ते के लिए पूरी तरह से तैयार हूँ। बल्कि, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानूंगा कि मुझे इतनी सुलझी हुई जीवनसाथी मिलेगी।”

पुराने शहर की उस संकरी गली में स्थित पंडित रमाकांत जी के मकान में आज सुबह से ही एक अलग तरह की हलचल थी। घर की पुरानी दीवारों पर भले ही समय के निशान साफ झलकते थे, लेकिन आज उन दीवारों को भी जैसे नई उम्मीदों के रंग से रंग दिया गया था। घर के आंगन में गेंदे के फूलों की लड़ियां बांधी जा रही थीं और रसोई से उठने वाली देसी घी की महक पूरे घर में एक उत्सव का अहसास करा रही थी। अवसर ही कुछ ऐसा था। रमाकांत जी की इकलौती और लाडली बेटी ‘मीरा’ को आज लड़के वाले देखने आ रहे थे।

रमाकांत जी एक साधारण से स्कूल में शिक्षक थे। उनका जीवन अनुशासन, ईमानदारी और सीमित साधनों के इर्द-गिर्द घूमता था। उन्होंने अपनी बेटी को सुख-सुविधाएं भले ही कम दी हों, लेकिन संस्कार और शिक्षा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मीरा एक बेहद समझदार, शांत और स्वाभिमानी लड़की थी। वह जानती थी कि उसके पिता ने उसे यहाँ तक पहुँचाने के लिए अपने कितने सपनों की बलि दी है। लेकिन आज, घर का माहौल मीरा के मन में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर रहा था। उसकी माँ, विमला देवी, सुबह से ही उसे हिदायतें दे रही थीं—”मीरा, आज वो बनारसी साड़ी पहनना जो पिछले साल ली थी। और हाँ, मेहमानों के सामने ज्यादा बोलना मत, नज़रें झुका कर रखना। लड़के वाले बहुत बड़े घर के हैं, शहर में उनका अपना बड़ा व्यापार है। अगर यह रिश्ता तय हो गया, तो समझो हमारी तो सारी चिंताएं ही खत्म हो जाएंगी।”

मीरा अपने कमरे में आईने के सामने बैठी थी। उसने सादगी से एक सूती सूट पहना हुआ था और उसके चेहरे पर किसी भी तरह के भारी मेकअप का कोई नामोनिशान नहीं था। माँ की बातें उसके कानों में गूंज रही थीं, लेकिन उसका मन इन दिखावटी रस्मों से बगावत कर रहा था। बाहर दालान में कुर्सियां बिछ चुकी थीं और रमाकांत जी बार-बार गली के नुक्कड़ की तरफ देख रहे थे कि कहीं मेहमानों की गाड़ी का रास्ता न भटक जाए। उनके माथे पर पसीने की कुछ बूंदें थीं, जो सिर्फ गर्मी की वजह से नहीं, बल्कि एक मध्यवर्गीय पिता की उस स्वाभाविक चिंता का परिणाम थीं, जो अपनी बेटी के लिए एक सुरक्षित भविष्य की कामना करता है।

तभी बाहर से किसी ने आवाज़ लगाई, “मास्टर जी, मेहमान आ गए!”

घर में अचानक एक अफरा-तफरी सी मच गई। विमला देवी रसोई की तरफ भागीं, जबकि रमाकांत जी ने आगे बढ़कर मेहमानों का स्वागत किया। शहर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखने वाले लड़के के माता-पिता और स्वयं लड़का, ‘आदित्य’, घर के दालान में आकर बैठ गए। आदित्य विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त करके लौटा था और अब अपने पिता का कारोबार संभाल रहा था। उसकी वेशभूषा और हाव-भाव से ही उसकी संपन्नता झलक रही थी। रमाकांत जी ने अपनी हैसियत से बढ़कर उनके सत्कार की व्यवस्था की थी।

इधर कमरे के भीतर, मीरा अभी भी अपनी जगह से नहीं उठी थी। उसके भीतर सवालों का एक बवंडर उठ रहा था। तभी दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई और रमाकांत जी कमरे में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान थी, लेकिन आँखों में वही पुरानी चिंता।

“तैयार हो गई बिटिया?” रमाकांत जी ने धीरे से पूछा।

मीरा ने आईने से नज़र हटाकर अपने पिता की ओर देखा। “जी बाबूजी,” उसने बहुत ही धीमी आवाज़ में उत्तर दिया।

रमाकांत जी अपनी बेटी के पास आए और उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोले, “बेटा, लड़के वाले बहुत अच्छे और सुलझे हुए लोग हैं। आदित्य बहुत पढ़ा-लिखा और होनहार है। मैंने उनके परिवार के बारे में बहुत छानबीन की है। भगवान ने चाहा तो तेरा जीवन खुशियों से भर जाएगा। वहां तुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होगी। बस अब तू एक बार बाहर चलकर उनसे मिल ले, बाकी जो भी तेरा फैसला होगा, मुझे मंजूर होगा।”

मीरा ने अपने पिता की आँखों में गहराई से देखा। वह जानती थी कि उसके पिता उससे कितना प्यार करते हैं, लेकिन आज वह अपने मन की बात कहे बिना नहीं रह सकी।

“बाबूजी, क्या मैं आपसे कुछ कह सकती हूँ?” मीरा की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।

“हाँ-हाँ मेरी बच्ची, कहो क्या बात है? घबरा रही हो क्या?” रमाकांत जी ने स्नेह से पूछा।

“घबराहट नहीं है बाबूजी,” मीरा ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “मैं बस यह सोच रही थी कि क्या यह जो कुछ भी बाहर हो रहा है, वह सही है? क्या सच में किसी इंसान को पांच मिनट तक चाय की ट्रे के साथ देखकर उसके पूरे जीवन का आकलन किया जा सकता है? माँ सुबह से कह रही हैं कि मैं अच्छी दिखूं, कम बोलूं, और उनके सामने खुद को इस तरह पेश करूँ कि उन्हें मुझमें कोई कमी नज़र न आए। लेकिन बाबूजी, क्या यह एक तरह का धोखा नहीं है? क्या विवाह जैसा पवित्र रिश्ता किसी ‘प्रदर्शन’ की बुनियाद पर खड़ा होना चाहिए?”

रमाकांत जी अवाक रह गए। उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उनकी शांत रहने वाली बेटी आज इस तरह के गंभीर सवाल पूछेगी।

मीरा रुकी नहीं, वह बोलती गई, “बाबूजी, आपने मुझे हमेशा सच्चाई और सादगी का पाठ पढ़ाया है। आपने सिखाया है कि असली धन इंसान का चरित्र होता है, बैंक का बैलेंस नहीं। फिर आज मेरी खुशी केवल इस बात पर क्यों तय की जा रही है कि लड़के वालों के पास कितना पैसा है? क्या अमीर लोग ही खुश रह सकते हैं? क्या धन-दौलत से आपसी समझ खरीदी जा सकती है? मैं यह नहीं कह रही कि पैसे वाले बुरे होते हैं, मेरा सिर्फ इतना कहना है कि अगर मेरे और आदित्य के विचारों में समानता ही न हो, तो वो करोड़ों की दौलत मेरे किस काम की? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम एक-दूसरे को इंसान की तरह समझें, न कि एक सौदे की तरह?”

रमाकांत जी के पास मीरा की बातों का कोई जवाब नहीं था। वे खामोशी से अपनी बेटी को सुन रहे थे।

“बाबूजी, मैं आपके संस्कारों को अपना सबसे बड़ा गहना मानती हूँ। अगर मैं बाहर जाकर सिर्फ एक कठपुतली की तरह मुस्कुराती रहूँ, तो यह आपके दिए गए संस्कारों का अपमान होगा। मुझे एक ऐसा जीवनसाथी चाहिए जो मेरी बाहरी सुंदरता या मेरे सिर झुकाकर चलने की अदा पर नहीं, बल्कि मेरे विचारों, मेरी सोच और मेरे आत्मविश्वास पर गर्व करे। अगर परिस्थितियां कभी खराब हुईं, तो पैसा साथ नहीं देगा बाबूजी, वो समझ और संस्कार साथ देंगे जो पति-पत्नी के बीच होते हैं। मैं किसी आधुनिकता या विद्रोह की बात नहीं कर रही, मैं बस यह चाहती हूँ कि रिश्तों की शुरुआत दिखावे की नींव पर न हो।”

कहते-कहते मीरा की आँखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर अपने पिता के हाथ पकड़ लिए। रमाकांत जी का गला भी रुंध गया था। उन्होंने अपनी बेटी के आँसू पोंछे और गदगद कंठ से बोले, “तूने आज मेरी आँखें खोल दीं बिटिया। तू सच कह रही है। मैंने तुझे जो शिक्षा दी है, तू आज उस पर पूरी तरह खरी उतरी है। मुझे तुझ पर गर्व है।”

कमरे में पिता-पुत्री के बीच एक भावुक सन्नाटा छा गया था। लेकिन वे दोनों इस बात से बिल्कुल अनजान थे कि उनके कमरे की खिड़की जो दालान की तरफ खुलती थी, वहां से यह पूरी बातचीत कोई और भी सुन रहा था।

दालान में बैठे आदित्य को पानी पीने की इच्छा हुई थी। जब विमला देवी रसोई में थीं और रमाकांत जी कमरे में, तो वह खुद ही पानी लेने के लिए उठा था और खिड़की के पास से गुज़रते हुए उसने मीरा की बातें सुन ली थीं। एक-एक शब्द उसके कानों में पिघले हुए सोने की तरह उतरा था। जिस समाज में उसने हमेशा लड़कियों को खुद को सजा-संवार कर पेश करते और पैसों से प्रभावित होते देखा था, वहां एक साधारण से घर की लड़की के ये असाधारण विचार उसके लिए किसी झटके से कम नहीं थे।

आदित्य वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। कुछ ही देर में रमाकांत जी कमरे से बाहर आए। उनके चेहरे पर अब कोई बनावटीपन नहीं था, बल्कि एक आत्मसम्मान की चमक थी। उनके पीछे-पीछे मीरा भी बाहर आई। उसके हाथों में चाय की ट्रे थी। उसने बिना किसी घबराहट के मेहमानों को चाय दी और एक किनारे पर रखी कुर्सी पर शालीनता से बैठ गई।

लड़के की माँ ने मीरा को ऊपर से नीचे तक देखा। उन्हें मीरा की सादगी शायद थोड़ी अजीब लगी, क्योंकि वे अपने बेटे के लिए कोई बहुत सजी-धजी लड़की की उम्मीद कर रही थीं। उन्होंने औपचारिक सवाल शुरू किए, “बेटा, तुम्हें खाना बनाना तो अच्छे से आता है न? और घर का काम…”

इससे पहले कि मीरा या रमाकांत जी कुछ बोलते, अचानक आदित्य अपनी जगह से खड़ा हो गया।

“माफ़ कीजिएगा आंटी जी,” आदित्य ने अपनी माँ को टोकते हुए बहुत ही विनम्र स्वर में कहा, फिर वह रमाकांत जी की तरफ मुड़ा। “मास्टर जी, क्या मैं कुछ कह सकता हूँ?”

सभी लोग हैरान होकर आदित्य की तरफ देखने लगे। विमला देवी का दिल ज़ोर से धड़कने लगा कि कहीं लड़के को लड़की पसंद न आई हो और वह कोई बहाना बनाकर जाने वाला हो।

“हाँ बेटा, कहिए,” रमाकांत जी ने शांत स्वर में कहा।

आदित्य ने मीरा की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक गहरी इज्ज़त और प्रशंसा का भाव था। उसने कहा, “मास्टर जी, मैं आपसे और आपके परिवार से माफी मांगना चाहता हूँ। हम यहाँ यह देखने आए थे कि मीरा जी हमारे घर के लिए कितनी उपयुक्त हैं। लेकिन सच कहूँ तो, अब मुझे लग रहा है कि मुझे खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या मैं उनके जैसे ऊंचे विचारों वाली लड़की के लायक हूँ?”

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। आदित्य के माता-पिता भी अचंभित थे।

आदित्य ने आगे कहा, “अभी कुछ देर पहले, जब मैं पानी लेने के लिए उठा था, तो मैंने अनायास ही मीरा जी और आपकी बातचीत सुन ली। मास्टर जी, मैंने दुनिया के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की है, बड़े-बड़े बिज़नेस डील किए हैं, लेकिन जीवन की जो असली समझ और गहराई मैंने आज मीरा जी की बातों में देखी, वो मैंने दुनिया की किसी किताब में नहीं पढ़ी। हम अक्सर रिश्तों को पैसों और बाहरी दिखावे के तराजू पर तौलते हैं। लेकिन मीरा जी ने बिल्कुल सही कहा कि रिश्ते की नींव दिखावे पर नहीं, विचारों की समानता पर होनी चाहिए।”

आदित्य की माँ ने टोकने की कोशिश की, “आदित्य, यह तुम क्या कह रहे हो…”

“मैं सच कह रहा हूँ माँ,” आदित्य ने दृढ़ता से कहा। “मुझे ऐसी जीवनसाथी की ही तलाश थी जो सिर्फ हां में हां मिलाने वाली न हो, बल्कि जिसकी अपनी एक स्वतंत्र सोच हो। जो मुश्किल वक्त में मेरे बैंक बैलेंस की मोहताज न हो, बल्कि अपने संस्कारों और आत्मविश्वास से मेरा साथ दे सके। मास्टर जी, मुझे मीरा जी बिना किसी और शर्त के, बिना किसी और सवाल के पसंद हैं। अगर मीरा जी को मुझ पर और मेरे परिवार पर विश्वास हो, तो मैं इस रिश्ते के लिए पूरी तरह से तैयार हूँ। बल्कि, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानूंगा कि मुझे इतनी सुलझी हुई जीवनसाथी मिलेगी।”

यह सुनकर रमाकांत जी की आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। विमला देवी, जो अब तक डर के मारे सिकुड़ी बैठी थीं, उनका चेहरा खिल उठा। आदित्य के माता-पिता, जो शुरू में थोड़े झिझक रहे थे, अपने बेटे की बातों में छुपी सच्चाई और मीरा के संस्कारों को समझ चुके थे। उन्होंने भी मुस्कुराते हुए अपनी सहमति में सिर हिला दिया।

मीरा, जो अब तक खामोश बैठी थी, उसने धीरे से सिर उठाकर आदित्य की तरफ देखा। आदित्य की आँखों में उसे कोई अमीर घराने का घमंडी लड़का नहीं, बल्कि एक ऐसा सच्चा इंसान नज़र आया जिसने उसकी आत्मा के श्रृंगार को पहचान लिया था। मीरा के होठों पर एक हल्की सी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई, जिसने बिना कुछ कहे ही उसकी सहमति बयान कर दी।

उस छोटे से घर के आंगन में उस दिन सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं जुड़ा था, बल्कि दो समान और परिपक्व विचारों का मिलन हुआ था। दिखावे की वह रस्म उस दिन सच्चाई और ईमानदारी की एक खूबसूरत मिसाल में बदल गई थी।

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#असली श्रृंगार

लेखिका : मोनिका सहगल

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