राधिका एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी जिसके पिताजी पुजारी थे।राधिका देखने में अच्छी या सुंदर नहीं थी।पहली शादी में दो महीने बाद ही तलाक हो कर वो अपने पिता के घर आ गई।बाकी भाई बहन वेल सेटल्ड थे और वो राधिका का ध्यान भी रखते थे।
राधिका ने वापस आ कर कंप्यूटर कोर्स किया और सिंबोसिस यूनिवर्सिटी में अप्रोच लगा कर लग गई वही उसके लिए नितिन का रिश्ता आया नितिन की दूसरी शादी थी।घर परिवार भी साधारण था नितिन को संगीत का शौक था वो छोटे छोटे प्रोग्राम में गाया करता था।
सास सुशीला जो राधिका का पूरा साथ देती थी ससुर सुहास जो कोई काम नहीं करता था सिर्फ इसकी टोपी उसके सर इतना बड़ा उनका घर था जिसकी जिम्मेदारी सभी भाइयों ने सुहास को दी थी वो धीरे धीरे उसमें से सब बेच कर खा गया।तो सही शब्दों में कहे तो सारी जिम्मेदारी राधिका पर थी
उधर सुशीला का मायका समृद्ध था और उसकी पूरी मदद भी करता था इस प्रकार उनका जीवन चल रहा था।नितिन भी अपनी दुनिया में खोया रहता ऐसे कोई ढंग की नौकरी नहीं करता था।जब गाने का कभी कार्यक्रम होता तब कुछ हाथ में आता।
राधिका और सुशीला ने अपने मायके और ससुराल वालों से जोड़ कर रखा था सबके सुख दुख में पहले खड़ी होती थी।सुहास तो कहता क्यों जाती हो मेरे भाई इतने अमीर है मेरी मदद नहीं करते तो सुशीला बोली इतना बड़ा घर दिया था तुम्हे संभालना नहीं आया सब बेच कर खा गए वो भी अपनी मेहनत से ही तो कमा रहे हैं।
तू ज्यादा तरफदारी करती है एक जोर का थप्पड़ सुहास ने सुशीला के गाल पर मार दिया थप्पड़ इतना जोरदार था कि सुशीला बेहोश हो गई डॉक्टर को दिखाया वो अपनी सुनने की शक्ति खो बैठी थी एक कान उसका बेहरा हो गया।अब राधिका सुशीला का बहुत ध्यान रखती
उधर राधिका एक बेटे की मां बन गई उस बच्चे निनाद में भी अपने दादा और पापा वाले गुण आए थे कामचोरी के गुस्से के तेज होने के इधर एक दिन कार्यक्रम से आ कर नितिन को हार्टअटैक आया और उसकी मृत्यु हो गई सारा परिवार राधिका और सुशीला के लिए खड़ा था सबने यथापूर्व मदद की और सारे काम निपट गए
नितिन की ताई जी ने हर महीने राधिका को पैसे भेजने शुरू किए ताकि निनाद का शिक्षण अच्छे से हो जाए।बीच में भी कोई ना कोई मिलने आता पैसे देता उसमें से भी सुहास चोरी कर लेता। सुशीला को अब सुहास से चीड़ होने लगी थी इसलिए वो निनाद को भी सुहास के पास कम जाने देती थी।
उसे समझाती बेटा तेरी मां कितना कष्ट कर रही हैं तुझे पालने में उसकी मेहनत को व्यर्थ मत जाने देना।छोटे छोटे काम सुशीला भी करती ताकि घर में कुछ हाथ बटा सके उनके पड़ोस में कृष्ण मंदिर था जो वहां के मालिक थे वो दूसरी जगह रहने चले गए तो मंदिर के पूजा पाठ की जिम्मेदारी सुशीला को दे गए और हर महीने कुछ पैसा भी दे देते।
इसी बीच सुहास की तबीयत खराब हुई हफ्ता भर अस्पताल में रह कर वो दुनिया को अलविदा कह गए अब घर में ये तीनों निनाद भी अब बड़ा हो रहा था दादी और मां के कष्ट देख रहा था उसने दिल में ठान लिया था कि इन दोनों को सुखी जीवन दूंगा।उसने आलस त्याग दिया पढ़ाई पर ध्यान लगाया और पहले attempt में सीएस क्लियर कर लिया
और उसे अच्छी नौकरी लग गई आज वो एक कमरे के घर से मां दादी को 2 bhk फ्लैट में ले आया तीनों एक दूसरे के पूरक थे।सुशीला हमेशा कहती थी ये मेरे रिश्तों की जमा पूंजी है जो जीवन में मैने कमाई मेरी बहु ने बेटी से ज्यादा मुझे संभाला प्यार दिया और मेरा पोता तो हम दोनों की आँखों का तारा है जिसने हमे प्यार दिया।
निनाद की शादी पल्लवी से तय हुई जो कि एक कंपनी लॉयर थी निनाद ने उसे पहले ही कह दिया था कुछ भी हो जाए कभी मेरी मां और दादी का अपमान मत करना नाही कभी ये कहना हम अलग रहेंगे । मैं जो हूं उनकी वजह से हूँ कुछ ग़लत लगे या पसंद नहीं आए तो बात करना अपने माता पिता से शिकायत नहीं ।
पल्लवी बोली मैने राधिका काकी को बचपन से देखा है उन जैसा कोई हो नहीं सकता और दादी तो है ही प्यारी।शादी में सबने कहा पैसा चाहे राधिका और सुशीला के पास ना हो पर रिश्तों की जमापूंजी अपार है देखो सारे रिश्तेदार खड़े हैं आज निनाद की शादी में और राधिका सुशीला खुश थी कि उन्होंने अपने बेटे को संस्कारी और काबिल बना दिया।
स्वरचित कहानी
आपकी सखी
खुशी