नया घर – संगीता अग्रवाल 

बारिश की बूंदें कार के शीशे पर लगातार टकरा रही थीं, मानो बाहर का मौसम गाड़ी के भीतर बैठे हरिशंकर बाबू के मन में चल रहे तूफ़ान को भांप गया हो। कार की पिछली सीट पर बैठे सत्तर वर्षीय हरिशंकर अपनी गोद में रखे पुराने ब्रीफकेस को कसकर पकड़े हुए थे। उस ब्रीफकेस में न … Read more

पिता का स्वाभिमान – शुभ्रा बनर्जी

दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीखें जैसे पंख लगाकर उड़ रही थीं। वंदना के लिए यह सफर सिर्फ़ एक शादी में शामिल होने का नहीं था, बल्कि अपनी ममता के एक हिस्से को विदा करने का था। वह अपनी ननद, सुनिधि, की इकलौती बेटी प्रिया की शादी में शामिल होने के लिए इंदौर पहुंची थी। … Read more

गृहस्थी – हेमलता गुप्ता

“मीरा, कल सुबह से तुम और सुमित अपनी रसोई अलग कर लोगे। ऊपर वाले फ्लोर पर छोटा किचन बना हुआ है, गैस और बर्तन मैंने रखवा दिए हैं। राशन का सामान कल सुमित ले आएगा। अब से तुम दोनों का खाना-पीना वहीं होगा।” सावित्री देवी ने अपनी नई-नवेली बहू मीरा से यह बात इतने सपाट … Read more

खामोशी की गूंज – हेमलता गुप्ता

सुबह के 6:30 बज रहे थे। अलार्म की आवाज़ से नहीं, बल्कि रसोई में बर्तनों के पटकने की तेज़ आवाज़ से 65 वर्षीय सुमेधा देवी की आँख खुली। उनके सिर में हल्का भारीपन था। कल रात ब्लड प्रेशर थोड़ा बढ़ा हुआ था, इसलिए नींद देर से आई थी। अभी उन्होंने करवट बदली ही थी कि … Read more

कड़वाहट –  शुभ्रा बनर्जी

मुंबई के एक पॉश बैंक्वेट हॉल में झूमर की रोशनी और शहनाई की धुन के बीच मेहमानों का तांता लगा हुआ था। अवसर था ‘आरव’ का अन्नप्राशन संस्कार। आरव, जो शिखा और मयंक का पहला बेटा था, आज मखमल की शेरवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था। मीरा अपने पति, आकाश, के … Read more

मेरे बेटे – एम. पी. सिंह.

मैं 65 वर्षीय रिटायर्ड व्यक्ति अपने पुत्र के साथ हॉस्पिटल से निकल कर दवाई लेने मेडिकल स्टोर गया. मेरा बेटा दवाई ले रहा था और दुकानदार मुझे बड़े गौर से देख रहा था. दवाई देने के बाद दुकानदार ने बिल बनाते हुए नाम पूछा, तो बेटा बोला, अर्जुन. दुकानदार मेरी तरफ देखकर बोला, तुम्हारा नहीं, … Read more

भाई जैसा मित्र नहीं न भाई जैसा शत्रु – परमा दत्त झा

आज सोहन मंडल अपने भाई रमेश मंडल को सुनाकर कह रहा था “मैं गांव का कुछ भी नहीं दूंगा।पूरी जिंदगी यहीं बरवाद कर दी।यह शहर में घूमता रहा था”। दूसरी ओर रमेश मंडल चुपचाप बड़ा भाई होने के नाते तेरहवीं और बाकी कर्मों को निपटा रहा था।वह बाहर के कमरे में पत्नी के साथ टिका … Read more

इस गुनाह की माफी नहीं – बबीता झा

राकेश अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। रिया पर तो वह अपनी जान निछावर करता था। रिया उसकी छोटी, लाडली बहन थी, जो शादी के लायक हो गई थी, फिर भी घर में इतनी उछल-कूद करती थी मानो दो-तीन साल की बच्ची हो। राकेश के डर से उसके मम्मी-पापा, यानी अवधेश और आकांक्षा भी … Read more

इज्जत से जीना कोई गुनाह नहीं – रश्मि प्रकाश 

“शर्मा जी, क्या गजब करते हैं आप भी! सुना है बड़ा बेटा विदेश में लाखों छाप रहा है और छोटा यहाँ सरकारी अफ़सर है, फिर भी आप इस तपती दुपहरी में फाइलों का बोझ उठाए घूम रहे हैं? लगता है बेटों की कमाई में बरकत नहीं है, या फिर बुढ़ापे में आपको नोट गिनने का … Read more

नर्स देखभाल कर सकती है बेटी नहीं बन सकती – संगीता अग्रवाल

शाम की धुंधलके में ड्राइंग रूम की खामोशी इतनी गहरी थी कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की चोट जैसी महसूस हो रही थी। सोफे पर बिखरे हुए कपड़ों और गत्ते के डिब्बों के बीच खड़ी मेघा अपनी सांसों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी। उसके सामने उसका पति, अनिरुद्ध, हाथ में एक … Read more

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