वक्त का पहिया – सीमा सिंघी

घड़ी का कांटा नौ पर पहुंच चुका था। रागिनी अपने काम जल्दी-जल्दी निपटाने में लगी हुई थी इसीलिए राज को और दोनों बच्चों को टिफिन देकर विदा किया और खुद भी नाश्ता लेकर बैठ गई और फिर नाश्ते के बर्तन सिंक में डाले और जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगी । रसोई का काम निपटाकर रागिनी ऑफिस … Read more

“फर्स्ट रैंक”- श्वेता अग्रवाल

छवि जैसे ही स्कूल के लिए निकलने लगी, उसकी माँ ने उसे रोकते हुए कहा, “छवि टिफिन तो लेकर जा। इतनी बड़ी हो गई लेकिन ध्यान ही नहीं रहता।” ये सुनकर छवि हँसते हुए उनके गले में झूल गई, “मम्मा, ध्यान मुझे नहीं बल्कि आपको नहीं रहता।” “क्या मतलब?” “मतलब ये भाग्यवान कि तुम भूल … Read more

जलन – खुशी

निशा और सिया दो चचेरी-तहेरी बहनें थीं। दोनों बचपन से ही साथ पली-बढ़ी थीं, लेकिन दोनों के स्वभाव और गुणों में बहुत अंतर था। निशा साँवली-सलोनी, समझदार, मेहनती और गुणी लड़की थी। पढ़ाई में वह बहुत तेज थी और हमेशा अच्छे अंक प्राप्त करती थी। घर के कामों में उसकी बहुत अधिक रुचि नहीं थी, … Read more

जेठानी – निभा राजीव “निर्वी”

जैसे ही नववधू अंकिता ने मीनल के पैर छुए उसने पुलकित होकर उसे खींचकर हृदय से लगा लिया। वह बेहद प्रसन्न थी आज! और होती भी क्यों नहीं, नववधू के पदार्पण के साथ ही उसे जेठानी की पदवी जो प्राप्त हो गई थी। उसने मुंह दिखाई में सुंदर से कान के बुंदे देवरानी के हाथों … Read more

जलनखोर – गीता वाधवानी

” आज चलो ना अविनाश मम्मी पापा से मिलने” श्रुति ने प्यार से मनुहार करते हुए अविनाश से कहा।   अविनाश-” आज नहीं, कल आऊंगा और वो भी अपने मम्मी पापा को साथ लेकर कल ठीक रहेगा क्योंकि कल रविवार है। ”   श्रुति-” सच्ची, सच कह रहे हो ना तुम? ”   अविनाश-” हां बाबा बिल्कुल सच्ची, … Read more

ये न कहना – डॉ. कविता विकास

काम रोज़ की तरह चल रहे थे लेकिन मन में उत्साह नहीं था। मेहमानों से भरे – पूरे घर में भी एक ख़ालीपन धर गया था। मैं भिंडी काट रही थी कि लगा कोई पीछे से कह रहा है,”फिर आज इतनी देर लगा दी,सब्ज़ी बनी नहीं अभी तक,मैं क्या खा कर जाऊँगी?कॉलेज का समय हो … Read more

देहरी की छाँव

 ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मयंक की उँगलियाँ लगातार अपनी हथेलियों को मसल रही थीं। बाहर तेजी से पीछे छूटते हरे-भरे खेत, आम की अमराइयां और धूल उड़ाती पगडंडियाँ गवाह थीं कि उसका पैतृक कस्बा अब बस चंद मिनटों की दूरी पर था। पूरे आठ साल बीत चुके थे इस रास्ते से गुजरे … Read more

भारी मन (अर्चना सिंह)

कीर्ति भारी मन से अपनी पड़ोसन नैना के घर से लौट आई। घर आकर ना जाने क्यों आज कीर्ति के मन में अंतर्द्वंद चल रहा था और बहुत बोझिल सी स्थिति हो रही थी। इसका कारण खुद कीर्ति भी नहीं समझ पा रही थी। अचानक पौधों को बालकनी में लहराते देख कीर्ति को याद आया.. … Read more

मौन की दीवारें 

 अगले कुछ हफ़्ते उस छोटे से फ्लैट में एक दमघोंटू सन्नाटे की तरह गुज़रे। दोनों एक ही बिस्तर पर सोते थे, लेकिन उनके बीच अनकहे शब्दों की एक विशाल खाई बन चुकी थी। नयना को लगने लगा कि उसकी आधुनिकता, उसकी समझदारी और उसकी स्वतंत्रता शायद इस मौन के सामने हार रही थी। उसने महसूस … Read more

दहलीज की धूप

 “नहीं देवांश, मुझे आज अपनी बात पूरी करने दीजिए,” अवनि ने हाथ उठाकर बहुत शांति से अपने पति को रोका। फिर वह दीनानाथ जी की आँखों में आँखें डालकर बोली, “बाबूजी, आपने मुझे हमेशा बेटी कहा, लेकिन मुझे कभी उस बेटी जैसा अधिकार नहीं दिया जो आपकी विरासत को आगे बढ़ा सके। आपने मुझे एक … Read more

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