नमन ने आगे बढ़कर माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू छलक आए थे। “माँ, मुझे माफ कर दीजिए। हम दोनों अपनी झूठी प्रतिष्ठा और दिखावे के चक्कर में इतने अंधे हो गए थे कि हमें इस घर की कीमत केवल रुपयों में दिखाई दे रही थी। हम भूल गए थे कि हमारी असली पहचान इसी घर की चौखट से शुरू होती है। अगर आप उस दिन सख्ती से न अड़तीं, तो आज हम अपनी सबसे अनमोल धरोहर को गँवा चुके होते। यह घर कभी नहीं बिकेगा माँ, कभी नहीं।”
दो मंजिला मकान—’मातृ-छाया’। बाहर से देखने पर वह एक साधारण सा घर था, जिसकी बालकनी में मनीप्लांट की हरी-भरी बेलें लिपटी थीं और मुख्य द्वार पर पीतल की घंटी हवा के साथ हल्की झंकार पैदा करती थी। मगर आज उस मकान के बैठक कक्ष में अजीब सी गहमागहमी और तनाव का माहौल था। मेज़ पर रखी चाय की प्यालियाँ ठंडी हो चुकी थीं, पर किसी का ध्यान उनकी तरफ नहीं था।
“बाबूजी, आप और माँ ज़रा व्यावहारिक होकर सोचिए। शहर के दूसरे छोर पर बन रही ‘रॉयल हाइट्स’ सिर्फ एक सोसायटी नहीं है, आज के दौर की ज़रूरत है। वहाँ 24 घंटे सुरक्षा गार्ड, लिफ्ट, स्विमिंग पूल, जिम और हरा-भरा पार्क है। दो महीने बाद मेरी शादी है। ऋषिता मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है, उसके परिवार वाले जब यहाँ आएंगे तो इस संकरी गली और पुराने ढर्रे के घर को देखकर क्या सोचेंगे? अगर हम इस पुराने मकान को अच्छे दामों में बेच दें, तो वहाँ एक शानदार 4-बीएचके फ्लैट आराम से मिल जाएगा,” बड़े बेटे नमन ने अपनी बात को तर्क की चाशनी में लपेटते हुए कहा।
छोटा बेटा मयंक भी अपने भाई के सुर में सुर मिलाते हुए बोला, “हाँ बाबूजी, भैया बिल्कुल सही कह रहे हैं। यहाँ अब गाड़ी पार्क करने तक की जगह नहीं बचती। मोहल्ले में हर वक्त स्कूटरों और बच्चों का शोर रहता है। नए ज़माने के साथ हमें भी अपनी जीवनशैली बदलनी चाहिए। अब आप दोनों की उम्र आराम करने की है, वहाँ क्लब हाउस में आप दोनों जैसे बुज़ुर्गों के लिए बैठने की अलग जगह है।”
बैठक के एक कोने में सोफे पर बैठे उमाकांत जी ने गहरी साँस ली। वे जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त एक सीधे-सादे इंसान थे। उन्होंने चश्मा उतारकर अपनी धोती के पल्लू से पोंछा और एक बार फिर लड़कों को समझाने की कोशिश की, “बेटा, तुम्हारी बातें अपनी जगह ठीक हो सकती हैं, लेकिन ये घर…” इससे पहले कि वे अपनी बात पूरी कर पाते, नमन ने बीच में ही टोक दिया, “बाबूजी, भावुकता से ज़िंदगी नहीं चलती। आप बस अपनी सहमति दीजिए, बाकी सब हम दोनों भाई संभाल लेंगे।” उमाकांत जी ने लाचार होकर सिर झुका लिया और खामोश हो गए। उन्हें पता था कि नई पीढ़ी के तर्कों के आगे उनकी आवाज़ अक्सर धीमी पड़ जाती है।
तभी अंदर के कमरे से निकलकर मालती देवी बैठक में आईं। उनके चेहरे पर दृढ़ता और आँखों में बरसों के संघर्ष की चमक थी। हाथ में पूजा की थाली रखते हुए उन्होंने दोनों बेटों की ओर देखा और बहुत ही सधे हुए स्वर में कहा, “नमन, मयंक, तुम दोनों जितनी चाहें दलीलें दे लो, पर जब तक मेरी साँसें चल रही हैं, इस घर पर ‘बिकाऊ है’ का बोर्ड नहीं लगेगा। यह केवल चार दीवारों का ढाँचा नहीं है जिसे बाज़ार में किसी भी भाव तौल दिया जाए।”
नमन झुँझला उठा, “माँ, आप हमेशा हर बात में अड़ियल रुख क्यों अपना लेती हैं? ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया, और आप इसी पुराने खंडहर से चिपकी रहना चाहती हैं! आखिर इस पुराने मकान में ऐसा क्या रखा है जो आपको नई सोसायटी के आलीशान फ्लैट में नहीं मिलेगा?”
मालती देवी ने एक फीकी मुस्कान के साथ अपने बेटे को देखा। उनके मन के भीतर स्मृतियों का एक पूरा सैलाब उमड़ पड़ा। वे अतीत के उन पन्नों को पलटने लगीं जिन्हें इन बच्चों ने कभी देखा ही नहीं था।
तीस साल पहले, जब मालती ब्याह कर उमाकांत जी के जीवन में आई थीं, तब ज़िंदगी इतनी आसान नहीं थी। उमाकांत जी एक छोटी सी नौकरी में थे। उस समय वे दोनों सदर बाज़ार की एक तंग गली में दो छोटे कमरों के किराए के मकान में रहते थे। उस छोटे से घर में केवल वे दोनों नहीं थे; साथ में वृद्ध सास-ससुर और एक छोटी ननद भी थी। उस छोटे से किराए के घर में एक ही नल था, जहाँ सुबह चार बजे उठकर बाल्टियाँ भरनी पड़ती थीं। छत से कभी सीलन टपकती, तो कभी मकान मालिक हर तीसरे साल किराया बढ़ाने का फरमान सुना देता या फिर घर खाली करने का नोटिस थमा देता।
घर-घर सामान समेटना, ट्रकों में बक्से लादना, टूटे हुए बर्तनों को देखकर दिल मसोस कर रह जाना और फिर किसी नई अनजान जगह पर नए सिरे से गृहस्थी जमाना—मालती ने वह सब झेला था। उसी छोटे से घर में पहले नमन का जन्म हुआ और फिर दो साल बाद मयंक आया। बच्चे बढ़ते जा रहे थे, ज़रूरतें आसमान छू रही थीं, लेकिन आमदनी सीमित थी। उमाकांत जी दिन में दफ़्तर में खटते और शाम को कुछ अतिरिक्त काम ढूँढते। ननद की शादी की ज़िम्मेदारी सिर पर थी। परिवार के मान-सम्मान को बचाए रखने के लिए मालती ने अपने सारे शौक दबा दिए। उन्होंने कभी नई साड़ी की ज़िद नहीं की, न कभी सिनेमा देखने गईं। सास-ससुर की दवाइयों और ननद के ब्याह के लिए उन्होंने अपने मायके से मिले सोने के दो कंगन तक हँसते-हँसते बेच दिए थे। अपनी छत का सपना उस वक्त किसी दूर टिमटिमाते तारे जैसा लगता था, जो आँखों को दिखता तो था मगर हाथों की पहुँच से बहुत दूर था।
फिर वक्त ने एक नया मोड़ लिया। मालती अपने मायके में इकलौती बेटी थीं और उनका एक छोटा भाई था। माँ बचपन में ही गुजर चुकी थीं, और कुछ साल पहले पिता का भी साया सिर से उठ गया। पिता कटनी में एक पुश्तैनी ज़मीन और मकान छोड़ गए थे। पिता ने अपनी वसीयत में अपनी बेटी के आत्मसम्मान और भविष्य की चिंता करते हुए बेटे और बेटी दोनों का बराबर हिस्सा लिखा था। मालती के भाई ने किसी तरह का छल-कपट किए बिना, पूरी ईमानदारी और आदर के साथ बहन का हिस्सा उसके हाथों में सौंप दिया।
जब वह एकमुश्त बड़ी रकम मालती के हाथ में आई, तो उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े थे। उन्हें लगा जैसे पिता ऊपर से उनके सिर पर हाथ रखकर कह रहे हों—”बेटी, अब अपने सपनों का आशियाना बना ले।” उस रकम में उमाकांत जी की प्रोविडेंट फंड की बचत और मालती की वर्षों की छोटी-छोटी कटौतियों को जोड़कर उन्होंने गढ़ा की इस ज़मीन को खरीदा था।
उस घर की नींव रखने से लेकर छत ढलने तक का एक-एक दिन मालती के ज़ेहन में आज भी ताज़ा था। भरी दुपहरी में जब मज़दूर ईंटें जोड़ते, तो मालती अपने नन्हे बच्चों को कमरे में सुलाकर खुद सिर पर पल्लू बांधे तराई करने पहुँच जाती थीं। किस कमरे की खिड़की से सुबह की ताज़ी हवा आएगी, रसोई का स्लैब किस दिशा में होगा ताकि काम करते वक्त बाहर का आँगन दिखाई दे, बच्चों के पढ़ने के लिए मेज़ कहाँ लगेगी—हर एक कोने को उन्होंने अपनी ममता और अरमानों से तराशा था। गृहप्रवेश के दिन जब उन्होंने देहरी पर पहला दीपक जलाया था, तब लगा था कि अब भटकने के दिन खत्म हो गए, अब कोई मकान मालिक उन्हें दरवाज़ा खाली करने को नहीं कहेगा।
और आज, वही बच्चे, जिन्हें उँगली पकड़कर उन्होंने इस घर की देहरी लांघना सिखाया था, आज पढ़-लिखकर बड़े पदों पर पहुँचते ही इस घर को ‘पुराना खंडहर’ कहने लगे थे!
मालती देवी ने अपनी भीगी आँखों को पोंछते हुए कहा, “नमन, मयंक, तुम दोनों को लगता है कि यह सिर्फ ईंट और गारे की दीवारें हैं? तुम दोनों जब पहली बार अपने पैरों पर चले थे, तो इसी आँगन की ज़मीन पर गिरे थे। तुम्हारे पहले कदमों के निशान, पेंसिल से दीवारों पर खींची गई वो टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें, तुम्हारी बीमारियों में रात-रात भर जागकर की गई दुआएँ… सब इस घर की दीवारों में रची-बसी हैं। इस घर ने हमें तब छत दी थी जब हमारे पास खोने के लिए सब कुछ था और पाने के लिए कुछ नहीं।”
नमन ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “माँ, हम आपकी भावनाओं की कद्र करते हैं, लेकिन ज़माना बदल चुका है। सोसायटी की लाइफ बहुत सुरक्षित और आधुनिक होती है। यहाँ इस मोहल्ले में क्या रखा है?”
मालती देवी ने बड़े शांत भाव से जवाब दिया, “बेटा, जिस सोसायटी की चकाचौंध तुम्हें खींच रही है, वहाँ फ्लैटों के बंद दरवाज़े होते हैं जहाँ पड़ोस में कौन रहता है, किसी को खबर तक नहीं होती। लिफ्ट खराब हो जाए तो बुज़ुर्ग अपने ही घर में कैद होकर रह जाते हैं। यहाँ ज़रा बाहर निकल कर देखो, सामने वाले त्रिवेदी जी, बगल के शर्मा चाचा, किराने वाले गुप्ता जी… ये सब सिर्फ पड़ोसी नहीं, हमारा परिवार हैं। कभी आधी रात को तुम्हारे बाबूजी की तबीयत खराब हुई, तो अस्पताल ले जाने के लिए मुझे किसी सुरक्षा गार्ड या एम्बुलेंस का इंतज़ार नहीं करना पड़ा, मोहल्ले के चार लड़के अपनी गाड़ियाँ लेकर दरवाज़े पर खड़े हो गए थे। यहाँ बाज़ार पास है, मंदिर पास है, अस्पताल पास है। तुम दोनों तो दिन भर अपने दफ़्तरों में रहोगे, तुम्हारी बहुएँ अपने काम में व्यस्त रहेंगी, हम दोनों बुज़ुर्ग उस बंद फ्लैट की बालकनी में बैठकर क्या सिर्फ दीवारों को तकते रहेंगे?”
मयंक ने समझाने के लहजे में कहा, “माँ, वहाँ पार्क है, लोग टहलते हैं…”
“पार्क में अजनबियों की भीड़ होती है मयंक, अपने नहीं होते,” मालती देवी ने दो टूक शब्दों में कहा, “तुम दोनों को अगर अपने स्टेटस की चिंता है, तो तुम अपनी कमाई से जो चाहे खरीद लो। तुम दोनों सक्षम हो, बैंक से लोन लो और उस सोसायटी में फ्लैट ले लो। हमें तुम्हारे नए घर में जाने से कोई एतराज़ नहीं होगा। पर इस घर को बेचकर अपनी शान-शौकत खरीदना… यह मैं जीते जी कभी नहीं होने दूँगी। यह घर मेरे पिता का दिया हुआ आशीर्वाद है और तुम्हारे बाबूजी के स्वाभिमान का प्रतीक है।”
बैठक में एकदम सन्नाटा छा गया। नमन और मयंक अपनी माँ की आँखों में वह दृढ़ता देख रहे थे जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। दोनों भाई समझ चुके थे कि माँ को मनाना असंभव है। वे कुछ देर तक सिर झुकाए बैठे रहे और फिर बिना कुछ बोले अपने कमरे में चले गए।
उस रात घर में एक अजीब सा खिंचाव बना रहा। रात के खाने की मेज़ पर किसी ने ज़्यादा बात नहीं की। उमाकांत जी ने रात को बिस्तर पर जाते हुए मालती से धीमे स्वर में कहा, “मालती, बच्चे नाराज़ हो गए हैं। शायद हमें उनकी खुशी के लिए समझौता कर लेना चाहिए था। बच्चे आज के दौर के हिसाब से सोच रहे हैं।”
मालती ने तकिए को ठीक करते हुए कहा, “नहीं जी। बच्चे आज के दौर की चमक देख रहे हैं, जीवन की धूप-छाँव नहीं। अगर आज हम अपनी जड़ें काट देंगे, तो कल को वे अपनी संस्कृति और रिश्तों को भी इसी तरह पुरानी समझकर फेंक देंगे। उन्हें यह समझना ही होगा कि हर पुरानी चीज़ बेकार नहीं होती, कुछ चीज़ें ज़िंदगी की ढाल होती हैं।”
अगले दो दिनों तक घर में एक खामोश दूरी बनी रही। नमन ऑफिस से आता और सीधे अपने कमरे में चला जाता। शादी की तैयारियाँ भी जैसे ठंडी पड़ गई थीं। मालती का दिल भी दुखता था, मगर वे अपने फैसले से पीछे हटने को तैयार नहीं थीं। वे जानती थीं कि अगर आज वे झुक गईं, तो उनका यह आशियाना हमेशा के लिए छिन जाएगा।
तीसरे दिन शाम को एक अप्रत्याशित घटना घटी। नमन की होने वाली पत्नी ऋषिता अचानक अपने माता-पिता के साथ ‘मातृ-छाया’ पहुँची। नमन और मयंक घबरा गए। नमन के मन में डर समा गया कि कहीं इस पुराने मोहल्ले और मकान को देखकर ऋषिता के परिवार वाले कोई नकारात्मक टिप्पणी न कर दें।
ऋषिता के पिता, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित कॉलेज के पूर्व प्राचार्य थे, ने घर में प्रवेश करते ही खुले आँगन और बीच में लगे तुलसी के चौरे को देखा। उनके चेहरे पर एक सुखद संतोष की लकीर उभर आई। उन्होंने उमाकांत जी से हाथ मिलाया और बैठक में सोफे पर बैठते हुए बोले, “भाई साहब, आपका यह घर देखकर सचमुच मन तृप्त हो गया। आज के दौर में जब लोग कबूतरखानों जैसे फ्लैटों में कैद होकर रह गए हैं, आपके घर में यह खुला आँगन, यह धूप और यह अपनापन किसी वरदान जैसा है।”
ऋषिता ने आगे बढ़कर मालती देवी और उमाकांत जी के चरण स्पर्श किए। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ जी, नमन मुझे बता रहे थे कि आप लोग इस घर को बेचने की बात कर रहे हैं क्योंकि मैं इस माहौल में शायद एडजस्ट न कर पाऊँ। पर सच कहूँ तो जब नमन ने मुझे इस घर की तस्वीरें दिखाई थीं, तभी मुझे इस घर से प्यार हो गया था। मैं खुद बचपन से फ्लैट कल्चर में पली-बढ़ी हूँ, जहाँ पड़ोसियों के नाम तक नहीं मालूम होते। मुझे ऐसा घर चाहिए था जहाँ बड़ों का आशीर्वाद हो, खुली धूप हो और रिश्तों की खुशबू हो। अगर हम चाहें तो ऊपर वाली मंजिल को थोड़ा सा मॉडर्न तरीके से रिनोवेट करवा सकते हैं, लेकिन इस घर को बेचने का ख्याल तो मन से बिल्कुल निकाल दीजिए।”
ऋषिता की बात सुनते ही बैठक का पूरा वातावरण एक पल में बदल गया। नमन और मयंक हक्के-बक्के रह गए। जिस आधुनिकता और स्टेटस सिंबल की दुहाई देकर वे अपनी माँ की भावनाओं को कुचलने पर आमादा थे, उसी आधुनिक पीढ़ी की लड़की ने आकर उनकी खोखली सोच का आईना उनके सामने रख दिया था।
ऋषिता के माता-पिता ने भी सहमति जताते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही है ऋषिता। ज़मीन से जुड़ा हुआ मकान सिर्फ एक संपत्ति नहीं, परिवार की मर्यादा होता है। इसे सहेज कर रखिए।”
मेहमानों के जाने के बाद, नमन और मयंक बैठक में अकेले खड़े थे। उनके सिर शर्म से झुके हुए थे। वे दोनों धीरे-धीरे कदमों से अपनी माँ के कमरे की ओर बढ़े। मालती देवी खिड़की के पास खड़ी बाहर गली में खेलते बच्चों को देख रही थीं।
नमन ने आगे बढ़कर माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू छलक आए थे। “माँ, मुझे माफ कर दीजिए। हम दोनों अपनी झूठी प्रतिष्ठा और दिखावे के चक्कर में इतने अंधे हो गए थे कि हमें इस घर की कीमत केवल रुपयों में दिखाई दे रही थी। हम भूल गए थे कि हमारी असली पहचान इसी घर की चौखट से शुरू होती है। अगर आप उस दिन सख्ती से न अड़तीं, तो आज हम अपनी सबसे अनमोल धरोहर को गँवा चुके होते। यह घर कभी नहीं बिकेगा माँ, कभी नहीं।”
मयंक ने भी अपनी माँ के कंधे पर सिर रख दिया और बोला, “हाँ माँ, अब हम कहीं नहीं जाएंगे। हम इसी घर को थोड़ा सा संवारेंगे, ताकि हमारी पुरानी यादें भी बची रहें और नई शुरुआत भी हो सके।”
मालती देवी की आँखों से भी आँसू बह निकले, पर ये आँसू विजय और असीम सुकून के थे। उन्होंने अपने दोनों बेटों को अपने सीने से लगा लिया। उमाकांत जी दरवाज़े पर खड़े होकर यह सब देख रहे थे, उनके चेहरे पर एक निश्चिंत और गरिमामयी मुस्कान तैर रही थी।
उस रात ‘मातृ-छाया’ की रसोई में जब एक बार फिर पूरे परिवार के लिए हँसी-खुशी खाना बना, तो घर का हर कोना जैसे मुस्कुरा रहा था। आँगन में लगा पारिजात का पेड़ हवा के साथ झूम रहा था, मानो कह रहा हो कि जड़ें जितनी गहरी होंगी, डालियाँ उतनी ही सुरक्षित और हरी-भरी रहेंगी। मालती देवी के त्याग, संघर्ष और संकल्प ने न केवल एक मकान को बिकने से बचा लिया था, बल्कि एक बिखरते हुए परिवार को उसकी जड़ों से दोबारा जोड़ दिया था।
माता-पिता अपनी पूरी ज़िंदगी का पसीना बहाकर जिस आशियाने को तिनका-तिनका जोड़कर खड़ा करते हैं, क्या नई पीढ़ी का अपनी सुविधा और स्टेटस के नाम पर उसे बेच देना उचित है? क्या कंक्रीट के आधुनिक फ्लैट कभी उन पुराने घरों की आत्मीयता, पड़ोस के भरोसे और यादों की जगह ले सकते हैं? अपनी अनमोल और सच्ची राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।
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