मैली चादर का उजास

“अरे ओ पल्लवी! कहाँ कान में रुई ठूँसकर बैठी है? सुनती क्यों नहीं? रीना कब से अपने कमरे में बैठी है कि कोई आकर उसके बाल संवार दे, उसका श्रृंगार कर दे। पर बहुओं के तो नखरे ही नहीं खत्म होते! ज़रा सा काम क्या बोल दो, जैसे पहाड़ टूट पड़ता हो!”

उस वक्त घर की बड़ी बहू पल्लवी रसोई के पिछले कोने में खड़ी, अपने आँचल से हाथ पोंछते हुए अपने पति मयंक से फोन पर दबी आवाज़ में बात कर रही थी। पल्लवी का चेहरा पसीने से भीगा हुआ था, लेकिन उसकी आवाज़ में एक जिम्मेदारी भरी फुर्ती थी।

“सुनिए जी, आप दफ्तर से निकलते वक्त थोड़ा जल्दी आ जाइएगा। लड़के वाले किसी भी वक्त पहुँचते होंगे। रीना को देखने आ रहे हैं तो नाश्ते में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। वो जो हलवाई की दुकान से काजू कतली और ताज़ी मलाई वाली दही लानी थी, वो रह गई है। साथ में दो खीरे और थोड़े से ताज़े फल भी लेते आइएगा।”

तभी मालती देवी रसोई के मुहाने पर आकर खड़ी हो गईं और कमर पर हाथ रखकर ज़ोर से चिल्लाईं, “अरे वाह री महारानी! इधर सिर पर मेहमान चढ़े आ रहे हैं और तू यहाँ खड़े होकर अपने मायके में दास्तान सुना रही है! मुझे तो समझ नहीं आता कि अक्ल कब आएगी तुझे? रीना का पूरा भविष्य दांव पर लगा है और तुझे अपनी बातों से फुर्सत नहीं! जा, रीना कब से आईने के सामने बैठी इंतज़ार कर रही है तेरा!”

पल्लवी ने झेंपते हुए तुरंत फोन काटा और विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, “नहीं माँ जी, मैं मायके बात नहीं कर रही थी। मयंक जी को फोन करके बस कुछ ज़रूरी सामान मंगवा रही थी ताकि जो मेहमान आ रहे हैं, उनके स्वागत में कोई कोर-कसर न रह जाए।”

मालती देवी ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए उसे झिड़क दिया, “रहने दे, मुझे मत सिखा! दिन भर ज़ुबान तो कैंची की तरह चलती है, अगर इतने हाथ-पाँव काम में चला लिए होते तो अब तक सारा घर चमक रहा होता। जा रीना के पास, और हाँ, सलीके से सजाना उसे!”

पल्लवी ने चुपचाप अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और बिना कोई प्रतिवाद किए रीना के कमरे की ओर बढ़ गई। पल्लवी ने शादी से पहले पेशेवर स्तर का सौंदर्य और साज-सज्जा का कोर्स किया था। उसके हाथों में गज़ब का हुनर था। वह किसी भी साधारण चेहरे को अपनी कला से अत्यंत शालीन और आकर्षक रूप दे सकती थी। लेकिन इस घर में आने के बाद से उसकी सास मालती देवी और ननद रीना ने कभी उसके हुनर की कद्र नहीं की थी। उलटा हर बात में उसे नीचा दिखाना, उसके मायके के स्तर पर व्यंग्य करना और बात-बात पर उसे यह अहसास कराना कि वह इस घर की सबसे बड़ी कमी है, उनका रोज़मर्रा का शगल बन चुका था।

कमरे में रीना गुलाबी रंग के लहंगे में सजी आईने के सामने मुँह फुलाए बैठी थी। पल्लवी ने बड़ी आत्मीयता से उसके चेहरे का बेस तैयार किया, आँखों में काजल और हल्का सा लाइनर लगाया और बालों को बहुत ही सुंदर जुड़ा बनाकर पिनअप कर दिया। रीना का रूप सचमुच खिल उठा था।

“रीना, तुम बहुत प्यारी लग रही हो। नज़र न लगे किसी की,” पल्लवी ने मुस्कुराते हुए उसके माथे पर एक छोटा सा टीका लगाते हुए कहा, “लो, यह मोतियों वाला नेकलेस पहन लो, तुम्हारे गले और इस पोशाक पर बहुत जँचेगा।”

रीना ने उस हार को अपनी उँगलियों से छुआ और झटके से मेज़ पर पटक दिया। “छी भाभी! कितना सस्ता और नकली लग रहा है यह। क्या मुझे भिखारिन समझ रखा है जो यह प्लास्टिक के मोती पहनकर बैठूँ? देखने वाले क्या कहेंगे कि करोड़ों के खानदान में ऐसी फूहड़ चीज़ें पहनाई जाती हैं?”

पल्लवी ने असहज होकर कहा, “लेकिन रीना, गले में कुछ नहीं होगा तो बिल्कुल खाली-खाली लगेगा। साड़ी का गला थोड़ा गहरा है…”

“तो आप अपना वो सोने का चोकर हार दे दीजिए ना, जो आपने पहन रखा है!” रीना ने बिना किसी संकोच के पल्लवी के गले की ओर इशारा करते हुए हुक्म सुनाया, “यह डिज़ाइन मुझे बहुत पसंद है। इस पर बहुत फबेगा।”

पल्लवी के हाथ कांप गए। उसका गला रुंध गया। उसने अपनी उँगलियों से उस चोकर को छुआ और कांपते होठों से बोली, “रीना… यह… यह तो मेरे स्वर्गीय पिता जी की आखिरी निशानी है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी भर की बचत से मेरे कन्यादान के वक्त मुझे दिया था। मैं… इसे कभी किसी को…”

तभी कमरे के दरवाज़े पर मालती देवी की भारी आवाज़ गूँजी, “तो क्या तेरी उस निशानी को मेरी बेटी खा जाएगी? अपनी सगी ननद के अच्छे रिश्ते के लिए ज़रा सा ज़ेवर देने में कलेजा फट रहा है तेरा? आज गैर घर जा रही है बच्ची, उसके लिए इतना छोटा मन? राम-राम! कैसी संकीर्ण सोच लेकर आई है हमारे घर में!”

पल्लवी की आँखों में आँसू छलक आए। उसने देखा कि बात बढ़ जाएगी और आज का माहौल खराब हो जाएगा। उसने जल्दी से आँसू पोंछे और कहा, “नहीं माँ जी… मेरा वो मतलब नहीं था। बस मुँह से निकल गया… मैं अभी उतारकर पहना देती हूँ।”

पल्लवी ने अपने गले से वह हार उतारा और रीना के गले में पहना दिया। रीना ने आईने में खुद को देखा और गर्व से गर्दन मटकाते हुए बोली, “अरे छोड़िए भाभी, ऐसे मुँह बना रही हैं जैसे आपके प्राण ही निकल गए हों!”

ठीक उसी वक्त मयंक कमरे में दाखिल हुआ। उसने हाथ में मिठाई और फलों का थैला पकड़ रखा था। माहौल की तल्खी को हल्का करने के लिए उसने मज़ाकिया लहजे में कहा, “अरे भाई, कौन प्राण निकाल रहा है हमारी धर्मपत्नी के? ज़रा बताओ तो सही, हम भी देखें किसकी इतनी हिम्मत हुई!”

मालती देवी ने तिनक कर कहा, “लो, आ गए मजनू जी! अपनी पत्नी की ज़रा सी वकालत करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बाहर निकलो सब, लड़के वालों की गाड़ी आ चुकी है। दरवाज़े पर खड़े हैं वे लोग!”

मालती देवी और रीना बाहर की ओर लपकीं। पल्लवी ने मयंक की ओर देखा। मयंक ने सांत्वना देते हुए उसकी हथेली को हल्के से दबाया और कहा, “सब ठीक होगा पल्लवी, तुम चिंता मत करो।”

ड्राइंग रूम में मेहमान बैठ चुके थे। लड़के का नाम कुणाल बताया गया था। उसके साथ उसके तथाकथित माता-पिता आए हुए थे। दिखने में वे लोग बेहद संपन्न लग रहे थे। कुणाल ने बहुत महँगा इटैलियन सूट पहन रखा था, हाथ में रोलेक्स की घड़ी थी और बात-बात पर अपनी कंपनियों और विदेशों के दौरों का ज़िक्र कर रहा था। मालती देवी की आँखें उस रईसी को देखकर चौंधिया गई थीं। वे हाथ जोड़े उनकी आवभगत में बिछी जा रही थीं।

कुछ ही देर बाद मालती देवी ने अंदर आवाज़ लगाई, “बहू, ज़रा चाय और नाश्ता तो लाओ!”

पल्लवी ने रसोई में जाकर करीने से नाश्ते की प्लेटें सजाईं और चाय की ट्रे लेकर ड्राइंग रूम के पर्दे के पीछे से बाहर निकली। उसने शालीनता से सिर पर पल्लू ले रखा था। जैसे ही वह आगे बढ़ी और उसने चाय की पहली प्याली सामने बैठे उस लड़के कुणाल की तरफ बढ़ाई, कुणाल ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ आगे किया।

उसकी आँखें पल्लवी के चेहरे से टकराईं।

और उसी पल पल्लवी का पूरा शरीर बर्फ की तरह सुन्न पड़ गया। उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं। उसके हाथ इतनी ज़ोर से कांपे कि पूरी की पूरी ट्रे फर्श पर गिर पड़ी। काँच की प्यालियाँ चूर-चूर हो गईं और गर्म चाय कालीन पर फैल गई।

“तुम…?” पल्लवी की चीख गले में ही घुटकर रह गई। उसका चेहरा इस कदर सफेद पड़ गया मानो उसके जिस्म से किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो। वह लड़खड़ाकर दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई।

मालती देवी का चेहरा गुस्से और शर्म से तमतमा उठा। लेकिन मेहमानों के सामने उन्होंने तुरंत खुद को संभाला और बनावटी मुस्कान के साथ बोलीं, “अरे-अरे बहू! क्या हुआ? चक्कर आ गया क्या? आप लोग बुरा मत मानिएगा, दरअसल बेचारी बहुत मेहनत करती है। ऊपर से इन दिनों थोड़ी नाज़ुक हालत है इसकी, डॉक्टर ने आराम को कहा है पर सुनती ही नहीं।”

मालती देवी ने पल्लवी का हाथ पकड़ा और उसे घसीटते हुए अंदर के कमरे में ले आईं।

“तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या?” मालती देवी फुसफुसाते हुए गुर्राईं, “इतने बड़े खानदान के सामने तूने हमारी नाक कटवा दी! शगुन के वक्त चाय की ट्रे गिरा दी? कोई अपशकुन करना चाहती है तू?”

पल्लवी ने अपनी सास की बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने बदहवास होकर अपने पति मयंक का हाथ पकड़ लिया जो आवाज़ सुनकर अंदर दौड़ा आया था।

पल्लवी की सांसें फूल रही थीं। उसने कांपती उँगलियों से ड्राइंग रूम की तरफ इशारा करते हुए कहा, “मयंक… यह शादी नहीं हो सकती! यह रिश्ता किसी भी कीमत पर नहीं होगा! यह लड़का… यह लड़का बहुत बड़ा धोखेबाज़ और घिनौना इंसान है!”

उसी वक्त अपने कमरे से सज-धज कर बाहर निकलने की तैयारी कर रही रीना के कानों में ये शब्द पड़े। वह बिजली की तरह तड़प उठी और गुस्से में पैर पटकती हुई कमरे में आ धमकी।

“भाभी! आपकी हिम्मत कैसे हुई यह बोलने की?” रीना की आँखों से नफरत बरस रही थी। “मैं सब समझती हूँ! आप मुझसे कितना जलती हैं! जब आपने देखा कि मुझे इतना अमीर, हैंडसम और रईस खानदान का लड़का मिल रहा है, तो आपके सीने पर सांप लोटने लगा! आप नहीं चाहतीं कि मैं राज करूँ, इसलिए भैया को भड़काकर मेरा घर बसने से पहले ही उजाड़ना चाहती हैं!”

“रीना! ज़बान संभाल कर बात कर अपनी भाभी से!” मयंक ने कड़क आवाज़ में डांट लगाई। फिर उसने पल्लवी की तरफ मुड़कर शांत स्वर में पूछा, “पल्लवी, तुम इतनी बड़ी बात कह रही हो। तुम्हें इस लड़के के बारे में क्या पता है? क्या आधार है तुम्हारी बात का?”

पल्लवी ने अपने कांपते हाथों को सीने पर रखा और गहरी सांस लेते हुए कहा, “मयंक, इस समय बाहर वो लोग बैठे हैं। अगर हम वहाँ खुलकर बात करेंगे तो तमाशा बन जाएगा। लेकिन सच यह है कि आपसे शादी से ठीक छह महीने पहले, यही लड़का अपने माता-पिता के साथ मेरे घर मुझे देखने आया था। इसके ठाठ-बाट देखकर मेरे पिता जी भी बहुत प्रभावित हुए थे। लेकिन मेरे पिता जी हमेशा कहते थे कि रिश्ते चमक-दमक से नहीं, इंसान के चरित्र से बनते हैं। उन्होंने अपने एक पुलिस अधिकारी मित्र के ज़रिए इस लड़के की गुप्त रूप से जांच-पड़ताल करवाई थी।”

कमरे में सन्नाटा पसर गया।

पल्लवी ने आगे कहा, “जांच में पता चला कि यह लड़का कोई बहुत बड़ा उद्योगपति नहीं है, बल्कि एक शातिर ठग और हिस्ट्रीशीटर है! इसका असली धंधा सीधे-साधे और अमीर परिवारों की लड़कियों को अपने रूप और झूठी दौलत के जाल में फंसाना, शादी करना, और फिर उनके ज़ेवर और पैसे ऐंठकर उन्हें छोड़कर भाग जाना है। इस पर जालसाजी, धोखाधड़ी और कई गैर-कानूनी मामलों के तहत गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। इसके जो माता-पिता बाहर बैठे हैं, वे भी किराए के कलाकार हैं! जब पिता जी ने पुलिस की मदद से इसे चेतावनी दी थी, तब जाकर इसने हमारा पीछा छोड़ा था।”

मयंक के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं।

“क्या? इतनी भयानक सच्चाई?” मयंक की मुट्ठियाँ भिंच गईं। “अगर यह बात सच है, तो यह रिश्ता इसी क्षण खत्म होता है।”

मयंक बिना एक पल गँवाए तेज़ी से ड्राइंग रूम की ओर बढ़ा। मालती देवी उसके पीछे भागीं, “अरे मयंक! रुक, क्या कर रहा है तू?”

ड्राइंग रूम में पहुँचकर मयंक ने उस लड़के कुणाल और उसके साथ आए लोगों को देखा जो सोफे पर बड़े इत्मीनान से काजू खा रहे थे।

मयंक ने बहुत ही गंभीर और कड़े लहजे में कहा, “देखिए भाई साहब, हमें माफ़ कीजिएगा। हम अपनी बहन रीना का रिश्ता इस वक्त आपके साथ पक्का नहीं कर सकते। हमें अभी इस बारे में बहुत सोच-विचार और छानबीन करनी है। आप लोग जा सकते हैं।”

मालती देवी चिल्ला उठीं, “मयंक! तेरा दिमाग तो ठिकाने है? वे लोग शगुन की सोने की अँगूठी लेकर आए हैं हमारी बच्ची को पहनाने के लिए! रोज़-रोज़ ऐसे करोड़पति घर के रिश्ते चौखट पर नहीं आते!”

मयंक ने अपनी माँ की तरफ देखकर कड़क आवाज़ में कहा, “माँ! जो मैं कह रहा हूँ, वही होगा। हम अभी कुछ भी फाइनल नहीं करेंगे।”

कुणाल ने स्थिति को बिगड़ते देखा तो उसकी आँखों में एक धूर्त चमक कौंधी। उसने उठते हुए अकड़कर कहा, “देखिए समधिन जी, हम बहुत इज़्ज़तदार लोग हैं। अगर आपके बेटे को तमीज़ नहीं है कि घर आए मेहमानों से कैसे बात की जाती है, तो हमें भी कोई शौक नहीं है ऐसी जगह अपनी पगड़ी रखने का। चलते हैं!”

वे तीनों लोग गुस्से का ढोंग करते हुए तेज़ी से बाहर निकल गए।

उनके जाते ही घर में जैसे बारूद का विस्फोट हो गया।

मालती देवी छाती पीटते हुए ज़मीन पर बैठ गईं और चीखने लगीं, “हाय रे मेरी फूटी किस्मत! बना-बनाया काम बिगाड़ दिया इस कुलच्छनी बहू ने! मयंक, तू अपनी पत्नी का ऐसा गुलाम बन चुका है कि अपनी सगी बहन की खुशियाँ अपनी आँखों से छीन लीं!”

रीना भी रोते-रोते बदहवास हो रही थी, “हाँ मम्मी! इस औरत ने ज़हर उगला है भैया के कानों में! इसे डर था कि मैं कहीं इससे बड़ी महारानी न बन जाऊँ। इसने मेरे सपनों का खून कर दिया!”

“बस! एक शब्द और नहीं रीना!” मयंक की दहाड़ ने पूरे मकान की दीवारों को हिलाकर रख दिया। “तेरी भलाई के लिए, तेरी ज़िंदगी को एक नरक में गिरने से बचाया है उसने, और तू उसी पर कीचड़ उछाल रही है?”

“पर कोई मुझे बताएगा कि हुआ क्या है? बिना किसी सबूत के इतने बड़े घर को ठुकरा दिया?” मालती देवी चिल्लाईं।

उसी वक्त पल्लवी अंदर के कमरे से बाहर आई। उसके हाथ में उसके पुराने शैक्षणिक दस्तावेज़ों और प्रमाणपत्रों वाली एक बड़ी सी फाइल थी। पल्लवी ने उस फाइल में से पीले पड़ चुके एक अखबार की कटिंग निकाली और लाकर मालती देवी के हाथ में थमा दी।

उस अखबार की मुख्य पृष्ठ की खबर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’शातिर जालसाज़ गिरोह का पर्दाफाश: अमीर लड़कियों से शादी का झांसा देकर करोड़ों ठगने वाला गिरोह गिरफ्तार।’

और उस खबर के ठीक नीचे उसी लड़के की तस्वीर छपी थी, जो अभी-अभी उस सोफे पर सूट-बूट पहनकर बैठा था! तस्वीर के नीचे उसका असली नाम और उसके खिलाफ दर्ज मुकदमों की लंबी सूची थी।

अखबार की उस कटिंग को देखते ही मालती देवी के हाथ कांपने लगे। उनके मुँह से शब्द नहीं निकले। रीना की चीख उसके हलक में ही अटक गई। उसका चेहरा इस कदर फक पड़ गया जैसे किसी ने उसे बिजली का झटका दे दिया हो।

मयंक ने भारी मन से, लेकिन बेहद गंभीर स्वर में अपनी माँ की ओर देखा।

“माँ, मुझे आज बहुत दुख हो रहा है,” मयंक की आवाज़ में वर्षों का दबा हुआ दर्द छलक पड़ा। “आपने जब से पल्लवी इस घर में आई है, कभी उसे अपनी बेटी तो क्या, एक इंसान के रूप में भी सम्मान नहीं दिया। आप हमेशा इसी भ्रम और संकीर्णता में जीती रहीं कि बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। लेकिन मैं आज आपसे पूछता हूँ माँ, क्या आपने कभी उसे बेटी की नज़र से देखा? क्या आपने कभी उसके आँसुओं को, उसकी पीड़ा को अपना समझा? आपने बात-बात पर उसके साथ दोगला व्यवहार किया, उसके मायके को कोसा, उसे ज़लील किया। लेकिन फिर भी… इस लड़की ने कभी अपने संस्कारों की मर्यादा नहीं लांघी।”

मयंक ने पल्लवी के कंधे पर हाथ रखा, जिसकी आँखों से मौन अश्रु बह रहे थे।

“माँ, अगर पल्लवी के दिल में ज़रा सा भी स्वार्थ या बदले की भावना होती, तो वह चुप बैठ सकती थी। वह तमाशा देख सकती थी कि जिस ननद ने उसे हमेशा ताने दिए, वह एक अपराधी के पल्ले बंधकर ज़िंदगी भर रोए! लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने अपने अपमान को भूलकर, अपनी ननद को अपनी सगी छोटी बहन माना और उसके जीवन को उस दलदल में धकेलने से रोक लिया जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। आज जो रीना जीवित है, उसका भविष्य सुरक्षित है, वह सिर्फ इस बहू की बदौलत है जिसे आप हर रोज़ ताने मारती थीं।”

ड्राइंग रूम में एक गहरा, स्तब्ध कर देने वाला सन्नाटा पसर गया था। दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक भी साफ सुनाई दे रही थी।

मालती देवी की नज़रें धीरे-धीरे उठीं और पल्लवी के चेहरे पर जाकर ठहर गईं। पल्लवी कोई बदला लेने के भाव से नहीं खड़ी थी; उसके चेहरे पर केवल एक गहरी संवेदना और राहत थी कि परिवार एक भयानक आंधी से बच गया था।

मालती देवी के हाथ से वह अखबार की कटिंग छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी। उनकी आँखों से पश्चाताप की अविरल धारा बह निकली। उनके पैरों तले की ज़मीन जैसे खिसक गई थी। उन्हें अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी वो सारी कड़वी बातें, वो ताने, वो ज़हरीले बोल किसी भयानक आईने की तरह अपने सामने नाचते हुए दिखाई दिए।

वे लड़खड़ाते हुए उठीं। उनके कदम पल्लवी की तरफ बढ़े।

पल्लवी कुछ समझ पाती, इससे पहले ही मालती देवी ने अपनी दोनों कांपती हथेलियाँ जोड़ लीं और फूट-फूट कर रो पड़ीं।

“बहू… मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची!” मालती देवी की हिचकियाँ बंध गईं। “मेरी आँखों पर अहंकार और दंभ की जो पट्टी बंधी थी, आज तूने उसे अपने त्याग से उतार फेंका। मैं अंधी थी पल्लवी… मैं भूल गई थी कि संस्कार और पवित्रता किसी तिजोरी में बंद दौलत से नहीं, मन की विशालता से आती है। तूने आज मेरी बेटी का सिंदूर लुटने से बचा लिया, तूने इस खानदान की पगड़ी को सड़क पर उछलने से बचा लिया। मैं तेरी गुनहगार हूँ बेटी…”

पल्लवी यह सहन नहीं कर सकी। उसने तुरंत आगे बढ़कर अपनी सास के जुड़े हुए हाथों को थाम लिया और उनके आँसू पोंछते हुए बोली, “नहीं माँ जी! ऐसा मत कहिए। आप मेरी माँ के समान हैं। अगर बेटी से कोई भूल हो जाए तो माँ डांटती ही है। आज अगर मैंने अपना कर्तव्य निभाया है, तो इसमें कोई अहसान नहीं है। रीना मेरी भी तो बहन है।”

तभी रीना दौड़कर आई और उसने पल्लवी के पैरों को पकड़ लिया। वह ज़मीन पर बैठकर बिलखने लगी, “भाभी… मुझे माफ़ कर दीजिए! मैंने आपको कितना दुख पहुँचाया, आपकी उस पावन निशानी का मज़ाक उड़ाया। अगर आज आप न होतीं, तो मेरी ज़िंदगी उस दरिंदे के हाथों तबाह हो चुकी होती। मुझे अपनी छोटी बहन समझकर माफ़ कर दीजिए भाभी!”

पल्लवी ने झुककर रीना को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। दोनों ननद-भाभी एक-दूसरे के गले लगकर रो पड़ीं। वह रोना किसी दुख का नहीं था, बल्कि वह उन सारी कड़वाहटों, तानों और मैली दीवारों के ढहने का रोना था जो बरसों से उस घर में खिंची हुई थीं।

उस दोपहर उस घर की आबोहवा हमेशा-हमेशा के लिए बदल चुकी थी। मालती देवी ने समझ लिया था कि बहू कभी पराई नहीं होती; अगर उसे सम्मान और प्रेम की दृष्टि से देखा जाए, तो वह अपनी कोख से जन्मी औलाद से भी बढ़कर परिवार की ढाल बन सकती है। बात केवल नज़रिए की होती है—हम जैसा बोते हैं, वैसा ही काटते हैं। उस दिन उस घर के आँगन में केवल एक रिश्ता नहीं बचा था, बल्कि विश्वास और आत्मीयता का एक ऐसा अमर वटवृक्ष अंकुरित हुआ था जिसकी छाँव कभी फीकी नहीं पड़ने वाली थी।

प्रिय पाठकों,

क्या किसी परिवार में बहू को मान-सम्मान देने के लिए हमेशा किसी बड़ी परीक्षा या संकट का इंतज़ार करना ज़रूरी है? क्या बहुओं को भी बिना किसी शर्त और पूर्वाग्रह के अपनी सगी बेटी का दर्ज़ा और प्यार नहीं मिलना चाहिए? इस भावनात्मक और आँखें खोल देने वाली कहानी पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।

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