नंदिनी रसोई की खिड़की के पास बैठी विज्ञान की कॉपियाँ जाँच रही थी, तभी माँ गीता देवी हाथ में एक छोटा-सा थैला लिए कमरे में आईं। थैले से किसी क्रीम की तेज़ खुशबू आ रही थी।
“नंदू, ये देख, पड़ोस वाली शर्मा आंटी ने बताया है। इसे रोज़ रात को लगाना है, पंद्रह दिन में चेहरा दमक उठेगा। वो कहती हैं उनकी भांजी की शादी से पहले इसी से रंग खिल गया था।”
नंदिनी ने लाल पेन रखा और मुस्कुराकर बोली, “माँ, शादी में आठ दिन बचे हैं, पंद्रह दिन वाली क्रीम का क्या करूँगी?”
“तू हर बात मज़ाक में उड़ा देती है। पता है, कल अभिनव की मौसी का फ़ोन आया था। कह रही थीं कि शोभना दीदी चाहती हैं कि शादी के फ़ोटो में बहू खिली-खिली दिखे। रंग थोड़ा साफ़ दिखे तो रिश्तेदारों के सामने बात बनी रहेगी।”
गीता देवी की आवाज़ भर्रा गई। नंदिनी ने कॉपियाँ एक तरफ़ रखकर माँ के हाथ थाम लिए। माँ की हथेलियाँ ठंडी थीं और उँगलियाँ हल्के-हल्के काँप रही थीं।
“माँ, आप डर क्यों रही हैं?”
“डरूँ नहीं तो क्या करूँ बेटा? तेरे लिए पहले भी रिश्ते आए। हर बार लोग तेरी पढ़ाई और तेरी नौकरी की तारीफ़ करते, फिर जाते-जाते कह देते कि लड़की का रंग ज़रा दबा हुआ है। इस बार अभिनव ने ख़ुद तुझे पसंद किया है। मैं नहीं चाहती कि कोई छोटी-सी बात इस रिश्ते को तोड़ दे।”
नंदिनी ने माँ का चेहरा देखा। इन आँखों ने बरसों उसकी चोटी बनाई थी, उसके स्कूल के लिए सुबह चार बजे उठकर पराँठे बनाए थे। इन्हीं आँखों में आज उसके लिए डर था। उसे अपना गुस्सा बेकार लगा।
तभी पिता हरिप्रसाद अपनी पुरानी लाठी टेकते कमरे में आए। वे डाकघर से रिटायर हुए थे और ज़्यादा बोलते नहीं थे, पर जब बोलते तो घर चुप हो जाता था।
“गीता, बच्ची को थोड़ा सोचने दो। नंदू, तू क्या चाहती है?”
“पापा, मैं माँ का मन नहीं तोड़ना चाहती, और ख़ुद को भी नहीं तोड़ना चाहती।”
हरिप्रसाद ने सिर हिलाया। “तो बीच का रास्ता निकालो। तुम्हारे ससुराल वाले कल दोपहर तुम्हें और तुम्हारी माँ को गोद-भराई की रस्म के लिए बुला रहे हैं। वहाँ चलो। जो होगा, देखा जाएगा।”
उस रात नंदिनी देर तक छत पर बैठी रही। गोरखपुर की उस गली में दूर कहीं ढोलक बज रही थी, किसी के घर शादी की तैयारी चल रही थी। उसे अभिनव की बात याद आई, जो उसने पहली मुलाक़ात में कही थी, “मुझे वो लड़की चाहिए जो मेरे सामने भी वही रहे जो सबके सामने रहती है।” उसने मन में सोचा, यही तो मैं हूँ, और इसे बदलकर मैं किसे ख़ुश करूँगी?
अगली दोपहर नंदिनी और गीता देवी अभिनव के घर पहुँचीं। बड़ा-सा आँगन था, तुलसी का चौरा था, और बरामदे में पीतल के बर्तन चमक रहे थे। सास शोभना जी ने दोनों का स्वागत तो किया, पर उनकी नज़र नंदिनी के चेहरे पर कुछ ज़्यादा देर टिकी रही। जैसे कोई कपड़े का रंग परख रहा हो।
“आओ बहू, बैठो। गीता जी, आपने कुछ सोचा या नहीं? हमारी रेखा की शादी में भी पार्लर वाली ने बहुत अच्छा काम किया था। मैं नंबर दे दूँ?”
गीता देवी ने घबराकर नंदिनी की ओर देखा। नंदिनी ने शांत स्वर में कहा, “आंटी जी, मैं आपकी हर बात ध्यान से सुन रही हूँ, पर पहले मुझे घर के बाक़ी लोगों से मिलवा दीजिए।”
शोभना जी हल्का-सा हँसकर रेखा को बुलाने चली गईं। रेखा अभिनव की बड़ी बहन थी, जो अपनी आठ साल की बेटी परी के साथ मायके आई हुई थी। परी हर जगह दिखाई देती थी, बस आज नहीं दिख रही थी।
थोड़ी देर बाद जब बड़ों की बातें लंबी खिंचने लगीं तो नंदिनी पानी लेने के बहाने उठी। गलियारे के आख़िरी कमरे से उसे धीमी-धीमी सिसकी सुनाई दी। उसने दरवाज़ा हल्के से खोला। पलंग के कोने में एक छोटी बच्ची घुटनों में मुँह छिपाए बैठी थी। उसके चेहरे पर सफ़ेद पाउडर की मोटी परत थी, जो आँसुओं से जगह-जगह बह गई थी। आँखों के नीचे सफ़ेद-भूरी धारियाँ बन गई थीं।
“अरे, तुम परी हो ना?” नंदिनी ने पास बैठते हुए पूछा। “मैं नंदिनी हूँ। तुम्हारे मामा की दोस्त।”
परी ने झट से हथेली से चेहरा ढक लिया। “आप मत देखो। मैं बहुत गंदी लग रही हूँ।”
“कौन कहता है?”
“सब कहते हैं।” उसकी आवाज़ में सिसकी घुल गई। “स्कूल में सब बोलते हैं कि मैं कोयला हूँ। नानी भी कहती हैं कि लड़की का रंग साफ़ होना चाहिए, वरना शादी नहीं होगी। मम्मी रोज़ मुझे क्रीम लगाती हैं, पर मैं गोरी नहीं होती। आज मैंने मम्मी की पाउडर वाली डिब्बी चुराकर लगा ली कि शायद आपके आने पर कोई कुछ न कहे।”
नंदिनी के गले में कुछ अटक गया। इस आठ साल की बच्ची ने वही वाक्य बोल दिए थे जो उसने बचपन से अपने कानों में सुने थे। उसे अपना बचपन याद आया। वह आईने के सामने खड़ी होकर साबुन से चेहरा इतना रगड़ती थी कि गाल लाल हो जाते थे और माँ आकर हाथ पकड़ लेती थीं।
उसने अपने दुपट्टे के कोने को पानी की गिलास में भिगोया और बहुत धीरे से परी का चेहरा साफ़ किया। फिर बोली, “परी, मैं तुम्हें एक राज़ बताऊँ? जब मैं तुम्हारी उम्र की थी ना, तो मेरा नाम भी स्कूल में काली मैना रखा गया था।”
परी की आँखें फैल गईं। “सच में?”
“बिल्कुल सच। मैं भी रोती थी। फिर एक दिन मेरी विज्ञान की टीचर ने हम सबको क्लास में एक बात सिखाई। उन्होंने कहा, रात का आसमान काला होता है, पर तारे उसी में चमकते हैं। अगर आसमान सफ़ेद होता तो एक भी तारा दिखाई नहीं देता। उस दिन के बाद मैंने तय किया कि मैं अपना काम इतना अच्छा करूँगी कि लोग रंग भूलकर काम याद रखें।”
परी ने आँसू पोंछे। “तो क्या मैं भी तारा बन सकती हूँ?”
“तुम तो अभी से तारा हो। तुमने सुबह मामा की कविता वाली कॉपी में जो चित्र बनाया है, मैंने देखा। इतना सुंदर चित्र बनाने वाली लड़की को किसी पाउडर की ज़रूरत नहीं।”
परी पहली बार हल्का-सा मुस्कुराई। उसी क्षण नंदिनी की नज़र दरवाज़े की ओर गई। चौखट पर शोभना जी खड़ी थीं, हाथ में चाँदी की थाली लिए। उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। उनके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। शायद वे बहुत देर से वहाँ खड़ी थीं।
परी ने नानी को देखकर डर के मारे चादर खींच ली। शोभना जी धीरे-धीरे अंदर आईं, थाली मेज़ पर रखी और पलंग के किनारे बैठ गईं। उनकी आँखें डबडबा आई थीं।
“परी बेटा,” उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा, “तू नानी से डरती है?”
परी चुप रही।
शोभना जी ने नंदिनी की ओर देखा। “बहू, मैंने ज़िंदगी भर यही सुना और यही कहा कि लड़की का रंग उसका गहना है। मैंने कभी सोचा ही नहीं कि इन बातों का बोझ कौन उठाता है। आज देखा कि वो बोझ मेरी अपनी नातिन के नन्हे कंधों पर है।”
वे रुकीं और आँचल से आँखें पोंछीं। “मैंने तुम्हारी माँ से कहा था कि शादी में रंग निखरा दिखना चाहिए। मुझे लगा था कि मैं समाज की बात बता रही हूँ। असल में मैं वही ज़हर आगे बढ़ा रही थी जो मुझे भी बचपन में पिलाया गया था। मेरी अपनी माँ मुझे हल्दी-बेसन लगाकर कहती थीं कि मेरा रंग दबा है और शादी में दिक्कत होगी। मैंने उसे सच मान लिया, और फिर वही अपनी बेटी और नातिन को सिखा दिया।”
नंदिनी कुछ कह नहीं पाई। उसने बस शोभना जी का हाथ थाम लिया।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। अभिनव खड़ा था। उसने शायद कुछ बातें सुन ली थीं, पर वह चुप रहा। रेखा भी उसके पीछे आ गई थी, और उसकी आँखें लाल थीं। उसे अपनी माँ और बेटी दोनों को इस हाल में देखकर समझ आ गया था कि घर के अंदर की चुप्पी कितनी भारी हो चुकी थी।
शोभना जी उठीं और सीधी बरामदे में पहुँचीं, जहाँ गीता देवी और बाक़ी रिश्तेदार बैठे थे। नंदिनी भी परी का हाथ पकड़े पीछे-पीछे आई। शोभना जी ने सबके सामने हाथ जोड़ दिए।
“गीता जी, मुझे आपसे माफ़ी माँगनी है। मैंने आपकी बेटी से रूप निखारने की माँग रखी थी। आज मैं वो माँग वापस लेती हूँ। मेरी बहू जैसी है, वैसी ही मेरे घर की रौनक बनेगी। अगर इस घर में किसी को कुछ बदलना है तो वो हमारी सोच है, नंदिनी का चेहरा नहीं।”
बरामदे में सन्नाटा छा गया। एक दूर की मामी ने फुसफुसाकर कुछ कहना चाहा, पर शोभना जी ने सख़्त निगाह से उसे चुप करा दिया। “जिसे मेरी बहू के रंग पर ऐतराज़ हो, वो शादी में आने की तकलीफ़ न करे। मेरी बहू की क़ीमत उसकी डिग्री, उसकी तमीज़ और उसके दिल से है।”
गीता देवी की आँखों से आँसू फूट पड़े। वे हाथ जोड़कर बोलीं, “बहन जी, मैं तो बस डर गई थी कि कहीं मेरी बेटी का घर बसने से पहले ही उजड़ न जाए। मुझे क्या पता था कि आपका दिल इतना बड़ा है।”
हरिप्रसाद, जो उसी वक़्त दरवाज़े से अंदर आए थे, चुपचाप खड़े सब सुन रहे थे। उन्होंने बस इतना कहा, “आज बहुत बड़ा काम हुआ है, समधिन जी। रिश्ते तो हर दिन जुड़ते हैं, पर आज एक सोच टूटी है।”
उस शाम लौटते हुए गीता देवी ने बेटी का हाथ कसकर पकड़ रखा था। रिक्शे में बैठकर उन्होंने धीरे से कहा, “नंदू, मुझे माफ़ कर दे। मैं तुझे वो क्रीम लगाने को मजबूर कर रही थी।”
नंदिनी ने माँ के कंधे पर सिर रख दिया। “माँ, आपने मुझे कभी नहीं तोड़ा। आपने बस मुझे दुनिया की बुरी नज़र से बचाना चाहा। आपका डर भी प्यार ही था।”
शादी का दिन आया। नंदिनी ने गहरे लाल रंग का लहँगा पहना, सोने के गहने पहने, और चेहरे पर बस हल्का-सा काजल और सादा श्रृंगार किया। पार्लर वाली ने पूछा था कि थोड़ा ब्लीच कर दूँ, तो नंदिनी ने मुस्कुराकर मना कर दिया था। जब वह मंडप की ओर बढ़ी तो कई आँखें उसकी ओर उठीं, और किसी की आँखों में कोई ताना नहीं था। सबने देखा कि उस दिन नंदिनी सच में दमक रही थी। वो चमक किसी क्रीम की नहीं थी, उसके आत्मविश्वास की थी।
फेरों के बाद जब शोभना जी ने बहू को गले लगाया तो धीरे से कान में कहा, “तूने मेरी आँखें खोल दीं बेटा।”
एक साल बाद गोरखपुर के उसी स्कूल में, जहाँ नंदिनी पढ़ाती थी, सालाना उत्सव हुआ। मंच पर आठ साल की परी ने अपने बनाए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई थी, और उसके बगल में एक बड़ा-सा बैनर था: “मेरा रंग, मेरी पहचान”। नंदिनी ने स्कूल में लड़कियों के लिए “आत्मविश्वास कक्षा” शुरू की थी, जहाँ हर शनिवार बच्चियों को सिखाया जाता था कि उनकी क़ीमत उनके रंग से नहीं, उनके सपनों से तय होती है। पहली पंक्ति में शोभना जी, गीता देवी और हरिप्रसाद साथ बैठे थे, और तीनों की आँखें नम थीं।
जब परी को सर्वश्रेष्ठ चित्रकार का पुरस्कार मिला तो उसने माइक पर कहा, “मेरी नंदिनी मामी ने मुझे बताया था कि अँधेरे आसमान में ही तारे चमकते हैं। आज मैं सबसे कहना चाहती हूँ कि अपने रंग से कभी मत शर्माना।”
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। शोभना जी ने रुमाल से आँखें पोंछीं और मन ही मन सोचा कि एक छोटी-सी सिसकी ने वो काम कर दिया जो बरसों की सीख नहीं कर पाई थी।
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