“बड़ा वह होता है जो बड़प्पन दिखाए, जो ज़िम्मेदारी उठाए,” निर्मला जी ने उनकी बात काटते हुए कहा। “सुमित ने अपनी जवानी, अपने सपने सब कुछ इस घर के लिए कुर्बान कर दिए। अंजलि ने इस घर को अपना माना और राधिका को अपनी बेटी की तरह पाला। कन्यादान कोई महज़ रस्म या दिखावा नहीं है जिसे समाज को खुश करने के लिए किया जाए। यह उस पिता और उस परिवार का सबसे बड़ा अधिकार और त्याग है जिसने उस बच्ची को सींच कर बड़ा किया है। विकास अगर शादी में आना चाहे तो एक मेहमान की तरह आ सकता है, लेकिन मेरी राधिका का कन्यादान सिर्फ और सिर्फ सुमित और अंजलि ही करेंगे। यह मेरा अंतिम फैसला है और इसे दुनिया की कोई भी झूठी परंपरा नहीं बदल सकती।”
निर्मला जी का परिवार हँसी-खुशी जीवन बिता रहा था। उनके पति रमेश जी का एक छोटा सा कपड़े का व्यापार था, जिससे घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई आराम से चल रही थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने से रमेश जी का निधन हो गया और हँसते-खेलते परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उस समय उनका बड़ा बेटा विकास कॉलेज के प्रथम वर्ष में था, छोटा बेटा सुमित ग्यारहवीं कक्षा में था और सबसे छोटी बेटी राधिका अभी सिर्फ सातवीं कक्षा की छात्रा थी। पिता के साये के बिना पूरा घर जैसे बिखर सा गया था।
निर्मला जी अभी इस सदमे से उबर भी नहीं पाई थीं कि घर की आर्थिक ज़िम्मेदारियों ने दरवाज़े पर दस्तक दे दी। ऐसे कठिन समय में ग्यारहवीं में पढ़ने वाले सुमित ने अपनी उम्र से कहीं बढ़कर समझदारी दिखाई। उसने पिता के व्यापार को संभालने का फैसला किया। विकास का मन पढ़ाई में बहुत लगता था और वह हमेशा से शहर से बाहर जाकर कुछ बड़ा करना चाहता था। सुमित ने अपने बड़े भाई से कहा कि वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे और घर की चिंता छोड़ दे। सुमित ने दिन-रात एक कर दिया, सुबह दुकान खोलता और देर रात तक हिसाब-किताब करता। उसने अपनी पढ़ाई भी पत्राचार (डिस्टेंस लर्निंग) के माध्यम से जारी रखी ताकि भाई और बहन के सपनों में कोई रुकावट न आए।
विकास की कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई और उसे दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। वहां काम करने के दौरान उसकी मुलाकात मीनल से हुई, जो उसी कंपनी के मालिक की बेटी थी। दोनों के बीच नज़दीकियां बढ़ीं और उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया। निर्मला जी और सुमित ने भी विकास की खुशी में अपनी खुशी मानी और धूम-धाम से दोनों की शादी करवा दी। शादी के बाद विकास पूरी तरह से दिल्ली में ही शिफ्ट हो गया। शुरुआत में वह त्योहारों पर घर आता था, लेकिन मीनल को कानपुर का रहन-सहन और छोटे घर का माहौल कुछ खास पसंद नहीं था। धीरे-धीरे विकास का आना-जाना कम हो गया। महीनों बीत जाते, लेकिन विकास का फोन तक नहीं आता। निर्मला जी कभी फोन करतीं तो वह काम की व्यस्तता का बहाना बनाकर बात टाल देता। सुमित यह सब देखता, लेकिन अपनी माँ को कभी दुख नहीं पहुँचने देता।
कुछ सालों बाद सुमित की भी शादी हो गई। उसकी पत्नी अंजलि एक बहुत ही संस्कारी, सुलझी हुई और समझदार लड़की थी। अंजलि ने आते ही घर को इस तरह से सँभाला जैसे वह सालों से इसी परिवार का हिस्सा हो। उसने कभी भी निर्मला जी को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उनकी बहू है, बल्कि हमेशा एक बेटी बनकर उनकी सेवा की। राधिका के लिए तो अंजलि एक बड़ी बहन और माँ जैसी बन गई। राधिका अपनी हर बात, हर राज अंजलि से साझा करती। दोनों ननद-भाभी कम और सहेलियां ज्यादा लगती थीं।
समय अपनी गति से चलता रहा। अंजलि और सुमित के घर एक प्यारी सी बेटी ने जन्म लिया। घर में फिर से वही पुरानी रौनक लौट आई। सुमित और अंजलि हमेशा यही कहते थे कि उनके पास दो बेटियां हैं—एक उनकी अपनी बेटी और दूसरी राधिका। सुमित ने राधिका की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने राधिका को उच्च शिक्षा दिलाई और जब वह एक अच्छी कंपनी में नौकरी करने लगी, तो उसके लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी गई।
जल्द ही अंजलि के मायके वालों की जान-पहचान से राधिका के लिए एक बहुत ही अच्छा रिश्ता आया। लड़का इंजीनियर था और परिवार भी बहुत ही नेक विचारों वाला था। दोनों परिवारों की रज़ामंदी से शादी पक्की हो गई और घर में शादी की तैयारियां ज़ोरों-शोरों से शुरू हो गईं। कार्ड छप गए, रिश्तेदारों को निमंत्रण भेजे जाने लगे। सुमित और अंजलि ने राधिका की शादी के लिए अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी लगा दी ताकि उनकी बहन को दुनिया की सबसे अच्छी विदाई मिल सके।
शादी से पंद्रह दिन पहले की बात है। घर में मेहमानों का आना शुरू हो गया था। तभी निर्मला जी के भाई यानी राधिका के मामा सुरेश जी घर आए। बातों-बातों में सुरेश जी ने निर्मला जी से कहा, “निर्मला, कल रात मेरी विकास से बात हुई थी। उसका कहना है कि वह घर का बड़ा बेटा है, इसलिए राधिका का कन्यादान वह और मीनल ही करेंगे। आखिर समाज में भी तो एक प्रतिष्ठा होती है, लोग क्या कहेंगे कि बड़े भाई के होते हुए छोटे भाई ने कन्यादान कर दिया? मेरी भी यही राय है कि परंपरा के अनुसार यह हक़ विकास को ही मिलना चाहिए।”
यह बात सुनकर घर के आंगन में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। सुमित और अंजलि चुपचाप खड़े रहे। सुमित ने कभी किसी अधिकार की मांग नहीं की थी, उसने तो बस निस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाया था। लेकिन आज बात हक़ की थी।
निर्मला जी का चेहरा एकदम शांत था, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी। उन्होंने अपने भाई की तरफ देखा और बेहद गंभीर आवाज़ में कहा, “भैया, जब राधिका के पिता इस दुनिया से गए थे, तब क्या समाज ने आकर इस घर का खर्च उठाया था? विकास तो उस वक्त दिल्ली जाकर अपनी नई दुनिया बसाने में मग्न हो गया था। तब से लेकर आज तक, क्या उसने कभी एक बार भी फोन करके पूछा कि उसकी छोटी बहन की फीस कैसे भरी जा रही है? क्या उसने कभी पूछा कि इस घर में राशन है या नहीं?”
सुरेश जी ने हड़बड़ाते हुए कहा, “लेकिन निर्मला, वह बड़ा भाई है…”
“बड़ा वह होता है जो बड़प्पन दिखाए, जो ज़िम्मेदारी उठाए,” निर्मला जी ने उनकी बात काटते हुए कहा। “सुमित ने अपनी जवानी, अपने सपने सब कुछ इस घर के लिए कुर्बान कर दिए। अंजलि ने इस घर को अपना माना और राधिका को अपनी बेटी की तरह पाला। कन्यादान कोई महज़ रस्म या दिखावा नहीं है जिसे समाज को खुश करने के लिए किया जाए। यह उस पिता और उस परिवार का सबसे बड़ा अधिकार और त्याग है जिसने उस बच्ची को सींच कर बड़ा किया है। विकास अगर शादी में आना चाहे तो एक मेहमान की तरह आ सकता है, लेकिन मेरी राधिका का कन्यादान सिर्फ और सिर्फ सुमित और अंजलि ही करेंगे। यह मेरा अंतिम फैसला है और इसे दुनिया की कोई भी झूठी परंपरा नहीं बदल सकती।”
निर्मला जी के इन स्पष्ट और दो-टूक शब्दों को सुनकर सुरेश जी अवाक रह गए। उन्हें अपनी बहन से इतने कड़े और निष्पक्ष जवाब की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। उनका सारा गुरूर टूट गया और वह अपना सा मुँह लेकर चुपचाप वहाँ से खिसक गए। सुमित और अंजलि की आँखों में आँसू थे, लेकिन ये आँसू उस सम्मान के थे जो उनकी माँ ने आज उन्हें दिया था।
राधिका की शादी का दिन बहुत ही भव्य और भावुक रहा। विकास अपनी पत्नी के साथ शादी में शामिल हुआ, लेकिन उसकी हैसियत सिर्फ एक आम रिश्तेदार जैसी ही थी। मंडप में जब कन्यादान की रस्म का समय आया, तो पंडित जी के बुलाने पर सुमित और अंजलि आगे आए। दोनों ने नम आँखों और गर्व के साथ अपनी बहन का कन्यादान किया। राधिका ने रोते हुए अपने भाई-भाभी के पैर छुए और सुमित ने उसे गले से लगा लिया। वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें इस पवित्र और सच्चे रिश्ते को देखकर छलक उठीं। निर्मला जी ने साबित कर दिया था कि परिवार खून से नहीं, बल्कि साथ निभाने से और एक-दूसरे के प्रति समर्पण से बनता है।
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