शिखा तुरंत कमरे में आई और पिता के पास बैठकर उनके हाथ पकड़ते हुए बोली, “नहीं पापा, बिल्कुल नहीं। आप किसी को फोन नहीं करेंगे। मुझे किसी की सिफ़ारिश की भीख नहीं चाहिए। तान्या को सिफ़ारिश से नौकरी मिली है, उसे हमेशा यह अहसास रहेगा कि वह उस जगह के काबिल नहीं थी। लेकिन मैं अपनी मंजिल अपनी काबिलियत के दम पर हासिल करूँगी। मैं थोड़ी देर के लिए अपना धैर्य खो बैठी थी, दूसरों को देखकर भटक गई थी। मुझे माफ़ कर दीजिए पापा।”
शर्मा परिवार में आज सुबह से ही एक अजीब सा तनाव फैला हुआ था। घर की इकलौती और लाडली बेटी शिखा आज अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण इंटरव्यू देकर लौटी थी। शिखा पढ़ाई में हमेशा से अव्वल रही थी, यूनिवर्सिटी टॉपर थी और उसने अपने हर सपने को सच करने के लिए दिन-रात एक कर दिया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसका संघर्ष उसे तोड़ने लगा था। यह उसका छठा इंटरव्यू था, और इस बार भी वह निराशा ही लेकर घर लौटी थी।
जैसे ही शिखा ने घर का दरवाज़ा खोला, उसकी माँ माधवी जी ने बेचैनी से पूछा, “शिखा बेटा, कैसा हुआ इंटरव्यू? कुछ बात बनी?”
शिखा ने अपना हैंडबैग ज़ोर से सोफे पर फेंका और गुस्से से भड़कते हुए बोली, “क्या खाक बात बनेगी माँ! सब पहले से तय होता है वहां। पापा के इतने जान-पहचान वाले हैं, शहर के हर बड़े आदमी से उनके संपर्क हैं, लेकिन मजाल है जो वो अपनी बेटी के लिए एक फोन घुमा दें! उन्हें तो बस अपने आदर्श और उसूल प्यारे हैं। मैं यहाँ दर-दर की ठोकरें खा रही हूँ, और उन्हें कोई परवाह ही नहीं है।”
माधवी जी ने उसे शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, “शांत हो जा बेटा, ऐसे हिम्मत नहीं हारते। तेरे पापा के अपने कुछ नियम हैं…”
“क्या नियम माँ?” शिखा बीच में ही चीख पड़ी। “मेरी सहेली तान्या को देखो। वो पढ़ाई में हमेशा मुझसे पीछे रही, कभी कोई प्रोजेक्ट खुद से नहीं किया। लेकिन आज वो एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर बैठ गई है, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके डैडी ने एक सिफारिशी फोन कर दिया था। आज वो मुझसे कह रही थी, ‘शिखा, तेरे पापा तेरा भला नहीं चाहते, वरना तू आज धक्के नहीं खा रही होती।’ और माँ, सच कहूँ तो अब मुझे भी यही लगने लगा है।”
इतना कहते-कहते शिखा का गला भर आया और उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। वह भागकर अपने कमरे में गई और दरवाज़ा बंद कर लिया।
माधवी जी से अपनी बेटी का यह दुख नहीं देखा गया। वह जानती थीं कि उनके पति राजीव जी एक बहुत ही ईमानदार और सिद्धांतवादी इंसान हैं। वे सरकारी विभाग से एक ऊँचे पद से रिटायर हुए थे और चाहते तो एक इशारे पर शिखा को नौकरी मिल सकती थी। लेकिन उन्होंने हमेशा ईमानदारी का रास्ता चुना था। फिर भी, आज एक माँ की ममता उन उसूलों पर भारी पड़ रही थी।
शाम को जब राजीव जी घर आए, तो माधवी जी ने उन्हें चाय देते हुए तीखे स्वर में कहा, “आज फिर शिखा का इंटरव्यू खराब हो गया। वो बहुत रो रही थी। आप आख़िर कैसे पिता हैं? शहर में इतने बड़े-बड़े लोग आपको जानते हैं, एक फोन कर देंगे तो क्या आपका कोई नुकसान हो जाएगा? बेटी की इस हालत से ज्यादा आपके उसूल मायने रखते हैं क्या? तान्या के पिता ने अपनी बेटी की नौकरी लगवा दी, और आप यहाँ बैठकर बस अपनी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटते रहते हैं।”
राजीव जी ने चाय का कप मेज़ पर रखा और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर आवाज़ में बोले, “माधवी, मैं एक फोन कर सकता हूँ। मेरे एक इशारे पर शिखा को शहर की सबसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी। लेकिन, उसके बाद क्या? उस नौकरी में शिखा की मेहनत कहाँ होगी? मेरी सिफ़ारिश से मिली नौकरी उसे वो आत्मविश्वास कभी नहीं दे पाएगी जो उसे अपनी काबिलियत से मिलती। बचपन से लेकर आज तक, उसने हर चीज़ अपनी मेहनत से हासिल की है। अगर आज मैं उसके लिए सिफ़ारिश कर दूँ, तो उसका खुद पर से विश्वास उठ जाएगा। वह ज़िंदगी भर यही सोचेगी कि वह इस काबिल नहीं थी, इसलिए उसके पिता को किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ा।”
राजीव जी गहरी साँस लेते हुए आगे बोले, “यह जो असफलताएं उसे आज मिल रही हैं, यह उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि अंदर से मज़बूत बना रही हैं। संघर्ष की भट्टी में तपकर ही तो सोना कुंदन बनता है। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी किसी की दया या सिफ़ारिश की मोहताज बने। लेकिन… अगर तुम्हें और शिखा को यही सही लगता है, तो कल सुबह मैं मिस्टर खन्ना को फोन कर दूँगा। शिखा की नौकरी पक्की समझो।”
राजीव जी की यह बात कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी शिखा सुन रही थी। पिता के ये शब्द उसके दिल में सीधे उतर गए। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह समझ गई कि पिता की सख्ती के पीछे उनकी कितनी गहरी सोच और विश्वास छिपा था।
शिखा तुरंत कमरे में आई और पिता के पास बैठकर उनके हाथ पकड़ते हुए बोली, “नहीं पापा, बिल्कुल नहीं। आप किसी को फोन नहीं करेंगे। मुझे किसी की सिफ़ारिश की भीख नहीं चाहिए। तान्या को सिफ़ारिश से नौकरी मिली है, उसे हमेशा यह अहसास रहेगा कि वह उस जगह के काबिल नहीं थी। लेकिन मैं अपनी मंजिल अपनी काबिलियत के दम पर हासिल करूँगी। मैं थोड़ी देर के लिए अपना धैर्य खो बैठी थी, दूसरों को देखकर भटक गई थी। मुझे माफ़ कर दीजिए पापा।”
राजीव जी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “शाबाश बेटा! मुझे तुम पर पूरा भरोसा था कि तुम मेरी बात समझोगी। यह संघर्ष तुम्हें वो उड़ान देगा, जहाँ पहुँचने के बाद कोई तुमसे तुम्हारी सफलता का श्रेय नहीं छीन पाएगा।”
अगले कुछ महीनों तक शिखा ने दोगुनी मेहनत से तैयारी की। उसने अपनी पिछली कमियों से सीखा और खुद को और बेहतर बनाया। और एक दिन वह सुखद पल भी आ गया। एक बहुत ही प्रतिष्ठित कंपनी से उसे बुलावा आया। इस बार उसका इंटरव्यू शानदार रहा, और उसे उसकी योग्यता के आधार पर मैनेजर के पद पर चुन लिया गया।
जिस दिन शिखा का पहला दिन था, उसने ऑफिस जाने से पहले अपने पिता के पैर छुए। राजीव जी ने गर्व से कहा, “आज तुम्हें जो मिला है, वह तुम्हारी अपनी मेहनत है। अब तुम ज़िंदगी में कभी किसी चुनौती से नहीं घबराओगी।” शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ पापा, क्योंकि मुझे पता है कि मेरी नींव किसी सिफ़ारिश पर नहीं, बल्कि मेरे अपने संघर्ष पर खड़ी है।”
क्या आपको भी लगता है कि बच्चों को संघर्ष करने देना चाहिए ताकि वे अपनी काबिलियत पहचान सकें? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ।
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