“तुम्हारी कमाई, मेरी कमाई…

 नेहा ने अपने पिता को भी फ़ोन करके कहा, “पापा, आप चिंता मत कीजिए। मैं और विपुल जो बन पाएगा, मदद करेंगे। हम सब मिलकर इस मुश्किल से निकलेंगे।” मोहनलाल जी की आँखें भीग गईं। उन्होंने कहा, “बेटी, तूने आज मुझे बहुत बड़ा सहारा दिया है।”

नेहा हर महीने अपनी तनख़्वाह का एक हिस्सा माता-पिता को भी भेजने लगी, और बाक़ी हिस्सा क़र्ज़ चुकाने में लगाती। विपुल और नेहा ने मिलकर तय किया कि जब तक क़र्ज़ ख़त्म नहीं होता, कोई फ़िज़ूलख़र्ची नहीं होगी।

 सावित्री देवी चश्मा ठीक करती हुई आँगन में आईं और देखा कि बहू नेहा फिर से अख़बार में लिपटा हुआ भारी-भरकम पैकेट मेज़ पर रख रही थी।

“नेहा बेटा, ये फिर क्या उठा लाई? कल ही तो तुमने ऑनलाइन से दो जोड़ी जूते मँगवाए थे।”

नेहा ने भौंहें चढ़ाईं। “माँजी, ये तो बस कुछ सजावटी सामान है। बालकनी के लिए झूमर और कुछ गमले। आपको हर चीज़ में हिसाब क्यों चाहिए?”

“हिसाब नहीं बेटा, बस इतना कह रही थी कि अभी घर में ज़रूरी चीज़ें…”

“देखिए माँजी,” नेहा ने बात काटी, “मैं भी कमाती हूँ। मेरी तनख़्वाह है, मेरी मर्ज़ी है। मैं अपनी कमाई अपनी ख़ुशी पर ख़र्च करूँ, इसमें किसी को क्या एतराज़?”

सावित्री देवी चुप हो गईं। उनके होंठों पर कुछ कहने को आए शब्द वहीं अटक गए। वे धीरे से अपने कमरे की ओर मुड़ गईं।

नेहा और विपुल की शादी को डेढ़ साल हुआ था। दोनों की मुलाक़ात एक निजी बैंक में हुई थी, जहाँ दोनों काम करते थे। नेहा एक संपन्न व्यापारी परिवार की बेटी थी। उसके पिता मोहनलाल जी का कपड़ों का बड़ा शोरूम था, घर में नौकर-चाकर थे और नेहा ने कभी किसी चीज़ के लिए “ना” नहीं सुनी थी। विपुल एक साधारण परिवार का बेटा था। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में क्लर्क थे और कई साल पहले चल बसे थे। माँ सावित्री ने पेंशन के थोड़े से पैसों और घर की छत पर चलने वाली छोटी-सी अचार-पापड़ की दुकान से तीन बच्चों को पाला था।

विपुल की दोनों बड़ी बहनों, रेखा और सुषमा की शादी में माँ ने रिश्तेदारों और एक स्थानीय साहूकार से क़र्ज़ लिया था। उन्होंने सबसे वादा किया था, “विपुल की नौकरी लगते ही सब चुका दूँगी।” पर विपुल की नौकरी लगते ही उसकी शादी भी हो गई, और शादी का ख़र्च भी क़र्ज़ की सूची में जुड़ गया। अब घर पर लगभग साढ़े चार लाख रुपये का बोझ था।

सावित्री देवी की आँखों की रोशनी अब कमज़ोर पड़ने लगी थी। पापड़ बेलना और अचार के मर्तबान सँभालना अब उनके बस में नहीं रहा। दुकान लगभग बंद हो चुकी थी। विपुल की तनख़्वाह अच्छी थी, पर क़िस्त, घर का ख़र्च, माँ की दवाइयाँ, सब उसी से निकलता था।

विपुल और नेहा दोनों कमाते थे, पर विपुल ने कभी नेहा से उसकी तनख़्वाह का हिसाब नहीं माँगा था। उसका मानना था कि यह उसका अपना फ़ैसला होना चाहिए। लेकिन दिन-ब-दिन उसे महसूस हो रहा था कि घर के सारे ख़र्चे और क़र्ज़ का भार सिर्फ़ उसके कंधों पर है, जबकि नेहा की पूरी कमाई शॉपिंग, पार्लर, बाहर के खाने और दोस्तों के साथ घूमने में उड़ जाती थी।

एक रात उसने धीरे से कहा, “नेहा, क्या हम महीने की तनख़्वाह का कुछ हिस्सा बचत में डाल सकते हैं? माँ का क़र्ज़…”

नेहा ने मोबाइल से नज़र हटाए बिना कहा, “विपुल, क़र्ज़ तुम्हारी माँ ने लिया है। मैंने तो नहीं कहा था कि दीदियों की शादी में इतना ख़र्च करें। मैं अपनी कमाई से समझौता क्यों करूँ? तुम्हारी माँ का क़र्ज़ तुम जानो।”

विपुल को जैसे किसी ने तमाचा मार दिया हो। वह कुछ बोल नहीं पाया। बस करवट बदलकर लेट गया। बहुत देर तक छत को ताकता रहा। उसके और नेहा के बीच जो दीवार खड़ी हो रही थी, वह उसे साफ़ दिखाई देने लगी थी।

अगले कुछ महीने ऐसे ही गुज़रे। नेहा की तनख़्वाह आती और ख़र्च होती रहती। उसकी अलमारी में ऐसे कपड़े भरे थे जिनके टैग तक नहीं हटे थे। रसोई में वह कभी सब्ज़ी ज़्यादा मँगवा लेती, कभी आधी पकाकर छोड़ देती। सावित्री देवी चुपचाप बची हुई चीज़ों को सँभालतीं, दाल को सुबह परांठे के आटे में मिला देतीं, बची सब्ज़ी से शाम को कटलेट बना देतीं, और कभी कुछ न कहतीं। उन्होंने तय कर लिया था कि घर की शांति के लिए वे अपनी ज़ुबान बंद रखेंगी।

पर एक दिन नेहा ने उन्हें ऐसा कुछ कह दिया जो उन्हें भीतर तक चुभ गया। सावित्री देवी ने बस इतना पूछा था कि बाज़ार से आई साड़ी की क़ीमत क्या थी। नेहा ने तीखे स्वर में कहा, “माँजी, आप अपना पुराना ज़माना अपने पास रखिए। मेरी माँ ने कभी मुझसे हिसाब नहीं माँगा। आप क्या समझेंगी कि अच्छी चीज़ों की क़ीमत क्या होती है?”

उस रात सावित्री देवी देर तक अपनी पुरानी सिलाई मशीन के पास बैठी रहीं, जिस पर अब धूल जमी थी। उन्होंने मशीन पर हाथ फेरा, और आँखें पोंछ लीं।

दीवाली से कुछ हफ़्ते पहले की बात है। नेहा रात को खाना खाकर अपने कमरे में बैठी थी कि उसके फ़ोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर “पापा” का नाम चमक रहा था। इतनी रात गए पापा कभी फ़ोन नहीं करते थे। उसने झट से उठाया।

“हेलो पापा?”

“बेटा…” उधर से आवाज़ भारी और काँपती हुई थी। “कैसी है तू?”

“मैं ठीक हूँ पापा, आप ठीक हैं? आपकी आवाज़ को क्या हुआ?”

कुछ पल की ख़ामोशी के बाद मोहनलाल जी ने कहा, “नेहा, एक बात बतानी थी। हमारा शोरूम बंद हो गया है। पिछले एक साल से माल की उधारी बढ़ती जा रही थी। एक बड़े सप्लायर ने धोखा दे दिया। करोड़ों का माल गया और पैसा भी वापस नहीं आया। बैंक का क़र्ज़ भी चढ़ गया है। हमें शोरूम और ये बड़ा मकान, दोनों बेचने पड़ रहे हैं।”

नेहा का गला सूख गया। “पापा… ये क्या कह रहे हैं? आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”

“तू परेशान होती बेटी। अब हम कल सुबह पुराने मोहल्ले में किराए के दो कमरों में जा रहे हैं।”

नेहा रोने लगी। “पापा, आप इतने बड़े घर में रहे हैं, माँ कैसे रहेंगी उस छोटे-से किराए के मकान में? ये क़र्ज़ आपका है, माँ क्यों भुगतें? माँ को इतना कष्ट क्यों उठाना पड़े?”

तभी फ़ोन पर माँ की आवाज़ आई। उन्होंने पति के हाथ से फ़ोन ले लिया था। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें एक गहराई थी जो नेहा ने पहले कभी महसूस नहीं की थी।

“नेहा, सुन बेटा। जब तेरे पापा ने ये दुकान शुरू की थी, तब हम एक कमरे में रहते थे। मैंने अपने गहने बेचकर पहली खेप का पैसा जुटाया था। आज अगर वही दुकान डूब रही है तो क्या मैं हाथ झाड़कर कह दूँ कि ये तेरे पापा की समस्या है? पत्नी सिर्फ़ सुख की साथी नहीं होती। जब पति पर संकट आता है, तब उसका सबसे बड़ा सहारा वही बनती है।

“मैंने कल अपने सारे गहने निकालकर तेरे पापा के सामने रख दिए। उन्होंने मना किया, पर मैंने कहा कि गहने दोबारा बन जाएँगे, पर इंसान का सिर अगर क़र्ज़ के बोझ से झुक गया तो उसे सीधा करना मुश्किल होता है। यह घर, यह शोरूम, ये सब ईंट-पत्थर हैं बेटा। असली घर वह होता है जहाँ दो लोग एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ते।”

नेहा के हाथ काँप रहे थे। फ़ोन कट गया, पर माँ के शब्द उसके कानों में गूँजते रहे।

वह देर तक पलंग के किनारे बैठी रही। फिर धीरे से उठकर अपनी अलमारी खोली। नए कपड़ों के ढेर, जूतों के डिब्बे, सजावटी सामान की थैलियाँ, सब ऐसे ही पड़े थे। उसे पहली बार लगा कि ये चीज़ें नहीं, कोई बोझ हैं। उसकी आँखों के सामने सावित्री देवी का चेहरा आ गया, जो हर बार उसके ख़र्चों पर कुछ कहते-कहते रुक जाती थीं। उसे याद आया कि कैसे एक बार उसने उन्हें “पुराने ज़माने की” कहकर ताना मारा था।

उसकी आँखों से आँसू बह निकले। “मैं कितनी ग़लत थी,” उसने ख़ुद से कहा।

अगली सुबह नेहा देर से उठी, पर चेहरा शांत था। रसोई में सावित्री देवी चाय बना रही थीं। नेहा चुपचाप उनके पास आकर खड़ी हो गई।

“माँजी, आज से खाना मैं बनाऊँगी। आप बताइए, कितना आटा लूँ, दाल कितनी रखूँ, ताकि कुछ बेकार न जाए?”

सावित्री देवी ने हैरानी से उसकी ओर देखा। यह वही नेहा थी जिसने कभी रसोई में नाप-तौल के बारे में सुना तक नहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर बताया, और नेहा ध्यान से सीखती रही।

उस दिन के बाद सब कुछ धीरे-धीरे बदलने लगा। नेहा ने ऑनलाइन शॉपिंग के ऐप फ़ोन से हटा दिए। उसने अपनी सहेलियों से कहा कि अब हर हफ़्ते घूमने नहीं जा सकेगी। शुरू में सहेलियों ने मज़ाक उड़ाया, पर नेहा मुस्कुराकर टाल देती।

एक शाम विपुल दफ़्तर से लौटा तो नेहा ने उसके सामने एक कॉपी रख दी। “ये देखो।”

उसमें महीने के ख़र्च की पूरी सूची थी, किराना, बिजली, दवा, क़िस्त, और सबसे ऊपर लिखा था, “माँजी का क़र्ज़: साढ़े चार लाख।”

“विपुल,” नेहा ने धीमे स्वर में कहा, “मैं अपनी तनख़्वाह का आधा हिस्सा हर महीने इस क़र्ज़ के लिए अलग रखूँगी। मैंने बहुत बड़ी ग़लती की थी। मैंने सोचा कि घर सिर्फ़ तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। पर घर तो हम दोनों का है, और माँजी की मुश्किलें भी हमारी हैं।”

विपुल की आँखें भर आईं। उसने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं निकले। सावित्री देवी दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थीं। नेहा उनके पास गई और उनके पैरों में झुक गई।

“माँजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपको बहुत दुख पहुँचाया।”

सावित्री देवी ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया। “बेटा, माफ़ी माँगने की ज़रूरत नहीं। बेटियाँ ग़लती करती हैं तो माएँ सीखने का वक़्त भी देती हैं। आज तूने साबित कर दिया कि तू इस घर की सच्ची बहू है।”

अगले कुछ महीनों में घर का माहौल बदल गया। नेहा और विपुल ने मिलकर बजट बनाया। हर महीने की पहली तारीख़ को क़र्ज़ की क़िस्त सबसे पहले अलग रखी जाती। नेहा ने पुरानी सिलाई मशीन साफ़ करवाई और सावित्री देवी से सिलाई का बुनियादी काम सीखना शुरू किया। सावित्री देवी की आँखों की रोशनी कमज़ोर थी, पर उनके हाथों का हुनर अब भी वैसा ही था। वे बताती जातीं और नेहा सिलती जाती। आस-पड़ोस की औरतें ब्लाउज़ और सलवार-सूट सिलवाने आने लगीं।

नेहा ने अपने पिता को भी फ़ोन करके कहा, “पापा, आप चिंता मत कीजिए। मैं और विपुल जो बन पाएगा, मदद करेंगे। हम सब मिलकर इस मुश्किल से निकलेंगे।” मोहनलाल जी की आँखें भीग गईं। उन्होंने कहा, “बेटी, तूने आज मुझे बहुत बड़ा सहारा दिया है।”

नेहा हर महीने अपनी तनख़्वाह का एक हिस्सा माता-पिता को भी भेजने लगी, और बाक़ी हिस्सा क़र्ज़ चुकाने में लगाती। विपुल और नेहा ने मिलकर तय किया कि जब तक क़र्ज़ ख़त्म नहीं होता, कोई फ़िज़ूलख़र्ची नहीं होगी। त्योहार पर भी सादगी रही, दीये जले, घर में मिठाई बनी, और सबने साथ मिलकर खाना खाया। उस दीवाली पर पहली बार नेहा को लगा कि असली रोशनी महँगे झूमरों में नहीं, अपनों की मुस्कान में होती है।

डेढ़ साल की मेहनत के बाद वह दिन भी आया जब आख़िरी क़िस्त चुका दी गई। साहूकार के घर से लौटकर विपुल ने माँ के हाथ में रसीद रखी। सावित्री देवी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने रसीद को माथे से लगाया और कहा, “आज तेरे पिताजी की आत्मा को भी शांति मिली होगी।”

उसी शाम नेहा ने विपुल और सावित्री देवी को बैठाकर बताया कि वह माँ बनने वाली है। घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। रेखा और सुषमा भी अपने परिवारों के साथ मिलने आ गईं। घर में बरसों बाद ऐसी रौनक थी।

उधर नेहा के माता-पिता भी धीरे-धीरे सँभल गए थे। मोहनलाल जी ने एक छोटी-सी दुकान फिर से शुरू की, और इस बार नेहा की माँ भी उनके साथ बैठतीं। वे कहते, “अब दुकान छोटी है, पर दिल बहुत बड़ा है।”

कुछ महीनों बाद नेहा ने एक प्यारी-सी बेटी को जन्म दिया। नामकरण वाले दिन सावित्री देवी ने नन्ही बच्ची को गोद में लेकर कहा, “बेटा, इसका नाम हम ‘सहारा’ रखेंगे। क्योंकि इस घर को सहारा देना सिखाने वाली तू है।”

नेहा ने मुस्कुराकर विपुल की ओर देखा। विपुल ने उसका हाथ थाम लिया। उस पल उसे लगा कि सचमुच अब “मेरा” और “तुम्हारा” की जगह “हमारा” ने ले ली है।


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मूल लेखिका : अर्चना खंडेलवाल

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