मिट्टी के घरौंदे

“कागज की नाव जब तक पानी के ऊपर तैरती है चित्रा, तब तक ही सबको सुंदर लगती है। जिस दिन वह पानी सोख कर भारी हो जाती है, बच्चे भी उसे किनारे छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। औरत की ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है, जब तक वह सबका बोझ उठाती है, वह ‘गृहलक्ष्मी’ कहलाती है, और जिस दिन वह खुद थक कर सहारे की उम्मीद करती है, वह घर का फालतू सामान बन जाती है।” वंदना ने मिट्टी के कुल्हड़ में गरम चाय उड़ेलते हुए एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर ढलती उम्र की लकीरें तो थीं, लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक और ठहराव था।

वंदना के सामने बैठी उसकी कॉलेज के दिनों की सबसे करीबी दोस्त चित्रा अवाक होकर चारों तरफ देख रही थी। चित्रा पूरे बीस साल बाद देहरादून से उदयपुर लौटी थी। उसे आज भी याद था कि वंदना की शादी उदयपुर के सबसे प्रतिष्ठित और रईस खानदान के बड़े बेटे महेंद्र से हुई थी। शहर के बीचों-बीच बनी उनकी विशाल हवेली ‘कमल कुंज’ किसी महल से कम नहीं थी। उस हवेली में वंदना का राज चलता था। नौकर-चाकरों की फौज, गले में सोने के भारी हार और कमर में चाबियों का भारी गुच्छा—यही वंदना की पहचान हुआ करती थी। लेकिन आज, वंदना शहर के एक शांत कोने में बने एक छोटे से, पर बेहद खूबसूरत घर के आँगन में बैठी थी, जहाँ चारों तरफ मसालों और अचार की भीनी-भीनी खुशबू फैल रही थी, और आँगन में सात-आठ औरतें बैठी काम कर रही थीं।

चित्रा से रहा नहीं गया। उसने वंदना के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए पूछा, “वंदना, ये सब क्या है? तुम उस इतनी बड़ी हवेली को छोड़कर यहाँ इस छोटे से घर में क्यों रह रही हो? महेंद्र जी कहाँ हैं? और तुम्हारा बेटा नीरज? मैंने तो सुना था कि तुम्हारा परिवार पूरे शहर में एक मिसाल माना जाता था।”

वंदना के होंठों पर एक फीकी, पर शांत मुस्कान तैर गई। उसने सामने काम कर रही महिलाओं को दोपहर की छुट्टी का इशारा किया और चित्रा के पास खिसक कर बैठ गई। “मिसालें अक्सर दूर से ही अच्छी लगती हैं चित्रा। जब करीब जाकर देखो, तो पता चलता है कि उन मिसालों की नींव में किसी की पूरी ज़िंदगी दफन है,” वंदना ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए अतीत के पन्नों को पलटना शुरू किया।

“तुम्हें तो याद ही होगा चित्रा, मुझे पेंटिंग और पाक-कला का कितना शौक था। लेकिन जब मैं बाईस साल की उम्र में महेंद्र की दुल्हन बनकर ‘कमल कुंज’ में आई, तो दूसरे ही महीने मेरे ससुर जी का देहांत हो गया। सास, कमला जी, को गठिया की गंभीर बीमारी थी, वो बिस्तर से उठ भी नहीं पाती थीं। उस वक्त मेरे देवर आलोक की उम्र मात्र बारह साल थी और ननद शोभा सिर्फ नौ साल की थी। महेंद्र ने मेरे दोनों हाथ पकड़कर कहा था—’वंदना, आज से तुम सिर्फ मेरी पत्नी नहीं हो, इस बिखरते हुए परिवार की माँ भी हो। अगर तुमने हिम्मत हार दी, तो मैं टूट जाऊँगा।’ बस, महेंद्र के उन शब्दों को मैंने अपने जीवन का धर्म मान लिया।”

वंदना की आवाज़ में पुरानी यादों की कसक उभर आई। “मैंने अपने सारे रंग, अपनी तूलिकाएं एक बक्से में बंद करके रख दीं। मेरी सुबह चार बजे शुरू होती थी और रात के बारह बजे खत्म। सास की मालिश करना, उन्हें नहलाना, आलोक और शोभा का टिफिन बनाना, उन्हें स्कूल भेजना, फिर शाम को उन्हें पढ़ाना। कुछ साल बाद जब मेरे बेटे नीरज का जन्म हुआ, तब भी मैंने कभी आलोक और नीरज में रत्ती भर का फर्क नहीं किया। अगर नीरज के लिए एक खिलौना आता, तो आलोक के लिए दो आते, ताकि उसे कभी यह महसूस न हो कि उसके सिर पर पिता का साया नहीं है। शोभा की शादी में मैंने अपने मायके से मिले सारे पुश्तैनी गहने चुपचाप महेंद्र को दे दिए ताकि हमारी ननद की विदाई राजकुमारी की तरह हो सके। महेंद्र मेरा बहुत सम्मान करते थे। वो अक्सर समाज में गर्व से कहते थे कि ‘कमल कुंज’ की असली मालकिन वंदना ही है।”

“फिर अचानक ऐसा क्या हुआ वंदना?” चित्रा ने बेचैनी से पूछा।

“वक्त की मार पड़ी चित्रा,” वंदना ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा। “आज से चार साल पहले, महेंद्र को व्यापार के सिलसिले में सूरत जाना था। रास्ते में उनकी कार का भयानक एक्सीडेंट हो गया। अस्पताल पहुँचने से पहले ही वो दम तोड़ चुके थे। जब उनका पार्थिव शरीर घर के आँगन में रखा था, तब मुझे लगा कि मेरी तो साँसें ही रुक जाएँगी। इकतीस साल का साथ एक झटके में छूट गया था। मैं सुध-बुध खो बैठी थी। लेकिन उस अंधेरे में भी मुझे एक उम्मीद थी—मुझे लगा कि मैंने जिस परिवार को अपने खून-पसीने से सींचा है, वो मुझे गिरने नहीं देगा। आलोक, जिसे मैंने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया, और नीरज, जो मेरा अपना अंश था, वो मेरी ढाल बनेंगे। लेकिन मैं कितनी गलत थी, यह मुझे तेरहवीं की रस्म खत्म होते ही समझ आ गया।”

वंदना ने चाय का एक घूंट भरा, मानो वह अपने गले में अटक रहे दर्द को नीचे उतारने की कोशिश कर रही हो। “महेंद्र के जाने के मात्र बीस दिन बाद, घर के माहौल में एक अजीब सी ठंडक आ गई। आलोक और उसकी पत्नी रुचि के तेवर पूरी तरह बदल चुके थे। एक शाम आलोक कुछ कागजात लेकर मेरे कमरे में आया। उसने बड़े ही मीठे स्वर में कहा, ‘भाभी माँ, भैया के जाने के बाद मार्केट में लेनदार बहुत परेशान कर रहे हैं। शोरूम और फैक्ट्री के कामकाज में कई कानूनी अड़चनें आ रही हैं। वकील साहब ने कहा है कि अगर यह सारा कारोबार मेरे नाम पर ट्रांसफर हो जाए, तो टैक्स और बैंक के झंझटों से मुक्ति मिल जाएगी। आप बस यहाँ दस्तखत कर दीजिए, बाकी मैं सब संभाल लूँगा।’ चित्रा, मैं उस वक्त इतने गहरे सदमे में थी कि मुझे दुनियादारी की कोई समझ ही नहीं थी। और भला मैं उस आलोक पर शक कैसे करती, जिसे मैंने अपने हाथों से निवाले खिलाए थे? मैंने बिना एक शब्द पढ़े उन कागजों पर अंगूठा और दस्तखत कर दिए।”

“हे भगवान! तुमने एक बार नीरज से भी नहीं पूछा?” चित्रा ने हैरानी से कहा।

वंदना के चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आ गई। “नीरज? चित्रा, सबसे गहरा घाव तो मुझे उसी ने दिया। महेंद्र के जाने के चार महीने बाद ही नीरज ने मुझे बताया कि उसकी कंपनी उसे ऑस्ट्रेलिया भेज रही है, वो भी हमेशा के लिए। मुझे लगा कि शायद वह माहौल बदलने के लिए मुझे भी साथ ले जाएगा। लेकिन जब मैंने पासपोर्ट बनवाने की बात छेड़ी, तो मेरी बहू शिखा ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘मम्मी जी, वहाँ की लाइफस्टाइल बहुत फास्ट है। वहाँ यहाँ की तरह नौकर-चाकर नहीं मिलते। हम दोनों जॉब करेंगे, तो आपको कौन संभालेगा? और वैसे भी, आपकी तो पूरी ज़िंदगी इसी हवेली में बीती है, यहाँ आलोक चाचू और दादी हैं तो सही।’ मैंने नीरज की आँखों में देखा, मुझे लगा वो अपनी पत्नी को टोकेगा, कहेगा कि मेरी माँ मेरे साथ जाएगी। लेकिन नीरज ने नज़रें झुका लीं और बोला, ‘हाँ माँ, शिखा ठीक कह रही है। मैं वहाँ सेटल होकर आपको हर महीने पैसे भेज दिया करूँगा।'”

“और उससे भी बड़ा सच मुझे तब पता चला, जब नीरज के जाने के बाद आलोक ने मुझे बताया कि नीरज तो जाने से पहले ही हवेली में अपने हिस्से के बदले आलोक से चालीस लाख रुपये नकद ले चुका था। मेरे अपने बेटे ने अपने पिता की निशानी और अपनी माँ के आश्रय का सौदा कर लिया था, और मुझे भनक तक नहीं लगने दी। जिस दिन नीरज ने एयरपोर्ट के लिए टैक्सी पकड़ी, उसने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा कि दहलीज पर खड़ी उसकी माँ की आँखें पथरा गई हैं।”

चित्रा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने वंदना का हाथ कसकर दबाया, “इतना बड़ा धोखा? तुम्हारे अपने बेटे ने?”

“हाँ चित्रा, पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई,” वंदना की आवाज़ अब सख्त हो चुकी थी। “नीरज के जाते ही आलोक और रुचि के चेहरे से शराफत का नकाब पूरी तरह उतर गया। जिस सास की मैंने तीस साल तक गंदगी साफ की, उन्होंने भी आलोक के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। वो कहतीं—’अब महेंद्र तो रहा नहीं, और तेरा बेटा तुझे छोड़ गया। अब आलोक ही इस घर का मालिक है, तो तुझे रुचि के हिसाब से ही चलना पड़ेगा।’ मुझसे घर की चाबियां छीन ली गईं। हवेली के जिस बड़े कमरे में मैं तीस साल रही, वहाँ से मेरा सामान निकालकर छत की सीढ़ियों के नीचे बने एक छोटे से स्टोर रूम में फेंक दिया गया, जहाँ ठीक से हवा भी नहीं आती थी। घर की पुरानी नौकरानी को हटा दिया गया और सारा काम मेरे मत्थे मढ़ दिया गया।”

“मैं सुबह से शाम तक उस बड़ी हवेली में झाड़ू-पोंछा करती, सबके कपड़े धोती और रसोई में घंटों खड़ी रहकर खाना बनाती। रुचि की किटी पार्टी होती, तो उसकी सहेलियों के सामने मुझे एक नौकरानी की तरह पेश किया जाता। अगर कभी सब्जी में नमक कम-ज्यादा हो जाता, तो आलोक सबके सामने मुझ पर चिल्लाता—’मुफ्त की रोटियां तोड़ने को मिल रही हैं, कम से कम काम तो ढंग से किया करो।’ मैंने नीरज को कई बार फोन लगाया, पर उसने मेरा नंबर ही ब्लॉक कर दिया। ननद शोभा, जिसके लिए मैंने अपने गहने बेच दिए थे, उसने भी फोन पर साफ कह दिया कि ‘भाभी, अब तुम आलोक पर बोझ बन गई हो, थोड़ा सहना तो पड़ेगा ही।'”

वंदना ने एक गहरी सांस ली। “मैं सब सह रही थी चित्रा, क्योंकि मेरे मन के किसी कोने में यह डर बैठा दिया गया था कि साठ साल की इस उम्र में एक विधवा औरत घर छोड़कर जाएगी कहाँ? समाज क्या कहेगा? लेकिन दो साल पहले, दिसंबर की एक कड़ाके की ठंड वाली रात ने मेरी ज़िंदगी बदल दी।”

“क्या हुआ था उस रात?” चित्रा ने साँस रोककर पूछा।

“उस दिन हवेली में आलोक की शादी की सालगिरह की पार्टी थी। मैंने सुबह से खड़े होकर पचास लोगों का खाना बनाया था। शाम होते-होते मुझे तेज बुखार चढ़ गया और सीने में तेज दर्द होने लगा। मैं अपनी कोठरी में जाकर लेट गई। बाहर लॉन में तेज संगीत बज रहा था, लोग हँस रहे थे, महंगे पकवान खा रहे थे, और मैं अंदर ठंड और बुखार से कांप रही थी। मेरा गला सूख रहा था, पास के जग में पानी खत्म हो चुका था। मैंने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला और आँगन से गुज़रती रुचि को आवाज़ दी—’बहू, मुझे बहुत तेज बुखार है, थोड़ा सा गर्म पानी और एक दवा की गोली दे दो।’ रुचि ने अपनी महंगी साड़ी का पल्लू संभालते हुए बेहद घृणा से मेरी तरफ देखा और बोली, ‘आपका तो रोज़ का नाटक है। देख नहीं रहीं मेहमान आए हैं? अभी मेरे पास फालतू वक्त नहीं है। दरवाज़ा बंद कर लीजिए, आपकी शक्ल देखकर मेहमानों का मूड खराब हो जाएगा।'”

वंदना की आँखों में उस रात का दृश्य फिर से जीवित हो उठा, लेकिन इस बार आँखों में आँसू नहीं, एक चिंगारी थी। “चित्रा, रुचि के उन शब्दों ने मेरे कानों में पिघले हुए शीशे का काम किया। उसने मेरे मुंह पर दरवाज़ा बंद कर दिया। मैं पूरी रात उस अंधेरी कोठरी में बुखार से तपते हुए फर्श पर पड़ी रही। उस रात मुझे मौत का डर नहीं लगा, बल्कि अपनी उस मूर्खता पर रोना आया जो मैंने पिछले बत्तीस सालों से ओढ़ रखी थी। मुझे समझ आ गया कि मैं किसी परिवार में नहीं रह रही हूँ, मैं तो गिद्धों के एक झुंड के बीच हूँ जो मेरे पति के जाने के बाद मेरी बची-खुची अस्मिता को नोच रहे हैं। उस रात जब घड़ी ने सुबह के चार बजाए, मेरा बुखार उतर चुका था, और उसके साथ ही मेरे सिर से ‘परिवार, त्याग और लोक-लाज’ का भूत भी हमेशा के लिए उतर गया था।”

“अगली सुबह जब सब सो रहे थे, मैंने अपनी एक पुरानी साड़ी की गठरी में अपने दो जोड़ी कपड़े बांधे। मेरे पास मेरी माँ के दिए हुए सोने के दो कंगन बचे थे, जिन्हें मैंने महेंद्र की तिजोरी में नहीं, बल्कि अपने भगवान के मंदिर के पीछे छुपा कर रखा था। मैंने वो कंगन निकाले, अपनी चप्पल पहनी और उस हवेली के मुख्य द्वार को खोलकर बाहर निकल आई। पीछे मुड़कर मैंने ‘कमल कुंज’ को आखिरी बार देखा—मुझे उस इमारत से अब कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि मेरा कर्ज तो उसी रात चुक गया था।”

“फिर तुम कहाँ गईं वंदना? इस उम्र में अकेले शुरुआत करना कितना मुश्किल रहा होगा!” चित्रा ने गर्व और आश्चर्य के मिले-जुले भाव से पूछा।

वंदना के चेहरे पर अब एक विजयी मुस्कान थी। “मुश्किल तो तब होता चित्रा, जब मेरे पास हुनर न होता। हवेली के लोग मेरी संपत्ति छीन सकते थे, पर मेरे हाथों का जादू नहीं। तुम्हें याद है न, मेरे हाथ के बने राजस्थानी अचार, पापड़ और मसालों की तारीफ पूरा शहर करता था? हवेली में रहते हुए भी आसपास के लोग त्योहारों पर मुझसे ही मसाले और अचार बनवाने की गुजारिश करते थे। बस, मैंने अपनी उसी कला को अपनी ताकत बनाया। मैंने जौहरी बाज़ार में जाकर माँ के वो दो कंगन बेचे। उससे मुझे जो पैसे मिले, उससे मैंने शहर के इस बाहरी इलाके में यह छोटा सा मकान किराए पर लिया और कुछ बड़े मर्तबान, कच्चे मसाले और सामान खरीदा।”

“शुरुआत में मैंने अकेले ही दिन-रात मेहनत की। सुबह मसाले कूटती, अचार डालती और दोपहर में खुद झोला उठाकर कॉलोनियों में और छोटे डिपार्टमेंटल स्टोर्स में सैंपल देने जाती। कई बार लोगों ने दरवाज़ा बंद कर लिया, कई बार पैरों में छाले पड़ गए, पर मैं रुकी नहीं। क्योंकि इस बार की थकान में अपमान नहीं था, इस बार की थकान में मेरे अपने स्वाभिमान की मिठास थी। धीरे-धीरे लोगों को मेरे हाथ के शुद्ध और पारंपरिक स्वाद की आदत पड़ने लगी। मात्र छह महीने में मेरे पास इतने ऑर्डर आने लगे कि मेरे अकेले के बस की बात नहीं रही।”

वंदना ने आँगन में सूख रहे लाल मिर्च और कैरी के मर्तबानों की तरफ इशारा करते हुए कहा, “तब मैंने अपनी जैसी उन औरतों को जोड़ना शुरू किया, जिन्हें उनके घरों में बेसहारा या कमज़ोर समझ लिया गया था। आज मेरे साथ बारह महिलाएं काम करती हैं। हमने अपने इस छोटे से काम को ‘अन्नपूर्णा स्वाभिमान केंद्र’ का नाम दिया है। आज उदयपुर के बड़े-बड़े होटलों और दुकानों में हमारे यहाँ के मसाले और अचार जाते हैं। पिछले ही महीने मैंने अपने खुद के कमाए पैसों से इस मकान का बयाना दे दिया है—अब यह किराए का नहीं, मेरा अपना घर है।”

चित्रा की आँखें खुशी के आँसुओं से डबडबा गईं। उसने उठकर वंदना को कसकर गले लगा लिया। “मुझे तुम पर बहुत गर्व है वंदना। पर क्या हवेली के लोगों को या नीरज को तुम्हारे बारे में पता है?”

वंदना हँस पड़ी, और उसकी उस हँसी में झरने जैसी पवित्रता थी। “पता कैसे नहीं होगा चित्रा? जब इंसान सफल होता है, तो उसकी खबर हवा से भी तेज़ फैलती है। कुछ महीने पहले आलोक के व्यापार में भारी घाटा हुआ क्योंकि उसे महेंद्र की तरह ईमानदारी से काम करना तो आता नहीं था। वह एक दिन यहाँ आया था, मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए कि ‘भाभी माँ, घर लौट चलिए, आपके बिना हवेली में बरकत नहीं रही।’ और पिछले हफ्ते ही नीरज का भी फोन आया था किसी दूसरे नंबर से, कह रहा था कि उसे अपनी गलती का एहसास है। लेकिन मैंने उन दोनों से बड़ी ही शांति से हाथ जोड़कर कह दिया—’जिस वंदना को तुम लोग ढूंढ रहे हो, वह दो साल पहले उसी स्टोर रूम में मर चुकी है। अब जो यहाँ रहती है, उसका अपने काम और अपनी इन बहनों के अलावा और कोई परिवार नहीं है।'”

वंदना ने कुल्हड़ की आखिरी चुस्की ली और चित्रा की आँखों में देखते हुए बोली, “चित्रा, वक्त ने मुझसे मेरा झूठा घमंड और खोखले रिश्ते ज़रूर छीन लिए, लेकिन बदले में मुझे मेरी असली पहचान लौटा दी। जब तक मैं दूसरों की बैसाखी पर टिकी थी, मैं अपाहिज थी। जिस दिन मैंने अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा, मुझे समझ आया कि आसमान कितना बड़ा है। आज मेरे पास हवेली नहीं है, पर सुकून की नींद है। आज मैं किसी की दया की पात्र नहीं, बल्कि बारह घरों के चूल्हे जलने का माध्यम हूँ। इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता है?”

शाम की सुनहरी धूप आँगन में फैल रही थी, और उस धूप में वंदना का चेहरा किसी तपे हुए कुंदन की तरह दमक रहा था।

क्या आपने भी अपने जीवन में या अपने आसपास किसी ऐसी महिला को देखा है जिसने अपनों के दिए घावों को अपनी ताकत बनाकर एक नई उड़ान भरी हो? क्या वाकई धन-दौलत के आगे खून के रिश्ते और माँ का त्याग इतना सस्ता हो जाता है? वंदना के इस फैसले पर आपकी क्या राय है—क्या उसे अपने बेटे और देवर को माफ कर देना चाहिए था या उसने जो किया वह बिल्कुल सही था? अपने विचार हमारे साथ कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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