अपनों का आईना

 शैलजा जी  अपनी लाडली बेटी नीति के ससुराल से लौटकर घर की दहलीज पर कदम रख रही थीं, तो उनके माथे की लकीरें और चेहरे की तमतमाहट साफ बता रही थी कि अंदर कोई बड़ा ज्वालामुखी फूटने को तैयार है। उन्होंने अपना हैंडबैग सोफे पर लगभग पटकते हुए रखा और पल्लू से माथे का पसीना पोंछने लगीं। बैठक में बैठे उनके पति, मनोहर जी, जो अपने चश्मे के भीतर से अखबार टटोल रहे थे, पत्नी के इस रौद्र रूप को देखकर तुरंत सतर्क हो गए। उन्होंने चश्मा उतारा, अखबार को तह करके मेज पर रखा और शांत स्वर में पूछा, “क्या बात है शैलजा? नीति के ससुराल में सब कुशल-मंगल तो है न? तुम इतनी भरी हुई क्यों लग रही हो?”

बस, मनोहर जी का इतना पूछना था कि शैलजा जी के सब्र का बांध टूट गया। वह पैर पटकते हुए सोफे पर धम्म से बैठ गईं और हाथ नचाते हुए बोलीं, “कुशल-मंगल? अजी, कुशल-मंगल तो तब हो न जब उस घर की मालकिन को चैन से बैठना आता हो! हद कर दी है नीति की सास ने तो। जब देखो तब शिकायतों का पिटारा खोले बैठी रहती हैं। अभी जुम्मा-जुम्मा चार महीने ही तो हुए हैं मेरी फूल सी बच्ची को ब्याह कर गए हुए, और इनकी अपेक्षाएं तो देखो, जैसे कोई मशीन खरीद कर लाए हों!”

मनोहर जी ने गहरी सांस ली। वह अपनी पत्नी के स्वभाव से भली-भांति परिचित थे। फिर भी बात को टटोलने के लिए बोले, “आखिर हुआ क्या है? कुछ खुलकर तो बताओ। निर्मला जी ने कुछ कहा क्या?”

“कुछ कहा होता तो मैं सह भी लेती जी, यहां तो पूरी रामकथा सुना दी गई!” शैलजा जी की आवाज में गुस्सा और बेटी के लिए मोह एक साथ छलक रहा था। “मैं तो सावन की मिठाई और तीज का सिंजारा देने गई थी। सोचा था बेटी से मिल लूंगी, दो घड़ी बैठकर सुख-दुख बतिया लूंगी। पर वहां कदम रखते ही समधन जी का मुंह ऐसे सूजा हुआ था जैसे मैंने उनकी तिजोरी मांग ली हो। बैठते ही शुरू हो गईं—’बहन जी, आपकी नीति को तो सुबह जल्दी उठने की आदत ही नहीं है। रसोई में जाती है तो आटा गूंथते वक्त आधा परात से बाहर गिरा देती है। कल हमारे देवर जी के घर से लोग आए थे, तो नीति ने न तो ठीक से बात की और न ही तरीके से चाय-नाश्ता परोसा।’ अब आप ही बताइए, इसमें मेरी बच्ची का क्या कसूर है?”

शैलजा जी सांस लेने के लिए रुकीं, तभी रसोई से कांच के गिलास की खनक सुनाई दी। घर की बड़ी बहू मृदुला चांदी की ट्रे में ठंडे पानी का गिलास और गुड़ का एक छोटा टुकड़ा लेकर बाहर आई। उसके चेहरे पर हमेशा की तरह एक सौम्य और शांत भाव था। सिर पर सलीके से पल्लू रखे मृदुला ने झुककर अपनी सास को पानी दिया, “मम्मी जी, पहले पानी पी लीजिए। धूप बहुत तेज है बाहर, आपका गला सूख रहा होगा।”

शैलजा जी ने बिना बहू की तरफ देखे गिलास उठाया और एक ही सांस में आधा पानी गटक गईं। गिलास वापस ट्रे में रखते हुए उनकी भड़ास फिर से निकलने लगी, “मृदुला, तू ही बता, क्या मेरी नीति को हमने कोई कामचोर बनाया है? अरे, अभी तो उसकी उम्र ही क्या है! बाईस साल की तो है मेरी बच्ची। एम.बी.ए. की परीक्षा खत्म भी नहीं हुई थी कि ये लोग हाथ धोकर पीछे पड़ गए थे। तब तो समधन जी के मुंह से शहद टपक रहा था—’बहन जी, हमें कोई कामवाली नहीं चाहिए, हमें तो बस आपकी जैसी सुशील और पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए जो घर की रौनक बढ़ाए। काम-काज तो धीरे-धीरे सीख ही जाएगी।’ और आज? आज चार महीने में ही उन्हें नीति में सौ कमियां दिखने लगीं!”

मृदुला ट्रे पकड़े वहीं पास में खड़ी रही। उसने धीमे और सधे हुए स्वर में कहा, “आप बिल्कुल सही कह रही हैं मम्मी जी। कोई भी लड़की मां के पेट से तो ससुराल के तौर-तरीके सीखकर आती नहीं है। हर घर का अपना अलग माहौल होता है, अपने अलग नियम होते हैं। हमारे यहां दाल में जीरे का तड़का लगता है, तो हो सकता है उनके यहां राई और करी पत्ते का लगता हो। अब इतनी छोटी-सी बात को समझने में और हाथ सधने में थोड़ा वक्त तो लगता ही है न।”

बहू के मुंह से अपनी बात का समर्थन सुनकर शैलजा जी को जैसे और बल मिल गया। उन्होंने पति की ओर देखते हुए कहा, “सुन रहे हैं आप? एक ये हमारी बहू है जो कितनी समझदारी की बात कर रही है, और एक वो नीति की सास हैं! कहती हैं कि नीति को रिश्तेदारी निभानी नहीं आती, बड़ों के सामने कैसे बैठा जाता है, कितना बोला जाता है, इसका ज्ञान ही नहीं है। अरे भाई, हमारे घर में हमने अपनी बेटी को लाड़-प्यार से रखा है, किसी फौज की ट्रेनिंग तो दी नहीं थी कि ससुराल जाते ही परेड करने लगेगी। पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अव्वल रही है, घर के कामों में हमने कभी उसे उलझाया ही नहीं। हमने सोचा था ससुराल जाएगी तो वक्त के साथ जब जिम्मेदारी सिर पर पड़ेगी, तो खुद-ब-खुद सब सीख लेगी। पर सास तो सास ही होती है न! जब तक बहू में चार खोट न निकाल ले, तब तक उन्हें रात को नींद कहां आती है!”

मनोहर जी चुपचाप सुन रहे थे, पर उनकी नजरें कभी अपनी पत्नी के तमतमाए चेहरे पर जातीं, तो कभी पास खड़ी अपनी बहू मृदुला के शांत चेहरे पर। मनोहर जी को दो साल पहले का वो वक्त याद आ रहा था जब मृदुला इस घर में नई-नई ब्याह कर आई थी।

तभी मृदुला ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “मम्मी जी, सास का स्वभाव ही शायद ऐसा हो जाता है। उन्हें लगता है कि जैसे वो पच्चीस साल से घर चला रही हैं, नई आने वाली लड़की भी पहले ही दिन से वैसे ही घर संभाल ले। वो ये भूल जाती हैं कि वो खुद भी कभी किसी घर से नई-नई आई थीं। लेकिन क्या कर सकते हैं, दुनिया की रीत ही ऐसी है। बेटी के मां-बाप को तो हमेशा झुककर ही रहना पड़ता है। आपने भी तो समधन जी की बातें चुपचाप सुन ली होंगी, आखिर नीति के घर की शांति का सवाल है।”

“चुपचाप? और मैं सुन लूं?” शैलजा जी के स्वर में अचानक एक दर्प जाग उठा। “अरे बहू, तुझे क्या लगता है मैं वहां सिर झुकाकर उनकी खरी-खोटी सुनकर आ गई? मेरी नीति कोई बिन मां-बाप की बच्ची नहीं है और न ही हमने उसे किसी के दरवाजे पर बोझ बनाकर फेंका है! मैंने भी समधन जी को दो टूक शब्दों में साफ-साफ सुना दिया। मैंने कह दिया—’देखिए समधन जी, हमारी बेटी अभी नादान है, बच्ची है। उसे प्यार से समझाएंगी तो वो अपनी जान भी हाजिर कर देगी, लेकिन अगर हर बात पर टोका-टाकी करेंगी और ताने मारेंगी, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। बहू भी इंसान होती है, कोई पत्थर की मूरत नहीं कि जब चाहा जैसे तराश दिया। थोड़ा धैर्य रखिए, हमारी बेटी सब सीख जाएगी, पर उसे वक्त दीजिए और मां का प्यार दीजिए, सास का रौब नहीं!'”

अपनी इस बहादुरी का किस्सा सुनाते हुए शैलजा जी की छाती गर्व से फूल गई थी। उन्हें लग रहा था कि आज उन्होंने एक मां होने का सबसे बड़ा फर्ज अदा किया है। उन्होंने अपनी बेटी के स्वाभिमान की रक्षा की है।

मृदुला के होंठों पर एक बहुत ही हल्की, पर गहरी मुस्कान तैर गई। उसकी आंखों में एक अजीब सी नमी और चमक एक साथ उभरी। उसने खाली गिलास को ट्रे में ठीक से रखते हुए बेहद शांत और मीठे स्वर में कहा, “वाह मम्मी जी! आपने तो बहुत ही हिम्मत का काम किया। काश! हर लड़की की किस्मत नीति जैसी होती और हर सास को समझाने के लिए आप जैसी कोई समधन सामने खड़ी होती।”

मृदुला एक पल के लिए रुकी, फिर उसने अपनी नजरें शैलजा जी की आंखों में डालते हुए आगे कहा, “आपने बिल्कुल सोलह आने सच बात कही मम्मी जी कि बहू को प्यार से समझाओ तो वो सब सीख जाती है। अब मुझे ही देख लीजिए न… जब मैं दो साल पहले राजकोट से ब्याह कर इस घर में आई थी, तो मुझे भी तो यहां के रीति-रिवाज कहां पता थे? मुझे याद है, शादी के पंद्रह दिन बाद ही जब मुझसे कढ़ी में नमक थोड़ा तेज हो गया था और मौसी जी के आने पर मैं घूंघट की लंबाई का ध्यान नहीं रख पाई थी, तो घर में कितना बड़ा तूफान खड़ा हो गया था।”

शैलजा जी के चेहरे का रंग धीरे-धीरे बदलने लगा। उनकी आंखों की पुतलियां स्थिर हो गईं।

मृदुला उसी सहजता से बोलती रही, “तब मेरी मम्मी भी ठीक आपकी ही तरह तीज का सामान लेकर मुझसे मिलने आई थीं। और तब आपने उन्हें इसी सोफे पर बिठाकर यही कहा था कि—’समधन जी, अपनी बेटी को कुछ सिखा-पढ़ाकर भेजा है या नहीं? न रसोई का सलीका है, न बड़ों के आदर का ढंग! हमारे घर की तो नाक ही कटवा दी आपकी लाडली ने।’ मम्मी जी, उस दिन मेरी मां की आंखों में भी आंसू थे, पर वो आपकी तरह तेज और स्वाभिमानी नहीं बन पाईं। उन्होंने आपके आगे हाथ जोड़ लिए थे और कांपती आवाज में कहा था कि—’बहन जी, बच्ची है, गलती हो गई, मैं इसे समझाऊंगी।’ और फिर वो मेरे कमरे में आकर मेरे गले लगकर खूब रोई थीं, पर जाते-जाते मेरे सिर पर हाथ रखकर यही कह गई थीं कि—’बेटा, ससुराल की मिट्टी में घुलने में वक्त लगता है। सास मां के समान होती है, उनकी बातों का बुरा मत मानना, बस मन लगाकर सब सीख लेना।’ देखिए मम्मी जी, आपकी डांट और मेरी मां के उन आंसुओं ने मुझे कितना कुछ सिखा दिया। आज मैं इस घर के सारे काम आपकी पसंद के हिसाब से कर लेती हूं न? आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, नीति भी बहुत समझदार है, वो भी मेरी तरह सब सीख जाएगी। बस फर्क इतना है कि नीति के आंसू पोंछने और उसकी ढाल बनने के लिए उसके पास आप जैसी मजबूत मां है, और मेरे पास… मेरे पास सिर्फ सब्र था।”

इतना कहकर मृदुला ने हल्की सी मुस्कान के साथ सिर झुकाया और कहा, “मैं आपके और पापा जी के लिए अदरक वाली चाय बना लाती हूं, आपका सिर दर्द कम हो जाएगा।” और वह सधे हुए कदमों से वापस रसोई की ओर बढ़ गई।

बैठक में अचानक एक गहरा सन्नाटा पसर गया। पंखे की सरसराहट के अलावा वहां कोई आवाज नहीं थी। शैलजा जी तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थीं। उनके चेहरे का सारा गुस्सा, सारा दर्प अचानक हवा हो गया था और उसकी जगह एक अजीब सी झेंप और उलझन ने ले ली थी। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि अभी-अभी जो हुआ, वो क्या था? क्या मृदुला ने उनकी हां में हां मिलाकर उन्हें तसल्ली दी थी, या फिर बहुत ही मखमली लपेटे में उन्हें उनके ही अतीत का ऐसा आईना दिखा दिया था जिसमें उनका अपना चेहरा बेहद कुरूप नजर आ रहा था?

शैलजा जी ने सकपकाते हुए पास बैठे मनोहर जी की ओर देखा और दबी जुबान में बोलीं, “अजी सुनते हो… ये मृदुला अभी-अभी क्या बोलकर गई है? आपको कुछ समझ में आया क्या? ये मेरी तरफदारी कर रही थी या मुझे ताना मार कर गई है?”

मनोहर जी ने अपने चश्मे को साफ करते हुए एक लंबी, अर्थपूर्ण मुस्कान बिखेरी और बोले, “भई शैलजा, इस घर में सबसे बड़ी और सबसे समझदार तो तुम ही हो। तुम्हारे रहते हमारी क्या मजाल कि हम किसी की बात का मतलब निकालें! वैसे बहू ने बात तो तुम्हारी ही दोहराई है, बस पात्र बदल गए हैं। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम इसे ताना समझकर गुस्सा करती हो, या आईना समझकर अपना चेहरा साफ करती हो।”

इतना कहकर मनोहर जी ने फिर से अखबार उठा लिया, लेकिन शैलजा जी के भीतर एक महाभारत शुरू हो चुका था।

उनका गुस्सा अब काफूर हो चुका था और उसकी जगह आत्मग्लानि की एक ठंडी लहर उनकी रीढ़ में दौड़ रही थी। वह उठकर अपने कमरे में चली गईं और बिस्तर पर बैठ गईं। कमरे की खिड़की से बाहर आंगन में लगे तुलसी के चौरे पर नजर पड़ते ही उन्हें पिछले दो साल की एक-एक घटना किसी फिल्म की रील की तरह अपनी आंखों के सामने घूमती दिखाई देने लगी।

उन्हें याद आया कि जब मृदुला इस घर में आई थी, तब वो भी तो महज तेईस साल की थी। अपने माता-पिता की इकलौती और लाडली बेटी। उसने भी अपनी पढ़ाई पूरी ही की थी कि मनोहर जी के दोस्त के जरिए ये रिश्ता आ गया था। तब शैलजा जी ने भी तो मृदुला के रूप-रंग और सादगी को देखकर तुरंत हां कर दी थी। लेकिन शादी के रस्मों-रिवाज खत्म होते ही शैलजा जी के भीतर की ‘सास’ जाग उठी थी।

उन्हें याद आया वो दिन, जब मृदुला से सुबह उठने में सिर्फ आधे घंटे की देरी हो गई थी, क्योंकि रात भर वो सिर दर्द से परेशान थी। तब शैलजा जी ने पूरे घर में बवाल मचा दिया था—’हमारे घर की बहुएं सूरज उगने के बाद तक बिस्तर नहीं तोड़तीं! मायके में क्या दोपहर तक सोने की आदत डाली गई थी?’ उस दिन मृदुला ने बिना कुछ कहे चुपचाप रसोई संभाली थी, जबकि आज जब नीति की सास ने यही शिकायत की, तो शैलजा जी ने तुरंत दलील दी थी कि—’आजकल के बच्चों को देर रात तक पढ़ने की आदत होती है, तो सुबह आंख खुलने में वक्त लग जाता है, इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?’

एक और दृश्य शैलजा जी की आंखों के सामने तैर गया। पिछले साल दिवाली पर जब मृदुला ने गुजिया बनाई थी और उसका आकार थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा हो गया था, तो शैलजा जी ने पड़ोस की औरतों के सामने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा था—’अजी, आजकल की लड़कियों को किताबी ज्ञान तो खूब होता है, पर रसोई में भेज दो तो नक्शे बना देती हैं।’ उस वक्त मृदुला किस तरह अपमान का घूंट पीकर रसोई में छुपकर रोई थी, ये शैलजा जी ने देखा तो था, पर अनदेखा कर दिया था। उन्हें लगा था कि सख्ती नहीं बरतेंगी तो बहू सिर पर चढ़ जाएगी।

और आज? आज जब नीति की सास ने कहा कि नीति से रोटियां गोल नहीं बनतीं और आटा बाहर गिर जाता है, तो शैलजा जी का कलेजा मुंह को आ गया था! उन्हें नीति के कोमल हाथों में पड़ने वाले छालों की चिंता सताने लगी थी।

“हे भगवान! ये दोहरा मापदंड क्यों?” शैलजा जी ने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उनकी आंखों से पश्चाताप के गर्म आंसू बहकर गालों पर लुढ़कने लगे। “जब अपनी कोख से जन्मी बेटी ससुराल गई, तो उसकी हर गलती मुझे उसकी मासूमियत, उसकी नादानी और उसकी कच्ची उम्र का तकाजा लगने लगी। उसके लिए मुझे उसकी सास में एक क्रूर और पत्थरदिल औरत नजर आने लगी। लेकिन जब किसी दूसरे की कोख से जन्मी फूल सी बच्ची मेरे आंगन में आई, तो मैंने पहले ही दिन से उससे ये उम्मीद क्यों पाल ली कि वो एक मंझी हुई गृहिणी की तरह मेरा सारा बोझ अपने कंधों पर उठा लेगी? क्यों मैंने उसके आंसुओं को उसका ढोंग समझा और अपनी बेटी के आंसुओं को मोती?”

शैलजा जी के भीतर बैठी ‘सास’ और ‘मां’ आज आमने-सामने खड़ी थीं, और मां के तर्कों के आगे सास का अहंकार चूर-चूर हो रहा था। उन्हें मृदुला की मां का वो झुका हुआ सिर और कांपते हुए हाथ याद आ रहे थे। उस बेचारी मां ने तो अपनी बेटी के घर को बसाए रखने के लिए शैलजा जी के कठोर शब्दों को भी प्रसाद समझकर निगल लिया था। उन्होंने तो पलटकर शैलजा जी को यह नहीं कहा था कि ‘मेरी बेटी भी अभी बच्ची है।’ और मृदुला? मृदुला ने इन दो सालों में एक बार भी अपने पति से या अपने मायके में शिकायत नहीं की। उसने हर ताने को अपनी सीख बनाया, हर कड़वे घूंट को अपनी ताकत बनाया और इस घर को अपने प्यार और धैर्य से सींच दिया।

“और आज भी… आज भी जब उसने मुझे सच दिखाया, तो कितनी शालीनता से! न आवाज ऊंची की, न शब्दों में जहर घोला, बस अपनी पीड़ा को मेरी बेटी के दर्द के साथ रखकर मुझे तौलने के लिए छोड़ दिया।” शैलजा जी का हृदय ग्लानि से भर उठा। उन्हें एहसास हुआ कि अगर वह आज नहीं बदलीं, तो वह न कभी एक अच्छी सास बन पाएंगी और न ही अपनी बेटी के लिए एक सही मार्गदर्शक।

तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। शैलजा जी ने जल्दी से अपने पल्लू से आंखें पोंछीं। मृदुला हाथ में चाय का कप लिए अंदर आई। “मम्मी जी, चाय। पापा जी को दे दी है मैंने। आप यहां अकेले अंधेरे में क्यों बैठी हैं? तबीयत तो ठीक है न आपकी?” मृदुला के स्वर में कोई बनावट नहीं थी, बस एक सच्ची चिंता थी।

मृदुला ने जैसे ही मेज पर चाय का कप रखा और मुड़ने लगी, शैलजा जी ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। मृदुला ठिठक कर रुक गई। उसने देखा कि उसकी सास की आंखें लाल थीं और गालों पर आंसुओं के सूखे निशान थे।

“मम्मी जी, क्या हुआ? आप रो रही हैं? मेरी किसी बात का बुरा लग गया क्या आपको? मुझे माफ कर दीजिए मम्मी जी, मेरा इरादा आपका दिल दुखाने का बिल्कुल नहीं था, वो तो बस बातों-बातों में…” मृदुला घबरा कर बोल पड़ी और झुककर शैलजा जी के पैर छूने लगी।

शैलजा जी ने उसे बीच में ही रोक लिया और अपने दोनों हाथों से उसके कंधे पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया। सास के इस अप्रत्याशित आलिंगन से मृदुला सन्न रह गई। शैलजा जी की रुलाई फूट पड़ी। वह मृदुला की पीठ सहलाते हुए भर्राई आवाज में बोलीं, “माफी तो मुझे मांगनी चाहिए तुझसे मेरी बच्ची! तूने मेरा दिल नहीं दुखाया, बल्कि मेरी आंखों पर बंधी उस पट्टी को खोल दिया है जो मेरे अहंकार ने बांध रखी थी। मैं कितनी अंधी हो गई थी मृदुला! अपनी बेटी की उंगली में कांटा भी चुभा तो मेरी जान निकल गई, और तुझे मैं दो साल से रोज अपने तानों के शूल चुभोती रही, फिर भी तेरे चेहरे से मुस्कान नहीं गई।”

मृदुला की आंखों से भी आंसू बह निकले। उसने अपनी सास को कसकर पकड़ लिया, “ऐसा मत कहिए मम्मी जी, आप तो मेरी मां जैसी हैं। बड़ों का तो हक होता है समझाने का।”

शैलजा जी ने उसे अपने से थोड़ा अलग किया और अपने आंचल से उसके आंसू पोंछते हुए कहा, “नहीं मृदुला, आज तक मैं सिर्फ तेरी ‘सास’ थी, ‘मां’ तो मैं आज बनी हूं। जब तक इंसान खुद उस जगह खड़ा न हो, उसे दूसरे के जूतों में चुभने वाले कंकड़ का अहसास नहीं होता। नीति के ससुराल जाकर जब मुझे उसकी सास के रूप में अपना ही अक्स दिखाई दिया, तब भी मेरा अहंकार मुझे सच देखने नहीं दे रहा था। पर तेरी दो बातों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मुझे माफ कर दे बेटा, मैंने तुझे और तेरी मां को बहुत दुख दिया है।”

दरवाजे की चौखट पर खड़े मनोहर जी चाय का कप हाथ में लिए इस पावन दृश्य को देख रहे थे। उनकी आंखों के कोर भी भीग गए थे। उनके घर में आज सही मायनों में सुख और शांति का प्रवेश हुआ था।

शैलजा जी ने अपने आंसू पोंछे और एक दृढ़ निश्चय के साथ अपना फोन उठाया। उन्होंने पहले अपनी समधन, यानी मृदुला की मां का नंबर लगाया। फोन उठते ही शैलजा जी ने बिना किसी भूमिका के कहा, “प्रणाम समधन जी। आज मैं आपसे अपने पिछले दो सालों के व्यवहार के लिए हाथ जोड़कर माफी मांगती हूं। आपने तो मुझे एक हीरे जैसी बेटी सौंपी थी, पर मुझ नादान को ही उसकी परख करने में दो साल लग गए। आज मैं आपसे वादा करती हूं, आज के बाद आपकी बेटी के हिस्से में इस घर से सिर्फ मां का प्यार आएगा, सास का कोई ताना नहीं।” उधर से मृदुला की मां की सिसकियों और आशीर्वाद की आवाजें आ रही थीं, और इधर मृदुला अपनी सास के गले लगकर भावुक हो रही थी।

फोन रखने के बाद शैलजा जी ने दूसरा नंबर अपनी बेटी नीति का लगाया। नीति ने फोन उठाते ही शिकायत भरे लहजे में कहा, “मम्मी, आपके जाने के बाद मम्मी जी का मुंह और फूल गया है। मैं यहां नहीं रह सकती, आप मुझे ले जाइए…”

शैलजा जी ने बहुत ही शांत, पर सधे हुए स्वर में अपनी बेटी को बीच में ही टोका, “नीति बेटा, मेरी बात बहुत ध्यान से सुन। आज मैं वहां तेरी सास से लड़कर अपनी ममता का फर्ज तो निभा आई, पर एक मां का असली धर्म निभाना भूल गई थी। बेटा, कोई भी इंसान या कोई भी घर परफेक्ट नहीं होता। जैसे तुझे वहां के माहौल में ढलने में वक्त लग रहा है, वैसे ही तेरी सास को भी एक नए इंसान को अपने आंगन में स्वीकार करने में वक्त लग रहा है। आज भाभी ने मुझे बहुत बड़ी बात सिखाई है। ससुराल की पगडंडी पर कांटे तो मिलते हैं बेटा, पर उन्हें अपने सब्र और प्यार से फूल बनाना पड़ता है। मैं तेरी सास से अभी फोन करके अपने कड़वे शब्दों के लिए माफी मांगूंगी और उन्हें प्यार से समझाऊंगी कि वो तुझे थोड़ा वक्त दें। लेकिन तुझे भी मुझसे एक वादा करना होगा कि तू हर छोटी बात को शिकायत नहीं बनाएगी, बल्कि अपनी भाभी मृदुला की तरह अपने गुणों और धैर्य से सबका दिल जीतेगी। समझी?”

फोन के उस पार नीति कुछ पल के लिए चुप रही, फिर धीमे से बोली, “जी मम्मी, मैं कोशिश करूंगी।”

शैलजा जी ने फोन रखा, तो उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके सिर से कई मन का बोझ उतर गया हो। उन्होंने मृदुला की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोलीं, “चाय तो ठंडी हो गई बहू… नहीं, मेरी बेटी। चल, आज रसोई में हम दोनों मां-बेटी मिलकर गरमा-गरम पकोड़े और चाय बनाते हैं। और हां, आज कढ़ी में नमक तू अपने हिसाब से डालना, मुझे तेरे हाथ का हर स्वाद मंजूर है।”

मृदुला खिलखिला कर हंस पड़ी और मनोहर जी ने संतोष की सांस लेते हुए कहा, “चलो, देर आए दुरुस्त आए। आखिर हमारे घर की सबसे समझदार महिला को बात समझ में आ ही गई!”

उस शाम उदयपुर के उस घर की रसोई से सिर्फ पकौड़ों की खुशबू ही नहीं आ रही थी, बल्कि दो औरतों के बीच पनपे एक नए, पवित्र और अटूट रिश्ते की महक भी पूरे आंगन में फैल रही थी।

आपकी क्या राय है?

दोस्तों, शैलजा जी को तो समय रहते अपनी बहू मृदुला की बातों का मर्म समझ में आ गया और उन्होंने अपनी गलती सुधार ली। लेकिन क्या हमारे समाज में आज भी ‘बेटी’ और ‘बहू’ को तौलने के तराजू अलग-अलग नहीं हैं? आपको मृदुला का अपनी सास को सच का आईना दिखाने का यह शांत और संस्कारी तरीका कैसा लगा? क्या शैलजा जी ने अंत में अपनी बेटी नीति को जो सीख दी, वह सही थी? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके कमेंट्स का हमें बेसब्री से इंतजार रहेगा!

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 मूल लेखिका : सविता गोयल 

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